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पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary

राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished69 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 69 में से

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पृष्ठ 30

Here is the complete, line-by-line transcription of the Sanskrit verses and Hindi commentary from the provided image:


[Left Page: ३६ - पाकदर्पणम्]

लिस कर दे तथा घी के साथ भूने । जब केशर के वर्ण का हो जाय तब उतार
ले । इसके बाद उसमें कर्पूर, कस्तूरी, केशर, शीतल जल, नींबू के दल के टुकड़े,
केवड़ा का फूल, कुम्भी तथा कुस्तुम्बुरी इन सबों को छोड़ दे। इसके बाद उत्तम
पाचक पूगपट्ट के नेत्र से वेष्टित कर दे और अच्छी तरह वेष्टित पोटली को संतप्त
घी में छोड़ दे । तदनन्तर उनमें से निकाल कर खाने को दे । यह कटहल फल
का शाक हल्का होता है और पित्त को दूर करने वाला, वीर्यवर्द्धक, वातनाशक,
बलप्रद, जाठराग्निदीपक, पाचक तथा रुचिकारक होता है ॥ २४८-२४६ ॥

प्रकारान्तरेण पनशशाकनिर्माणविधिः
शकलानि सुपक्वानि समादायाथ कानिचित् ।
पूर्ववच्छेद नं कुर्यात् सम्भारादींश्च पूर्ववत् ॥ २४७ ॥
सितखण्डान् पुनस्तत्र चिञ्चाम्लेन समक्षिपेतू ।
भर्जयेत् पूर्ववत्तानि रामठाद्यं च सूदराट् ॥ २४८ ॥
घनसारदिना सम्यक् पुनस्तान्यधिवासयेत् ।
नेत्रेण वेष्टयेत्तानि पूगपट्टस्य बुद्धिमान् ॥ २४९ ॥
पूर्ववत् पोटलीं कृत्वा तप्ते सर्पिषि निक्षिपेत् ।
प्राप्ते भोजनकाले तु प्रदद्याद्भोजनार्थिने ॥ २५० ॥
अन्य प्रकार से कटहल का शाक बनाने की विधि—अच्छी तरह परिपक्व
कटहल के कुछ टुकड़ों को लेकर पूर्ववत् काट ले और सम्भार (हल्दी, हींग,
मसाला आदि) पूर्ववत् मिला दे। पुनः उसमें शक्कर को इमली की खटाई के साथ
छोड़ दे । इसके बाद उत्तम पाचक पूर्ववत् घी तथा हींग के साथ भून ले। पुनः
कर्पूर आदि सुगन्धित द्रव्यों से उनको सुवासित कर ले । इसके बाद पूगपट्ट के नेत्र
से उनको वेष्टित करे और पूर्ववत् पोटली बनाकर संतप्त घृत में छोड़ दे । तदन-
न्तर भोजन के समय खानेवाले को दे ॥ २४७-२५० ॥

पनसस्यान्यमिष्टपाकनिर्माणप्रकारो गुणाश्च
शर्कराखण्डयुक्तानि फलानि पनसस्य च ।
दर्शनाय विधिः केषामुच्यते सविशेषतः ॥ २५१ ॥
कानिचिच्छकलान्यस्य आदाय च्छेदयेत्पुनः ।
नवेन सर्पिषा विद्वान् भर्जयेत्तानि बुद्धिमान् ॥ २५२ ॥
सम्भारादीन् मरिच्यादीन् कृत्वा भाण्डेऽथ मेलनम् ।
क्षीरेण सह खण्डांश्च नारिकेलफलस्य च ॥ २५३ ॥


[Right Page: ३७ - नलविरचितम्]

आर्द्रवीलेपमाशीतपूगपट्टस्य निक्षिपेत् ।
मूत्रस्रावी मलस्रावी रक्तजः पित्तजस्तथा ॥ २५४ ॥
कटहल का मीठा पाक बनाने का प्रकार तथा गुण—शक्कर से युक्त कटहल
के फलों को दिखाने के लिए कुछ पाक-निर्माण को विधि विशेषप्रकार से कह रहे
है । कटहल के परिपक्व कुछ टुकड़ों को लेकर पुनः छोटा-छोटा काटे और बुद्धि-
मान् पाचक उनको नवीन घी के साथ भून ले । इसके बाद उसमें मरिच, जीरा
आदि मसाला सामग्री को पात्र में रखकर मिला दे और दूध के साथ नारियल के
फल के टुकड़ों एवं शक्कर को मिलाकर पूगपट्ट में दव लेप पकाये तथा शीतल होने
तक छोड़ दे । इसका प्रयोग मलस्रावी, मूत्रस्रावी, रक्तज एवं पित्तज रोग में
करे ॥ २५१-२५४ ॥

निष्पावफलयुक्तपनसफलपाकप्रकारो गुणाश्च
निष्पावफलमानीय कोमलं क्रिमिवर्जितम् ।
त्वचमुत्सृज्य तद्बीजं आहरेच्छोधयेद्बुधः ॥ २५५ ॥
पचेत्तत्प्रवणीभाण्डे क्षतेनैव ततः परम् ।
नारिकेलफलं क्षोरं वटकान् पेषयेत्तिलान् ॥ २५६ ॥
मरीचान् सर्षपान् पिष्ट्वा कल्कं तत्र विनिक्षिपेत् ।
पुनः क्षीरं समासिच्य सुगन्धञ्च निषिञ्चयेत् ॥ २५७ ॥
रामठं क्षीरमासिच्य तानि पक्वावतारयेत् ।
ततश्च घनसारार्याः सूदस्तान्यधिवासयेत् ॥ २५८ ॥
ततस्तत्पूगपट्टेन वेष्टयित्वा प्रदापयेत् ।
इदं स्वादुतरं हृद्यं कषायं गुरुपित्तकृत् ॥ २५९ ॥
वृष्यं बल्यं कफहरं समीरणविवर्धनम् ।
एवं च वननिष्पावं पक्वं सम्यक् प्रदापयेत् ॥ २६० ॥
इदञ्च वननिष्पावं स्निग्धं स्वादुतरं परम् ।
समीरणहरं वृष्यं पित्तश्लेष्मकरं हितम् ॥ २६१ ॥
निष्पाव फलयुक्त कटहलफल का पाक निर्माण प्रकार तथा गुण—बुद्धिमान्
पाचक क्रिमिरहित निष्पाव (भटवांस) के कोमल फल को लेकर उसकी त्वचा
को निकाल कर फेंक दे तथा उसके बीज को लेकर शोधन कर ले । इसके बाद
पूर्वोक्त परिपक्व कटहल के फल को बटलोही में क्षत (खण्डित) भटवांस के
साथ पकाये । इसके बाद नारियल के फल, दूध, वटक (कोहड़बटी) तथा तिल
को पीसकर कल्क बना ले और मरिच एवं सरसों को भी पीसकर कल्क बना ले ।