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पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary

राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished69 पृष्ठ

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४० पाकदर्पणम्
रक्तक्षुद्रबृहतीफलस्यान्यपाकविधिः
ततश्च कानिचित्तेषां तदा सर्पिषि भर्जयेत् ।
ततश्च प्रवणीभाण्डे क्षीरमासिच्य यत्नतः ॥ २७४ ॥
सर्षपांश्च मरीचींश्च नारिकेलफलस्य च ।
तिलस्य कल्कमालोड्य जालिन्या तद्विशोधयेत् ॥ २७५ ॥
तत्पुनः क्वाथयित्वात्र तानि न्यस्यावतारयेत् ।
प्रक्षाल्य प्रवणीमन्यां घृतमासिच्य सूदवित् ॥ २७६ ॥
रामठञ्च विनिक्षिप्य माषस्य वटकान् क्षिपेत् ।
पर्पटस्य कणान् क्षिप्त्वा दर्या तानि विघट्टयेत् ॥ २७७ ॥
तत्क्वाथं तत्र निक्षिप्य सम्यक् कृत्वावतारयेत् ।
वाससा पूर्ववत् कृत्वा वेष्टयित्वावतारयेत् ॥ २७८ ॥
लाल क्षुद्रबृहतीफल का अन्य प्रकार का पाक बनाने की विधिः--पूर्वोक्त
लाल क्षुद्र बृहतीफल में से कुछ लेकर घी में भून लें । इसके बाद प्रवणी भाण्ड
( बटलोही ) में प्रयत्नपूर्वक दूध छोड़कर सरसों, मरिच, नारियल का फल तथा
तिल का कल्क मिलाकर छलनी से छान ले । इसके बाद क्वाथ बनाकर उसमें उन
घृतभृष्ट बृहती फल को छोड़कर उतार ले और दूसरी बटलोही को प्रक्षालन कर
उसमें पाकशास्त्र को जानने वाला पाचक घृत छोड़कर हींग छोड़े तथा उड़द के
वटकों को छोड़ दे और पर्पट ( पापड़ ) के टुकड़ों को छोड़कर कलछुल से घोट
दे । इसके बाद पूर्वोक्त क्वाथ को उसमें छोड़कर तथा अच्छा बनाकर उतार ले ।
'पुनः वस्त्र से पूर्ववत् बनाकर तथा वेष्टित कर उतार ले ॥ २७४-२७८ ॥
क्षुद्रबृहतीफलपाकस्य गुणाः
पित्तघ्नं दीपनं भेदि वातघ्नं बृहतीफलम् ।
गुल्मशोथज्वरश्वासकासघ्नं वह्निदीपनम् ॥ २७९ ॥
रुच्यं पथ्यं ज्वरार्शोघ्नं स्यात्क्षुद्रबृहतीफलम् ।
सनाभफलमतनु कृमिहीनं सुकोमलम् ॥ २८० ॥
कफपित्तहरं तिक्तं समीरणहरं तथा ।
बहुकण्टफलं पक्वं सक्षीरं पित्तवर्द्धनम् ॥ २८१ ॥
रक्त क्षुद्र बृहतीफल के पाक का गुण-क्षुद्र बृहती फल पाक पित्तनाशक,
जाठराग्निदीपक, मलभेदक तथा वातनाशक है । यह गुल्म रोग, शोथ, ज्वर,
श्वासवृद्धि, तथा कास नाशक है। अग्नि दीपक, रुचिकारक, पथ्य, ज्वर तथा
अर्शनाशक होता है। नाभिसहित, बड़ा, कृमिरहित तथा कोमलफल तिक्त रस-
नलविरचितम् ४१
वाला, कफ-पित्त को दूर करने वाला तथा वातनाशक है। दूधयुक्त पका हुआ
बहुत काँटों वाला फल पित्तवर्द्धक होता है ॥ २७९-२८१ ॥
कटुकीफलस्य पाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
कोमलानि समादाय कटुकस्य फलानि च ।
( पूर्ववद्विपचेत्सूदो गुणधर्मं प्रवक्ष्यते )
तिक्तं हृद्यं कफहरं कुष्ठजिज्ज्वरनाशनम् ॥ २८२ ॥
कासश्वासारुचिहरं समीरणहरं तथा ।
कटुकीफलं च पक्वञ्चेत् गुरु विष्टम्भि पित्तकृत् ॥ २८३ ॥
कटुकी-फल-पाक बनाने की विधि तथा गुण-कटुकी का कोमल फल
लेकर पूर्ववत् ( बृहती फल सदृश ) पाक करें। उसका गुण आगे कहते हैं। कटुकी
फल पाक स्वाद में तिक्त, हृदय को बल देनेवाला, कफ को दूर करनेवाला, कुष्ठ
रोग को जीतने वाला तथा ज्वरनाशक है। यह कास ( खांसी ), श्वास रोग
अरुचि तथा वात रोग को दूर करने वाला है। पके कटुकी फल का पाक गुरु
( गरिष्ठ ) विष्टम्भि ( विबन्धकारक ) तथा पित्तकारक होता है ॥ २८२-२८३ ॥
एरण्डबालफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
एरण्डस्य फलं बालं पचेदेवं विधानतः ।
दीपनं पाचनं रुच्यं समीरणहरं परम् ॥
श्लेष्मक्रिमिहरं रुच्यं मूत्ररोगहरं तथा ॥ २८४ ॥
बालएरण्डफल के पाक की निर्माण विधि तथा गुण-एरण्ड ( रेड ) के
बाल फल को लेकर पूर्वोक्त विधि के अनुसार पकावे । यह एरण्डफलपाक जाठ-
राग्निदीपक, पाचक, रुचिकारक, अच्छी तरह वातशामक, कफविकार तथा क्रिमि-
रोग को दूर करनेवाला, रुचिकारक तथा मूत्रविकार को नाश करनेवाला है ॥
शिग्रुफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
ततः शिग्रुफलं रम्यं पचेदानीथ पूर्ववत् ।
वासेनावेष्टनं दान पूर्ववद्धि पचेद् बुधः ॥ २८५ ॥
दीपनं वातपित्तघ्नं वृष्यं वर्ण्यप्रमेहजित् ।
चक्षुष्यं शुक्रदं रुच्यं बृंहणं श्लेष्मनुत्तथा ॥ २८६ ॥
सहिजनफल की पाकनिर्माणविधि तथा गुण-सहिजन का मनोहर (सुन्दर)
फल लेकर पूर्ववत् पकावे । इसके बाद वस्त्र से आवेष्टित कर पूर्वबृहतीफलपाक के
सदृश पकावे और खाने के लिये दे । यह दीपक, वात-पित्तनाशक, वीर्यवर्द्धक,