पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
पाकदर्पणम् (पृष्ठ २)
पाकदर्पणम्
सर्वेषां व्यञ्जनानाञ्च संस्कारं लवणादिभिः ।
एभिर्विना च तोयैश्च चित्रपाकं रसावहम् ॥ ५ ॥
सभी व्यञ्जनों का संस्कार लवणादिरसद्रव्यों से होता है। इन नवों के
बिना तथा जल से भी पाक होता है और चित्रपाक उत्तम रस लाने वाला
होता है ॥ ५ ॥
यानि शिल्पानि लोकेऽस्मिन् यच्चान्यदपि दुर्लभम् ।
मया कृतरसः किञ्च सुधाताभ्यश्च दुर्लभः ॥ ६ ॥
इस संसार में जितने भी शिल्पी कर्म हैं और भी जो कुछ दुर्लभ हैं तथा
पाकसम्वन्धित शिल्पकर्म हैं उन रसपाककार्य को भी मैंने बनाया है। वह कार्य
अच्छे धातुओं (पदार्थों) से भी बनना दुर्लभ है ॥ ६ ॥
भुज्यते येन यत्नेन तस्यारोग्यं भवेद्ध्रुवम् ।
वातजं पित्तजं रोगं श्लेष्मजं हन्ति सर्वदा ॥
सकृन्निषेवणेनैव त्रिपुरं त्र्यम्बको यथा ॥ ७ ॥
मेरे द्वारा बनाये हुए सरस पाक को जो व्यक्ति प्रयत्न पूर्वक खाता है
उसको अवश्य ही आरोग्य प्राप्त होता है। एक ही बार सेवन करने से वातज,
पित्तज तथा कफज रोगों को हमेशा नष्ट करता है। जैसे शंकर जी त्रिपुर नामक
राक्षस को एक ही बार में नष्ट कर दिये थे ॥ ७ ॥
अजीर्णदोषादुत्पन्नं ज्वरं माहेश्वरादिकम् ।
हृद्रोगं राजयक्ष्मादिरोगं शूलादिकं ततः ॥ ८ ॥
भगन्दरातिसारञ्च सन्निपातादिकं तथा ।
इत्थमेवादिकं सर्वं रोगजालं निहन्ति सः ॥ ९ ॥
यह रसपाक अजीर्ण आदि दोष से उत्पन्न माहेश्वर¹आदि ज्वर, हृदयरोग,
राजयक्ष्मा, श्वास, कास आदि रोग, शूल, उदरशूल, अंगशूल आदि रोग,
भगन्दर, अतिसार तथा सान्निपातिक रोग, इसी प्रकार के सभी रोग समूहों को
नष्ट करता है ॥ ८-९ ॥
सर्वं यतिष्ये तत्कर्तुं ऋतुपर्ण ! भरस्व माम् ।
इत्युक्त्वां वसतीं चक्रे ऋतुपर्णस्य वेश्मनि ॥ १० ॥
हे राजा ऋतुपर्ण ! पूर्वोक्त सभी प्रकार के कर्मों को करने का मैं प्रयत्न
१. दक्षापमानसंक्रुद्धरुद्रनिःश्वाससम्भवः ।
ज्वरोऽष्टधा पृथग्द्वन्द्वसंघातागन्तुजः स्मृतः ॥
(मा० नि० ज्व० नि० १)
नलविरचितम् (पृष्ठ ३)
नलविरचितम् ३
करूँगा, आप मेरा भरण-पोषण करें। यह कहकर नल राजा ऋतुपर्ण के घर में
रहने लगे ॥ १० ॥
नल-ऋतुपर्णयोः सम्वादः
ऋतुपर्ण उवाच
तं कदाचित्समाहूय स राजा राजसत्तमः ।
एताः कलाः कुतो लब्धास्त्वमस्माकं वद प्रियम् ॥ ११ ॥
नल तथा राजा-ऋतुपर्ण का सम्वाद—किसी समय राजाओं में श्रेष्ठ राजा
ऋतुपर्ण नल को बुलाकर पूछे कि हे नल तुम इन कलाओं को कहाँ से प्राप्त किये
हो, इस प्रिय कथा को हमसे कहो ॥ ११ ॥
नल उवाच
श्रुत्वा तद्वचनं साधुस्तद्वक्तुमुपचक्रमे ।
शृणु राजेन्द्र! विद्याया निदानं मम तत्त्वतः ॥ १२ ॥
राजा के वचन को सुनकर नल बोले—हे राजन् ! मेरे इन विद्याओं को प्राप्त
करने का आदि कारण विधिवत् सुनें ॥ १२ ॥
स्वयम्बरार्थं वैदर्भ्याः समायाताः सुरेश्वराः ।
अहमप्यागतस्तत्र दृष्ट्वा दृष्टश्च तैः पथि ॥ १३ ॥
हे राजन् ! वैदर्भी (दमयन्ती) के स्वयंवर के लिये सुरेश्वर (इन्द्रादि)
देवता आये। वहाँ पर वे लोग मार्ग में ही सौभाग्यवश मुझे देख लिये ॥ १३ ॥
मामूचुस्तत्र वै देवा वञ्चनार्थमिदं वचः ।
अस्मान् वै पुरुषव्याघ्र यथा भैमी वरिष्यति ॥ १४ ॥
तथा कुरु वतेत्युक्ते स्वस्ति तेऽस्त्विति चाब्रुवन् ।
वे इन्द्रादिक देवता वहाँ पर ठगने के लिये मुझसे कहे कि हे पुरुषों में श्रेष्ठ
नल ! दमयन्ती हम लोगों को ही जैसे वरण करे वैसा करें। 'करूँगा' ऐसा कहने
पर 'तुम्हारा कल्याण हो' ऐसा बोले ॥ १४ ॥
दूतरूपं समाभृत्य मामकार्थी यथार्थतः ॥
ते नैषधं समालोक्य वरान् ददुरनुत्तमान् ॥ १५ ॥
इन्द्रादि देवगण मेरे स्वीकार करने पर दूत के रूप में यथार्थ में मुझे ही
खोजनेवाले मुझ नल को देखकर उत्तम वरों को दिये ॥ १५ ॥
इन्द्रादि लोकपालप्रदत्तवरनिरूपणम्
अदृश्यसिद्धिं प्रथममिन्द्रस्तुष्टोऽददात्स्वयम् ।
३ पा.द.
पाकदर्पणम्
ततो हविर्भुजः प्रादादग्निसिद्धिं निरिन्धनीम् ॥ १६ ॥
ततोऽन्नग्ससिद्धिंश्च सूर्य्यपुत्रश्च लौकिकीम्।
वरुणो जलसिद्धिञ्च विना यत्नेन सत्तम ॥ १७ ॥
इति विद्याः सुरास्ते तु दत्त्वा निजपदं ययुः ।
इति तस्य वचः श्रुत्वा राजा त विस्मितोऽब्रवीत ॥ १८ ॥
इन्द्रादि लोकपालों के द्वारा दिये वरों का निरूपण—हे राजन् ! सबसे
पहले इन्द्र संतुष्ट होकर स्वयं अदृश्यसिद्धि (अदृश्य विद्या) को दिये। इसके
बाद अग्निदेव बिना लकड़ी के ही अग्नि उत्पन्न कर देने की शक्ति (अग्निसिद्धि)
को दिये। तत्पश्चात् सूर्य पुत्र (यमराज) लौकिक अन्नसिद्धि (अनेक प्रकार के
अन्न-व्यञ्जनादि को बनाने की शक्ति) को दिये। इसके बाद वरुण बिना प्रयत्न के
ही जल उत्पन्न करने की शक्ति (जलसिद्धि) को दिये। इसप्रकार वे देवगण इन
विद्याओं को देकर अपने धाम को चले गये। इस प्रकार उनके वाक्यों को सुनकर
राजा ऋतुपर्ण आश्चर्यित होकर नल से बोले ॥ १६-१८ ॥
इयं त्वलौकिकी विद्या त्वद्गता नरदुर्लभा ।
अतो नरहितार्थाय निदर्शनमुखेन ताम् ॥ १९ ॥
दर्शनं कुरु तत्त्वेन दृष्टेः कौतूहलं हि नः ।
इत्युक्तवति राजेन्द्र नैषधः पुनरब्रवीत् ॥ २० ॥
तुम्हारे अन्दर मनुष्यों के लिये दुर्लभ यह अलौकिकी विद्या प्राप्त हुई है।
अतः इस विद्या को मनुष्यों के हित के लिये प्रत्यक्ष रूप से विधिपूर्वक प्रदर्शन
कीजिये। हम लोगों को वह विद्या देखने के लिए बहुत बड़ी उत्कण्ठा है। इस
प्रकार राजा ऋतुपर्ण के कहने पर राजा नल फिर बोले ॥ १९-२० ॥
नलेन स्वनिर्मितग्रन्थविषयवर्णनम्
अस्मिन्नर्थे मयाऽकारि ग्रन्थो लोकहिताय च ।
लोकपालप्रसादेन पाकदर्पणनामतः ॥ २१ ॥
तस्यावलोकनेनैव दृश्यन्ते विविधाः क्रियाः ।
सूदस्य लक्षणं तावद् वक्ष्ये संक्षेपतः प्रभो ॥ २२ ॥
राजा नल के द्वारा स्वनिर्मित ग्रन्थ के विषय का वर्णन—राजा ऋतुपर्ण के
वाक्य को सुनकर राजा नल ने कहा कि अन्नसिद्धि के विषय में मैंने सभी लोगों
के कल्याणार्थ लोकपालों के प्रसाद से पाकदर्पण नामक ग्रन्थ बनाया है। उस ग्रन्थ
को देखने से ही सभी अनेक प्रकार के पाकनिर्माण सम्बन्धी क्रियाओं का ज्ञान हो
जाता है, हे राजन् ! सर्वप्रथम रसोइया का लक्षण संक्षेप में कहता हूँ ॥ २१-२२ ॥
नलविरचितम्
सूदस्य लक्षणम्
स्वदेशसम्भवः प्राज्ञः सर्वलक्षणलक्षितः ।
सदाचारसमायुक्तो विशिष्टकुलसम्भवः ॥ २३ ॥
शान्तो दान्तो दानशीलो राजपूज्यो शुचिस्मितः ।
स्वदारनिरतः शुद्धः परदारविवर्जितः ॥ २४ ॥
मितभाषी सदा दाता दयालुश्च सुभाषितः ।
धातुज्ञो देशकालज्ञो वयोऽवस्थादिविद्बुधः ॥ २५ ॥
रसोइया का लक्षण—रसोइया को निम्न लक्षणों से युक्त होना चाहिए।
जिस देश में काम करता हो वहीं का उत्पन्न हो, विद्वान् हो, सभी अच्छे लक्षणों
से युक्त हो, सदाचारी हो, अच्छे विशिष्ट कुल में उत्पन्न हो, शान्त स्वभाव का
हो, इन्द्रियों को वश में किया हो, दान प्रवृत्ति वाला हो, राज्य परिवार का
विश्वासपात्र हो, पवित्र हो, अपनी धर्मपत्नी से ही सम्बन्ध रखने वाला हो, शुद्ध
हो, परायी स्त्री से सम्बन्ध न रखता हो, थोड़ा बोलने वाला हो, हमेशा दान देने
वाला हो, दयालु हो, मृदुभाषी हो, धातुओं (अनेक प्रकार के लौह, ताम्र आदि
धातुओं) की जानकारी रखनेवाला हो, देश-विदेश तथा कालविशेष की जानकारी
रखने वाला हो, आयु एवं अवस्था आदि का जानकार हो ॥ २३-२५ ॥
परिवेशकस्य लक्षणं विधिश्च
प्रक्षाल्य चरणौ हस्तौ कृतशौचविधिस्तदा ।
सम्पूर्णकामो निष्ठात्मा राजभोजनकालवित् ॥ २६ ॥
राज्ञश्चावसरं ज्ञात्वा पाकादींश्च प्रदापयेत् ।
यदा पथ्यं भवेद्राज्ञः क्रमेण प्रक्षिपेच्च तान् ॥ २७ ॥
परोसने वाले का लक्षण तथा विधि—रसोइया सभी शौच क्रिया (उठने
से लेकर पूजन पर्यन्त शौच विधि) को सम्पन्न कर, हाथ-पैर को अच्छी तरह
धोकर, संतुष्ट मन से निष्ठावान् होकर राजा के भोजन काल को जानने वाला,
राजा के भोजन समय को जानकर भोजन सामग्री को राजा के सामने रखे।
जब जो पदार्थ राजा के लिए हितकर हो उन पदार्थों को भोजन¹परिवेशण क्रम से
रखे ॥ २६-२७ ॥
ग्रन्थस्योपक्रमणिका
ओदनस्य प्रभेदोऽत्र प्रथमं कथ्यते मया ।
द्वितीयं सूपभेदश्च सर्पिषश्च तृतीयकम् ॥ २८ ॥
१. विविध भोजन-सामग्री रखने का क्रम आगे के श्लोक में देखें।
६ पाकदर्पणम्
व्यञ्जनस्य च भेदश्च चतुर्थः स प्रपञ्चकः ।
पञ्चमो मांसशाकोऽत्र सप्रभेदश्च कथ्यते ॥ २९ ॥
ग्रन्थ के उपक्रम विषय--सर्वप्रथम ओदन (भात, रोटी, विविध अन्न आदि
के विविध भेदों को कहेंगे । दूसरा सूप (दाल) के भेद, तीसरा घी के भेद,
चौथा सप्रपञ्च (विधिविधान पूर्वक) व्यंजनों के भेद तथा पाँचवां मांस एवं
शाक आदि के भेदों को कहेंगे ॥ २८-२९ ॥
षष्ठोऽत्र भक्ष्यभेदश्च सप्तमः पायसस्य च ।
रसायनश्चाष्टमोऽत्र नवमः पानभेदतः ॥ ३० ॥
दशमं यूषभेदश्च घृताद्यन्नप्रभेदकः ।
एकादशश्च लेह्यस्य भेदो द्वादशकस्तथा ॥ ३१ ॥
त्रयोदशन्तु पानीयं क्षीरभेदश्चतुर्दशः ।
दधिभेदः पञ्चदशः षोडशः तक्रभेदकः ॥ ३२ ॥
छठवाँ भक्ष्य प्रकार के भेद, सातवाँ पायस (खीर) के भेद, आठवाँ रसायन
भेद, नवाँ पानक भेद, दसवाँ यूष का भेद, ग्यारहवाँ घृतपक्वादि अन्न के भेद,
बारहवाँ लेह्य पदार्थों का भेद, तेरहवाँ विविध प्रकार के जल का भेद, चौदहवाँ
दूध का भेद, पन्द्रहवाँ दही का भेद तथा सोलहवाँ तक्र का भेद कहा गया
है ॥ ३०-३२ ॥
षोडशो मुख्यभेदश्च दृष्टान्तेन प्रदर्शितः ।
मृग्योऽवान्तरभेदश्च तत्र तत्र महद्धिया ॥ ३३ ॥
प्रधान सोलह भेदों को दृष्टान्त के साथ दिखाया गया है । उसके सम्बन्ध में
अपनी विशद बुद्धि के अनुसार अवान्तर भेदों को भी विज्ञजन खोज करें ॥ ३३ ॥
तत्र तत्र यथायोग्यो वादस्तु कथितो मया ।
पानीयनामदेशे हि पानीयस्य समुद्भवः ॥ ३४ ॥
पुनश्चित्रं च कथितं पायसं चाम्लसम्भवम् ।
एवमादीनि चित्राणि कार्याणि विविधानि च ॥ ३५ ॥
पाकोत्थितान्यपाकानि कर्तव्यानि मनीषिभिः ।
किमत्र बहुनोक्तेन युक्तं चैकं शृणु प्रभो ! ॥ ३६ ॥
पूर्वोक्त सोलह प्रकार के पाकों के सम्बन्ध में मैंने यथायोग्य विवेचन किया
है । पानीय नामक देश में ही पानी का उद्भव बताया गया है। इसके बाद चित्र-
पाक का वर्णन है और आम्लवस्तु से पायस निर्माण का वर्णन है। इस तरह अनेक
नलविरचितम् ७
प्रकार के चित्र-विचित्र विधियों का वर्णन किया गया है। विद्वानों को विना
पकाये ही पाक बनाना चाहिए। इस सम्बन्ध में अधिक कहना भी ठीक नहीं है।
हे राजन् ! वहाँ पर एक उपयोगी विषय को सुनें ॥ ३४-३६ ॥
यस्मिन् काले देशकाले दयाभावो हि भूमिप ! ।
तथा तस्मिन्नुपायेन कथितस्तस्य सम्भवः ॥ ३७ ॥
हे राजन् ! जिस समग्र तथा जिस काल में दयाभाव (दयालुता) रहता है,
उस समय तथा उस काल में उसका उत्पादन उसी प्रकार के उपायों से कहा
गया है ॥ ३७ ॥
अन्नस्य प्राशस्त्यनिरूपणम्
सर्वेषां प्राणिनां प्राणमन्नं प्रथममुच्यते ।
ब्रह्मरूपमिदं सम्यक् त्रिषष्टिरसरूपकम् ॥ ३८ ॥
दोषाष्टकेन रहितमाहरेदन्नमुत्तमम् ।
अन्न की प्रशंसा—सभी प्राणियों का प्राण सर्व प्रथम अन्न ही कहा गया
है, अच्छी तरह तिरसठ रस वाला यह अन्न ब्रह्म स्वरूप है अतः आठ दोषों से
रहित उत्तम अन्न को ग्रहण करना चाहिए ॥ ३८ ॥
अन्नगतदोषाणां विवेचनम्
दोषस्वरूपमज्ञात्वा तद्राहित्यं कथं लभेत् ॥ ३९ ॥
अनिन्द्यत्वाददोषत्वाद् दोषो नास्ति तदाश्रयः ।
अतोऽष्टरूपो दोषो हि नास्त्यत्र श्रुतिमानतः ॥ ४० ॥
अन्न सम्बन्धी दोषों का विवेचन—अन्न सम्बन्धी दोषों की जानकारी के
बिना अन्नगत दोषों को कैसे दूर किया जा सकता है। क्योंकि अन्न अनिन्द्य एवं
दोषरहित है । अतः उसमें दोष नहीं रह सकते, साथ ही शास्त्रनिर्देश के अनुसार
उसमें आठ दोष नहीं हैं ॥ ३९-४० ॥
अन्नेऽष्टदोषसम्भव निरूपणम्
विद्यते ह्यष्टदोषो हि प्रत्यक्षेण प्रमादतः ॥
अन्न में आठ दोषों का उत्पत्ति-निरूपण—अन्न में प्रमाद (असावधानी)-
वश प्रत्यक्ष कारणों से अन्न में आठ दोष उत्पन्न होते हैं ॥ ४०½ ॥
के ते दोषाः सदाविष्टाः प्रत्यक्षेण बलीयसा ॥ ४१ ॥
वे कौनसे दोष हैं जो बलवान् प्रत्यक्ष कारणों से अन्न में उत्पन्न होते हैं ॥४१॥
[पृष्ठ ८]
पाकदर्पणम्
इति प्रश्नकृते जातमुत्तरं ज्येष्ठमानतः ।
ये ते तदाश्रिताः दोषा अस्रुतः पिच्छिलोऽशुचिः ॥ ४२ ॥
क्वथितश्शुष्कतो दग्धो विरूपो नर्तुजस्तथा ।
स्वरूपलक्षणं चैषां कथ्यते क्रमशो गुणम् ॥ ४३ ॥
अन्नगत दोषों को पूछने पर उत्तम प्रमाणों के द्वारा उत्तर दिये। प्रमादादि-
वश अन्न में रहनेवाले निम्नलिखित दोष हैं। आस्रुत (अन्नगत मांड न निकालने
से खट्टा हुआ अन्न), पिच्छिल, अशुचि, क्वथित, शुष्क, दग्ध, विरूप तथा विपरीत
ऋतुओं में उत्पन्न — ये अन्नगत आठ दोष होते हैं; । इन दोषों के स्वरूप, लक्षण
तथा गुणों को आगे कहेंगे ॥ ४२-४३ ॥
अन्नगतदोषविचारस्य प्रयोजननिरूपणम्
किं तस्य हासरूपस्य विचारस्य प्रयोजनम् ।
पयस्त्वात् त्यज्यते सद्भिर्द्रवत्वे तु विशारदैः ॥ ४४ ॥
इदं सदोषं निर्दोषमिदं चेति विवेकितुम् ।
विकारार्थं न दोषेण युक्तद्रव्यम्प्रयत्नतः ॥ ४५ ॥
किन्त्वदुष्टवशाद्कर्त्तु रेतदेव प्रयोजनम् ।
अन्नगतदोषविचार का प्रयोजन — अन्न सम्बन्धी इन तुच्छ विचारों का
क्या प्रयोजन है ? अच्छे पण्डित लोग द्रव में शक्ति होने पर भी छोड़ देते हैं।
यह विचार करने के लिए कि यह दोषयुक्त है या दोषरहित है। दोष से युक्त द्रव
विकारोत्पादक न हो जाय इसके लिए प्रयत्नपूर्वक दोषरहित बनाना ही दोष के
विचार का प्रयोजन है ॥ ४४-४५॥
अन्नस्य नास्ति वा दोषा न भवन्ति कदाचन ॥ ४६ ॥
ते तस्य सम्भवन्त्येव पाचकस्य प्रमादतः ।
क्रमेण वक्ष्ये दोषाणामष्टानां लक्षणं गुणम् ॥ ४७ ॥
अन्न में न दोष हैं और न होते हैं। उसमें वे दोष रसोइया के प्रमाद के
कारण हो सकते हैं। प्रमाद से होनेवाले उन अन्नगत आठों दोषों के लक्षण तथा
गुणों को आगे कहेंगे ॥ ४६-४७ ॥
अस्रुतान्नलक्षणं दोषाश्च
अश्रावितयवागुं यदन्नमस्रुतमुच्यते ।
तदन्नं येन भुक्तं चेत् तस्य व्याधिकरणं भवेत् ॥ ४८ ॥
अस्रुत अन्न का लक्षण तथा दोष — जो अन्न मांड न निकालने से अम्ल हो
[पृष्ठ ९]
नलविरचितम्
जाता है उसे अस्रुतान्न कहते है । जो उस अन्न को खाता है उसके लिए वह अन्न
रोगकारक होता है ॥ ४८ ॥
पैच्छिलान्नस्य लक्षणं दोषाश्च
अन्नमाश्रयते जीर्णमतिपाकेन पैच्छिलम् ।
तद्भक्तं भुज्यते येन तं त्यजेदौदरोऽनलः ॥ ४९ ॥
पेंच्छिल अन्न का गुण तथा दोष — अन्न अधिक पकाने से पैच्छिल दोषों से
युक्त हो जाता है, जो लोग उस भात को खाते है उनको जठराग्नि छोड़ देती है।
अर्थात् उसकी जठराग्नि मन्द हो जाती है और कड़े अन्न पचाने में असमर्थ भी
हो जाती है ॥ ४९ ॥
अशुच्यन्नस्य लक्षणं दोषाश्च
कृमिकेशादिसंयुक्तं यदन्नमशुचि स्मृतम् ।
तद्भक्षणादरुचीरसना स्रवते जलम् ॥ ५० ॥
अशुचि (अपवित्र) अन्न का लक्षण तथा दोष — जो कृमि तथा केश
आदि से मिश्रित अन्न होता है उसे अशुचि अन्न कहते हैं। उस अन्न को खाने से
अरुचि (अरोचक) होती है और रसना (जिह्वा) से जल स्राव (लार)
निकलता है ॥ ५० ॥
क्वथितान्नस्य लक्षणं दोषाश्च
ईषत्तण्डुलमिश्रं यत् क्वथितं परिकीर्तितम् ।
आत्मादिदोषकृत्यर्थं कायस्थं यस्य तद्भवेत् ॥ ५१ ॥
क्वथितान्न का लक्षण तथा दोष — थोड़ा तण्डुल (चावल) से मिश्रित जो
पाक होता है उसे क्वथित अन्न कहते हैं। यह अन्न जिसके शरीर में जाता है
वह शरीर में स्थित होकर आत्मा आदि में विकार उत्पन्न करता है ॥ ५१ ॥
शुष्कान्नस्य लक्षणं दोषाश्च
यत्कालविरहादन्नं शुष्कं तत्परिकीर्तितम् ।
भक्षितं येन तस्यान्नं विधूमो भवति ध्रुवम् ॥ ५२ ॥
शुष्क अन्न का लक्षण तथा दोष — जो अन्न अधिक समय तक रह जाने से
शुष्क हो जाता है उसे शुष्कान्न कहते हैं । उस शुष्कान्न को जो खाता है उसको
अवश्य ही विधूम (अपचन) हो जाता है ॥ ५२ ॥
१० पाकदर्पणम्
दग्धान्नस्य लक्षणं दोषाश्च
पावकस्यातियोगाद्धि दग्धं भवति चोदनम् ।
भक्षितं येन कुक्षिस्र्थं तत्कुर्याद्धातुशोषणम् ॥ ५३ ॥
दग्धान्न के लक्षण तथा दोष—तेज अग्नि के सहयोग से जो अन्न जल
जाता है उसे दग्धान्न कहते है । उस अन्न को जो खाता है उसके पेट में स्थित
होकर वह अन्न धातुओं (रस, रक्त, मांस आदि का) शोषण करता है ॥ ५३ ॥
विरूपान्नस्य लक्षणं दोषाश्च
ओदनं स्याद्विरूपाख्यं पाकादक्षुण्णतण्डुलम् ।
कुक्षिस्र्थं यस्य तद्भुक्तमायुरादीन्निहन्ति च ॥ ५४ ॥
विरूपान्न का लक्षण तथा दोष—बिना अच्छी तरह कूटा-छाँटा चावल
पाक करने से विकृत रूप हो जाता है उसे विरूपान्न (विरूपौदन) कहते हैं। वह
खाया हुआ भात जिसके पेट में रहता है उसकी आयु, बल, वीर्य आदि को नष्ट
कर देता है ॥ ५४ ॥
अनर्तुजान्नस्य लक्षणं दोषाश्च
अनर्तुजाभिधानादन्नं पर्युषितं भवेत् ।
निद्राशीतादिरोगः स्याद्कुक्षितस्य च तस्य वै ॥ ५५ ॥
विपरीत ऋतुज अन्न के लक्षण तथा दोष--अनर्तुज कहने से पर्युषित (ऋतु
विपरीत-बासी) अन्न होता है। जो उस अन्न को खाता है उसको निद्रा आलस्य
दौर्बल्यादि रोग होते हैं ॥ ५५ ॥
राज्ञे निर्दोषान्नप्रदानस्य विधानम्
एते चान्नाश्रिता दोषाः मया सम्यक् प्रकाशिताः ।
एभिर्दोषैर्विहीनं यदन्नं राज्ञे प्रदापयेत् ॥ ५६ ॥
राजा के लिए निर्दोष अन्न देने का विधान--पूर्वोक्त अन्नगत आठ दोष
हैं उनको मैंने अच्छी तरह बता दिया है। जो अन्न पूर्वोक्त दोषों से रहित हो उस
अन्न को राजा को खाने के लिए देना चाहिए ॥ ५६ ॥
अन्ननिर्माणविधिर्गुणाश्च
विधानमत्र पाकस्य वक्ष्ये सर्वहिताय च ।
अखण्डतण्डुलान् क्षुष्यान् पुराणव्रीहिसम्भवान् ॥ ५७ ॥
क्षालयेत्तान् बुधः सम्यगोषदुष्णेन वारिणा ।
शुद्धोदकं पुनः स्थाल्यां पूरयेत्तत्रिभागिकम् ॥ ५८ ॥
नलविरचितम् ११
चुल्यामारोपयेत्स्थालीं पूरितां पाककोविदः ।
शीतबुद्बुदसंयुक्ते पक्वे पयसि तान् क्षिपेत् ॥ ५९ ॥
तण्डुलानां यथा मध्ये ईषत्कठिनता भवेत् ।
दर्वीपुटेन तान् सम्यगवलोड्य पुनः पुनः ॥ ६० ॥
तत्रैव तु सदा सिञ्चेत् तक्रं क्षीरं पयोऽथवा ।
तदावतार्य प्रस्थाप्य चाङ्गारेषु¹ पुनर्न्यसेत् ॥ ६१ ॥
तदन्नं सम्यगालोक्य मृदुभूतं च दापयेत् ।
इदं तण्डुलसम्भूतमायुरारोग्यवर्द्धनम् ॥ ६२ ॥
अन्न (भात) बनाने की विधि तथा गुण--यहाँ पर सभी लोगों के लिए
पाक बनाने की विधि कहता हूँ। बुद्धिमान व्यक्ति पुराने धान के बिना टूटे, सूखे
चावल को थोड़े गरम जल से अच्छी तरह धो कर बटलोही (भोजन-निर्माण-
पात्र) में चावल से तीन गुना शुद्ध जल भर दे। इसके बाद पाचक जलपूर्ण भोजन-
निर्माण पात्र को चूल्हा के ऊपर रक्खे । जल के थोड़े गरम हो जाने पर पूर्वोक्त
धोये हुए चावल को छोड़ दे । जब चावल में थोड़ा कड़ापन रह जाय तब कलछुल
से बार-बार अच्छी तरह चलाये और उसी में मट्ठा, दूध या जल छोड़ दे । इसके
बाद उतार कर तथा रख कर पुनः अंगार (आग) के ऊपर रखे । उस अन्न
(भात) को अच्छी तरह मुलायम देखकर खाने के लिए दे। यह चावल का भात
आयु एवं आरोग्य को बढ़ाने वाला है ॥ ५७-६२ ॥
मांसग्रहणविधिः
छागमेषशकुन्तादिप्राणिनां पलं बुधः ।
समादाय पुनस्तस्य त्वगन्त्राणि समुत्सृजेत् ॥ ६३ ॥
तेषामेकतमं मांसं क्षालयेद्वारिणा ततः ।
अस्थिभिस्सह संच्छिद्य निक्षिपेत्तस्य भाजने ॥ ६४ ॥
मांसग्रहण करने का नियम - बुद्धिमान व्यक्ति बकरी, भेड़, शकुन्त (पक्षी)
आदि प्राणियों के मांस लेकर उसके चमड़े तथा आँतों को निकाल दे। पुनः उनमें
से किसी एक का मांस लेकर जल से प्रक्षालन करे । इसके बाद उस मांस को
अस्थिसहित काटकर मांस बनाने के पात्र में रक्खे ॥ ६३-६४ ॥
१. भात को उतार कर आग के ऊपर रखने की प्रक्रिया आज भी प्रचलित
है । इससे भात में एक प्रकार का स्वाद आ जाता है और कच्चा रहने की आशंका
नहीं रहती । योग्य पाचक अब भी इस प्रक्रिया को अपनाते हैं ।
पृष्ठ १२
१२ पाकदर्पणम्
उत्क्राणोदकनिर्माणविधिः
अनापलं ततो भाण्डे तण्डुलस्योदकं शुभे ।
निधाय शुद्धमुदकं समं कृत्वा पचेत्सुधीः ॥ ६५ ॥
तप्ते पयसि तन्मासं निक्षिपेत्क्षालितं पुनः ।
पुनश्च निक्षिपेत्तत्र कुम्भीकुस्तुम्बुरीं बुधः ॥ ६६ ॥
तप्ते मांसे पुनः सम्यक् शोधयेच्चिचक्रणं विना ।
शीतलञ्च पुनः कृत्वा कुसुमैरधिवासयेत् ॥ ६७ ॥
न्यसेच्च मृगनाभिश्च कर्पूरं हिमचारि च ।
मुहूर्त्तमेकं संस्थाप्य प्रसूनानि परित्यजेत् ॥ ६८ ॥
एतदुत्क्राणमुदकमाहुः सूदविशारदः ॥ ६९ ॥
उत्क्राणोदक बनाने की विधि - उत्क्राणोदक बनाने के लिये पहले शुद्ध पात्र
में चावल का जल रखकर सम भाग शुद्धजल मिलाकर बुद्धिमान रसोइया पकाये ।
जल गरम हो जाने पर पूर्वोक्त प्रक्षालित मांस को पुनः छोड़ दे । इसके बाद
उसमें कुम्भी, कुस्तुम्बुरी, (धनिया) आदि छोड़ दे । पुनः मांस के गरम हो जाने
पर चिकनापन के बिना ही छान ले । पुनः जल को शीतल कर पुष्पों से सुगन्धित
करे । पुनः उसमें कस्तूरी तथा कर्पूर मिला दे । उसमें एक घड़ी तक पुष्पों को
रखकर निकाल दे । इसको पाकशास्त्रवेत्ता उत्क्राणोदक कहते हैं ॥ ६६-७० ॥
उत्क्राणोदकशब्दस्य विवेचनम्
सर्वोदकातिक्रमणादुत्कृष्टत्वादितं पयः ।
रससर्वस्वरूपत्वादुत्क्राणमिति कथ्यते ॥ ७० ॥
उत्क्राणोदक शब्द की व्युत्पत्ति - सभी प्रकार के जल को अतिक्रमण करने
से तथा उत्कृष्ट (उत्तम) होने से और सभी रसस्वरूप होने से उत्क्राण
(उत्क्राणोदक) कहा जाता है ॥ ७१ ॥
सामान्यमांसौदननिर्माणविधिः
त्रिभागपूरितां स्थालीं तज्जलैश्च प्रमाणवित् ।
स्थापयेच्च तथा चुल्यां तप्ते पयसि वह्निना ॥ ७१ ॥
चतुर्थांशान्निक्षिपेत्सम्यक् क्षालितान् गौरतण्डुलान् ।
ईषत्पाके तु सञ्जाते सुशुभे शालितण्डुले ॥ ७२ ॥
आदाय पक्वपललमपक्वमथवामिषम् ।
तण्डुलाकारवच्छित्त्वा किञ्चित्सैन्धवमावहेत् ॥ ७३ ॥
पृष्ठ १३
नलविरचितम् १३
भर्जयित्वा पुनस्थाल्यां किञ्चिदाज्यं च निक्षिपेत् ।
जले विलीने तद्भक्तमङ्गारेषु समाविशेत् ॥ ७४ ॥
क्षीरं च नारिकेलस्य नवसर्पिस्तथैव च ।
न्यसेत्तत्रैव रम्याणि केतकीकुसुमानि च ॥ ७५ ॥
निक्षिपेत् शकलांस्तत्र पर्पटप्रमुखोद्भवान् ।
गन्धैः कर्पूरकस्तूरीसम्भवैश्चाधिवासयेत् ॥ ७६ ॥
तन्मुखं छादयेत्सम्यग्विधानेन विचक्षणः ।
लिम्पेत्तद्गन्धरक्षार्थं तद्रन्ध्र कणिकैर्ध्रुवम् ॥ ७७ ॥
आवर्त्तनं पुनः कुर्यादङ्गारेष्वेव तान् पुनः ।
यावता मृदुभावं स्यात्तावत्तत्र प्रयोजयेत् ॥ ७८ ॥
एवमामिषसम्भूतं दापयेदन्नमीदृशम् ॥ ७९ ॥
सामान्य मांसोदन (पुलाव) बनाने की विधि - पूर्वनिर्मित उत्क्राणोदक से
प्रमाण जाननेवाला रसोइया स्थाली का तीन भाग भर दे तथा स्थाली को चूल्ही
पर रखे । इसके बाद आग से पानी गरम हो जाने पर अच्छी तरह प्रक्षालित
चतुर्थांश सफेद चावल को छोड़ दे । उत्तम शालिचावल के थोड़ा पक जाने पर
पका मांस या अपक्व मांस लेकर तथा चावल के बराबर-बराबर काट कर थोड़ा
नमक मिला दे । पुनः स्थाली में भूनकर मिला दे तथा थोड़ा घी मिला दे । जल
के नष्ट हो जाने पर उस भात को अंगार पर रखे । इसके बाद नारियल का
जल तथा नया घी मिला दे और वहीं पर रमणीय केवड़ा के फूल को रखे ।
तदनन्तर उसमें पर्पट (पापड़) आदि के टुकड़ों को छोड़ दे और कर्पूर-कस्तूरी
आदि के गन्ध से अधिवासित (सुगन्धित) करे । बाद में बुद्धिमान् पाचक उसके
मुख को ढक दे और उसके गन्ध को सुरक्षित रखने के लिये ढकने के छेद को
आटे से बन्द कर दे । पुनः अंगार के ऊपर ही उनको घुमाकर (झोंककर)
नीचे-ऊपर कर रख दे । जब
१४ पाकदर्पणम्
तदर्यन्ननिर्माणविधिर्गुणाश्च
स्थाल्यां पक्वेऽथ पयसि पूर्ववत् सुद्वेदवित् ।
तत्रैव भिन्नमुद्गांस्तु निक्षिपेन्निष्पचेत्पुनः ॥ ८१ ॥
गतेषु तेषु मुद्गेषु किञ्चित् पाकं प्रयत्नतः ।
समालोक्य पुनस्तत्र निक्षेपेत्क्षालितण्डुलान् ॥ ८२ ॥
कुक्कुटस्यामिषं पिष्ट्वा पूर्ववद्भर्ज्य निक्षिपेत् ।
मुद्गतण्डुलमांसानां समपाकं यदा भवेत् ॥ ८३ ॥
तथा पचति पाकज्ञः प्रदद्यादन्नमुत्तमम् ।
इदं रुचिकरं सम्यक्कायपावकवर्धनम् ॥ ८४ ॥
समीरणहरं सम्यग् वारिदोषहरं परम् ।
तहरीत्युच्यते सद्भिरिदमन्नं शुभावहम् ॥ ८५ ॥
**तहरी बनाने की विधि तथा गुण—**पाकशास्त्र को जाननेवाला पाचक पूर्व-
वत् पके उत्क्राणोदक को भोजन-निर्माण पात्र में रक्खे और उसी में मूँग के दाल
को छोड़ दे तथा पकावे । मूँग के दाल के गल जाने पर प्रयत्न पूर्वक थोड़ा पका
हुआ जान कर उसमें जड़हन के चावल को छोड़ दे और पुनः मुर्गी के मांस को
पीसकर तथा कड़ाही में भूनकर छोड़ दे । जब तक मूँग, चावल तथा मांस एक
साथ पाक न हो जाय तब तक पाकज्ञ पाचक पकावै और इस उत्तम अन्न को खाने
के लिये दे । यह मुद्ग-तण्डुल-मांसान्न रुचिवर्द्धक, अच्छी तरह जाठराग्निवर्द्धक,
वातनाशक तथा अच्छी तरह जल के दोष को दूर करने वाला है। इस लाभ-
कारक अन्न को सज्जनवृन्द तहरी कहते हैं ॥ ८१-८५ ॥
चित्रपाकीय भक्तभेदनिरूपणम्
कथ्यन्ते भक्तभेदाश्च चित्रपाकसमन्विताः ।
पुष्पैैरनेकैर्बहुभिः सुगन्धैर्वासितेषु च ॥ ८६ ॥
विशालेषु च रम्येषु पूगपादेषु मानवित् ।
सुजातं राजशाल्यन्नं सुपक्वं सुमनोहरम् ॥ ८७ ॥
निक्षिपेतत्तथा योग्यं सुशील भक्तमुत्तमम् ।
सर्वत्र सैन्धवं न्यस्येत् मृगनाभिसकर्पूरम् ॥ ८८ ॥
कुंकुमं हिमतयोञ्च्च केतकीकुसुमं न्यसेत् ।
मातुलुङ्गदलं न्यस्य कुम्भीकुस्तुम्बरी तथा ॥ ८९ ॥
आर्द्रकस्य पलाण्डोश्च शकलान् समुन्निक्षिपेत् ।
जीरकस्य च मेथ्याश्च चूर्णं सर्वत्र निक्षिपेत् ॥ ९० ॥
नलविरचितम् १५
एभिश्चाकलयेद्भक्तं पूगपदेषु संस्थितम् ।
केषाञ्चित् निक्षेपेन्मांसमोदनानां नवं घृतम् ॥ ९१ ॥
**चित्रपाक सम्बन्धी भक्तभेद का निरूपण—**चित्रपाक से युक्त भात के प्रकार
को कहते हैं । प्रमाण को जानने वाला पाचक अनेक बहुत प्रकार के सुगन्धित
पुष्पों से सुगन्धित विशाल एवं मनोहर पूग पद में निर्मित अच्छी तरह परिपक्व
मनोहर, शीतल एवं उत्तम राजशालि का भात यथा योग्य स्थान पर रक्खे ।
सर्वत्र सेन्धा नमक रक्खे । कस्तूरी, कपूर, केशर, शीतल जल तथा केवड़ा का
फूल रक्खे । नींबू के टुकड़ों तथा कुम्भी, कुस्तुम्बरी को रख कर अदरक तथा
पलाण्डु (प्याज) के टुकड़ों को रक्खे । सभी स्थानों पर जीरा तथा मेथी के चूर्ण
को रक्खे । इन पूर्वोक्त द्रव्यों से पूगपद में स्थित भात को आकलन (सुसज्जित)
करे । कुछ पशु-पक्षियों का मांसौदन तथा नया घृत रक्खे ॥ ८६-९१ ॥
लावुकमांसौदननिर्माणविधिः
लावुकस्यामिषं दग्धं दग्धं मेदस्य मेदस्रम् ।
तण्डुलाकारवत्कृत्वा सम्यगाभर्ज्य सर्पिषा ॥ ९२ ॥
निक्षिपेच्छकलैः सार्द्धं पर्पटादिसमुद्भवैः ।
किञ्चिदाज्यं पुनस्तत्र नवनीतसमुद्भवम् ॥ ९३ ॥
मेलयित्वा तु तैस्साकं कुर्यात्पोटलिका पुनः ।
अन्तरालाट्टालके सम्यक् पचेतां पाकवित्तथा ॥ ९४ ॥
इदं चित्रतरं भक्तमेवं कृत्वा प्रदापयेत् ।
अमिषस्योदनश्चायं लावुकस्याति दुर्लभः ॥ ९५ ॥
**लावुक (लावापक्षी) मांसौदन बनाने की विधि—**लावा पक्षी का पका हुआ
मांस तथा पका हुआ घो ले ले । मांस को चावल के आकार का टुकड़ा-टुकड़ा
बनाकर घी में अच्छी तरह भून ले और पर्पट आदि से निर्मित टुकड़ों के साथ
छोड़ दे । पुनः उसमें मक्खन का निकाला हुआ थोड़ा घी मिलाकर उन पूर्वोक्त
द्रव्योंके साथ पोटलिका बनाये और पाक निर्माण को जाननेवाला पाचक अन्तराल
(मध्य में) अच्छी तरह पूर्वोक्त प्रकार से पकावे । इस प्रकार इस चित्र-विचित्र
भात को बना कर खाने के लिये दे । यह लावापक्षी के मांस का मांसौदन अत्यन्त
दुर्लभ है ॥ ९२-९५ ॥
लावुकमांसौदनस्य गुणाः
वृष्यं रोगहरं पथ्यमिन्द्रियाणां बलप्रदम् ।
श्लेष्मजित् श्रमजिद् बल्यमायुर्वृद्धिकरम्परम् ॥ ९६ ॥
१६ पाकदर्पणम्
लावुक मांसौदन का गुण — लावा पक्षी का मांसौदन वीर्यवर्द्धक, रोगनाशक,
पथ्य, इन्द्रियों को बल देनेवाला, कफनाशक तथा थकावट को दूर करने वाला है
और अच्छी तरह बलकारक एवं आयुवर्द्धक है ॥ ९६ ॥
कुक्कुटमांसतैलौदननिर्माणविधिः
जाठरः कथितः सम्यक् लावुकस्यामिषोद्भवः । ९७ ॥
कथ्यते ताम्रचूडस्य पिशितस्यौदनः पुनः ।
सैन्धवादीनि वस्तूनि केषाञ्चिन्निक्षिपेद् बुधः ॥ ९८ ॥
पादायुधस्य पलं छित्त्वा दग्ध्वा च पूर्ववत् ।
निक्षिपेत्तिलपिण्याकलेह्येन सह सूदवित् ॥ ९९ ॥
भर्जितं तिलतैलेन रामठं तत्र निक्षिपेत् ।
मेलयित्वा तु कुर्वीत पोटलीः पूर्ववत् पचेत् ॥ १०० ॥
अनैनैव प्रकारेण साधयित्वान्नमुत्तमम् ।
राज्ञे दद्यादिदं विद्वान् कुक्कुटामिषसम्भवम् ॥ १०१ ॥
कुक्कुट (मुर्गा) मांस तैलौदन बनाने की विधि — उदर के लिये हितकर
लावा मांस का बना हुआ मांसौदन कहा गया। अब मुर्गे का मांसतैलौदन
निर्माण कहते हैं। बुद्धिमान् पाचक पुनः सेन्धा नमक आदि वस्तु समूहों को एकत्र
कर छोड़ दे । पूर्वोक्त प्रकार से मांस को तण्डुलाकार काट कर तथा घी में भून
कर पाक शास्त्रवेत्ता पाचक तिल के गीले खली के साथ छोड़ दे । पुनः उसमें घी
में भूनी हुई हींग छोड़ दे। पूर्वोक्त सभी चीजों को मिलाकर पूर्व की तरह पोटली
बनावे और पकावे । इसी प्रकार मुर्गे के मांस से निर्मित उत्तम कुक्कुटतैलमांसौ-
दन को विद्वान् पाचक राजा के लिये खाने को दे ॥ ९७-१०१ ॥
कुक्कुटमांसतैलौदनस्य गुणाः
एतत्कीर्तिकरं नित्यं शरीरस्य हितप्रदम् ।
मरुद्दोषहरं शश्वत् वृष्यं लघुबलप्रदम् ॥ १०२ ॥
कुक्कुट मांसतैलौदन के गुण — यह कुक्कुटमांसतैलौदन यशकारक तथा
शरीर के लिये हितकर है। यह वातविकार को दूर करने वाला निरन्तर वीर्य-
वर्द्धक, हल्का तथा बलकारक है ॥ १०२ ॥
सूक्ष्ममांसौदननिर्माणविधिर्गुणाश्च
अन्नञ्च दर्शितं रम्यं कुक्कुटामिषसम्भवम् ।
सूक्ष्ममांसौदनं रम्यं कथ्यते क्रमशस्ततः ॥ १०३ ॥
नलविरचितम् १७
भक्तानां निक्षिपेत्तेषां सैन्धवादीन् सुबुद्धिमान् ।
सूक्ष्ममांसं न्यसेत् पक्वं पुनः तण्डुलभक्तिकी ॥ १०४ ॥
कैटर्यपत्रसंभूतलेह्यं तत्र समाविशेत् ।
तिलपिष्टेन रचितं षट् चूर्णं तत्र निक्षिपेत् ॥ १०५ ॥
हिंगुञ्च भर्जितं दद्यात् तैलं च तिलसम्भवम् ॥ १०६॥
सममेभिर्मेलयित्वा भक्तं तत् पूर्ववत् पचेत् ।
कृत्वान्नमेतदेवञ्च प्रदद्यात् प्राणकारणम् ॥ १०७ ॥
रुच्यं श्लेष्महरं रम्यं सुराणामपि दुर्लभम् ॥ १०८ ॥
सूक्ष्म मांसौदन बनाने की विधि तथा गुण — मुर्गा के मांस से निर्मित स्वादिष्ट
भात को मैंने बनाया। अब स्वादिष्टसूक्ष्ममांसौदन को क्रमशः कह रहा हूँ। बुद्धि-
मान् पाचक उन अन्नों में सेन्धा नमक आदि छोड़ दे। इसके बाद पका हुआ
सूक्ष्म मांस का टुकड़ा छोड़े। पुनः चावल का भात तथा कैटर्य पत्र का बना
हुआ लेह्य पदार्थ उसमें छोड़ दे। पुनः उसमें तिल की पिट्ठी से बना हुआ षट्-
चूर्ण छोड़ दे। इसके बाद भूनी हुई हींग तथा तिल का तेल मिलादे। इस प्रकार
इन सबों के साथ मिलाकर उस अन्न को पूर्ववत् पकाये। इस जीवन प्रदान करने
वाले सूक्ष्म मांसौदन को राजा के लिये दे। यह सूक्ष्म मांसौदन रुचिकारक,
वातनाशक, मनोरम तथा देवताओं के लिये भी दुर्लभ है ॥ १०३-१०८ ॥
प्रश्नोत्तररूपेणान्नस्य विषाक्तत्वनिराकरणम्
युक्तं भक्तं त्वयाप्युक्तं विषवद्भाति बाहुक ॥
अस्माभिर्भुज्यते भक्तं कथं च विषदूषितम् ॥ १०९ ॥
अमृतद्रव्यसंयुक्तं भुक्तमन्नं मया प्रभो ! ।
न कापि विषसंयुक्तमन्नं वै कथितं मया ॥ ११० ॥
प्रमादेन यदुक्तञ्च सत्यं तद्ब्रूत पार्थिव ! ।
बाहुकस्य वचः श्रुत्वा राजैनमिदमब्रवीत् ॥ १११ ॥
प्रश्नोत्तर के रूप में अन्न विषाक्तता का निराकरण — विविध संमिश्रित अन्न
निर्माण विधि एवं गुण को सुनकर राजा ऋतुपर्ण ने पूछा कि हे बाहुक ! आपने
कहा है कि युक्तिपूर्वक बनाया हुआ भी अन्न विषसदृश हो जाता है। तब हमलोग
विष दूषित अन्न को कैसे भोजन करते हैं। इस बात को सुनकर बाहुक नल ने
कहा कि हे राजन् ! अमृत द्रव्य से युक्त उचित अन्न को मैंने कहीं भी विषयुक्त अन्न
नहीं कहा है। यदि मैंने प्रमादवश सचमुच कहा है तो आप कहें। इसप्रकार बाहुक
की बात सुनकर राजा ऋतुपर्ण ने पूर्वोक्त आख्यान को बताया ॥ १०९-१११ ॥
प्रथम खण्ड: सूप, ओदन (चावल), शाक एवं व्यंजन निर्माण विधि
१८ पाकदर्पणम्
नलोक्तान्योन्यद्रव्यसंसर्गजविषनिरूपणम्
श्रूयतां पाचकश्रेष्ठ ! त्वदुक्तं गरलं पुनः ।
सर्वं वस्तुस्वरूपेण सुधा भवति वै ध्रुवम् ॥ ११२ ॥
अन्योन्यद्रव्यसंसर्गाद्विषं भवति वै तृणम् ।
अत्रापि तैलसंसर्गात् कर्पूरस्य कृतं त्वया ॥ ११३ ॥
इदं हि गरलं प्रोक्तं प्राणिनां दृश्यते मृतिः ।
राज्ञश्च वचनं श्रुत्वा बाहुकः पुनरब्रवीत् ॥ ११४ ॥
नल कथित अन्योन्य द्रव्यसंसर्गज विष का निरूपण—राजा ऋतुपर्ण ने नल
के कथन को स्मरण दिलाया कि हे पाचकश्रेष्ठ बाहुक ! तुमने संसर्गज विष का
निरूपण किया है। सभी द्रव्य अपने स्वरूप में निश्चय ही अमृत के समान होते
हैं। किन्तु विभिन्न द्रव्यों के संसर्ग से तृण भी विष हो जाता है। यहाँ पर भी
आपने तैल के संसर्ग से कर्पूर को विष बताया है। इसको गरल (संसर्गज विष)
कहते हैं और इससे प्राणियों की मृत्यु होती है। इस प्रकार राजा के वचन सुनकर
बाहुक ने उत्तर दिया ॥ ११२-११४ ॥
संसर्गजविषनिराकरणपूर्वक ममृतत्वनिरूपणम्
सत्यमुक्तं महाराज ! नत्वेतद् गरलं भवेत् ।
किन्तु पीयूषसदृशमन्नमेतद् भवेद् ध्रुवम् ॥ ११५ ॥
सत्यं संगविशेषेण विषमप्यमृतायते ।
हरिसन्निधिमात्रेण शेषो निर्विषतां यथा ॥ ११६ ॥
तथायोगस्तु कर्पूरंतैलयोरमृतायते ।
मांसशाल्यन्नयोगाद्धि तद्विषं निर्विषायते ॥ ११७ ॥
सूदस्य हस्तकरणममृतं तद्द्भवेद्ध्रुवम् ।
तदेतन्मात्रया युक्तं विषमप्यमृतं भवेत् ॥ ११८ ॥
अमात्रयाभिसंयुक्तममृतं विषमेव तत् ॥ ११९ ॥
संसर्गज विष का निराकरणपूर्वक अमृत स्वरूप का निरूपण- हे महाराज !
आपने सत्य कहा है किन्तु मैंने जो मांसोदन पदार्थ निर्माण किया है वह गरल
(संसर्गज विष) नहीं होता है। किन्तु निश्चय ही वह अन्न अमृत सदृश
होता है। यह सत्य है कि विशिष्ट पदार्थ का संसर्ग होने से विष भी अमृत हो जाता
है। जैसे भगवान् विष्णु के संसर्ग से शेषनाग भी निर्विष हो जाते हैं उसी प्रकार
कर्पूर और तैल का संयोग भी अमृत सदृश हो जाता है। कर्पूर तथा तैल का
संसर्गज विष मांस एवं शाल्यन्न के संयोग से निर्विष हो जाता है। पाचक के
नलविरचितम् १९
हाथ से बनाया हुआ वह निश्चय ही अमृत हो जाता है। वह विष भी उचित
मात्रा में मिलने पर विष अमृत हो जाता है, किन्तु विषम मात्रा (अनुपयुक्त
मात्रा) में मिलने पर अमृत भी विष हो जाता है ॥ ११५-११९ ॥
स्वकृतपाकप्रशस्तिः
नानाद्रव्यसमन्वितं बहुगुणं प्राणस्वरूपन्नृणाम्
धातूनाञ्च विवर्धनं कलिमलध्वंसं त्रिवर्गप्रदम् ।
नानाव्याधिहरं परत्र हिमकृत्कायस्य कान्तिप्रदम्
पीयूषालयमीदृशञ्च न हि तं भक्तं मया साधितम् ॥ १२० ॥
स्वकृत पाक की प्रशंसा—मैंने विविध द्रव्यों से युक्त अनेक गुणवाला मनुष्यों
के प्राणस्वरूप, धातुओं (रस-रक्त-मांस-भेदादि) को बढ़ाने वाला कलिकाल के
मल (रोगादि) की नाश करने वाला, त्रिवर्ग (धर्म-अर्थ-काम) देने वाला,
अनेक व्याधियों को दूर करनेवाला, दूसरों का हित करने वाला शरीर की शोभा
को बढ़ाने वाला अमृत भण्डारस्वरूप अन्न का निर्माण किया है। मैंने आपके
कथनानुसार विषाक्त अन्न का निर्माण नहीं किया है ॥ १२० ॥
सूपानां निर्माणविधिः
कुलित्थमाषनिष्पावतुवरीचणकादयः ।
शूर्पेण शोधयेत् सम्यक् मुद्गादीन्चितुषीकृतान् ॥ १२१ ॥
पचेत्प्रवण्यां पाकज्ञः समभागोदकैश्च तान् ।
पक्वे सूपे समालोक्य यथाहं सैन्धवं क्षिपेत् ॥ १२२ ॥
सुवर्णार्थञ्च तत्रैव निशाचूर्णं विनिक्षिपेत् ।
पुनश्च वासनाथंन्तु यथाहं हिंगु निक्षिपेत् ॥ १२३ ॥
दर्वीपुटेन निर्मथ्य पयसा लोडयेच्च तम् ।
कर्पूरपुष्पमुख्यैश्च सुहृदश्वाधिवासयेत् ॥ १२४ ॥
एवं मत्साधितं सूदः प्रदद्यात् सूपमुत्तमम् ॥ १२५ ॥
सूप (दाल) बनाने की विधि—कुरथी, उड़द, भटवास, अरहर तथा चना
आदि को सूप से अच्छी तरह साफ करे और पाचक भूसी रहित मूंग आदि के
दाल को समान भाग जल के साथ बटलोही में पकावे । पका हुआ दाल देखकर
उचित मात्रा में सेन्धा नमक छोड़ दे। दाल को सुन्दर रंग वाला बनाने के लिए
उस में हल्दी का चूर्ण मिला दे। उसमें सुगन्ध लाने के लिये पुनः उचित मात्रा
में हींग (घृतभर्जित) छोड़ दे। इसके बाद कलछुल से अच्छी तरह मथ कर
जल मिला दे। तदनन्तर कर्पूर तथा विभिन्न सुगन्धित पुष्पों से अच्छी तरह सुवा-
४ पा.द.
२० पाकदर्पणम्
सित (सुगन्धित) कर ले। इस प्रकार मेरा बनाया हुआ उत्तम स्वादिष्ट दाल
पाचक राजा के लिये दे ।। १२१-१२५ ।।
सूपस्य गुणाः
अयं रुचिकरात्सूपः रुच्यः पित्तविनाशकः ।
सर्वैर्गुणैस्समाविष्टो लघुरूपो निरामयः ।। १२६ ।।
दाल के गुण—पूर्वोक्त प्रकार से निर्मित दाल मन के अनुकूल होने से रुचि-
कारक एवं पित्तनाशक होता है। यह सभी गुणों से युक्त, हल्का तथा आरोग्यप्रद
होता है ।। १२६ ।।
विशिष्टसूप (द्विदल) निर्माणविधिः
सामान्यसूपस्सुपोऽत्र कथितो व्यञ्जनाग्रणीः ।
अत्र सिंहासनारूढः कथ्यते सूपभूपतिः ।। १२७ ।।
तेषां मध्ये समाधाय मुद्गोहितकरं परम् ।
तिलतैलेन संमृज्य तक्राम्ले तत्र लोडयेत् ।। १२८ ।।
शोषयित्वाऽऽतपे तन्तु भिन्नं कुर्यात् हरदृके ।
अपक्वतण्डुलोप्तेऽत्र साकं सूदस्तुषैश्च तम् ।। १२९ ।।
पूरयित्वाधितिष्ठेच्च दिनानि दशपञ्च च ।
मुसलेन सुतं यावद् भवेत्तावत् प्रसादयेत् ।। १३० ।।
एवञ्च निस्त्वचं कृत्वा क्षालयेद् वारिणा च तम् ।। १३१ ।।
विशेष प्रकार का दाल तैयार करने का प्रकार—बाहक नल ने बताया कि
मैंने सभी व्यञ्जनों में श्रेष्ठ सामान्य दाल का निर्माण बताया। अब यहाँ पर
सिंहासनारूढ (राजासन पर बैठे हुए) दालों के राजा को कहता हूँ। पूर्वोक्त
कुरथी, उड़द, मूँग आदि शिम्बी धान्य में से उत्तम हितकारक मूँग को लेकर
तिल तैल से मींजकर खट्टे मठ्ठे में भिगो दे। इसके बाद उसको धूप में सुखा
कर हरहक (दाल दलने की चकरी) में दरकर अलग-अलग कर ले। इसके
बाद उसको कच्चे चावल के पात्र में धान की भूसी के साथ रखकर दस-पन्द्रह
दिन रहने दे। पुनः निकाल कर मुसली के आघात से जब तक वह स्वच्छ-मुलायम
न होजाय तब तक स्वच्छ करे। इस प्रकार दाल की भूसी निकाल कर जल से
धो दे ।। १२७-१३ १।।
विशिष्टसूपपाकविधिः
भिन्नमुद्गसमं तोयं प्रवण्वां सेचयेद्बुधः ।
तस्मिन् पयसि शोभार्थं निशाचूर्णं च निक्षिपेत् ।। १३२ ।।
नलविरचितम् २१
रामठं च तथा क्षीरमासिञ्चेत्तत्र मानवित् ।
चुल्ल्यामारोप्य तान् विद्वान् जले बुद्बुदसंयुते ।। १३३ ।।
निक्षिपेत् क्षालितं पक्वं तुषादिवितुषीकृतम् ।
ईषन्मृदुत्वे जातेऽस्मिन्नवतार्य स्रावेदबुधः ।। १३४ ।।
तमादाय पुनः पूगपट्टनेत्रेषु निक्षिपेत् ।
सैन्धवं च यथायोग्यं तत्रैव परिनिक्षिपेत् ।। १३५ ।।
कुर्वीत वासेन सम्यक् कर्पूरप्रमुखैश्च तम् ।
वासितं तं पुनः सम्यग् वेष्टयित्वा प्रदापयेत् ।। १३६ ।।
विशेष प्रकार से दाल पकाने की विधि—बुद्धिमान् पाचक पूर्वोक्त प्रकार से
भूसीरहित मूँग की दाल के बराबर जल बटलोही में रक्खे और उस जल में शोभा
बढ़ाने के लिए हल्दी का चूर्ण छोड़ दे। इसके बाद प्रमाण को जानने वाला
पाचक हींग तथा दूध छोड़ दे। विद्वान् पाचक उनको चूल्हे पर रखकर बुदबुद
शब्द जल में होने पर भूसी आदि से रहित धोये हुए परिपक्व दाल को मिला-
दे। थोड़ा मुलायम हो जाने पर उतारकर जल को निकाल दे। इसके बाद
उसको लेकर पुनः सुपारी पात्र के मध्य में रख दे और उचित मात्रा में
सेन्धानमक मिला दे। इसके बाद कर्पूर आदि प्रमुख सुगन्धित द्रव्यों से सुगन्धित
बना कर तथा पुनः अच्छी तरह लपेटकर खाने के लिये राजा को दे। यह दक्षिण-
भारतीय "मसाल डोसा" का स्वरूप हो सकता है ।। १३२-३६।।
विशिष्टसूपपाकस्य गुणः
अयं स्वादुतरः रूपः सर्वेषां हितकृद्बली ।
स्निग्धो मनोहो रूपः सद्यः पित्तविमर्दकः ।। १३७ ।।
विशिष्ट परिपक्व दाल के गुण—पूर्वोक्त विशिष्ट प्रकार से निर्मित परिपक्व
दाल अत्यन्त स्वादिष्ट, सभी के लिये हितकर, बलकारक, स्निग्ध, मनोहर रूप-
कारक तथा शीघ्र ही पित्तनाशक होता है ।। १३७ ।।
अन्यविधसूपपाकविधिर्गुणाश्च
तादृशं मुद्गमादाय प्रवण्वां पाचयेद् बुधः ।
सम्यक् पक्वे ततः सूपे सैन्धवं हिंगु च क्षिपेत् ।। १३८ ।।
सूपमेवंविधं विद्वान् वासयेत्कर्पूरादिभिः ।
शनैः शलाकयालोड्य राजे तञ्च प्रदापयेत् ।। १३९ ।।
अयं स्वादुतरः सूपः प्रोक्तो लोकहितप्रदः ।
वृष्यः सुधासमः सद्यः सुराणामपि दुर्लभः ।। १४० ।।
अन्य प्रकार का दाल बनाने की विधि तथा गुण—बुद्धिमान् पाचक पूर्वोक्त
२२ पाकदर्पणम्
प्रकार के मूँग की दाल लेकर बटलोही में पकावे । अच्छी तरह दाल के पक जाने
पर सेन्धानमक तथा हींग छोड़ दे । विद्वान् पाचक इस प्रकार के दाल को कर्पूर
आदि सुगन्धित द्रव्य से सुवासित कर ले । इसके बाद कलछुल से धीरे चलाकर
दाल को राजा के लिये दे । यह स्वादिष्ट दाल संसार के हित के लिये कहा गया
है । अमृत समान दाल सद्यः वीर्यवर्द्धक है और देवताओं को भी दुर्लभ है ।
सूपप्रशस्तिः
माषादिसामन्तनृपैरनेकैः रम्भाप्रसूनप्रमुखैर्बलौघैः ।
शाल्यन्नसिंहासनगो विभाति घृतात्तपत्रः खलु सूपभूपः ॥ १४१ ॥
सूप (दाल) की प्रशंसा—माष (उड़द) अरहर आदि रूप अनेक सामन्त
राजाओं से तथा केला, पुष्प आदि रूप प्रमुख सेनासमूहों से घृत रूप छत्र से युक्त
सूपराज मूंग की दाल शालि (जड़हन चावल का) भातरूपी सिंहासन पर स्थित
होकर सु शोभित हो रहा है ॥ १४१ ॥
तेमनतक्रनिर्माणविधिर्गुणाश्चः
सप्रभेदः सूपभेदः कथितः कथ्यते खलु ।
जातितोलुलितं तक्रं तिलतैलेन संयुतम् ॥ १४२ ॥
सुगन्धगुणसंयुक्तं कुसुमैरधिवासयेत् ।
मुहूर्त्तमात्रं संस्थाप्य कुसुमानि परित्यजेत् ॥ १४३ ॥
लशुनार्द्रकयोः खण्डान् पुनस्तत्र विनिक्षिपेत् ।
कुम्भीदलं च धान्याकं शुण्ठीचूर्णं च निक्षिपेत् ॥ १४४ ॥
सैन्धवं च यथा योग्यं जम्बीराम्लञ्च निक्षिपेत् ।
रामठं तत्र निक्षिप्य कुर्यादालोडनं बुधः ॥ १४५ ॥
चुल्यां पचेच्च तं तक्रं दवघट्टनपूर्वकम् ।
पाकार्थं निक्षिपेत्तत्र शुचिभिन्नमरीचिकाः ॥ १४६ ॥
तद्यावतां कटु भवेत्तावत् पाकावतारयेत् ।
प्रवणीभाण्डमारोप्य चुल्यामस्यां प्रदापयेत् ॥ १४७ ॥
दर्वीविघट्टनं कृत्वा तेमनं तत्र निक्षिपेत् ।
पिधानेन समाच्छाद्य तन्मुखं तत्पुनः पचेत् ॥ १४८ ॥
प्रकृतेऽस्मिन् तदादाय मातुलुंगदलं क्षिपेत् ।
कर्पूरं मृगनाभि च केतकी कुसुमं न्यसेत् ॥ १४९ ॥
स्वादु पथ्यं लघुतरं तेमनं तत्र सम्भवम् ।
आरोग्यदं रोगहरं वातश्लेष्महरं शुभम् ॥ १५० ॥
नलविरचितम् २३
तेमन तक्र (मट्ठा) बनाने की विधि तथा गुण—सूप (दाल) के विविध
भेद को मैंने कहा । अब तेमन तक्र को कहता हूँ। अच्छी तरह मथा हुआ तक्र
(मट्ठा) तिल तैल के साथ मिला दे और सुगन्ध से युक्त कर फूल से सुवासित
कर दे । पुष्पों को मट्ठा में थोड़ा देर रखकर निकाल दे । इसके बाद लहसुन
तथा अदरक के टुकड़ों को उसमे छोड़ दे । पुनः कट्फल का पत्र, धनिया तथा
सोंठ का चूर्ण, उचित मात्रा में सेन्धानमक तथा जम्बीरी नीबू छोड़ दे । इसके
बाद उसमें हींग छोड़कर बुद्धिमान् पाचक अच्छी तरह मिला दे । इन द्रव्यों से
युक्त तक्र को कलछुल से चलाते हुए चुल्ही के ऊपर पकाये । उसमें पाक के लिये
शुद्धमरिच का चूर्ण छोड़ दे । जब तब वह कड़ुआ न हो जाय तब तक पाक करे ।
वटलोही में रखकर चूल्हे के ऊपर रखे । कलछुल से चला कर उसमें "तेमन"१
छोड़ दे, और ढक्कन से उसका मुँह ढँक कर पुनः पाक करें । अच्छी तरह परि-
पाक हो जाने पर विजोरा नीबू का दल छोड़ दे इसके बाद उसमें कर्पूर, कस्तूरी
तथा केवड़ा का फूल रक्खे । इस प्रकार तैयार "तेमन तक्र" स्वादिष्ट, पथ्यकारक
तथा हल्का होता है। यह आरोग्यप्रद, रोगनाशक, वात-कफ को दूर करनेवाला
तथा कल्याण कारक होता है ॥ १४२-१५० ॥
'खलतक्रनिर्माणविधिर्गुणाश्च
पुनर्नवा तथा वह्निघजाजीतक्रसमुद्भवम् ।
वासितं घनशारेण वातश्लेष्महरं शुभम् ॥ १५१ ॥
खलं गुल्महरं शीघ्रं पुष्पैश्च सुमनोहरैः ।
अशीतिवातजान् रोगान् जठरानलवृद्धिकृत् ॥ १५२ ॥
खल तक्र बनाने की विधि तथा गुण—पुनर्नवा, चित्रक, अजाजी (जीरा)
तथा तक्र से बनाया हुआ कर्पूर तथा मनोहर पुष्पों से सुवासित किया हुआ "खल
तक्र"२ शीघ्र ही गुल्म रोग को दूर करता है। यह अस्सी प्रकार के वात रोगों
को नाश करता है तथा जाठराग्नि को प्रदीप्त करता है ॥ १५१-१५२ ॥
१. व्यञ्जनं सूपशाकादि मिष्ठान्न तेमनं स्मृतम्—(रा० नि० २०) ।
२. मालवे व्यञ्जनविशेषः । मातुधानीयकपुष्पैर्योषितगुणः स "खल" इत्युच्यते ।
फलमूलैर्धनादानं व्यञ्जनं पाकतो घनम् । लेहवत् खल इत्यन्ये दोषलाः स्व
स्व योनिवत् ।। कल्को विल्वशलाटूनां तिलकल्कश्च तत्समः । दध्नः सरोऽम्लः
सस्नेहः खलो हन्ति प्रवाहिकाम् । श्रीकुक्कुटः अपराजितश्च नामपरो खला-
वपि । (वा० चि०-९।१२) ।
२४ पाकदर्पणम्
त्रिकटुकखलनिर्माणविधिर्गुणाश्च
तक्राजमोदसंयुक्तः खलस्त्रिकटुकोद्भवः ।
वासितः प्रसवैः सम्यक् सुगन्धसुमनोहरैः ॥ १५३ ॥
औदरानामयान् हन्ति जठराग्निप्रवर्द्धनम् ॥ १५४ ॥
त्रिकटु खल बनाने की विधि तथा गुण - तक्र (मट्ठा) तथा अजवायन से
युक्त त्रिकटु (सोंठ, पीपर, मरिच) से बनाया हुआ सुगन्धित एवं मनोहर पुष्पों
से अच्छी तरह सुवासित किया हुआ खल (त्रिकटु खल) उदर के रोगों को नष्ट
करता है। तथा जाठराग्नि को बढ़ाता है ॥ १५३-१५४ ॥
शुद्धतेमननिर्माणविधिर्गुणांश्च
तक्रस्याम्लं मर्दयित्वा जलेन च विचक्षणः ।
तत्र सैन्धवसिद्धार्थं मरीचानागरोद्भवम् ॥ १५५ ॥
कल्कं चालोडयित्वा च वासयेत्कर्पूरादिभिः ।
अयं तक्रसमुत्पन्नः खलो दीपनपाचनः ॥ १५६ ॥
त्रिदोषशमनं सम्यक् पीयूषसदृशः शुभः ॥ १५७ ॥
शुद्ध तेमन बनाने की विधि तथा गुण - बुद्धिमान् पाचक अम्लतक्र को जल
के साथ मर्दन कर उसमें सेन्धा नमक, सरसों, मरिच तथा सोंठ का कल्फ मिलाकर
कर्पूर आदि सुगन्धित द्रव्यों से सुवासित करें। यह तक्र के योग से बना हुआ खल
(शुद्ध तेमन) जाठराग्निदीपक तथा पाचक है। यह अच्छी तरह त्रिदोष को
शान्त करनेवाला अमृत के समान कल्याणकारक है ॥ १५५-१५७॥
कैटर्यं खलनिर्माणविधिर्गुणांश्च
व्योषकैडर्यलसुनजीरकाणि पुनर्नवैः ।
सैन्धवप्रमुखैर्युक्तः शरीरालनकृत्खलः ॥ १५८ ॥
कैटर्य खल निर्माणविधि तथा गुण - व्योष (सोंठ, पीपर, मरिच) कैटर्य
(कट्फल) लहसुन, जीरा, पुनर्नवा, सेन्धानमक आदि प्रमुख द्रव्यों से युक्त खल
(कैटर्य खल) जाठराग्नि को बढ़ानेवाला हैं। अर्थात् पूर्वोक्त खल में व्योष आदि
द्रव्यों को मिला देने से इसे कैटर्यखल कहते हैं और यह जाठराग्निवर्द्धक है ॥१५८॥
विशिष्टखलनिर्माणविधिर्गुणाश्च
मरिचं लशुनं चैवं निर्गुण्डी वैजयन्तिका ।
कर्णमालाग्निकाचूतजीरकाहिङ्गु सैन्धवान् ॥ १५९ ॥
पेषयित्वा यथामात्रमेतान् तक्रेण लोडयेत् ।
आलोड़ितं पुनः कल्कं जालिन्या च विशोधयेत् ॥ १६० ॥
नर्लविरचितम् २५
प्रवणीभाण्डमारोप्य चुल्ल्यां सं च प्रदापयेत् ।
निक्षिप्य गोघृतं तत्र नयेत्तस्मिन् प्रमाणवित् ॥ १६१ ॥
लशुनाजाजिसिद्धार्थं हिगुपर्पटमेथिकान् ।
भर्जयित्वा क्षिपेत्तत्र खलं तक्रविमिश्रितम् ॥ १६२ ॥
तन्मुखञ्च पिधानेन संछाद्य विपचेद्बुधः ।
यादृशं खलमादाय प्रदद्याद्बोधने दिने ॥ १६३ ॥
खलोऽयं साधितः सम्यक् वातश्लेष्मविनाशकः ।
उष्णं वीर्यकरं सम्यक् दीपन्नाग्निकरं शुभम् ॥ १६४ ॥
विशिष्ट 'खल' बनाने की विधि तथा गुण - काली मरिच, लहसुन, निर्गुण्डी-
बीज, वैजयन्तिका (गनियारी), कर्णमाला (नील कमल), अग्निका (चित्रक)
चूत (आम की गुठली), जीरा, हींग तथा सेन्धानमक इन सबको पीसकर
उचित मात्रा में तक्र के साथ मिला दे। पुनः मिलाये हुए कल्क को चलनी से छान
ले। इसके बाद प्रवणी भाण्ड (बटलोही या मिट्टी की हाड़ी) को चूल्हा पर रख
कर उसमें पूर्वोक्त कल्क को छोड़ दे और उसमें गाय का घी उचित मात्रा में
डालकर लहसुन, जीरा, सरसो, हींग, पित्त पापड़ा तथा मेथी को भूनकर मिला दे।
इसके बाद उसमें तक्र मिश्रित "खल" को छोड़ दे और उसका मुँह ढक्कन
से बन्द कर बुद्धिमान् पाचक पकाये। तैयार हो जाने पर एक चौथाई (एक
तोल = दस मि० ली०) खल प्रातःकाल पीने के लिये दे। यह अच्छी तरह
बनाया हुआ खल वात-कफ को नाश करने वाला है। यह उष्ण है तथा अच्छी
तरह वीर्यवर्द्धक है और जाठराग्नि को प्रदीप्त करने वाला है ॥ १५९-१६४ ॥
सितकुलित्थरसनिर्माणविधिर्गुणाश्च
रसं शीतकुलित्थोत्थं लशुनामरिचान्वितम् ।
रामठं सैन्धवं तत्र निवेद्येन्मानवः पुनः ॥ १६५ ॥
प्रदद्याद्वासितं पुष्पैः कर्पूराद्यैश्च सूदराट् ।
रसं शीतकुलित्थोत्थं समस्तामयहृत्तथा ॥ १६६ ॥
क्षुत्कृत् हृत्परमं स्वादु परमात्मसुहृत्पुनः ॥ १६७ ॥
सफेद कुरथी का रस बनाने की विधि तथा गुण--सफेद कुरथी का रस लेकर
उसमें लहसुन तथा मरिच का चूर्ण मिला दे और पुनः पाचक उसमें हींग तथा सेन्धा-
नमक छोड़ दे। इसके बाद उत्तम पाचक पुष्प तथा कर्पूर आदि से सुवासित
कुरथी के रस को पान करने के लिये दे। यह सितकुलित्थोत्थरस सम्पूर्ण रोगों को
दूर करनेवाला है तथा भूख को बढ़ाने वाला, हृदय के लिये हितकर, स्वादिष्ट एवं
आत्मा को अच्छी तरह प्रसन्न करनेवाला है ॥ १६५-१६७ ॥
असित कुलित्थररसनिर्माणविधिर्गुणाश्च
सितेतरकुलित्थस्य रसमादायसूदराट् ।
क्षिपेन्मरिचलशुनरामठानलसैन्धवान् ॥ १६८ ॥
दापयेद्वासितं द्रव्यैरधिवास्य सुगन्धिभिः ।
मरुद्दोषहरं सम्यक् श्लेष्मजिद्वातशोषणम् ॥ १६९ ॥
कृष्णकुरथीरस बनाने की विधि तथा गुण— उत्तम पाचक कृष्णकुरथी
का रस लेकर उसमें मरिच, लहसुन, हींग, चित्रक तथा सेन्धा नमक को (उचित
मात्रा में) छोड़ दे और सुगन्धित द्रव्यों से अधिवासित कर सुगन्धित बना ले
और पान करने के लिये दे । यह अच्छी तरह वात-विकार को दूर करता है,
कफ विकार को जीत लेता है तथा वात रोग का शोषण करता है ॥१६८-१६९॥
खलस्य (निर्मित खलद्रव्यस्य) प्रशस्तिः
[पृष्ठ २८]
२८ पाकदर्पणम्
चुल्ल्यामारोपयेद्विद्वान् तापयेन्मृदुवह्निना ।
तदीषद्व्रव्यसंयुक्तं जालिन्या च विशोधयेत् ॥ १८२ ॥
शोधितं तत्पचेत्सम्यगवघट्टनपूर्वकम् ।
बुद्बुदेषु विलीनेषु रक्तवर्णं प्रदापयेत् ॥ १८३ ॥
सौरभ्यं निक्षिपेत्तत्र किञ्चिद्गोधूमचूर्णकम् ।
तदावलोक्य सूदस्तु तद्घृतं चावतारयेत् ॥ १८४ ॥
न्यसेत्तत्र च तक्राक्तताम्बूलीकृष्णवर्णकम् ।
घनसारदिना सूदो वासयेत् सर्पिरुत्तमम् ॥ १८५ ॥
इदमाज्यं नवं पूज्य प्रदद्याद्भोजनार्थिने ।
अत्र भोजनवेलायां प्रदद्याद्द्रवपूर्वकम् ॥ १८६ ॥
ईषद्धनीकृतं सर्पिर्दद्यात्पायसभोजने ।
भक्ष्यादिभक्षणे काले घृतं दद्याद् घनीकृतम् ॥ १८७ ॥
वातपित्तप्रशमनं सुरभि स्वादु बृंहणम् ।
धातुप्रसाधनं शीतं विपाकि मधुरावहम् ॥ १८८ ॥
माङ्गल्यचाक्षुषं सर्पिर्गव्यं ग्रहनिवारणम् ॥ १८९ ॥
**गोघृत निर्माण विधि तथा गुण—**सफेद गाय का नवनीत लेकर पीत वर्ण
होने तक अच्छी तरह शोधन करे। उसी दिन का बनाया हुआ गाय का घी
चूल्हे पर रखे और विद्वान् पाचक मन्दाग्नि से तपाये । कुछ थोड़े द्रव्यों से संयुक्त
उस घी को छलनी से छान ले । इसके बाद शोधित गोघृत को कलछुल से चलाते
हुए पकाये । पकाते समय बुदबुद शब्द के बन्द हो जाने पर रक्त वर्ण होने तक
पकाये । उसमें सुगन्धित द्रव्य छोड़ दे और थोड़ा गेहूँ का चूर्ण भी छोड़ दे। पाचक
उस घृत को परिपक्व देखकर उतार ले । तदनन्तर उसमें तक्रलिप्त ताम्बूली
कृष्ण वर्ण को छोड़ दे और पाचक कर्पूर आदि से उत्तम घी को सुगन्धित बना ले
और इस नवीन उत्तम घृत को भोजन करनेवालों के लिये अर्पित करे। भोजन के
समय उसको गलाकर (द्रव्य रूप बनाकर दे। पावसभोजन (वर्षाकालीन)
भोजन या पायस (खीर) भोजन के समय थोड़ा गाढ़ा किया घृत दे। भक्ष्य
आदि पदार्थ खाने के समय गाढ़ा किया घृत दे। यह गाय का घी वात-पित्त को
शान्त करनेवाला सुगन्धित, स्वादिष्ट तथा बृंहण (मांसवर्द्धक) होता है और
धातुओं (रसरक्तादि) धातुओं को शुद्ध करने वाला, शीतल, विपाक में मधुर,
कल्याणकारक, नेत्र के लिये हितकर तथा ग्रह को दूर करनेवाला होता है।
[पृष्ठ २९]
नलविरचितम् २९
कुलत्थादीनां विशिष्टपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
तानि तेभ्यः समादाय त्वचं दग्धां समुद्धरेत् ।
भाजने राजते तानि कल्कं कुर्यात् प्रयत्नतः ॥ १९० ॥
घनसारदिभिर्भूयः सूदस्तान्यधिवासयेत् ।
सैन्धवादीन् न्यसेत्तस्मिन् लशुनार्द्रकयोः कणान् ॥ १९१ ॥
कणेषु भर्जितेष्वेवं कुष्माण्डवटकोद्भवान् ।
सर्पिषा सह निक्षिप्य कुर्यादङ्गारधूपनम् ॥ १९२ ॥
फलाकाराणि कुर्वीत कल्केऽस्मिन् बहुलः सुधीः ।
तत्तदाकाररूपेण भर्जयेत्तलपेरैर्घृतैः ॥ १९३ ॥
भर्जितानि पुनस्तानि रक्षयेन्मक्षिकादिभिः ।
ततो भाण्डेषु कुर्वीत सम्भारांश्च पृथक् पृथक् ॥ १९४ ॥
सम्भाराणि पुनस्तानि फलाकाराणि निक्षिपेत् ।
तानि भाण्डेषु तप्तेषु भर्जयेद्रामठादिभिः ॥ १९५ ॥
घनसारदिभिर्भूयः सूदस्तान्यधिवासयेत् ।
पुनश्च तानि बध्नीयात् पूगपट्टेसु सूद्राट् ॥ १९६ ॥
निक्षिप्य तानि सर्वाणि अन्तराट्टालकेष्वपि ।
भोजनावसरे प्राप्ते भोक्तृष्वेतानि दापयेत् ॥ १९७ ॥
भवन्ति बहवः शाखाः वस्तुनेकैन संयताः ।
सूदस्य हस्तवैचित्र्यात् तद्बुद्धिविभवात्ततः ॥ १९८ ॥
घ्नन्ति सर्वमयानेते शाकभेदाः सुखावहाः ।
वातपित्तप्रशमनाः साधुकल्पाः शुभावहाः ॥ १९९ ॥
कुलत्थी, उड़द आदि शिम्बीधान्यों की विशिष्टपाकनिर्माणविधि तथा गुण—
पूर्वोक्त कुलथी उड़द, आदि शिम्बी धान्यों में से लेकर पके छिलकों को निकाल दे
और उसे चाँदी के पात्र में कल्क बनावें । इसके बाद पाचक कर्पूर आदि से सुवा-
सित कर ले । पुनः सेन्धा नमक तथा लहसुन एवं अदरक के टुकड़ों को छोड़ दे।
पूर्वोक्त प्रकार से कणों के भुन जाने पर कुष्माण्ड वटक (कोहणवरी) को घी के
साथ छोड़कर छौंक दे । पुनः उस कल्क में अनेक प्रकार से बहुत फल के आकार
का बना ले और पूर्वोक्त आकार के रूप में ही कड़ाही में घृत डालकर भून ले।
इस भूने हुए व्यञ्जन को मक्खी आदि से सुरक्षित रखे। इसके बाद अलग-
अलग पात्रों में सम्भार (भूने हुए पदार्थ) को रखकर तथा पुनः उसको फलाकार
बनाकर संप्त भाण्ड में हींग आदि के साथ भूने तथा कर्पूर, कस्तूरी आदि से सुवा-
सित कर ले । तदनन्तर पाचक पूगपट्ट नेत्र में उनको बांध कर तथा अट्टालिका
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के अन्दर रखकर भोजन के समय भोजन करनेवाले को दे। उसके एक ही पदार्थ
से अन्य पदार्थों का संयोग होने पर बहुत सी शाखायें होती हैं। यह पाचक के
हस्तकौशल एवं उसके बुद्धिवैभव के ऊपर निर्भर करता है कि एक ही पदार्थ से
अनेक प्रकार के भोज्य शाक पदार्थों का निर्माण कर ले। ये शाक के प्रकार सभी
रोगों को नष्ट करते हैं तथा सुख को देनेवाले हैं। ये उत्तम कल्प वात-पित्त को
शान्त करने वाले तथा कल्याणकारक हैं ॥ १९०-१९९ ॥
रम्भाफलशाक निर्माणविधिर्गुणाश्च
वह्नरम्भाफलं रम्यं स्निग्धं स्थूलं सुदीर्घकम् ।
तदादाया पुनः छिन्द्यात् मूलमग्रं त्वचं पुनः ॥ २०० ॥
पुनश्च कलनीकोट्या भिन्नं कुर्वीत तद्विधा ।
त्रिधा वापि चतुर्धा वा च्छिन्द्यात्तियंक् च तत्पुनः ॥ २०१ ॥
प्रक्षाल्य प्रवणीभाण्डे निक्षिपेद् वारिणा च तान् ।
साधु मुद्गं यथायोग्यं प्रक्षिपेत्तत्र वारि च ॥ २०२ ॥
चुल्यामारोप्य तद्भाण्डे पचेत्तद्बहिना बुधः ।
अवतीर्य ततो रम्भाफलं पक्वं सुशोभनम् ॥ २०३ ॥
सितञ्च तत्र चूर्णञ्च मरीचिश्च विनिक्षिपेत् ।
प्रताष्य प्रवणीभाण्डमपरं सूदराट् ततः ॥ २०४ ॥
सिञ्चेत्तत्र नवं सर्पीरामठं तत्र निक्षिपेत् ।
घट्टयेद्द्वावपेत्तप्ते द्रव्यं सूदः पुनः पुनः ॥ २०५ ॥
तथैव तत्फलं तत्र निक्षिपेत्तत्प्रमाणवित् ।
छाद्येत्तन्मुखं तस्य पिधानेन प्रयत्नतः ॥ २०६ ॥
उत्क्षेपणमपक्षेपं कुर्यादन्तश्च तत्फलम् ।
प्रततं पाकमालोक्य वासयेत्तत्फलं ततः ॥ २०७ ॥
निक्षिपेद्वासितैः पुष्पैः पट्टपूगस्य तद्बुधः ।
कर्पूरप्रमुखैर्दिव्यैस्तत्पुनश्चाधिवासयेत् ॥ २०८ ॥
शैत्यं माभूत्ततस्तस्य उष्णत्वस्यानिवृत्तये ।
अन्तराट्टालके तच्च निक्षिपेत्किञ्चिदुष्णके ॥ २०९ ॥
दापयेद्भोजने काले तदादाय सुबुद्धिमान् ।
पित्तारुचिप gather प्रशमनं मेध्यं स्वादुतरं महत् ।
देहसारमिदं पथ्यमिन्द्रियाणां बलप्रदम् ॥ २१० ॥
**केला का शाक बनाने की विधि तथा गुण—**गठा हुआ सुन्दर, स्निग्ध,
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स्थूल तथा बड़ा केला का फल लेकर उसके मूल भाग, अग्रभाग तथा छिलका को
काटकर निकाल दे और चाकू से दो भाग कर दे। अथवा तीन भाग या चार भाग
तिरछा काटे । इसके बाद उनका प्रक्षालन कर प्रवणी भाण्ड, (बटलोही) में
जल के साथ छोड़ दे। स्वच्छ एवं साफ मूँग की दाल तथा जल उसमें छोड़ दे।
तदनन्तर उस पात्र को चूल्हा पर रखकर बुद्धिमान् पाचक आग से पकावे। इसके
बाद अच्छी तरह पके हुए केला के फल को उतार कर उसमें मिस्री तथा मरिच
का चूर्ण छोड़ दे और-बार वार पाचक दूसरे बटलोही को गरम कर उसमें नवीन
घी तथा हींग का तड़का देकर उस केला के परिपक्व फल को छोड़ दे। इसके बाद
गरम रहते ही उसको कलछुल से घोटे और पतला बना ले।
पूर्वोक्त प्रकार से केला के फल को उसके प्रमाण को जानने वाला पाचक
भाण्ड में छोड़ दे और ढक्कन से उसे ढक दे। उत्क्षेपण एवं अपक्षेपण (झोंककर)
के द्वारा उस फल को ऊपर-नीचे कर दे। पाक हो जाने पर सुगन्धित द्रव्यों से
सुगन्धित कर ले। इसके बाद पूगपट्ट में रखे तथा सुगन्धित कर्पूर आदि दिव्य
द्रव्यों से अधिवासित कर ले। ठंडा न हो जाय तथा उसकी गर्मी बनी रहे इसके
लिये थोड़ा गरम अन्दर की अट्टालिका (रेफ्रिजेटर) में रखे और बुद्धिमान
पाचक उसमें से निकालकर भोजन के समय पर दे। यह पित्त विकार तथा अरुचि
को शान्त करता है, मेधा के लिये हितकर है तथा बहुत स्वादिष्ट होता है। यह
शरीर के ओज को बढ़ाता है, पथ्य है तथा इन्द्रियों को बल देनेवाला है॥
कदलीस्तम्भशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
राजरम्भान्तरागर्भमादाय त्वचमुत्सृजेत् ।
तन्मूलाग्रे ततश्छित्वा दात्रेण विसृजेद् बुधः ॥ २११ ॥
करवीरदलाकारं कृतं तत्तत्प्रदापयेत् ।
मध्यदण्डं समादाय छिन्द्यात्तण्डुलवत्पुनः ॥ २१२ ॥
दण्डमन्यं पुनश्छिन्द्यात् कणावत्तण्डुलस्य च ।
चणकाकारवच्छिन्द्यात् दण्डमन्यं सुबुद्धिमान् ॥ २१३ ॥
चक्राकारं च कुर्वीत स्तम्भरम्भातरूद्भवम् ।
निक्षिपेत्प्रवणीभाण्डेष्वेतान् विद्वान् पृथक् पृथक् ॥ २१४ ॥
सैन्धवं तेषु निक्षिप्य शोभार्थं रजनीं क्षिपेत् ।
जम्बीरारम्लं च निक्षिप्य पचेत्तान् वह्निना ततः ॥ २१५ ॥
सम्भारादीन् विनिक्षिप्य भर्जयित्वावतारयेत् ।
पूगपट्टेषु निक्षिप्य वासयेत्पूर्ववच्च तान् ॥ २१६ ॥
३२ पाकदर्पणम्
कृत्वा तु पोटलीं विद्वान् अन्तराट्टालके न्यसेत् ।
प्रदद्याद्भोजने काले रम्भास्तम्भाननुत्तमान् ॥ २१७ ॥
लघून् स्वादुतरान् रुच्यान् पवित्रान् पित्तनाशनान् ॥ २१८ ॥
कदली स्तम्भ के अन्तर्गर्भ का शाक बनाने की विधि तथा गुण—कदली
खम्भ के अन्दर के भाग को लेकर उसकी त्वचा को फेंक दे और उसके मूलभाग
तथा अग्रभाग को बुद्धिमान् पाचक चाकू से काटकर करवीर ( कनेर ) के पत्ते
के आकार का बनाकर रख ले । उसके बीच का दण्ड लेकर चावल के आकार
को काट ले । दूसरे दण्ड को लेकर चावल के कण के आकार का काट ले । बुद्धिमान्
पाचक कुछ अन्य दण्ड को लेकर चने के आकार का काट ले और कुछ दण्ड को
चक्राकार काट कर बना ले । इसके बाद उन सबों को अलग बटलोही में रखे
और उसमें सेन्धानमक छोड़कर सुन्दरता के लिये हल्दी का चूर्ण छोड़ दे । तदन-
न्तर जम्बीरी नींबू का रस छोड़कर उनको आग पर पकावै । इसके बाद घी, हींग
का तड़का तथा गरम मसाला आदि छोड़कर तथा भूनकर उतार ले । उतारने
के बाद पूगपट्ट में रखकर उनको पूर्ववत् सुगन्धित पुष्प, कर्पूर आदि सुगन्धित
द्रव्यों से सुवासित कर ले और उनकी पोटली बनाकर अन्तराट्टालक (रेफ्रीजेटर )
में रखे । इस उत्तम रम्भास्तम्भ के अन्तर्गर्भ का शाक भोजन के समय दे । यह
शाक हल्का, स्वादिष्ट, रुचिकर, पवित्र तथा पित्तनाशक है ॥ २११-२१८ ॥
वृन्ताकशाकनिर्माणविधिगुणाश्च
बालं तरुणमानीय वृन्ताकं सुमनोहरम् ।
वृन्ताग्रं विसृजेच्छित्त्वा कलिकन्या तीव्रधारया ॥ २१९ ॥
पुनश्च तत्फलं द्वेधा भिन्नं कृत्वा सुबुद्धिमान् ।
सजले निक्षिपेद् भाण्डे बृहत्या सदृशं फलम् ॥ २२० ॥
स्विद्येपो निशाभाण्डे निक्षिपेदपरे कटुम् ।
रामठं तत्र कैटर्यं धान्याकं च विनिक्षिपेत् ॥ २२१ ॥
पुनश्च निक्षिपेत्तत्र लशुनाईकयोः कणान् ।
एतस्य मेलनं कृत्वा पचेच्चुल्यां विचक्षणः ॥ २२२ ॥
बृहतीफलभिन्नानि निक्षिपेत् तप्तवारिणि ।
आदाय तानि पक्वानि निक्षिपेद्भाजने शुभे ॥ २२३ ॥
सम्भारैर्मरिचादीनां कल्कं कुर्याद् विधानतः ।
चिञ्चापक्वफलाम्लेन दध्ना कल्कं विलोडयेत् ॥ २२४ ॥
नलविरचितम् ३३
कुर्यात् कल्केन तेषाञ्च लेपनं बहिरन्ततः ।
भर्जयेत्तानि लिप्तानि गोघृतेनाथ सूदवित् ॥ २२५ ॥
अवतार्य पुनस्तानि कर्पूरेणाथ वासयेत् ।
शुचौ तु पूगपट्टस्य नेत्रे तानि समादिशेत् ॥ २२६ ॥
ततश्च पोटलीं कृत्वा तप्ते सर्पिषि निक्षिपेत् ॥ २२७ ॥
स्वादु वृष्यं रुचिकरं त्रिदोषशमनं परम् ।
इदं बृहत्यास्तरुणं फलं पुष्टिविवर्द्धनम् ॥ २२८ ॥
वृन्ताक (बैगन) का शाक बनाने की विधि तथा गुण—बाल तरुण
(थोड़े दिन का उत्पन्न हुआ) सुन्दर बैंगन लेकर तीक्ष्णधार वाले चाकू से बैंगन
के अग्रभाग (भेंटी) को काटकर फेंक दे । फिर बुद्धिमान् पाचक बैंगन फलके दो
टुकड़े कर जल वाले पात्र में छोड़ दे । बृहती (गोल बैंगन) के समान फल को
काटकर हल्दी के पात्र में रखकर जल से सींचे और दूसरे पात्र में रख कर सोंठ
के साथ जल से सींचे । इसके बाद उसमें हींग, कैटर्य ( कायफल ) तथा धनियां
का चूर्ण छोड़ दे । फिर उसमें लहसून तथा अदरक के टुकड़ों को छोड़ दे और
इन सबों को एक में मिलाकर चूल्ही पर रखकर पकावे । बृहती फल (बैंगन) को
टुकड़ा-टुकड़ा काटकर गरम जल में छोड़कर उन पके फलों को लेकर स्वच्छ पात्र
में रखे । इसके बाद मरिच, धनियां, जीरा आदि मसालों का विधिपूर्वक कल्क
बनावे और इमली के पके फल की खटाई तथा दही में कल्क को मिला दे । इसके
बाद इस कल्क से बैंगन के टुकड़ों को बाहर-भीतर लेप कर दे तथा पाकशास्त्र को
जानने वाला पाचक उन कल्कलिप्त बैंगन के टुकड़ों को गाय के घी के साथ भून
ले। पुनः उसको उतार कर कपूर से सुगन्धित बना ले और पुनः स्वच्छ पूगपट्ट के
नेत्र (फोंफी) में भर दे । इसके बाद पोटली बनाकर संतप्त घी में छोड़ दे और
उसमें से निकाल कर खाने को दे । यह शाक स्वादिष्ट, वीर्यवर्द्धक, रुचिकारक
तथा अच्छी तरह त्रिदोषशामक है । यह परिपुष्ट बैंगन का फल पुष्टिवर्द्धक
होता है ॥ २१९-२२८ ॥
बृहती फलस्यान्यविधशाकनिर्माणविधिगुणाश्च
तिन्तिडीचूतफलयोर्भाण्डे कुर्याच्च मेलनम् ।
कुम्भीं कुस्तुम्बरीं तत्र निक्षिपेत्सल्लकीफलम् ॥ २२९ ॥
सैन्धवादींस्तु निक्षिप्य भर्जयेद्रामठादिभिः ।
घनसारादिना सम्यक् तत्पुनश्चाधिवासयेत् ॥ २३० ॥
३४ पाकदर्पणम्
बध्नीयाद्भर्जितं नेत्रे पूगपट्टस्य तत्फलम् ।
पूर्ववन्निक्षिपेद्विद्वान् तप्ते सर्पिषि तत्फलम् ॥ २३१ ॥
पित्तश्लेष्मप्रशमनं बृहत्यास्तरुणं फलम् ।
शरीरबलकृद्वृष्यं धातुवृद्धिकरं परम् ॥ २३२ ॥
बैंगन (गोल बैंगन) का दूसरे प्रकार से शाक बनाने की विधि तथा गुण—
पूर्वोक्त प्रकार से बैंगन को काटकर गरम पानी में छोड़कर निकाल ले और स्वच्छ पात्र में रखे। इसके बाद बैंगन फल के पात्र में इमली तथा आम के फल को मिला दे और कुम्भी, कुस्तुम्बुरी तथा सल्कीफल (सलईफल) छोड़ दे। तदनन्तर सेन्धानमक, जीरा आदि मिलाकर हींग का तड़का देकर घी में भून ले और कर्पूर आदि से अच्छी तरह पुनः सुगन्धित बना ले। इसके बाद भर्जित बैंगनफल को पूगपट्ट के नेत्र में बाँधे तथा पूर्ववत् संतप्तघृत में छोड़कर विद्वान् पाचक पका ले। यह तरुण बृहतीफल (गोल बैंगन) का शाक पित्त एवं कफ को शान्त करने वाला, शरीरबलकारक, वीर्यवर्द्धक तथा रस-रक्तादिधातुओं को अच्छी तरह बढ़ाने वाला है ॥ २२९-२३२ ॥
विशिष्टप्रकारेण बृहतीशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
फलं बृहत्यास्तरुणं संवृत्तं धारयेद् द्विधा ।
वेष्टयेदार्द्रवस्त्रेण भागमेकं तयोर्बुधः ॥ २३३ ॥
भाण्डे चेदितमपरं भागं चुल्यामपचेत्पुनः ।
पाकावसानपर्यन्तमन्यस्य जलमाविशेत् ॥ २३४ ॥
पक्वञ्च वेष्टयेद्भागमपक्वं पूगनेत्रयोः ।
दृढञ्च निक्षिपेद्विद्वान् तप्तसर्पिषि पूर्ववत् ॥ २३५ ॥
बृहत्याः फलभागस्य चित्रपाकः प्रदर्शितः ।
पाकं पादसमायुक्तं भागद्वयसमन्वितम् ॥ २३६ ॥
भोजनावसरे प्राप्ते प्रदद्याद् बृहती फलम् ॥ २३७ ॥
विशिष्टप्रकार से बृहतीफलचित्रपाक बनाने की विधि तथा गुण—
बैंगन के तरुण फल को दो प्रकार से ग्रहण करे। उन दोनों में से एक भागको आर्द्रवस्त्र से वेष्टित कर दे और भाण्ड (पात्र) में रखकर पकाये तथा दूसरे भाग को चूल्हे में पकाये। दूसरे भाग का जल पाक होने तक गिरने दे। इसके बाद पूगपट्ट के दो नेत्रों में पक्व तथा अपक्व भाग को वेष्टित कर दे। तदनन्तर विद्वान् पाचक संतप्त घी में पूर्ववत् छोड़कर पका लें। यह बैंगन के फल भाग का चित्रपाक प्रदर्शित
नलविरचितम् ३५
किया गया। बैंगन के पूर्वोक्त पाक के चौथाई भाग के साथ दो भाग बैंगन फल को मिलाकर भोजन के समय प्रदान करे ॥ २३३-२३७ ॥
पनसफलस्य शाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
पनसस्य फलं रम्यं तरुणं कोमलं सह ।
आनीय विसृजेच्छित्त्वा कण्टकांश्च बहिःस्थितान् ॥ २३८ ॥
पुनस्तद्बहुधा छित्त्वाखण्डं खण्डस्थितं त्यजेत् ।
पाकार्थं तत्पुनः छित्त्वा प्रवणीभाण्डमाविशेत् ॥ २३९ ॥
निशारामठकैटर्यधान्यकांस्तत्र निक्षिपेत् ।
पनसस्य फलान्यप्सु पचेद्विज्ञानि तैः सह ॥ २४० ॥
नीरसं विसृजेत्तानि समादायाऽथवा सह ।
समादाय पुनस्तेषां कानिचित्त्वच्छकलानि च ॥ २४१ ॥
कुर्यात्सूक्ष्मं च दीर्घं च शस्त्रेण च विचक्षणः ।
कल्कं च मरिचादीनाञ्जम्बीराम्लेन मेलयेत् ।
कल्केन लेपयेत्तानि भर्जयेत्सर्षिषा पुनः ॥ २४२ ॥
यदा कुङ्कुमकान्तेयं तदा तान्यवतारयेत् ।
कर्पूरं मृगनाभिं च कुङ्कुमं हिमवारि च ॥ २४३ ॥
मातुलुङ्गदलच्छेदान् केतकीकुसुमानि च ।
कुम्भीं कुस्तुम्बुरीं तत्र सर्वाण्येतानि निक्षिपेत् ॥ २४४ ॥
नेत्रेण पूगपट्टस्य वेष्टयेत् सूदराट् पुनः ।
पोटलीं वेष्टितां पूर्णां तप्ते सर्पिषि निक्षिपेत् ॥ २४५ ॥
लघु पित्तहरं वृष्यं वातघ्नं च बलप्रदम् ।
दीपनं पाचनं रुच्यं पनसस्य फलन्त्विदम् ॥ २४६ ॥
कटहल फल का शाक बनाने की विधि तथा गुण—
कटहल के सुन्दर कोमल तथा तरुण फल को लेकर उसके बाहर के कण्टकदार छिलकों को काटकर फेंक दे। फिर उसके अनेक टुकड़े बनाकर खण्ड रूप में स्थित टुकड़ों को निकाल दे। इसके बाद पाक करने योग्य खण्ड को पुनः काटकर बटलोही में रखे और हल्दी, हींग, कैटर्य (कायफर) तथा धनियाँ को उसमें छोड़ दें। पूर्वोक्त द्रव्यों के साथ पूर्वोक्त प्रकार से कटे हुए कटहल के फल को जल में पकाये। नीरस भाग उन सबों के साथ लेकर छोड़ दें। पुनः बुद्धिमान् पाचक उनके कुछ टुकड़ों को लेकर शस्त्र से काटकर छोटा तथा बड़ा टुकड़ा बनाये और मरिच, जीरा आदि के कल्क एवं जम्बिरी नींबू का अम्ल मिला दे। पुनः उस कल्क से कटहल के टुकड़ों को
५ पा.द.
Here is the complete, line-by-line transcription of the Sanskrit verses and Hindi commentary from the provided image:
[Left Page: ३६ - पाकदर्पणम्]
लिस कर दे तथा घी के साथ भूने । जब केशर के वर्ण का हो जाय तब उतार
ले । इसके बाद उसमें कर्पूर, कस्तूरी, केशर, शीतल जल, नींबू के दल के टुकड़े,
केवड़ा का फूल, कुम्भी तथा कुस्तुम्बुरी इन सबों को छोड़ दे। इसके बाद उत्तम
पाचक पूगपट्ट के नेत्र से वेष्टित कर दे और अच्छी तरह वेष्टित पोटली को संतप्त
घी में छोड़ दे । तदनन्तर उनमें से निकाल कर खाने को दे । यह कटहल फल
का शाक हल्का होता है और पित्त को दूर करने वाला, वीर्यवर्द्धक, वातनाशक,
बलप्रद, जाठराग्निदीपक, पाचक तथा रुचिकारक होता है ॥ २४८-२४६ ॥
प्रकारान्तरेण पनशशाकनिर्माणविधिः
शकलानि सुपक्वानि समादायाथ कानिचित् ।
पूर्ववच्छेद नं कुर्यात् सम्भारादींश्च पूर्ववत् ॥ २४७ ॥
सितखण्डान् पुनस्तत्र चिञ्चाम्लेन समक्षिपेतू ।
भर्जयेत् पूर्ववत्तानि रामठाद्यं च सूदराट् ॥ २४८ ॥
घनसारदिना सम्यक् पुनस्तान्यधिवासयेत् ।
नेत्रेण वेष्टयेत्तानि पूगपट्टस्य बुद्धिमान् ॥ २४९ ॥
पूर्ववत् पोटलीं कृत्वा तप्ते सर्पिषि निक्षिपेत् ।
प्राप्ते भोजनकाले तु प्रदद्याद्भोजनार्थिने ॥ २५० ॥
अन्य प्रकार से कटहल का शाक बनाने की विधि—अच्छी तरह परिपक्व
कटहल के कुछ टुकड़ों को लेकर पूर्ववत् काट ले और सम्भार (हल्दी, हींग,
मसाला आदि) पूर्ववत् मिला दे। पुनः उसमें शक्कर को इमली की खटाई के साथ
छोड़ दे । इसके बाद उत्तम पाचक पूर्ववत् घी तथा हींग के साथ भून ले। पुनः
कर्पूर आदि सुगन्धित द्रव्यों से उनको सुवासित कर ले । इसके बाद पूगपट्ट के नेत्र
से उनको वेष्टित करे और पूर्ववत् पोटली बनाकर संतप्त घृत में छोड़ दे । तदन-
न्तर भोजन के समय खानेवाले को दे ॥ २४७-२५० ॥
पनसस्यान्यमिष्टपाकनिर्माणप्रकारो गुणाश्च
शर्कराखण्डयुक्तानि फलानि पनसस्य च ।
दर्शनाय विधिः केषामुच्यते सविशेषतः ॥ २५१ ॥
कानिचिच्छकलान्यस्य आदाय च्छेदयेत्पुनः ।
नवेन सर्पिषा विद्वान् भर्जयेत्तानि बुद्धिमान् ॥ २५२ ॥
सम्भारादीन् मरिच्यादीन् कृत्वा भाण्डेऽथ मेलनम् ।
क्षीरेण सह खण्डांश्च नारिकेलफलस्य च ॥ २५३ ॥
[Right Page: ३७ - नलविरचितम्]
आर्द्रवीलेपमाशीतपूगपट्टस्य निक्षिपेत् ।
मूत्रस्रावी मलस्रावी रक्तजः पित्तजस्तथा ॥ २५४ ॥
कटहल का मीठा पाक बनाने का प्रकार तथा गुण—शक्कर से युक्त कटहल
के फलों को दिखाने के लिए कुछ पाक-निर्माण को विधि विशेषप्रकार से कह रहे
है । कटहल के परिपक्व कुछ टुकड़ों को लेकर पुनः छोटा-छोटा काटे और बुद्धि-
मान् पाचक उनको नवीन घी के साथ भून ले । इसके बाद उसमें मरिच, जीरा
आदि मसाला सामग्री को पात्र में रखकर मिला दे और दूध के साथ नारियल के
फल के टुकड़ों एवं शक्कर को मिलाकर पूगपट्ट में दव लेप पकाये तथा शीतल होने
तक छोड़ दे । इसका प्रयोग मलस्रावी, मूत्रस्रावी, रक्तज एवं पित्तज रोग में
करे ॥ २५१-२५४ ॥
निष्पावफलयुक्तपनसफलपाकप्रकारो गुणाश्च
निष्पावफलमानीय कोमलं क्रिमिवर्जितम् ।
त्वचमुत्सृज्य तद्बीजं आहरेच्छोधयेद्बुधः ॥ २५५ ॥
पचेत्तत्प्रवणीभाण्डे क्षतेनैव ततः परम् ।
नारिकेलफलं क्षोरं वटकान् पेषयेत्तिलान् ॥ २५६ ॥
मरीचान् सर्षपान् पिष्ट्वा कल्कं तत्र विनिक्षिपेत् ।
पुनः क्षीरं समासिच्य सुगन्धञ्च निषिञ्चयेत् ॥ २५७ ॥
रामठं क्षीरमासिच्य तानि पक्वावतारयेत् ।
ततश्च घनसारार्याः सूदस्तान्यधिवासयेत् ॥ २५८ ॥
ततस्तत्पूगपट्टेन वेष्टयित्वा प्रदापयेत् ।
इदं स्वादुतरं हृद्यं कषायं गुरुपित्तकृत् ॥ २५९ ॥
वृष्यं बल्यं कफहरं समीरणविवर्धनम् ।
एवं च वननिष्पावं पक्वं सम्यक् प्रदापयेत् ॥ २६० ॥
इदञ्च वननिष्पावं स्निग्धं स्वादुतरं परम् ।
समीरणहरं वृष्यं पित्तश्लेष्मकरं हितम् ॥ २६१ ॥
निष्पाव फलयुक्त कटहलफल का पाक निर्माण प्रकार तथा गुण—बुद्धिमान्
पाचक क्रिमिरहित निष्पाव (भटवांस) के कोमल फल को लेकर उसकी त्वचा
को निकाल कर फेंक दे तथा उसके बीज को लेकर शोधन कर ले । इसके बाद
पूर्वोक्त परिपक्व कटहल के फल को बटलोही में क्षत (खण्डित) भटवांस के
साथ पकाये । इसके बाद नारियल के फल, दूध, वटक (कोहड़बटी) तथा तिल
को पीसकर कल्क बना ले और मरिच एवं सरसों को भी पीसकर कल्क बना ले ।
an 'ा'?
Look at it: it has a body and an 'ा' (aa-matra)!
What is the body?
It's 'व्र' or 'ब'?
Wait, look at 'ब' in 'बुधः': 'ब' has a loop with a diagonal slash inside!
Does this letter have a diagonal slash inside?
YES! It has a loop with a diagonal line inside, like 'ब' or 'व्र'!
Wait, is it 'चूर्णेनाव्रावयेत्ततः' or 'चूर्णेनाव्रापयेत्ततः'?
Wait, if the body is 'व' and it has a 'ा' and then 'व' with 'े':
Wait! Look at the letter before 'त्त':
Is it 'ये' or 'पे' or 'वे'?
Wait, look at 'य' in 'वासयेत्' (L52): 'य' has a curved left.
Look at 'वे' in 'प्रवरे' (L51): 'वे' has a round loop!
In this word, the letter before 'त्त' has a curved left like 'य'!
Wait, but does it?
Let's look at 'य' in 'मेथ्याश्च' just to the left:
मे - थ्या - श्च
'थ्या' has 'थ' connected to 'य'.
Now look at the letter before 'त्त':
It is curved like 'य' with an e-matra: 'ये
४० पाकदर्पणम्
रक्तक्षुद्रबृहतीफलस्यान्यपाकविधिः
ततश्च कानिचित्तेषां तदा सर्पिषि भर्जयेत् ।
ततश्च प्रवणीभाण्डे क्षीरमासिच्य यत्नतः ॥ २७४ ॥
सर्षपांश्च मरीचींश्च नारिकेलफलस्य च ।
तिलस्य कल्कमालोड्य जालिन्या तद्विशोधयेत् ॥ २७५ ॥
तत्पुनः क्वाथयित्वात्र तानि न्यस्यावतारयेत् ।
प्रक्षाल्य प्रवणीमन्यां घृतमासिच्य सूदवित् ॥ २७६ ॥
रामठञ्च विनिक्षिप्य माषस्य वटकान् क्षिपेत् ।
पर्पटस्य कणान् क्षिप्त्वा दर्या तानि विघट्टयेत् ॥ २७७ ॥
तत्क्वाथं तत्र निक्षिप्य सम्यक् कृत्वावतारयेत् ।
वाससा पूर्ववत् कृत्वा वेष्टयित्वावतारयेत् ॥ २७८ ॥
लाल क्षुद्रबृहतीफल का अन्य प्रकार का पाक बनाने की विधिः--पूर्वोक्त
लाल क्षुद्र बृहतीफल में से कुछ लेकर घी में भून लें । इसके बाद प्रवणी भाण्ड
( बटलोही ) में प्रयत्नपूर्वक दूध छोड़कर सरसों, मरिच, नारियल का फल तथा
तिल का कल्क मिलाकर छलनी से छान ले । इसके बाद क्वाथ बनाकर उसमें उन
घृतभृष्ट बृहती फल को छोड़कर उतार ले और दूसरी बटलोही को प्रक्षालन कर
उसमें पाकशास्त्र को जानने वाला पाचक घृत छोड़कर हींग छोड़े तथा उड़द के
वटकों को छोड़ दे और पर्पट ( पापड़ ) के टुकड़ों को छोड़कर कलछुल से घोट
दे । इसके बाद पूर्वोक्त क्वाथ को उसमें छोड़कर तथा अच्छा बनाकर उतार ले ।
'पुनः वस्त्र से पूर्ववत् बनाकर तथा वेष्टित कर उतार ले ॥ २७४-२७८ ॥
क्षुद्रबृहतीफलपाकस्य गुणाः
पित्तघ्नं दीपनं भेदि वातघ्नं बृहतीफलम् ।
गुल्मशोथज्वरश्वासकासघ्नं वह्निदीपनम् ॥ २७९ ॥
रुच्यं पथ्यं ज्वरार्शोघ्नं स्यात्क्षुद्रबृहतीफलम् ।
सनाभफलमतनु कृमिहीनं सुकोमलम् ॥ २८० ॥
कफपित्तहरं तिक्तं समीरणहरं तथा ।
बहुकण्टफलं पक्वं सक्षीरं पित्तवर्द्धनम् ॥ २८१ ॥
रक्त क्षुद्र बृहतीफल के पाक का गुण-क्षुद्र बृहती फल पाक पित्तनाशक,
जाठराग्निदीपक, मलभेदक तथा वातनाशक है । यह गुल्म रोग, शोथ, ज्वर,
श्वासवृद्धि, तथा कास नाशक है। अग्नि दीपक, रुचिकारक, पथ्य, ज्वर तथा
अर्शनाशक होता है। नाभिसहित, बड़ा, कृमिरहित तथा कोमलफल तिक्त रस-
नलविरचितम् ४१
वाला, कफ-पित्त को दूर करने वाला तथा वातनाशक है। दूधयुक्त पका हुआ
बहुत काँटों वाला फल पित्तवर्द्धक होता है ॥ २७९-२८१ ॥
कटुकीफलस्य पाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
कोमलानि समादाय कटुकस्य फलानि च ।
( पूर्ववद्विपचेत्सूदो गुणधर्मं प्रवक्ष्यते )
तिक्तं हृद्यं कफहरं कुष्ठजिज्ज्वरनाशनम् ॥ २८२ ॥
कासश्वासारुचिहरं समीरणहरं तथा ।
कटुकीफलं च पक्वञ्चेत् गुरु विष्टम्भि पित्तकृत् ॥ २८३ ॥
कटुकी-फल-पाक बनाने की विधि तथा गुण-कटुकी का कोमल फल
लेकर पूर्ववत् ( बृहती फल सदृश ) पाक करें। उसका गुण आगे कहते हैं। कटुकी
फल पाक स्वाद में तिक्त, हृदय को बल देनेवाला, कफ को दूर करनेवाला, कुष्ठ
रोग को जीतने वाला तथा ज्वरनाशक है। यह कास ( खांसी ), श्वास रोग
अरुचि तथा वात रोग को दूर करने वाला है। पके कटुकी फल का पाक गुरु
( गरिष्ठ ) विष्टम्भि ( विबन्धकारक ) तथा पित्तकारक होता है ॥ २८२-२८३ ॥
एरण्डबालफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
एरण्डस्य फलं बालं पचेदेवं विधानतः ।
दीपनं पाचनं रुच्यं समीरणहरं परम् ॥
श्लेष्मक्रिमिहरं रुच्यं मूत्ररोगहरं तथा ॥ २८४ ॥
बालएरण्डफल के पाक की निर्माण विधि तथा गुण-एरण्ड ( रेड ) के
बाल फल को लेकर पूर्वोक्त विधि के अनुसार पकावे । यह एरण्डफलपाक जाठ-
राग्निदीपक, पाचक, रुचिकारक, अच्छी तरह वातशामक, कफविकार तथा क्रिमि-
रोग को दूर करनेवाला, रुचिकारक तथा मूत्रविकार को नाश करनेवाला है ॥
शिग्रुफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
ततः शिग्रुफलं रम्यं पचेदानीथ पूर्ववत् ।
वासेनावेष्टनं दान पूर्ववद्धि पचेद् बुधः ॥ २८५ ॥
दीपनं वातपित्तघ्नं वृष्यं वर्ण्यप्रमेहजित् ।
चक्षुष्यं शुक्रदं रुच्यं बृंहणं श्लेष्मनुत्तथा ॥ २८६ ॥
सहिजनफल की पाकनिर्माणविधि तथा गुण-सहिजन का मनोहर (सुन्दर)
फल लेकर पूर्ववत् पकावे । इसके बाद वस्त्र से आवेष्टित कर पूर्वबृहतीफलपाक के
सदृश पकावे और खाने के लिये दे । यह दीपक, वात-पित्तनाशक, वीर्यवर्द्धक,