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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

३२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
से प्रथम विद्यमानमें कारणता माननेहीसे प्रत्यक्षमें महत्त्व परिमाणको कारण और
अनेक द्रव्यत्वको अन्यथासिद्ध माना है। यहां अणुपरिमाण वालेसे भिन्न द्रव्यका
नाम अनेक द्रव्यत्व है। प्रत्यक्षमें महत्त्व अवश्यक्लृप्त है उससे अनेक द्रव्यत्व अन्य-
था सिद्ध है. शंका-यदि कोई अनेक द्रव्यत्वको प्रत्यक्षमें कारण तथा महत्त्वको
अन्यथा सिद्ध माने तो तुम्हारे पास एक पक्षके कहनेवाली युक्ति कौन है ?
समाधान-महत्त्वत्वजातिको कारणतावच्छेदक माननेमें शरीरकृत लाघव है॥२०॥
एते पञ्चान्यथासिद्धाः-
भाषा-ये पञ्च अन्यथा सिद्ध हैं.
दण्डत्वादिकमादिमम् ।
घटादौदण्डरूपादिद्वितीयमपि दर्शितम् ॥ २१ ॥
तृतीयं तु भवेद्व्योम कुलालजनकोऽपरः ।
पञ्चमोरासभादिःस्यात्-
भाषा-घटादि कार्यके प्रति प्रथम अन्यथा सिद्ध दण्डत्वादिक धर्म हैं. द्वितीय
दण्डके रूपादि हैं ॥ २१ ॥ तृतीय आकाश है. चतुर्थ कुलालपिता है. पञ्चम
रासभादि हैं ॥
रासभादिरिति। यद्यपि यत्किञ्चिद्घटव्यक्तिं प्रति रासभस्य निय-
तपूर्ववर्तित्वमस्ति, तथापि घटजातीयं प्रति सिद्धकारणभावै-
र्दण्डादिभिरेव तद्व्यक्तेरपिसम्भवे रासभोऽन्यथासिद्ध इति भावः।
भाषा-यद्यपि किसी एक घटव्यक्तिके पूर्वविद्यमानता गर्दभकोभी होसक्ती है
तथापि यावत् घटव्यक्तिके प्रति प्रसिद्ध कारणरूप दण्डादिकोंसेही उस व्यक्तिकाभी
निर्वाह होसक्ता है इसलिये रासभ सर्वथा अन्यथासिद्ध है ॥
एतेष्वावश्यकस्त्वसौ ॥ २२ ॥
भाषा-इन सबमें यह पञ्चम अन्यथासिद्ध तो आवश्यक है ॥ २२ ॥
एतेष्विति। एतेषु पञ्चस्वन्यथासिद्धेषु पञ्चमोऽन्यथासिद्ध आव-
श्यकः तेनैव परेषां चरितार्थत्वात् । तथाहि। दण्डादिभिरवश्य-
कॢप्तनियतपूर्ववर्तिभिरेव कार्य्यसम्भवे दण्डत्वादिकमन्यथा-
सिद्धम् ।

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ३३
इन पूर्वोक्त अन्यथासिद्ध पदार्थोंमें पञ्चम अन्यथा सिद्ध अवश्य माननीय है ।
और पूर्वले चारोंकी पञ्चममें चरितार्थताभी होसक्तीहै. उसकी रीति यह है
कि-कारणरूपसे अवश्य सम्बद्ध और घटादि कार्यके नियमसे प्रथम रहनेवाले
दण्डादिकोंसे ही यदि कार्यका सम्भव हो तो दण्डत्वादि सभी सर्वथा अन्यथा-
सिद्ध हैं.
न च वैपरीत्ये किं विनिगमकमिति वाच्यम्।दण्डत्वस्य कारणत्वे
दण्डघटितपरंपरायाः सम्बन्धत्वकल्पने गौरवात् । एवमन्येषाम-
प्यनेनैव चरितार्थत्वं सम्भवतीति ॥ २२ ॥
शंका-घटकार्यके प्रति 'दण्डत्व' को कारण तथा 'दण्ड' को अन्यथा-
सिद्ध मानें तो दण्डमें कारणताका नियामक कौन है? समाधान-दण्डत्वको कारण
माननेसे 'स्वाश्रयजन्य भ्रमीवत्ता' सम्बन्धसे कारणता माननी होगी और दण्डको
केवल 'स्वजन्य भ्रमीवत्ता' सम्बन्धसे कारणता है; इससे प्रथम सम्बन्धमें दण्ड
घटित परम्परा रूप सम्बन्ध कल्पनामें गौरव है. ऐसेही दण्डरूप, आकाश, कुलाल
के पिताकाभी पञ्चम अन्यथासिद्धमेंही संग्रह हो सकता है ॥ २२ ॥
समवायिकारणत्वं द्रव्यस्यैवेति विज्ञेयम् ॥
गुणकर्ममात्रवृत्तिज्ञेयमथाप्यसमवायिहेतुत्वम्॥२३॥
भाषा-समवायिकारण होना केवल द्रव्यहीका समान धर्म है. एवं असमवायि
कारण होना केवल गुण कर्महीका समान धर्म है ॥ २३ ॥
गुणकर्मेति।असमवायिकारणत्वं गुणकर्मभिन्नानां वैधर्म्यं न तु
गुणकर्मणोः साधर्म्यमित्यत्र तात्पर्यम् । अथवाऽसमवायिकारण
वृत्तिसत्ताभिन्नजातिमत्त्वं तदर्थः। तेन ज्ञानादीनामसमवायिकार
णत्वाविरहेऽपि न क्षतिः ॥ २३ ॥
भाषा-यहां गुणकर्मके समान धर्मके कथनका तात्पर्य नहीं किन्तु असमवायि
कारणता गुण कर्मसे भिन्न पदार्थोंका विपरीत धर्म है. इस कथनमें तात्पर्य है! अन्यथा
आत्मविशेष गुणोंमें इस लक्षणकी अव्याप्ति होगी; अथवा असमवायिकारणतावालेमें
वर्तनेवाली जो सत्ताभिन्न 'गुणत्व कर्मत्व' रूपा जातिः तादृश जातिमत्त्वही गुणकर्म
का समान धर्म है, ऐसा जातिघटित लक्षण करनेसे आत्मविशेष गुण ज्ञानादिकोंमें
असमवायिकारणताके न होनेसे भी अव्याप्ति नहीं है ॥ २३ ॥
३

३४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
अन्यत्र नित्यद्रव्येभ्य आश्रितत्वमिहोच्यते ॥
भाषा-नित्य द्रव्योंसे अन्यपदार्थोंका आश्रितत्वरूप समान धर्म्म है.
अन्यत्रेति। नित्यद्रव्याणि परमाण्वाकाशादीनि विहायाश्रितत्वं
साधर्म्यमित्यर्थः । आश्रितत्वंतु समवायादिसम्बन्धेन वृत्तिमत्त्वम् ।
विशेषणतया नित्यानामपि कालादौ वृत्तेः । कालिकसम्बन्धान्य-
सम्बन्धेनाऽवृत्तित्वमिति परमार्थः, तेन समवायेनावृत्तावपि न क्षतिः।
भाषा-पृथिवी आदि चारके परमाणु तथा आकाशादि पञ्च नित्यद्रव्य हैं. उनसे
भिन्न यावत् पदार्थोंका आश्रितत्वरूप समान धर्म्म है. यहां 'आश्रितत्व' शब्दका
अर्थ कालिकसम्बन्धसे भिन्न वृत्तिनियामक संयोगसमवायादि सम्बन्धसे वर्तना है.
कालिक विशेषणतारूप सम्बन्धसे तो नित्य पदार्थभी कालादिकोंमें रहते हैं.
कालिक सम्बन्धसे अन्यसम्बन्धसे आसमन्तात् वर्तनेवालेका 'आश्रितत्व'
रूप समान धर्म कहना वास्तव अर्थ है. ऐसे कथनसे समवायसे भिन्न सम्बन्धसे
वर्तनेवाले पदार्थोंमें पूर्व लक्षणकी अव्याप्ति नहीं है.
इदानीं द्रव्यस्यैव विशिष्यसाधर्म्यं वक्तुमारभते,क्षित्यादीनामिति-
भाषा-'क्षित्यादीनां' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार विशेषरूपसे द्रव्यहीका समान
धर्म कहता है-
क्षित्यादीनां नवानां तु द्रव्यत्वं गुणयोगिता ॥२४॥
क्षितिर्जलं तथा तेजः पवनो मन एव च ॥
परापरत्वमूर्तत्वक्रियावेगाश्रया अमी ॥ २५ ॥
भाषा-पृथिवीसे आदि लेके नव द्रव्योंका द्रव्यत्वरूप किंवा गुणवत्वरूप
समान धर्म्म है ॥ २४ ॥ पृथिवी, जल, अग्नि, वायु तथा मन इन पांचों
का परापरत्वरूप मूर्तत्वरूप तथा क्रियावेगाश्रयत्वरूप समान धर्म है ॥ २५ ॥
क्षितिर्जंलमिति । पृथिव्यप्तेजो वायुमनसां परत्वापरत्ववत्त्वं मूर्त-
त्वं क्रियावत्त्वं वेगवत्त्वं च साधर्म्यम् । न च यत्र घटादौ परत्वम-
परत्वं वा नोत्पन्नं तत्राव्याप्तिरिति वाच्यम् । परत्वादिसमानाधि-
करणद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वस्य विवक्षितत्वात्।मूर्तत्वमपकृष्ट-

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ३५
परिमाणवत्त्वम्, तच्च तेषामेव, गगनादिपरिमाणस्य कुतोऽप्यपकृ-
ष्टत्वाभावात् । पूर्ववत्कर्मवत्त्वं कर्मसमानाधिकरणद्रव्यत्व-
व्याप्यजातिमत्त्वं वेगवत्त्वं, वेगवद्वृत्तिद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वं
च बोध्यम् ॥ २४ ॥ २५ ॥
भाषा-पृथिवी,जल,अग्नि,वायु,मन इन पाँचोंका परत्वापरत्त्ववाले होना,मूर्त्त होना,
क्रिया वाले होना,तथा वेगवाले होना समान धर्म है.शंका-जहां जिन उत्पन्न विनष्टा
दिकार्योंमें परत्वापरत्त्व बुद्धि नहीं उत्पन्न हुई; वहां घटादि कार्योंमें परत्वापरत्त्वके
भी न उत्पन्न होनेसे अव्याप्ति होगी. समाधान-वहांभी परत्वादि समानाधिकरणमें
वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य पृथिवीत्व जलत्व तेजस्त्व वायुत्व मनस्त्व रूपा
जाति तादृश जातिमत्त्वकी विवक्षासे दोष नहीं है. मूर्त्तत्व नाम परिच्छिन्न अर्थात्
छोटे परिमाण वालेका है. वह परिच्छिन्न परिमाण पूर्वोक्त पाँचोंहीका है । आका-
शादिके परिमाणमें किसीकी अपेक्षासेभी छोटापना नहीं है । शेष लक्षणभी
पूर्ववत् जातिघटित करनेसे दोष नहीं है. अर्थात् ( कर्मवत्त्वं ) कर्मके समानाधि
करणमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य 'पृथिवीत्व' आदि जाति, तादृश जाति-
मत्त्व पृथिवी आदि पांचोंमें सिद्धहै.ऐसेही वेगवालेमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य
'पृथिवित्व' आदि जाति, तादृश जातिमत्ता पृथिवी आदि पाँचोंमें सिद्ध है २४॥२५॥
कालखात्मदिशां सर्वगतत्वं परमं महत् ॥
भाषा-काल आकाश आत्मा दिशा इन चारोंका सर्व व्यापकता तथा परममहत्
परिमाणवत्ता समान धर्म है.
कालेति।कालाकाशात्मदिशां सर्वगतत्वं सर्वमूर्त्तसंयोगित्वं परम-
महत्त्वं च, परममहत्त्वत्वं जातिविशेषः अपकर्षानाश्रय-
परिमाणत्वं वा ।
भाषा-जिसका यावत् मूर्त्तपदार्थके साथ संयोग हो वह व्यापक होता है ऐसेही
' परममहत्त्वत्व ' जातिविशेष युक्त परममहत् परिमाण होताहै. अथवा मूर्त्तोंमें न
वर्तनेवाला जो परिमाण तादृश परिमाणवत्ता पूर्वोक्त चारोंका समान धर्म है.
क्षित्यादिपञ्चभूतानि चत्वारि स्पर्शवन्ति हि ॥ २६ ॥
भाषा-पृथिवी जल अग्नि वायु आकाश, इन पाँचोंका भूतत्वरूप समान धर्म है.
पृथिवी आदि चारोंका समवायेन स्पर्शवत्ता समान धर्म है ॥ २६ ॥

३६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
क्षित्यादीति । पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशानां भूतत्वम् । तच्च बहिरि-
न्द्रियग्राह्यविशेषगुणवत्त्वम्। अत्र ग्राह्यत्वं लौकिंकप्रत्यक्षस्वरूप-
योग्यत्वं बोध्यम्।तेन ज्ञातो घट इति प्रत्यक्षे ज्ञानस्याप्युपनीत-
भानविषयत्वात्,तद्वत्यात्मनि नातिप्रसङ्गः।न वा प्रत्यक्षाविषय-
रूपादिमति परमाण्वादावव्याप्तिः,तस्यापि स्वरूपयोग्यत्वात् ।
महत्त्वलक्षणकारणान्तराऽसन्निधानाच्च न प्रत्यक्षम् । अथैवा
ऽऽत्मावृत्तिविशेषगुणवत्त्वं तत्त्वम् । चत्वारीति । पृथिव्यप्तेजो
वायूनां स्पर्शवत्त्वम् ।
भाषा-भूत नाम नेत्रादि बाह्य इन्द्रियग्राह्य रूपादि विशेषगुण वालोंकाहै.इस प्रसङ्ग-
में ग्राह्य पदसे लौकिक प्रत्यक्ष स्वरूप योग्यताका ग्रहण है. अन्यथा 'ज्ञातो घटः'
इस ज्ञानमें प्रकारीभूत जो ज्ञान उस ज्ञानकाभी ' चक्षुःसंयुक्तमनःसंयुक्तात्मसम-
वेतज्ञानविषयत्व' सम्बन्धसे घटअंशमें प्रत्यक्ष हो सकता है. एवं उस ज्ञान
वाले आत्मामें अतिव्याप्ति होगी; परन्तु पूर्वोक्त सम्बन्धसे ज्ञानका लौकिक प्रत्यक्ष
नहीं है किन्तु अलौकिक है; याते आत्मामें अतिव्याप्तिरूप दोष नहीं. स्वरूप
योग्यताके निवेश करनेसे प्रत्यक्षके अविषय तथा रूपादि युक्त परमाणु आदिमेंभी
अव्याप्ति नहीं है. परमाणुमें तथा द्वयणुकमें प्रत्यक्षकी योग्यता तो है परन्तु महत्त्व-
रूप कारणान्तरके न होनेसे परमाणुका तथा द्वयणुकका प्रत्यक्ष नहीं होता. अथवा
आत्मामें न वर्तनेवाले जो विशेषगुण, तादृश विशेषगुणवाले की 'भूत' संज्ञा है. पृथ्वी,
जल, तेज, तथा वायु इन चारोंका स्पर्शवाले होना समान धर्म है॥ २६ ॥
द्रव्यारम्भश्चतुर्षु स्यात्-
भाषा-द्रव्यान्तरके आरम्भक होनाभी पृथिवी आदि चारोंका समान धर्म है.
द्रव्यारम्भेति । पृथिव्यप्तेजोवायुषु चतुर्षु द्रव्यारम्भकत्वम् ।
( १ ) वक्ष्यमाणसंयोगादि षड्विधसन्निकर्षसे लौकिक प्रत्यक्ष होता है उनसे भिन्न
यावत् सम्बन्धोंसे प्रत्यक्ष योग्य पदार्थोंका अलौकिक प्रत्यक्ष होता है । एवं ' ज्ञातो घटः '
यह ज्ञान अनुव्यवसाय रूप मानसिक है । विशेष्यरूपसे घट तथा विशेषणरूपसे घटका
व्यवसायात्मक ज्ञान इसके विषय है । परन्तु अलौकिक सम्बन्धसे है याते ज्ञानवाले
आत्मामें दोष नहीं ॥
( २ ) नेत्र इन्द्रियादिगत रूपादि विशेष गुणोंको अनुद्भूत होनेसे बाह्य इन्द्रियसे ग्रहणकी
अयोग्यता है । यान्ते भूतत्व लक्षणकी अव्याप्तिकी शंकासे कहा है-अथवेति ।

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ३७
नच द्रव्यानाारम्भके घटादावव्याप्तिः । द्रव्यसमवायिकारणवृ-
त्तिद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वस्य विवक्षितत्वात् ।
भाषा-पृथिवी जल अग्नि वायु ये चारों समवायि कारण होकर द्रव्यान्तरके आर-
म्भक हैं. शंका-घटरूप पृथिवीमें द्रव्यान्तरारम्भकता नहीं है; अव्याप्ति होगी. समा०-
द्रव्यके समवायिकारणमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य 'पृथिवीत्व' आदि जाति,
तादृश जातिमत्ता यावत् घटादिकार्योंमें सिद्ध है. एवं अव्याप्तिरूप दोष नहीं है.

  • अथाकाशशरीरिणाम् ।
    अव्याप्यवृत्तिः क्षणिको विशेषगुण इष्यते ॥ २७ ॥
    भाषा-आकाश तथा जीवात्माका अव्याप्य वृत्ति क्षणिक विशेष गुणवत्ता समान
    धर्म है ॥ २७ ॥
    आकाशशरीरिणामिति । आकाशात्मनामव्याप्यवृत्तिक्षणिकवि-
    शेषगुणवत्त्वम्।आकाशस्य विशेषगुणः शब्दः,स चाव्याप्यवृत्ति-
    र्यदा किञ्चिदवच्छेदेन शब्द उत्पद्यते,तदाऽन्यावच्छेदेन तदभाव-
    स्यापि सत्त्वात्।क्षणिकत्वं च तृतीयक्षणवृत्तिध्वंसप्रतियोगित्वम्।
    योग्यविभुविशेषगुणानां स्वोत्तरवर्तिगुणनाश्यत्वात् प्रथमशब्द-
    स्य द्वितीयशब्देन नाशः।एवं ज्ञानादीनामपि ज्ञानादिकं ह्यात्म-
    नि विभौ शरीराद्यवच्छेदेनोत्पद्यते घटाद्यवच्छेदेन तदभावो
    ऽस्त्येव । एवं ज्ञानादिकमपि क्षणद्वयावस्थाथि । इत्थंचाव्याप्य-
    वृत्तिविशेषगुणवत्त्वं चार्थः । पृथिव्यादौ रूपादिर्विशेषगुणो
    ऽस्तीत्यतोऽव्याप्यवृत्तिरित्युक्तम्।पृथिव्यादावव्याप्यवृत्तिः संयो-
    गादिरस्तीत्यतो विशेषगुण इत्युक्तम्॥नच रूपादीनामपि कदा-
    चित्तृतीयक्षणे नाशसम्भवात् । क्षणिकविशेषगुणवत्त्वं क्षित्यादा
    वतिव्याप्तमिति वाच्यम् ।
    भाषा-आकाशका तथा जीवात्माओंका अव्याप्यवृत्ति जो क्षणिक विशेषगुण,
    तादृश विशेषगुणवत्ता समान धर्म है. आकाशका विशेषगुण शब्द है. वह अव्याप्य
    ( १ ) जिस वस्तुका ध्वंस होय वही वस्तु ध्वंसकी प्रतियोगी कही जाती है.

३८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
वृत्ति इस रीतिसे है कि-जिस कालमें भेर्याद्यवच्छेदेन शब्द उत्पन्न होता है, उसी
कालमें घटाद्यवच्छेदेन शब्दके अभावकीभी प्रतीति होती है. क्षणिक नाम
तीसरे क्षणमें नाश होनेवालेका है. प्रत्यक्षके योग्य जो आकाशादि विभुद्रव्योंके
शब्दादि विशेष गुण, उनका अपनेसे पीछे उत्पन्न होनेवाले विशेष गुणोंसे नाश
होता है. इस रीतिसे प्रथमशब्दका द्वितीयशब्द नाशक है. ऐसेही प्रथमज्ञान
इच्छादिकोंकेभी द्वितीयज्ञान इच्छादिक विनाशक हैं. व्यापक आत्मामें ज्ञान
इच्छादिक शरीरावच्छेदेन उत्पन्न होते हैं और घटाद्यवच्छेदेन ज्ञानादिकोंका
अभावभी सिद्ध है. इस रीतिसे ज्ञानादिकभी दो क्षण स्थित रहते हैं. इस पूर्व
कथनसे 'अव्याप्यवृत्ति विशेषगुणवत्ता' अथवा 'क्षणिक विशेषगुणवत्ता' आका-
शका तथा जीवात्माओंका समान धर्म सिद्ध हुआ. रूपादि विशेष गुण पृथिवी
आदिकोंमेंभी हैं, उनसे प्रथम लक्षणकी अतिव्याप्तिके वारणार्थ 'अव्याप्यवृत्ति'
विशेष गुणका विशेषण दिया. अव्याप्यवृत्ति संयोगादिकभी पृथिवी आदिकोंमें
रहते हैं. उनसे प्रथम लक्षणकी अतिव्याप्ति वारणार्थ विशेषगुणरूप विशेष्यका
निवेश किया। रूपादि अव्याप्य वृत्ति नहीं हैं तथा संयोगादि विशेष गुण नहीं हैं-
एवं उभयथा पृथिवीमें अतिव्याप्ति नहीं हैं. शंका-किसी एक कालमें रूपादिकों
का भी तीसरे क्षणमें नाश हो सकता है. ऐसे 'क्षणिक विशेष गुणवत्त्व' इस
द्वितीय लक्षणकी पृथिवी आदिकोंम अतिव्याप्ति होगी.
चतुःक्षणवृत्तिजन्यावृत्तिजातिमद्विशेषगुणवत्त्वस्य विवक्षित-
त्वात्, अपेक्षाबुद्धिः क्षणत्रयं तिष्ठति, क्षणचतुष्टयं तु किमपि
जन्यज्ञानादिकं न तिष्ठति, रूपत्वादिकं तु क्षणचतुष्टयस्थायि-
न्यपि रूपादौ वर्तत इति व्युदासः ईश्वरज्ञानस्य चतुःक्षणवृत्ति-
त्वाज्जन्येत्युक्तम्। यद्याकाशजीवात्मनोः साधर्म्यं तदा जन्ये-
ति न देयम्, द्वेषत्वादिकमादाय लक्षणसमन्वयात्, परममहत्त्व-
स्य तादृशगुणत्वाच्चतुर्थक्षणे द्वित्वादीनामपि नाशाभ्युपगमात्
( १ ) चतुःक्षणशब्द अधिक कालका उपलक्षक है.
( २ ) यदि जन्य पदका न निवेश किया जाय तो 'परममहत्त्वत्व' रूपजातिको चार
क्षणमें रहनेवाले परम महत्त्व परिमाणमें वृत्तित्त्व होनेसे परममहत्त्वपरिमाणको लेकर तिस
वालेकालादिकोंमें तो अतिव्याप्ति नहीं है याते विशेष पदकी सफलतार्थ ग्रन्थान्तर कहताहै
चतुर्थक्षणेद्वित्वादीनामिति ।

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ३९
द्वित्वादीनामपि तथात्वात् तद्वारणाय विशेषेति । त्रिक्षणवृत्तित्वं
वा वाच्यम् । द्वेषत्वादिकमादायात्मनि लक्षणसमन्वयः ॥२७॥
समाधान-चार क्षणमें वर्तनेवाले जो घट पटादि तथा रूप रसादिजन्य
उनमें न वर्तनेवाली जो 'शब्दत्व ज्ञानत्व' रूपा जाति तादृश जातिमद्विशेष
गुणवत्ता शब्दमें तथा ज्ञानमें विवक्षित है. याते पूर्वोक्त दोष नहीं । अपेक्षा
बुद्धिरूप ज्ञानभी तीन क्षणमात्र स्थिर रहता है । चतुर्थ क्षणमें अपेक्षा बुद्धिका
नाश होता है, चार क्षणतक स्थिर तो जन्यज्ञानादिक कोई भी नहीं रहते ।
और रूपत्वादिक जाति तो चार क्षण उपलक्षित बहुत कालतक रहनेवाले
रूपादिकोंमें रहती है इसलिये उस रूपत्वादि जातिका व्युदास हुआ अर्थात्
वारण हुआ. ईश्वर ज्ञानभी चार क्षण उपलक्षित नित्य विद्यमान है उसके
संग्रहार्थ 'जन्य' पदका निवेश किया. यदि आकाश तथा जीवात्माकाही समान
धर्म कहनेका तात्पर्य्य होय तो 'जन्य' पदके निवेशका कुछ प्रयोजन नहीं अर्थात्
न निवेश करना चाहिये. ज्ञानत्वजातिके स्थानपर केवल जीवात्माके गुणोंमें रहने
वाली (द्वेषत्वादि) जातिका निवेश करनेसे जातिघटित लक्षण संगत होगा ।
आकाश कालादिकोंका परम महत्त्व परिमाणभी चार क्षणमें वर्तनेवाले जन्य
पदार्थोंमें वर्तनेवाली जो 'परम महत्त्व' रूपा जातिः तादृश जातिमत् है । उससे
अति प्रसक्तिवारणार्थ तैसे चतुर्थक्षणमें द्वित्वादिकोंका नाश आचार्योंने माना है.
द्वित्वादिकोंकोभी तादृश जातिमद्गुण होनेसे उनसे अति प्रसक्तिवारणार्थ 'विशेष'
पदार्थ गुणका विशेषण कहा । परममहत्त्व परिमाण तथा द्वित्वादि विशेष गुण नहीं
हैं । किन्तु सामान्य गुण हैं इस लिये तादृश गुणवाले काल घटादिकोंमें आत्माकाश
लक्षणकी अतिव्याप्ति नहीं है. अथवा चतुःक्षणके स्थानपर 'त्रिक्षणवृत्ति' कहनेसे
पूर्वोक्त दोष नहीं. ज्ञानत्वजातिके स्थानपर द्वेषत्वादिक जातिका निवेश करनेसे
आत्मामें लक्षण समन्वय होगा ॥ २७ ॥
रूपद्रवत्वप्रत्यक्षयोगिनः प्रथमाश्रयः ॥
भाषा-रूपवत्ता द्रवत्ववत्ता प्रत्यक्षविषयता प्रथम तीनका समान धर्म है.
रूपेति । पृथिव्यप्तेजसां रूपवत्त्वं, द्रवत्ववत्त्वं, प्रत्यक्षविषयत्वं
चेत्यर्थः । नच चक्षुरादीनां भर्जनकपालस्थवह्नेरूष्मणश्च रूप-
वत्त्वे किं मानमिति वाच्यम्। तत्रापि तेजस्त्वेन रूपानुमानात् ।
एवं वाय्वानीतपृथिवीजलतेजोभागानामपि पृथिवीत्वादिना

४० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
रूपानुमानं बोध्यम्। न च घटादौ द्रुतसुवर्णादिभिन्ने तेजसि च द्रव-
त्ववत्त्वमव्याप्तमिति वाच्यम्। द्रवत्ववद्वृत्तिद्रव्यत्वव्याप्यजाति-
मत्वस्य विवक्षितत्वात् । घृतजतुप्रभृतिषु पृथिवीषु जलेषु
द्रुतसुवर्णादौ तेजसि च द्रवत्वसत्त्वात्, तत्र च पृथिवीत्वादिसत्त्वा-
त्तदादाय सर्वत्र लक्षणसमन्वयः। न च प्रत्यक्षविषयत्वं परमाण्वा-
दावव्याप्तम्, अतिव्याप्तं च रूपादाविति वाच्यम्। चाक्षुषप्रत्यक्ष-
विषयवृत्तिद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वस्य विवक्षितत्वात्। आत्मन्य-
तिव्याप्तिवारणाय चाक्षुषेति।
भाषा-पृथिवी जल अग्नि इन तीनोंका रूपवत्ता द्रवत्ववत्ता प्रत्यक्ष विषयता
समान धर्म्म है. शंका-नेत्र घ्राणादि इन्द्रियोंके तथा भर्जन कपालस्थ रेतेमें होने
वाले अग्निके तथा तैजस भाफके रूपवाले होनेमें क्या प्रमाण है ? समाधान-
इन सबको पक्ष बनाकर तेजस्त्वादिरूप हेतुओंसे रूपवत्त्वका अनुमान होसकता है; यथा
"नेत्रेन्द्रियं रूपवत् तेजस्त्वात्" इत्यादि. ऐसे वायुवेगसे देशान्तरसे आयेहुए पृथिवी
जल तथा अग्निके भागोंमेंभी "पृथिवीत्वात्" इत्यादि हेतुओंसे रूपका अनुमान
होसकता है. शंका-घटादिरूप पृथिवीमें तथा द्रुत सुवर्णादिसे भिन्न तेजमें द्रवत्वव-
त्त्वके न होनेसे अव्याप्ति होगी. समा०-वहांभी द्रवत्ववद्वृत्ति जो द्रव्यत्वकी
व्याप्य 'पृथिवीत्वादि' जाति तादृश जातिमत्त्व अपेक्षित होनेसे दोष नहीं है.
घृतलाक्षादि रूप पृथिवीमें जलमें तथा द्रुत सुवर्णादिरूप तेजमें द्रवत्वके विद्यमान
होनेसे तथा इनमें पृथिवीत्वादि रूपजातिके होनेसे सर्वत्र पूर्वोक्त जातिघटित लक्षण
समन्वय होसकता है. शंका-पूर्वोक्त प्रत्यक्ष विषयतारूप समानधर्म्म पृथिवी
आदिके परमाणुओंमें अव्याप्त है तथा रूपादिकोंमें अतिव्याप्त है. समाधान-
चाक्षुष प्रत्यक्षके विषयमें रहनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य 'पृथिवीत्वादि' जाति
तादृशजातिमत्त्वके वहांभी अपेक्षित होनेसे दोष नहीं है. आत्मामें अतिव्याप्तिके
वारणार्थ 'चाक्षुष' पदका निवेश है.
गुरुणी द्वे रसवती-
भाषा-बोझेवाले अर्थात् भारी तथा रसवाले दो पदार्थ हैं.
गुरुणी इति। गुरुत्ववत्त्वं च पृथिवीजलयोरित्यर्थः। न च घ्राणेन्द्रि-

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ४१
यादीनां वाय्वानीतपार्थिवादिभागानां च रसादिमत्त्वे किंमानमि-
तिवाच्यम् । तत्रापि पृथिवीत्वादिना तदनुमानात् ।
भाषा--गुरुत्ववत्ता तथा रसवत्ता पृथिवीजलका समान धर्म है. शंका-घ्राणादि
इन्द्रियोंके तथा वायुआनीत पार्थिवादि भागोंके रसवाले होनेमें क्या प्रमाण है?
समाधान-वहांभी "पृथिवीत्वात्" इत्यादि हेतुओंसे रसका अनुमान हो सक्ताहै.

  • द्वयोर्नैमित्तिको द्रवः ॥ २८ ॥
    द्वयोरिति पृथिवीतेजसोरित्यर्थः ।
    भाषा-पृथिवी, तेज, इन दोनोंका नैमित्तिक द्रवणरूप समान धर्म है ॥ २८ ॥
    न च नैमित्तिकद्रवत्ववत्त्वं घटादौ वह्न्यादौ चाव्याप्तमिति वाच्य-
    म् । नैमित्तिकद्रवत्वसमानाधिकरणद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वस्य
    विवक्षितत्वात् ॥ २८ ॥
    शंका-नैमित्तिक द्रवत्ववत्ता घटादि पृथिवीमें तथा वह्निरूप तेजमें अव्याप्त है.
    समा०-वहांभी नैमित्तिक द्रवत्वके समानाधिकरणमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी
    व्याप्य ( पृथिवीत्वादि ) जातिः तादृश जातिमत्त्व अपेक्षित होनेसे दोष नहीं है॥२८॥
    आत्मानो भूतवर्गाश्च विशेषगुणयोगिनः ॥
    यदुक्तं यस्य साधर्म्यं वैधर्म्यमितरस्य तत् ॥ २९ ॥
    भाषा-जीवात्मा तथा पञ्चभूत विशेष गुणोंवाले हैं. हमने जो जिसका समान
    धर्म कहा वह इतरका विरुद्ध धर्म जानना चाहिये ॥ २९ ॥
    आत्मान इति । पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशात्मनां विशेषगुणवत्त्व
    मित्यर्थः ॥ यदुक्तमिति । ज्ञेयत्वादिकं विहायेति बोध्यम्। तत्तु न
    कस्यापि वैधर्म्यं केवलान्वयित्वात् ॥ २९ ॥
    भाषा-ज्ञेयत्व प्रमेयत्व वाच्यत्व अभिधेयत्व इन चारों धर्मोंको छोड़कर जो
    जिसका समान धर्म कहा वह दूसरेका विपरीत धर्म है और ज्ञेयत्वादि धर्म तो
    केवलान्वयी हैं. याते किसी पदार्थकेभी विरुद्ध धर्म नहीं हैं ॥ २९ ॥
    स्पर्शादयोऽष्टौ वेगाख्यसंस्कारो मरुतो गुणाः ॥
    अष्टौ स्पर्शादयो रूपं द्रवो वेगश्च तेजसि ॥ ३० ॥

४२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
भाषा-स्पर्शादि आठ तथा वेगाख्य संस्कार ये नव वायुके गुण हैं. स्पर्शादि
आठ रूप द्रव और वेग ये एकादश तेजके गुण हैं ॥ ३० ॥
स्पर्शादयोऽष्टौ वेगश्च गुरुत्वं च द्रवत्वकम् ॥
रूपं रसस्तथा स्नेहो वारिण्येते चतुर्दश ॥ ३१ ॥
भाषा-स्पर्शादि आठ वेग गुरुत्व द्रवत्व रूप रस तथा स्नेह ये चतुर्दश जलके
गुण हैं ॥ ३१ ॥
स्नेहहीना गन्धयुताः क्षितावेते चतुर्दश ॥
बुद्ध्यादिषट्कं संख्यादि पञ्चकं भावना तथा ॥३२॥
धर्म्मा धर्म्मौ गुणा एते आत्मनः स्युश्चतुर्दश ॥
संख्यादि पञ्चकं कालदिशोः शब्दश्च ते च खे ॥३३॥
तेच संख्यादयः पञ्च खे आकाशे ।
जलके गुणोंमेंसे 'स्नेह' को निकाल गन्धको डालकर गिने तो वेही १४ पृथिवीके
गुण हैं. बुद्ध्यादि छः, तथा संख्यादि पञ्च, भावनाख्य संस्कार, तथा धर्म्माधर्म्म ये
१४ गुण जीवात्माके हैं. संख्यादि पञ्च कालके तथा दिशाके गुण हैं। संख्यादि
पञ्च तथा शब्द ये छः आकाशके गुण हैं ॥ ३२ ॥ ३३ ॥
संख्यादयः पञ्च बुद्धिरिच्छायतोऽपि चेश्वरे ॥
परत्वापरत्वे संख्याद्याः पञ्च वेगश्च मानसे ॥३४॥
भाषा-संख्यादि पञ्च बुद्धि इच्छा यत्न ये आठ ईश्वरके गुण हैं. परत्व अपरत्व
संख्यादि पञ्च तथा वेग ये आठ मनके गुण हैं ॥ ३४ ॥
साधर्म्यवैधर्म्ये निरूप्य संप्रति प्रत्येकं पृथिव्यादिकं निरूपयति,
तत्र क्षितिरित्यादिना-
भाषा-समान धर्म विपरीत धर्मोंके निरूपणानन्तर ' तत्र क्षितिः ' इत्यादि
ग्रन्थसे मूलकार प्रत्येक पृथिवी आदिका निरूपण करता है--
तत्र क्षितिर्गन्धहेतुः-
गन्धहेतुरिति । गन्धसमवायिकारणमित्यर्थः ।
भाषा--उन नवद्रव्योंके मध्यमें गन्धसमवायिकारणका नाम पृथिवी है,
यद्यपि गन्धवत्त्वमात्रं लक्षणमुचितं तथापि पृथिवीत्वजातौ
प्रमाणोपन्यासाय कारणत्वमुपन्यस्तम् । तथाहि । पृथिवीत्वं हि

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परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ४३
गन्धसमवायिकारणतावच्छेदकतया सिद्धयति, अन्यथा गन्ध-
त्वावच्छिन्नस्याकास्मिकत्वापत्तेः । नच पाषाणादौ गन्धाभावा-
द्गन्धवत्त्वमव्याप्तमिति वाच्यम् । तत्रापि गन्धसत्त्वात् । अनुपल्-
ब्धिस्त्वनुत्कटत्वेनाप्युपपद्यते, कथमन्यथा तद्भस्मनि गन्ध
उपलभ्यते । भस्मनो हि पाषाणध्वंसजन्यत्वात् पाषाणोपादानो-
पादेयत्वं सिद्धयति । यद्द्रव्यं यद्द्रव्यध्वंसजन्यं तत्तदुपादानो-
पादेयमिति व्याप्तेः । दृष्टं चैतत्-खण्डपटे महापटनध्वंसजन्ये ।
भाषा-यद्यपि पृथिवीका लक्षण गन्धवत्त्वमात्र कहना उचित है तथापि
लक्षणमें समवायिकारणताका निवेश ' पृथिवीत्व ' जातिमें प्रमाण उपन्यासके
लिये जानना चाहिये ( तथाहि ) उसकी रीति यह है कि-गन्धकी जो समवायि

[४४] न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-

भाषा--ऐसेही पाषाणके परमाणुओंको पृथिवी होनेसे उनसे उत्पन्न होनेवाला
पाषाणभी पृथिवीस्वरूपही है । एवं पाषाणको गन्धवाला होनेमेंभी कोई
बाधक नहीं है ॥
-नानारूपवती मता ।
भाषा--तथा वह पृथिवी नानाविध रूपवाली है.
नानारूपेति । शुक्लनीलादिभेदेन नानाजातीयं रूपं पृथिव्यामेव
वर्तते,नतु जलादौ तत्रशुक्लस्यैव सत्त्वात् पृथिव्यां त्वेकस्मिन्नपि
धर्मिणि पाकवशेन नानारूपसम्भवात् । नच यत्र नानारूपं नो-
त्पन्नं तत्राव्याप्तिः । रूपद्वयवद्वृत्तिद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वस्य
रूपनाशवद्वृत्तिद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वस्य वा वाच्यत्वात् ।
वैशेषिकनये पृथिवीपरमाणौ रूपनाशस्य रूपान्तरस्य च
सत्त्वात् । न्यायनये घटादावपि तत्सत्त्वाल्लक्षणसमन्वयः ।
भाषा-शुक्ल नीलादि भेदसे सात प्रकारका रूप पृथिवीहीमें रहता है; जलादिमें
नहीं रहता. जलादिमें तो केवल शुक्लरूपही रहता है और पृथिवीमें तो एक व्यक्ति
( घटादि ) मेंभी अग्निसंयोगसे नानारूपका सम्भव होता है. शंका-जिस पृथिवीमें
नानारूप उत्पन्न नहीं हुआ उसमें अव्याप्ति होगी. समाधान-वहांभी रूपद्वयवाले
में वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य ( पृथिवीत्व ) रूपजाति तादृश जातिमत्त्व
अपेक्षित है. अथवा रूप नाशवालेमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य ' पृथिवीत्व '
रूपजातिः तादृशजातिमत्त्व अपेक्षित होनेसे उक्त दोष नहीं है. वैशेषिकमतमें पृथिवी
परमाणुओंमें रूपका नाश तथा रूपान्तरकी उत्पत्ति मानी है और न्यायमतमें तो
घटादिकोंहींमें रूपको नाश तथा रूपान्तरकी उत्पत्ति मानी है याते उभयमतमें
पूर्वोक्त लक्षणमें दोष नहीं है.
षड्विधस्तु रसस्तत्र-
भाषा-षट् प्रकारका उस पृथिवीमें रस है.
षड्विधइति । मधुरकटुकाषायादिभेदेन यःषड्विधो रसः सपृथिव्यामेव,जले च मधुर एव रसः।अत्रापि पूर्ववद्रसद्वयवद्वृत्तिद्र-
व्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वं लक्षणार्थोऽवसेयः ।
१ प्रथम लक्षण अपेक्षा बुद्धिविशेष विषयत्वरूपद्वित्व घटित होनेसे गौरवयुक्त है या...
' रूपनाश ' इत्यादिसे द्वितीय कहा है.

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ४५
भाषा-मधुर कटु काषायादि भेदसे षट् प्रकारका रस पृथिवीहीमें रहता है;
जलमें तो केवल एक मधुररस है. यहांभी जिस पृथिवीमें नानाविध रस उत्पन्न
नहीं हुआ, उसमें अव्याप्ति वारणार्थ रसद्वयवालेमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य
‘पृथिवीत्व’ रूपा जाति तादृश जातिमत्त्वरूप लक्षणार्थ जानना उचित है.
-- गन्धस्तु द्विविधो मतः ॥ ३५ ॥
भाषा-दोप्रकारका उस पृथिवीमें गन्ध है ॥ ३५ ॥
गन्धस्त्विति। द्विविध इति वस्तुस्थितिमात्रं न तु द्विविधगन्धवत्त्वं
लक्षणं द्विविधत्वस्य व्यर्थत्वात् । द्वैविध्यं च सौरभासौरभभेदेन
बोध्यम् ॥ ३६ ॥
भाषा-पृथिवीमें गन्धका द्विविध कहना केवल वस्तुकी स्थितिमात्रका बोधक है.
द्विविध गन्धवत्त्व मात्र लक्षण नहीं है. किन्तु केवल 'गन्धवत्त्व' मात्रही लक्षण सम्यक्
है. 'द्विविध' पद निष्फल है. सुरभि असुरभि भेदसे वह गन्ध दोप्रकारका जानना
चाहिये ॥ ३५ ॥
स्पर्शस्तस्यास्तु विज्ञेयो ह्यनुष्णाशीतपाकजः ।
स्पर्श इति । तस्याः पृथिव्याः ।
भाषा--अनुष्णाशीतपाकज स्पर्शभी पृथिवीकाही जानना योग्य है.
अनुष्णाशीतस्पर्शवत्त्वं वायावपि वर्तत इत्युक्तं पाकज इति ।
इत्थञ्च पृथिव्याः स्पर्शोऽनुष्णाशीत इति ज्ञापनार्थं तदुक्तम् ।
लक्षणं तु पाकजस्पर्शवत्त्वमात्रम् । अधिकस्य वैयर्थ्यात् ।
यद्यपि पाकजस्पर्शः पटादौ नास्ति, तथापि पाकजस्पर्शवद्वृ-
त्तिद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वमर्थो बोध्यः ।
भाषा--अनुष्णाशीत स्पर्शवत्ता वायुमेंभी है उसके वारणार्थ 'पाकज' पदका निवेश
किया. वहस्पर्श वायुमें पाकज नहींहै. एवं यह पूर्व ग्रन्थ पृथिवीके लक्षणके अभिप्रायसे
नहीं कहा किन्तु पृथिवीका स्पर्श अनुष्णाशीत है यह बोधनार्थ कहा है. पृथिवीका
लक्षण तो 'पाकज स्पर्शवत्त्व' मात्रही साधु है; अधिक कथन निष्फल है. यद्यपि पाकज
स्पर्शवत्ता पटादिरूप पृथिवीमें नहीं है याते उक्त लक्षणकी अव्याप्ति होगी तथापि
पाकज स्पर्शवालेमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य 'पृथिवीत्व' रूपा जाति तादृश
'जातिमत्त्व' पदादि रूप पृथिवीमेंभी प्रसिद्ध है. एवं जातिघटित लक्षण करनेसे
कहीं दोष नहीं.

४६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
नित्याऽनित्या च सा द्वेधा नित्या स्यादणुलक्षणा॥३६
अनित्या तु तदन्या स्यात्सैवावयवयोगिनी ।
भाषा--नित्या तथा अनित्या भेदसे वह पृथिवी दोप्रकारकी है. उसमें परमाणु
रूप पृथिवी नित्या है ॥ ३६ ॥ उसमें भिन्नकार्यरूपा सावयव पृथिवी अनित्या है ।
नित्येति। सा पृथिवी द्विविधा नित्याऽनित्या चेत्यर्थः । अणुलक्ष-
णापरमाणुरूपा पृथिवी नित्या ॥ ३६ ॥ तदन्या परमाणुभिन्ना
पृथिवीद्व्यणुकादिरूपा सर्वाऽप्यनित्येत्यर्थः। सैवानित्या पृथिव्ये-
वावयववतीत्यर्थः ।
भाषा-वह पृथिवी दोप्रकारकीहै, एका नित्याहै और दूसरी अनित्याहै इन दोनोंमें
अणुलक्षणा अर्थात् परमाणुरूपा पृथिवी नित्या है ॥ ३६ ॥ और परमाणुओंसे भिन्न
द्व्यणुकादि रूपा यावत् पृथिवी अनित्या है. वह अनित्या पृथिवी ही अवयवयोगिनी
अर्थात् सावयवा कही जाती है.
नन्ववयविनि किं मानम्, परमाणुपुञ्जैरेवोपपत्तेः । न च परमाणू-
नामतीन्द्रियत्वाद्वटादेः प्रत्यक्षं न स्यादिति वाच्यम्, एकस्य
परमाणोरप्रत्यक्षत्वेऽपि तत्समूहस्य प्रत्यक्षत्वसम्भवात् । यथै-
कस्य केशस्य दूरेऽप्रत्यक्षत्वेऽपि तत्समूहस्य प्रत्यक्षत्वम् । न
चैकः स्थूलो महान् घट इति बुद्धेरनुपपत्तिरिति वाच्यम् ।
बौद्ध--शंका-सावयवा पृथिवीमें क्या प्रमाणहै? 'अयंघटः' इत्यादि प्रतीतिका निर्वाह
तो विलक्षण संस्थान विशिष्ट परमाणुपुंजसेही होसकताहै. सिद्धान्ती--परमाणु तो
अतीन्द्रिय पदार्थ हैं. यदि घटादि पदार्थोंको परमाणु पुञ्जस्वरूप माने तो परमाणुओंकी
तरह घटादिकाभी प्रत्यक्ष नहीं होगा. बौद्ध--यद्यपि पृथक् २ यावत् परमाणु अतीन्द्रियहैं
तथापि उनके समुदायका साक्षात्कार होसक्ताहै. जैसे एक (केश) बाल दूरसे नहींभी
दीखता तौभी उसके समुदायका प्रत्यक्ष होसकताहै. सिद्धान्ती-यह एक महत्त्व
परिमाणवाला स्थूल घट है ऐसी बुद्धि परमाणुपुंजमें नहीं होसकती.
एको महान् धान्यराशिरितिवदुपपत्तेः। मैवम्। परमाणोरतीन्द्रि-
यत्वेन तत्समूहस्यापि प्रत्यक्षत्वायोगात् । दूरस्थकेशस्तु नाती-
न्द्रियः, सन्निधाने तस्यैव प्रत्यक्षत्वात् । नच तदानीमदृष्टयपर-

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ४७
माणुपुञ्जाद्दृश्यपरमाणुपुञ्जस्योत्पन्नत्वान्न प्रत्यक्षत्वे विरोध इति
वाच्यम् । अदृश्यस्य दृश्यानुपादानत्वात् । अन्यथा चक्षूरूष्मा-
दिसन्ततेरपि कदाचिद्दृश्यत्वं स्यात् ।
बौद्ध-यह एक महान् धान्यराशिहै, इस बुद्धिकी तरह घटमेंभी बुद्धि होसकतीहै.
समाधान--परमाणु अतीन्द्रिय हैं उनका समूहभी प्रत्यक्षके योग्य नहीं है, दूरस्थ
केश तो अतीन्द्रिय नहींहै नेत्रादिकोंके समीप होनेसे उसी केशका प्रत्यक्षभी होसक्ता
है.शंका-कार्य्योत्पत्तिकालमें दर्शनयोग्यपरमाणुपुंजसे दर्शनयोग्य परमाणुपुंजकी
उत्पत्ति होतीहै. याने घटादिक साक्षात् होजानेमें कोई विरोध नहीं समाधान-अ-
दृश्यपदार्थ दृश्यपदार्थका उपादान नहीं होसकताहै. ( अन्यथा ) यदि अदृश्यपदार्थ
सेभी दृश्यपदार्थकी उत्पत्ति होवे तो कदाचित् नेत्रइन्द्रियका तथा ( ऊष्म ) भाफादि
अदृश्य तेजःपदार्थोकाभी साक्षात्कार होना चाहिये ।
न चातितप्ततैलादौ कथमदृश्यदहनसन्ततेर्दृश्यदहनोत्पत्तिरिति
वाच्यम् । तत्र तदन्तःपातिभिर्दृश्यैरेव दहनावयवैः स्थूलदहनो-
त्पत्तेरभ्युपगमात् । न चादृश्यद्वयणुकेन कथं त्रसरेणोरुत्पत्तिरि
तिवाच्यम्। यतो न वयं दृश्यत्वमदृश्यत्वं वा कस्यचित् स्वभा-
वादाचक्ष्महे किंतु महत्त्वोद्भूतरूपादिकारणसमुदायवशाद्दृश्यत्व
म् । तदभावेचादृश्यत्वम् । तथा च त्रसरेणोर्महत्त्वात्प्रत्यक्षं न
तु द्वयणुकादेस्तदभावात् । न हि तन्मतेऽपीदं सम्भवति,
परमाणौ महत्त्वाभावात् ।
शंका-अतितप्त तैलादिकोंविषे कैसे अदृश्यअग्निके भागोंसे दृश्य अग्निभागोंकी
उत्पत्ति होतीहै अर्थात् अतितप्त तैलादि पदार्थ पात्रव्यवहित अग्निसंयोगसेभी शीघ्र
जल उठते हैं; वहां प्रथम उनमें दहनसंतति अदृश्य होतीहै, पश्चात् दृश्य होजातीहै.
समाधान-वहांभी हम ऐसा मानते हैं कि, दर्शनयोग्य अग्निके भागोंने तैलादि
पदार्थमें प्रविष्ट होकर स्थूलदाहकी उत्पत्ति करीहै; याते अदृश्यसे दृश्यकी उत्पत्ति नहीं
है. शंका-अदृश्य द्वयणुकसे दृश्य त्रसरेणुकी उत्पत्ति आपने कैसे मानीहै ? समा०-
इसीकारणसे हम दर्शनयोग्यता अथवा अदर्शनयोग्यता किसी पदार्थको स्वरूपसे नहीं
कहते किन्तु-महत्त्व परिमाण उद्भूतरूपादि कारण समुदायसे पदार्थोंमें दर्शनयोग्यता
होतीहै इनके अभावसे पदार्थ अदृश्य रहताहै. इसीरीतिसे त्रसरेणुका महत्त्वपरिमाण

होनेसे प्रत्यक्ष होसकताहै द्व्यणुकका महत्त्वपरिमाणके अभावसे प्रत्यक्ष नहीं होसकता;
इसीनियमसे तुम्हारे मतमें तो निर्वाह नहीं होसकता, क्योंकि आपने परमाणुपुंजहीका
प्रत्यक्ष माना है और परमाणुमें महत्त्वरूप कारणके अभावसे प्रत्यक्ष योग्यता नहीं है.
इत्थं चावयवसिद्धौ तेषामुत्पादविनाशयोः प्रत्यक्षत्वाद नित्यत्व-
म्। तेषांचावयवधाराया अनन्तत्वे मेरुसर्षपयोरपि साम्यप्रसंगः ।
अतः क्वचिद्विश्रामो वाच्यः । यत्र च विश्रामस्तस्याऽनित्यत्वे
त्वसमवेतभावकार्योत्पत्तिप्रसङ्ग इति तस्य नित्यत्वम्। महत्प-
रिमाणतारतम्यस्य गगनादौ विश्रान्तत्वमिवाणुपरिमाणतार-
तम्यस्यापि क्वचिद्विश्रान्तत्वमस्तीति तस्य परमाणुत्वसिद्धिः ।
भाषा--इस पूर्वोक्तविचारसे (अवयवी) कार्यद्रव्यकी सिद्धि हुई तो उन कार्यद्रव्योंको
उत्पन्न विनष्ट होनेसे अनित्यत्व स्पष्ट है; उन कार्यद्रव्योंकी अवयवपरंपरा यदि असं-
ख्यात मानी जाय तो मेरुपर्वत तथा (सर्षप) सरसोंके दानेकी तुल्यता होनीचाहिये; याते
किसी एक स्थलमें अवयवपरंपराका विश्राम कहना उचितहै. जहां अवयवपरंपराका
पर्यवसान है यदि उसको अनित्य मानाजाय तो समवायिकारणसे विनाही भावकार्य-
की उत्पत्ति होनी चाहिये; सो तो संभव नहीं, याते अवयवपरंपराकी विश्राम
अवधिको नित्य मानना उचित है. जैसे महत्परिमाणकी न्यूनाधिकता त्रसरेणुसे लेकर
आकाशादिकोंमें विश्रामको प्राप्त होतीहै वैसेही अणुपरिमाणकी न्यूनाधिकताकी
विश्रान्तिकी अवधिभी कहीं कहनी उचित है. अणुपरिमाणकी न्यूनाधिकताकी
विश्रान्तिकी अवधि जहां है वही परमाणु है. इसरीतिसे परमाणुकी सिद्धि होसकतीहै.
न च त्रसरेणावेव विश्रमोऽस्त्विति वाच्यम् । त्रसरेणुः सावयवः
चाक्षुषद्रव्यत्वाद्धटवदित्यनुमानेन तदवयवसिद्धौ, त्रसरेणोरव-
यवाः सावयवा महदवयवत्वात् कपालवदित्यनुमानेन तद्व-
यवसिद्धेः ।
शंका-अणुपरिमाणकी विश्रामावधि त्रसरेणुहीमें मानलें तो दोष क्या है? समा०--
त्रसरेणु घटकी तरह नेत्रग्राह्य होनेसे सावयवहैं. इस अनुमानसे त्रसरेणुके अवयव सिद्ध
होनेसे पश्चात् त्रसरेणुके अवयवभी त्रसरेणुरूप महान्कार्यके आरम्भक होनेसे साव-
यव हैं जैसे कपाल घटरूप महान् कार्यके आरम्भक होनेसे सावयव हैं. इस
अनुमानसे त्रसरेणुके अवयवोंकेभी अवयव सिद्ध होसकते हैं.

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ४९
न चेदमप्रयोजकम् । अपकृष्टमहत्त्वं प्रत्यनेकद्रव्यवत्त्वस्य प्र-
योजकत्वात् । न चैवं क्रमेण तदवयवधारापि सिद्ध्येदिति वा-
च्यम्, अनवस्थाभयेन तत्सिद्धेः ।
शंका-इस पूर्वोक्त अनुमानमें अनुकूल तर्कका अभाव है. समाधान--अपकृष्ट
महत्त्वके प्रति अनेकद्रव्यको कारणतारूपही अनुकूलतर्क प्रसिद्ध है.शंका-इसी क्रमसे
उन अवयवोंकी धाराभी सिद्ध हो तो क्या हानि है? समाधान--अनवस्थारूप दोषके
भयसे तथा मेरु सरसोंके साम्यप्रसंगके भयसे अवयवोंकी धारा माननी अनुचित
है. इससे अणुपरिमाणकी विश्रांतिकी अवधि परमाणुनामक पदार्थ सिद्ध हुआ.
सा च त्रिधा भवेद्देहमिन्द्रियं विषयस्तथा ॥ ३७॥
सा च त्रिधेति । सा कार्यरूपा पृथिवी त्रिविधा शरीरेन्द्रियवि-
षयभेदादित्यर्थः ॥ ३७ ॥
भाषा-वह कार्यरूपा पृथिवी शरीरभेदसे तथा इन्द्रियभेदसे तथा विषयभेदसे तीन
प्रकारकी है ॥ ३७ ॥
तत्र देहमुदाहरति, योनिजादीति-
भाषा-उनमें 'योनिजादि' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार देहके भेदको दिखलाताहै-
योनिजादि भवेद्देहं--
योनिजमयोनिजं चेत्यर्थः ।
भाषा-योनिज तथा अयोनिजभेदसे वह देह दो प्रकारका है.
योनिजमपि जरायुजमण्डजं च । जरायुजं मानुषादीनाम्,अण्ड-
जं सर्पादीनाम् । अयोनिजं स्वेदजोद्भिज्जादिकम् । स्वेदजाः
कृमिदंशाद्याः, उद्भिज्जास्तरुगुल्माद्याः । नारकिणां शरीरमप्य-
योनिजम् ।
भाषा-योनिजशरीरभी जरायुज तथा अण्डजभेदसे दो प्रकारके हैं. उनमें पुरु-
षादिकोंके शरीर जरायुज कहे जाते हैं; तथा सर्पादिकोंके शरीर अण्डज कहे जातेहैं
तैसे अयोनिज शरीरभी स्वेदज तथा उद्भिज्ज भेदसे दो प्रकारके हैं. पसीनेसे उत्पन्न
होनेवाले कीटदंशादिक जीव स्वेदज कहेजातेहैं; तथा भूमिकेभेदनसे उत्पन्न होनेवाले
४

[५० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-

वृक्षलतादिके शरीर द्विज्ज कहे जातेहैं. नरकमें होनेवाले जीवोंके शरीरभी अयो-
निजही हैं; याते पृथक् परिगणन नहींकिये.
न च मानुषादिशरीराणां पार्थिवत्त्वे किं मानमिति वाच्यम्,
गन्धादिमत्त्वस्यैव प्रमाणत्वात् । न च क्लेदोष्मादेरुपलम्भादाप्य-
त्वादिकमपि स्यादिति वाच्यम्, तथा सति जलत्वपृथिवीत्वादि-
ना सङ्करप्रसङ्गात् । न च तर्हि जलत्वादिकमेवास्तु, न तु पार्थि-
वत्त्वमिति वाच्यम् । क्लेदादीनां विनाशेऽपि शरीरत्वेन प्रत्यभि-
ज्ञानात्, गन्धाद्युपलब्धेश्च पृथिवीत्वसिद्धेः । तेन पार्थिवादिशरीरे
जलादीनां निमित्तत्वमात्रं बोध्यम् ।
शंका-पूर्वोक्त पुरुषादिकोंके शरीर पृथिवीसे उत्पन्न होनेवाले हैं इसमें क्या प्रमा-
णहै? समाधान-पुरुषादिकोंके शरीर पार्थिव है, गन्धवाले होनेसे किंवा शुक्लेतररूप-
वाले होनेसे 'घटादिवत्' इत्याकारक अनुमानही प्रमाण है. शंका-पुरुषादि शरी-
रोंहीमें कदाचित् स्वेदादिसे गीलापना और कदाचित् ज्वरादिकोंसे उष्णता प्रतीत
होतीहै, इससे पुरुषादि शरीरोंको जलसे उत्पन्न होनेवाले किंवा तेजसे उत्पन्न
होनेवालेभी कहना चाहिये. समाधान--ऐसा माननेसे जलत्व जातिका तथा पृथिवीत्व
जातिका परस्पर संकर होगा. शंका-यदि ऐसाही है तो इन शरीरोंको जलसे वा
तेजसे उत्पन्न होनेवाला माननाही उचितहै और पार्थिव मानना व्यर्थ है. समाधान-
शरीरसे गीलेपनेके विनाशके पश्चात् किंवा उष्णताके विनाशके पश्चात् भी पुरुषादि
शरीरोंमें 'यह वही देवदत्तका शरीर है' इत्याकारक शरीरत्वरूपसे प्रत्यभिज्ञात्मकज्ञान
होताहै और गन्धके तथा श्वेतेतररूपादिकोंके उपलाभ होनेसे पुरुषादिशरीरोंमें पार्थि-
वत्व निश्चय होताहै, पुरुषादिशरीरोंको पार्थिव सिद्ध होनेसे इनमें जलादिभूतोंको
निमित्तकारण मात्र जानना चाहिये. पुरुषादिशरीरोंमें पाञ्चभौतिकत्वव्यवहारभी पञ्च-
भूतजन्यत्वमात्रको लेकर है किन्तु उपादान तात्पर्य्यसे नहींहै.
शरीरत्वं न जातिः पृथिवीत्वादिना साङ्कर्यात्, किंतु चेष्टाश्र-
यत्वम् । वृक्षादीनामपि चेष्टासत्त्वान्नाव्याप्तिः । नच वृक्षादीनां
शरीरत्वे किं मानमिति वाच्यम् । आध्यात्मिकवायुसम्बन्धस्य


१ यहां संकरका प्रकार ऐसेहै कि-पृथिवीत्वधर्मको छोड़कर शरीरत्वधर्म जलादिशरीरोंमें है
ऐसे शरीरत्वधर्मको छोड़कर पृथिवीत्वघटादिकोंमेंहै एवं दोनों धर्मोंका समावेश मानुषादिशरी-
रोंमें है याते पूर्वोक्तसंकरका लक्षणसमन्वय होसकता है ।

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ५१
प्रमाणत्वात्। तत्रैव किं मानमिति चेत्, भग्नक्षतसंरोहणादिना
तदनुमानात् ।
भाषा-पृथ्वीत्वादिजातियोंके साथ संकर होनेसे शरीरत्व जाति नहींहै,किंतु उपाधि
है,चेष्टा के आश्रयका नाम शरीर है यह उसका निर्वचन है. (चेष्टा) क्रियाका व्याप्य
जाति विशेष है, सो "चेष्टते२" इत्यादि व्यवहारसे प्रत्यक्ष सिद्ध है वह चेष्टा वृक्षादि
शरीरोंमेंभी है याते उनमें अव्याप्ति नहीं है शंका-वृक्षादिकोंके शरीर होनेमें क्या
प्रमाण है? समाधान-वृक्षादिकोंमें प्राणवायुका सम्बन्ध ही उनके शरीरमें प्रमाण है.
शंका-वृक्षादिकोंमें प्राणवायुका सम्बन्ध है. इसीमें क्या प्रमाण है?समाधान-१वृ-
क्षादिके स्वयं फूटनेसे, २तथा वृक्षादि शरीरोंमें स्वयं ( विस्फोट ) गूमड़ा होजानेसे,
३ एवं वृक्षादिके परस्पर एक दूसरे पर संरोहण होजानेसे,४ तथा वृक्षादिके वर्द्धनसे,
वृक्षादिकोंमें प्राणवायुका अनुमान होता है.
यदि हस्तादौ शरीरव्यवहारो न भवति, तदाऽन्त्यावयवित्वेन
विशेषणीयम्। न च यत्र शरीरे चेष्टा न जाता तत्राव्याप्तिरिति
वाच्यम्, तादृशे प्रमाणाभावात् । अथवा चेष्टावदन्त्यावयवि-
मात्रवृत्तिद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वं तत्, मानुषत्वचैत्रत्वजातिमा-
दाय लक्षणसमन्वयः । न च नृसिंहशरीरे कथं लक्षणसमन्वयः,
तत्र नृसिंहत्वस्यैकव्यक्तिवृत्तितया जातित्वाभावात् । जलीयतै-
जसशरीरवृत्तितया देवत्वस्यापि¹ जातित्वाभावादिति वाच्यम् ।
कल्पभेदेन नृसिंहशरीरस्य नानात्वेन नृसिंहत्वजात्या लक्षण-
समन्वयात् ॥
शंका-पूर्वोक्त क्रियाविशेषरूप चेष्टा हस्त पादादिकोंमेंभी रह सकतीहै परन्तु वहां
शरीरव्यवहार कोई नहीं करता. समाधान-यदि ऐसा है तो "अन्त्यावयवित्वे सति
चेष्टाश्रयत्वं" ऐसा लक्षण करनेसे दोष नहीं द्रव्यान्तरके अनारम्भकका नाम 'अ-
न्त्यावयवि' है ऐसा शरीर है; हस्तपादादि नहीं हैं. शंका-जिस शरीरमें चेष्टा नहीं
उत्पन्न हुई उसमें पूर्वोक्तलक्षणकी अव्याप्ति होगी. समाधान-ऐसे शरीरमें प्रमाण
१ देवत्वधर्मभी संकरदोषसे दूषित होनेसे जातिरूप नहींहै. उसका प्रकार यह है कि-देवत्व
धर्मको छोड़कर तैजसत्व धर्म स्वर्णादि तैजस पदार्थोंमें रहताहै. एवं तैजसत्वधर्मको छोड़
कर देवत्व जलीय देवोंमें है. उभयका समावेश तैजसदेवोंके शरीरमें है. इसलिये देवत्वधर्म
जातिरूप नहीं है ।