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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 350 में से

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पृष्ठ 74

[५० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-

वृक्षलतादिके शरीर द्विज्ज कहे जातेहैं. नरकमें होनेवाले जीवोंके शरीरभी अयो-
निजही हैं; याते पृथक् परिगणन नहींकिये.
न च मानुषादिशरीराणां पार्थिवत्त्वे किं मानमिति वाच्यम्,
गन्धादिमत्त्वस्यैव प्रमाणत्वात् । न च क्लेदोष्मादेरुपलम्भादाप्य-
त्वादिकमपि स्यादिति वाच्यम्, तथा सति जलत्वपृथिवीत्वादि-
ना सङ्करप्रसङ्गात् । न च तर्हि जलत्वादिकमेवास्तु, न तु पार्थि-
वत्त्वमिति वाच्यम् । क्लेदादीनां विनाशेऽपि शरीरत्वेन प्रत्यभि-
ज्ञानात्, गन्धाद्युपलब्धेश्च पृथिवीत्वसिद्धेः । तेन पार्थिवादिशरीरे
जलादीनां निमित्तत्वमात्रं बोध्यम् ।
शंका-पूर्वोक्त पुरुषादिकोंके शरीर पृथिवीसे उत्पन्न होनेवाले हैं इसमें क्या प्रमा-
णहै? समाधान-पुरुषादिकोंके शरीर पार्थिव है, गन्धवाले होनेसे किंवा शुक्लेतररूप-
वाले होनेसे 'घटादिवत्' इत्याकारक अनुमानही प्रमाण है. शंका-पुरुषादि शरी-
रोंहीमें कदाचित् स्वेदादिसे गीलापना और कदाचित् ज्वरादिकोंसे उष्णता प्रतीत
होतीहै, इससे पुरुषादि शरीरोंको जलसे उत्पन्न होनेवाले किंवा तेजसे उत्पन्न
होनेवालेभी कहना चाहिये. समाधान--ऐसा माननेसे जलत्व जातिका तथा पृथिवीत्व
जातिका परस्पर संकर होगा. शंका-यदि ऐसाही है तो इन शरीरोंको जलसे वा
तेजसे उत्पन्न होनेवाला माननाही उचितहै और पार्थिव मानना व्यर्थ है. समाधान-
शरीरसे गीलेपनेके विनाशके पश्चात् किंवा उष्णताके विनाशके पश्चात् भी पुरुषादि
शरीरोंमें 'यह वही देवदत्तका शरीर है' इत्याकारक शरीरत्वरूपसे प्रत्यभिज्ञात्मकज्ञान
होताहै और गन्धके तथा श्वेतेतररूपादिकोंके उपलाभ होनेसे पुरुषादिशरीरोंमें पार्थि-
वत्व निश्चय होताहै, पुरुषादिशरीरोंको पार्थिव सिद्ध होनेसे इनमें जलादिभूतोंको
निमित्तकारण मात्र जानना चाहिये. पुरुषादिशरीरोंमें पाञ्चभौतिकत्वव्यवहारभी पञ्च-
भूतजन्यत्वमात्रको लेकर है किन्तु उपादान तात्पर्य्यसे नहींहै.
शरीरत्वं न जातिः पृथिवीत्वादिना साङ्कर्यात्, किंतु चेष्टाश्र-
यत्वम् । वृक्षादीनामपि चेष्टासत्त्वान्नाव्याप्तिः । नच वृक्षादीनां
शरीरत्वे किं मानमिति वाच्यम् । आध्यात्मिकवायुसम्बन्धस्य


१ यहां संकरका प्रकार ऐसेहै कि-पृथिवीत्वधर्मको छोड़कर शरीरत्वधर्म जलादिशरीरोंमें है
ऐसे शरीरत्वधर्मको छोड़कर पृथिवीत्वघटादिकोंमेंहै एवं दोनों धर्मोंका समावेश मानुषादिशरी-
रोंमें है याते पूर्वोक्तसंकरका लक्षणसमन्वय होसकता है ।