न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
DevanagariHindipublished350 पृष्ठ
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परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ३७
नच द्रव्यानाारम्भके घटादावव्याप्तिः । द्रव्यसमवायिकारणवृ-
त्तिद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वस्य विवक्षितत्वात् ।
भाषा-पृथिवी जल अग्नि वायु ये चारों समवायि कारण होकर द्रव्यान्तरके आर-
म्भक हैं. शंका-घटरूप पृथिवीमें द्रव्यान्तरारम्भकता नहीं है; अव्याप्ति होगी. समा०-
द्रव्यके समवायिकारणमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य 'पृथिवीत्व' आदि जाति,
तादृश जातिमत्ता यावत् घटादिकार्योंमें सिद्ध है. एवं अव्याप्तिरूप दोष नहीं है.
- अथाकाशशरीरिणाम् ।
अव्याप्यवृत्तिः क्षणिको विशेषगुण इष्यते ॥ २७ ॥
भाषा-आकाश तथा जीवात्माका अव्याप्य वृत्ति क्षणिक विशेष गुणवत्ता समान
धर्म है ॥ २७ ॥
आकाशशरीरिणामिति । आकाशात्मनामव्याप्यवृत्तिक्षणिकवि-
शेषगुणवत्त्वम्।आकाशस्य विशेषगुणः शब्दः,स चाव्याप्यवृत्ति-
र्यदा किञ्चिदवच्छेदेन शब्द उत्पद्यते,तदाऽन्यावच्छेदेन तदभाव-
स्यापि सत्त्वात्।क्षणिकत्वं च तृतीयक्षणवृत्तिध्वंसप्रतियोगित्वम्।
योग्यविभुविशेषगुणानां स्वोत्तरवर्तिगुणनाश्यत्वात् प्रथमशब्द-
स्य द्वितीयशब्देन नाशः।एवं ज्ञानादीनामपि ज्ञानादिकं ह्यात्म-
नि विभौ शरीराद्यवच्छेदेनोत्पद्यते घटाद्यवच्छेदेन तदभावो
ऽस्त्येव । एवं ज्ञानादिकमपि क्षणद्वयावस्थाथि । इत्थंचाव्याप्य-
वृत्तिविशेषगुणवत्त्वं चार्थः । पृथिव्यादौ रूपादिर्विशेषगुणो
ऽस्तीत्यतोऽव्याप्यवृत्तिरित्युक्तम्।पृथिव्यादावव्याप्यवृत्तिः संयो-
गादिरस्तीत्यतो विशेषगुण इत्युक्तम्॥नच रूपादीनामपि कदा-
चित्तृतीयक्षणे नाशसम्भवात् । क्षणिकविशेषगुणवत्त्वं क्षित्यादा
वतिव्याप्तमिति वाच्यम् ।
भाषा-आकाशका तथा जीवात्माओंका अव्याप्यवृत्ति जो क्षणिक विशेषगुण,
तादृश विशेषगुणवत्ता समान धर्म है. आकाशका विशेषगुण शब्द है. वह अव्याप्य
( १ ) जिस वस्तुका ध्वंस होय वही वस्तु ध्वंसकी प्रतियोगी कही जाती है.