न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ५१
प्रमाणत्वात्। तत्रैव किं मानमिति चेत्, भग्नक्षतसंरोहणादिना
तदनुमानात् ।
भाषा-पृथ्वीत्वादिजातियोंके साथ संकर होनेसे शरीरत्व जाति नहींहै,किंतु उपाधि
है,चेष्टा के आश्रयका नाम शरीर है यह उसका निर्वचन है. (चेष्टा) क्रियाका व्याप्य
जाति विशेष है, सो "चेष्टते२" इत्यादि व्यवहारसे प्रत्यक्ष सिद्ध है वह चेष्टा वृक्षादि
शरीरोंमेंभी है याते उनमें अव्याप्ति नहीं है शंका-वृक्षादिकोंके शरीर होनेमें क्या
प्रमाण है? समाधान-वृक्षादिकोंमें प्राणवायुका सम्बन्ध ही उनके शरीरमें प्रमाण है.
शंका-वृक्षादिकोंमें प्राणवायुका सम्बन्ध है. इसीमें क्या प्रमाण है?समाधान-१वृ-
क्षादिके स्वयं फूटनेसे, २तथा वृक्षादि शरीरोंमें स्वयं ( विस्फोट ) गूमड़ा होजानेसे,
३ एवं वृक्षादिके परस्पर एक दूसरे पर संरोहण होजानेसे,४ तथा वृक्षादिके वर्द्धनसे,
वृक्षादिकोंमें प्राणवायुका अनुमान होता है.
यदि हस्तादौ शरीरव्यवहारो न भवति, तदाऽन्त्यावयवित्वेन
विशेषणीयम्। न च यत्र शरीरे चेष्टा न जाता तत्राव्याप्तिरिति
वाच्यम्, तादृशे प्रमाणाभावात् । अथवा चेष्टावदन्त्यावयवि-
मात्रवृत्तिद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वं तत्, मानुषत्वचैत्रत्वजातिमा-
दाय लक्षणसमन्वयः । न च नृसिंहशरीरे कथं लक्षणसमन्वयः,
तत्र नृसिंहत्वस्यैकव्यक्तिवृत्तितया जातित्वाभावात् । जलीयतै-
जसशरीरवृत्तितया देवत्वस्यापि¹ जातित्वाभावादिति वाच्यम् ।
कल्पभेदेन नृसिंहशरीरस्य नानात्वेन नृसिंहत्वजात्या लक्षण-
समन्वयात् ॥
शंका-पूर्वोक्त क्रियाविशेषरूप चेष्टा हस्त पादादिकोंमेंभी रह सकतीहै परन्तु वहां
शरीरव्यवहार कोई नहीं करता. समाधान-यदि ऐसा है तो "अन्त्यावयवित्वे सति
चेष्टाश्रयत्वं" ऐसा लक्षण करनेसे दोष नहीं द्रव्यान्तरके अनारम्भकका नाम 'अ-
न्त्यावयवि' है ऐसा शरीर है; हस्तपादादि नहीं हैं. शंका-जिस शरीरमें चेष्टा नहीं
उत्पन्न हुई उसमें पूर्वोक्तलक्षणकी अव्याप्ति होगी. समाधान-ऐसे शरीरमें प्रमाण
१ देवत्वधर्मभी संकरदोषसे दूषित होनेसे जातिरूप नहींहै. उसका प्रकार यह है कि-देवत्व
धर्मको छोड़कर तैजसत्व धर्म स्वर्णादि तैजस पदार्थोंमें रहताहै. एवं तैजसत्वधर्मको छोड़
कर देवत्व जलीय देवोंमें है. उभयका समावेश तैजसदेवोंके शरीरमें है. इसलिये देवत्वधर्म
जातिरूप नहीं है ।