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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 350 में से

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पृष्ठ 68

[४४] न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-

भाषा--ऐसेही पाषाणके परमाणुओंको पृथिवी होनेसे उनसे उत्पन्न होनेवाला
पाषाणभी पृथिवीस्वरूपही है । एवं पाषाणको गन्धवाला होनेमेंभी कोई
बाधक नहीं है ॥
-नानारूपवती मता ।
भाषा--तथा वह पृथिवी नानाविध रूपवाली है.
नानारूपेति । शुक्लनीलादिभेदेन नानाजातीयं रूपं पृथिव्यामेव
वर्तते,नतु जलादौ तत्रशुक्लस्यैव सत्त्वात् पृथिव्यां त्वेकस्मिन्नपि
धर्मिणि पाकवशेन नानारूपसम्भवात् । नच यत्र नानारूपं नो-
त्पन्नं तत्राव्याप्तिः । रूपद्वयवद्वृत्तिद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वस्य
रूपनाशवद्वृत्तिद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वस्य वा वाच्यत्वात् ।
वैशेषिकनये पृथिवीपरमाणौ रूपनाशस्य रूपान्तरस्य च
सत्त्वात् । न्यायनये घटादावपि तत्सत्त्वाल्लक्षणसमन्वयः ।
भाषा-शुक्ल नीलादि भेदसे सात प्रकारका रूप पृथिवीहीमें रहता है; जलादिमें
नहीं रहता. जलादिमें तो केवल शुक्लरूपही रहता है और पृथिवीमें तो एक व्यक्ति
( घटादि ) मेंभी अग्निसंयोगसे नानारूपका सम्भव होता है. शंका-जिस पृथिवीमें
नानारूप उत्पन्न नहीं हुआ उसमें अव्याप्ति होगी. समाधान-वहांभी रूपद्वयवाले
में वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य ( पृथिवीत्व ) रूपजाति तादृश जातिमत्त्व
अपेक्षित है. अथवा रूप नाशवालेमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य ' पृथिवीत्व '
रूपजातिः तादृशजातिमत्त्व अपेक्षित होनेसे उक्त दोष नहीं है. वैशेषिकमतमें पृथिवी
परमाणुओंमें रूपका नाश तथा रूपान्तरकी उत्पत्ति मानी है और न्यायमतमें तो
घटादिकोंहींमें रूपको नाश तथा रूपान्तरकी उत्पत्ति मानी है याते उभयमतमें
पूर्वोक्त लक्षणमें दोष नहीं है.
षड्विधस्तु रसस्तत्र-
भाषा-षट् प्रकारका उस पृथिवीमें रस है.
षड्विधइति । मधुरकटुकाषायादिभेदेन यःषड्विधो रसः सपृथिव्यामेव,जले च मधुर एव रसः।अत्रापि पूर्ववद्रसद्वयवद्वृत्तिद्र-
व्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वं लक्षणार्थोऽवसेयः ।
१ प्रथम लक्षण अपेक्षा बुद्धिविशेष विषयत्वरूपद्वित्व घटित होनेसे गौरवयुक्त है या...
' रूपनाश ' इत्यादिसे द्वितीय कहा है.