न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ४९
न चेदमप्रयोजकम् । अपकृष्टमहत्त्वं प्रत्यनेकद्रव्यवत्त्वस्य प्र-
योजकत्वात् । न चैवं क्रमेण तदवयवधारापि सिद्ध्येदिति वा-
च्यम्, अनवस्थाभयेन तत्सिद्धेः ।
शंका-इस पूर्वोक्त अनुमानमें अनुकूल तर्कका अभाव है. समाधान--अपकृष्ट
महत्त्वके प्रति अनेकद्रव्यको कारणतारूपही अनुकूलतर्क प्रसिद्ध है.शंका-इसी क्रमसे
उन अवयवोंकी धाराभी सिद्ध हो तो क्या हानि है? समाधान--अनवस्थारूप दोषके
भयसे तथा मेरु सरसोंके साम्यप्रसंगके भयसे अवयवोंकी धारा माननी अनुचित
है. इससे अणुपरिमाणकी विश्रांतिकी अवधि परमाणुनामक पदार्थ सिद्ध हुआ.
सा च त्रिधा भवेद्देहमिन्द्रियं विषयस्तथा ॥ ३७॥
सा च त्रिधेति । सा कार्यरूपा पृथिवी त्रिविधा शरीरेन्द्रियवि-
षयभेदादित्यर्थः ॥ ३७ ॥
भाषा-वह कार्यरूपा पृथिवी शरीरभेदसे तथा इन्द्रियभेदसे तथा विषयभेदसे तीन
प्रकारकी है ॥ ३७ ॥
तत्र देहमुदाहरति, योनिजादीति-
भाषा-उनमें 'योनिजादि' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार देहके भेदको दिखलाताहै-
योनिजादि भवेद्देहं--
योनिजमयोनिजं चेत्यर्थः ।
भाषा-योनिज तथा अयोनिजभेदसे वह देह दो प्रकारका है.
योनिजमपि जरायुजमण्डजं च । जरायुजं मानुषादीनाम्,अण्ड-
जं सर्पादीनाम् । अयोनिजं स्वेदजोद्भिज्जादिकम् । स्वेदजाः
कृमिदंशाद्याः, उद्भिज्जास्तरुगुल्माद्याः । नारकिणां शरीरमप्य-
योनिजम् ।
भाषा-योनिजशरीरभी जरायुज तथा अण्डजभेदसे दो प्रकारके हैं. उनमें पुरु-
षादिकोंके शरीर जरायुज कहे जाते हैं; तथा सर्पादिकोंके शरीर अण्डज कहे जातेहैं
तैसे अयोनिज शरीरभी स्वेदज तथा उद्भिज्ज भेदसे दो प्रकारके हैं. पसीनेसे उत्पन्न
होनेवाले कीटदंशादिक जीव स्वेदज कहेजातेहैं; तथा भूमिकेभेदनसे उत्पन्न होनेवाले
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