न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
रूपानुमानं बोध्यम्। न च घटादौ द्रुतसुवर्णादिभिन्ने तेजसि च द्रव-
त्ववत्त्वमव्याप्तमिति वाच्यम्। द्रवत्ववद्वृत्तिद्रव्यत्वव्याप्यजाति-
मत्वस्य विवक्षितत्वात् । घृतजतुप्रभृतिषु पृथिवीषु जलेषु
द्रुतसुवर्णादौ तेजसि च द्रवत्वसत्त्वात्, तत्र च पृथिवीत्वादिसत्त्वा-
त्तदादाय सर्वत्र लक्षणसमन्वयः। न च प्रत्यक्षविषयत्वं परमाण्वा-
दावव्याप्तम्, अतिव्याप्तं च रूपादाविति वाच्यम्। चाक्षुषप्रत्यक्ष-
विषयवृत्तिद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वस्य विवक्षितत्वात्। आत्मन्य-
तिव्याप्तिवारणाय चाक्षुषेति।
भाषा-पृथिवी जल अग्नि इन तीनोंका रूपवत्ता द्रवत्ववत्ता प्रत्यक्ष विषयता
समान धर्म्म है. शंका-नेत्र घ्राणादि इन्द्रियोंके तथा भर्जन कपालस्थ रेतेमें होने
वाले अग्निके तथा तैजस भाफके रूपवाले होनेमें क्या प्रमाण है ? समाधान-
इन सबको पक्ष बनाकर तेजस्त्वादिरूप हेतुओंसे रूपवत्त्वका अनुमान होसकता है; यथा
"नेत्रेन्द्रियं रूपवत् तेजस्त्वात्" इत्यादि. ऐसे वायुवेगसे देशान्तरसे आयेहुए पृथिवी
जल तथा अग्निके भागोंमेंभी "पृथिवीत्वात्" इत्यादि हेतुओंसे रूपका अनुमान
होसकता है. शंका-घटादिरूप पृथिवीमें तथा द्रुत सुवर्णादिसे भिन्न तेजमें द्रवत्वव-
त्त्वके न होनेसे अव्याप्ति होगी. समा०-वहांभी द्रवत्ववद्वृत्ति जो द्रव्यत्वकी
व्याप्य 'पृथिवीत्वादि' जाति तादृश जातिमत्त्व अपेक्षित होनेसे दोष नहीं है.
घृतलाक्षादि रूप पृथिवीमें जलमें तथा द्रुत सुवर्णादिरूप तेजमें द्रवत्वके विद्यमान
होनेसे तथा इनमें पृथिवीत्वादि रूपजातिके होनेसे सर्वत्र पूर्वोक्त जातिघटित लक्षण
समन्वय होसकता है. शंका-पूर्वोक्त प्रत्यक्ष विषयतारूप समानधर्म्म पृथिवी
आदिके परमाणुओंमें अव्याप्त है तथा रूपादिकोंमें अतिव्याप्त है. समाधान-
चाक्षुष प्रत्यक्षके विषयमें रहनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य 'पृथिवीत्वादि' जाति
तादृशजातिमत्त्वके वहांभी अपेक्षित होनेसे दोष नहीं है. आत्मामें अतिव्याप्तिके
वारणार्थ 'चाक्षुष' पदका निवेश है.
गुरुणी द्वे रसवती-
भाषा-बोझेवाले अर्थात् भारी तथा रसवाले दो पदार्थ हैं.
गुरुणी इति। गुरुत्ववत्त्वं च पृथिवीजलयोरित्यर्थः। न च घ्राणेन्द्रि-