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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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पृष्ठ 70

४६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
नित्याऽनित्या च सा द्वेधा नित्या स्यादणुलक्षणा॥३६
अनित्या तु तदन्या स्यात्सैवावयवयोगिनी ।
भाषा--नित्या तथा अनित्या भेदसे वह पृथिवी दोप्रकारकी है. उसमें परमाणु
रूप पृथिवी नित्या है ॥ ३६ ॥ उसमें भिन्नकार्यरूपा सावयव पृथिवी अनित्या है ।
नित्येति। सा पृथिवी द्विविधा नित्याऽनित्या चेत्यर्थः । अणुलक्ष-
णापरमाणुरूपा पृथिवी नित्या ॥ ३६ ॥ तदन्या परमाणुभिन्ना
पृथिवीद्व्यणुकादिरूपा सर्वाऽप्यनित्येत्यर्थः। सैवानित्या पृथिव्ये-
वावयववतीत्यर्थः ।
भाषा-वह पृथिवी दोप्रकारकीहै, एका नित्याहै और दूसरी अनित्याहै इन दोनोंमें
अणुलक्षणा अर्थात् परमाणुरूपा पृथिवी नित्या है ॥ ३६ ॥ और परमाणुओंसे भिन्न
द्व्यणुकादि रूपा यावत् पृथिवी अनित्या है. वह अनित्या पृथिवी ही अवयवयोगिनी
अर्थात् सावयवा कही जाती है.
नन्ववयविनि किं मानम्, परमाणुपुञ्जैरेवोपपत्तेः । न च परमाणू-
नामतीन्द्रियत्वाद्वटादेः प्रत्यक्षं न स्यादिति वाच्यम्, एकस्य
परमाणोरप्रत्यक्षत्वेऽपि तत्समूहस्य प्रत्यक्षत्वसम्भवात् । यथै-
कस्य केशस्य दूरेऽप्रत्यक्षत्वेऽपि तत्समूहस्य प्रत्यक्षत्वम् । न
चैकः स्थूलो महान् घट इति बुद्धेरनुपपत्तिरिति वाच्यम् ।
बौद्ध--शंका-सावयवा पृथिवीमें क्या प्रमाणहै? 'अयंघटः' इत्यादि प्रतीतिका निर्वाह
तो विलक्षण संस्थान विशिष्ट परमाणुपुंजसेही होसकताहै. सिद्धान्ती--परमाणु तो
अतीन्द्रिय पदार्थ हैं. यदि घटादि पदार्थोंको परमाणु पुञ्जस्वरूप माने तो परमाणुओंकी
तरह घटादिकाभी प्रत्यक्ष नहीं होगा. बौद्ध--यद्यपि पृथक् २ यावत् परमाणु अतीन्द्रियहैं
तथापि उनके समुदायका साक्षात्कार होसक्ताहै. जैसे एक (केश) बाल दूरसे नहींभी
दीखता तौभी उसके समुदायका प्रत्यक्ष होसकताहै. सिद्धान्ती-यह एक महत्त्व
परिमाणवाला स्थूल घट है ऐसी बुद्धि परमाणुपुंजमें नहीं होसकती.
एको महान् धान्यराशिरितिवदुपपत्तेः। मैवम्। परमाणोरतीन्द्रि-
यत्वेन तत्समूहस्यापि प्रत्यक्षत्वायोगात् । दूरस्थकेशस्तु नाती-
न्द्रियः, सन्निधाने तस्यैव प्रत्यक्षत्वात् । नच तदानीमदृष्टयपर-