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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 350 में से

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पृष्ठ 71

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ४७
माणुपुञ्जाद्दृश्यपरमाणुपुञ्जस्योत्पन्नत्वान्न प्रत्यक्षत्वे विरोध इति
वाच्यम् । अदृश्यस्य दृश्यानुपादानत्वात् । अन्यथा चक्षूरूष्मा-
दिसन्ततेरपि कदाचिद्दृश्यत्वं स्यात् ।
बौद्ध-यह एक महान् धान्यराशिहै, इस बुद्धिकी तरह घटमेंभी बुद्धि होसकतीहै.
समाधान--परमाणु अतीन्द्रिय हैं उनका समूहभी प्रत्यक्षके योग्य नहीं है, दूरस्थ
केश तो अतीन्द्रिय नहींहै नेत्रादिकोंके समीप होनेसे उसी केशका प्रत्यक्षभी होसक्ता
है.शंका-कार्य्योत्पत्तिकालमें दर्शनयोग्यपरमाणुपुंजसे दर्शनयोग्य परमाणुपुंजकी
उत्पत्ति होतीहै. याने घटादिक साक्षात् होजानेमें कोई विरोध नहीं समाधान-अ-
दृश्यपदार्थ दृश्यपदार्थका उपादान नहीं होसकताहै. ( अन्यथा ) यदि अदृश्यपदार्थ
सेभी दृश्यपदार्थकी उत्पत्ति होवे तो कदाचित् नेत्रइन्द्रियका तथा ( ऊष्म ) भाफादि
अदृश्य तेजःपदार्थोकाभी साक्षात्कार होना चाहिये ।
न चातितप्ततैलादौ कथमदृश्यदहनसन्ततेर्दृश्यदहनोत्पत्तिरिति
वाच्यम् । तत्र तदन्तःपातिभिर्दृश्यैरेव दहनावयवैः स्थूलदहनो-
त्पत्तेरभ्युपगमात् । न चादृश्यद्वयणुकेन कथं त्रसरेणोरुत्पत्तिरि
तिवाच्यम्। यतो न वयं दृश्यत्वमदृश्यत्वं वा कस्यचित् स्वभा-
वादाचक्ष्महे किंतु महत्त्वोद्भूतरूपादिकारणसमुदायवशाद्दृश्यत्व
म् । तदभावेचादृश्यत्वम् । तथा च त्रसरेणोर्महत्त्वात्प्रत्यक्षं न
तु द्वयणुकादेस्तदभावात् । न हि तन्मतेऽपीदं सम्भवति,
परमाणौ महत्त्वाभावात् ।
शंका-अतितप्त तैलादिकोंविषे कैसे अदृश्यअग्निके भागोंसे दृश्य अग्निभागोंकी
उत्पत्ति होतीहै अर्थात् अतितप्त तैलादि पदार्थ पात्रव्यवहित अग्निसंयोगसेभी शीघ्र
जल उठते हैं; वहां प्रथम उनमें दहनसंतति अदृश्य होतीहै, पश्चात् दृश्य होजातीहै.
समाधान-वहांभी हम ऐसा मानते हैं कि, दर्शनयोग्य अग्निके भागोंने तैलादि
पदार्थमें प्रविष्ट होकर स्थूलदाहकी उत्पत्ति करीहै; याते अदृश्यसे दृश्यकी उत्पत्ति नहीं
है. शंका-अदृश्य द्वयणुकसे दृश्य त्रसरेणुकी उत्पत्ति आपने कैसे मानीहै ? समा०-
इसीकारणसे हम दर्शनयोग्यता अथवा अदर्शनयोग्यता किसी पदार्थको स्वरूपसे नहीं
कहते किन्तु-महत्त्व परिमाण उद्भूतरूपादि कारण समुदायसे पदार्थोंमें दर्शनयोग्यता
होतीहै इनके अभावसे पदार्थ अदृश्य रहताहै. इसीरीतिसे त्रसरेणुका महत्त्वपरिमाण