न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
क्षित्यादीति । पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशानां भूतत्वम् । तच्च बहिरि-
न्द्रियग्राह्यविशेषगुणवत्त्वम्। अत्र ग्राह्यत्वं लौकिंकप्रत्यक्षस्वरूप-
योग्यत्वं बोध्यम्।तेन ज्ञातो घट इति प्रत्यक्षे ज्ञानस्याप्युपनीत-
भानविषयत्वात्,तद्वत्यात्मनि नातिप्रसङ्गः।न वा प्रत्यक्षाविषय-
रूपादिमति परमाण्वादावव्याप्तिः,तस्यापि स्वरूपयोग्यत्वात् ।
महत्त्वलक्षणकारणान्तराऽसन्निधानाच्च न प्रत्यक्षम् । अथैवा
ऽऽत्मावृत्तिविशेषगुणवत्त्वं तत्त्वम् । चत्वारीति । पृथिव्यप्तेजो
वायूनां स्पर्शवत्त्वम् ।
भाषा-भूत नाम नेत्रादि बाह्य इन्द्रियग्राह्य रूपादि विशेषगुण वालोंकाहै.इस प्रसङ्ग-
में ग्राह्य पदसे लौकिक प्रत्यक्ष स्वरूप योग्यताका ग्रहण है. अन्यथा 'ज्ञातो घटः'
इस ज्ञानमें प्रकारीभूत जो ज्ञान उस ज्ञानकाभी ' चक्षुःसंयुक्तमनःसंयुक्तात्मसम-
वेतज्ञानविषयत्व' सम्बन्धसे घटअंशमें प्रत्यक्ष हो सकता है. एवं उस ज्ञान
वाले आत्मामें अतिव्याप्ति होगी; परन्तु पूर्वोक्त सम्बन्धसे ज्ञानका लौकिक प्रत्यक्ष
नहीं है किन्तु अलौकिक है; याते आत्मामें अतिव्याप्तिरूप दोष नहीं. स्वरूप
योग्यताके निवेश करनेसे प्रत्यक्षके अविषय तथा रूपादि युक्त परमाणु आदिमेंभी
अव्याप्ति नहीं है. परमाणुमें तथा द्वयणुकमें प्रत्यक्षकी योग्यता तो है परन्तु महत्त्व-
रूप कारणान्तरके न होनेसे परमाणुका तथा द्वयणुकका प्रत्यक्ष नहीं होता. अथवा
आत्मामें न वर्तनेवाले जो विशेषगुण, तादृश विशेषगुणवाले की 'भूत' संज्ञा है. पृथ्वी,
जल, तेज, तथा वायु इन चारोंका स्पर्शवाले होना समान धर्म है॥ २६ ॥
द्रव्यारम्भश्चतुर्षु स्यात्-
भाषा-द्रव्यान्तरके आरम्भक होनाभी पृथिवी आदि चारोंका समान धर्म है.
द्रव्यारम्भेति । पृथिव्यप्तेजोवायुषु चतुर्षु द्रव्यारम्भकत्वम् ।
( १ ) वक्ष्यमाणसंयोगादि षड्विधसन्निकर्षसे लौकिक प्रत्यक्ष होता है उनसे भिन्न
यावत् सम्बन्धोंसे प्रत्यक्ष योग्य पदार्थोंका अलौकिक प्रत्यक्ष होता है । एवं ' ज्ञातो घटः '
यह ज्ञान अनुव्यवसाय रूप मानसिक है । विशेष्यरूपसे घट तथा विशेषणरूपसे घटका
व्यवसायात्मक ज्ञान इसके विषय है । परन्तु अलौकिक सम्बन्धसे है याते ज्ञानवाले
आत्मामें दोष नहीं ॥
( २ ) नेत्र इन्द्रियादिगत रूपादि विशेष गुणोंको अनुद्भूत होनेसे बाह्य इन्द्रियसे ग्रहणकी
अयोग्यता है । यान्ते भूतत्व लक्षणकी अव्याप्तिकी शंकासे कहा है-अथवेति ।