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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 350 में से

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पृष्ठ 65

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ४१
यादीनां वाय्वानीतपार्थिवादिभागानां च रसादिमत्त्वे किंमानमि-
तिवाच्यम् । तत्रापि पृथिवीत्वादिना तदनुमानात् ।
भाषा--गुरुत्ववत्ता तथा रसवत्ता पृथिवीजलका समान धर्म है. शंका-घ्राणादि
इन्द्रियोंके तथा वायुआनीत पार्थिवादि भागोंके रसवाले होनेमें क्या प्रमाण है?
समाधान-वहांभी "पृथिवीत्वात्" इत्यादि हेतुओंसे रसका अनुमान हो सक्ताहै.

  • द्वयोर्नैमित्तिको द्रवः ॥ २८ ॥
    द्वयोरिति पृथिवीतेजसोरित्यर्थः ।
    भाषा-पृथिवी, तेज, इन दोनोंका नैमित्तिक द्रवणरूप समान धर्म है ॥ २८ ॥
    न च नैमित्तिकद्रवत्ववत्त्वं घटादौ वह्न्यादौ चाव्याप्तमिति वाच्य-
    म् । नैमित्तिकद्रवत्वसमानाधिकरणद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वस्य
    विवक्षितत्वात् ॥ २८ ॥
    शंका-नैमित्तिक द्रवत्ववत्ता घटादि पृथिवीमें तथा वह्निरूप तेजमें अव्याप्त है.
    समा०-वहांभी नैमित्तिक द्रवत्वके समानाधिकरणमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी
    व्याप्य ( पृथिवीत्वादि ) जातिः तादृश जातिमत्त्व अपेक्षित होनेसे दोष नहीं है॥२८॥
    आत्मानो भूतवर्गाश्च विशेषगुणयोगिनः ॥
    यदुक्तं यस्य साधर्म्यं वैधर्म्यमितरस्य तत् ॥ २९ ॥
    भाषा-जीवात्मा तथा पञ्चभूत विशेष गुणोंवाले हैं. हमने जो जिसका समान
    धर्म कहा वह इतरका विरुद्ध धर्म जानना चाहिये ॥ २९ ॥
    आत्मान इति । पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशात्मनां विशेषगुणवत्त्व
    मित्यर्थः ॥ यदुक्तमिति । ज्ञेयत्वादिकं विहायेति बोध्यम्। तत्तु न
    कस्यापि वैधर्म्यं केवलान्वयित्वात् ॥ २९ ॥
    भाषा-ज्ञेयत्व प्रमेयत्व वाच्यत्व अभिधेयत्व इन चारों धर्मोंको छोड़कर जो
    जिसका समान धर्म कहा वह दूसरेका विपरीत धर्म है और ज्ञेयत्वादि धर्म तो
    केवलान्वयी हैं. याते किसी पदार्थकेभी विरुद्ध धर्म नहीं हैं ॥ २९ ॥
    स्पर्शादयोऽष्टौ वेगाख्यसंस्कारो मरुतो गुणाः ॥
    अष्टौ स्पर्शादयो रूपं द्रवो वेगश्च तेजसि ॥ ३० ॥