न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
वृत्ति इस रीतिसे है कि-जिस कालमें भेर्याद्यवच्छेदेन शब्द उत्पन्न होता है, उसी
कालमें घटाद्यवच्छेदेन शब्दके अभावकीभी प्रतीति होती है. क्षणिक नाम
तीसरे क्षणमें नाश होनेवालेका है. प्रत्यक्षके योग्य जो आकाशादि विभुद्रव्योंके
शब्दादि विशेष गुण, उनका अपनेसे पीछे उत्पन्न होनेवाले विशेष गुणोंसे नाश
होता है. इस रीतिसे प्रथमशब्दका द्वितीयशब्द नाशक है. ऐसेही प्रथमज्ञान
इच्छादिकोंकेभी द्वितीयज्ञान इच्छादिक विनाशक हैं. व्यापक आत्मामें ज्ञान
इच्छादिक शरीरावच्छेदेन उत्पन्न होते हैं और घटाद्यवच्छेदेन ज्ञानादिकोंका
अभावभी सिद्ध है. इस रीतिसे ज्ञानादिकभी दो क्षण स्थित रहते हैं. इस पूर्व
कथनसे 'अव्याप्यवृत्ति विशेषगुणवत्ता' अथवा 'क्षणिक विशेषगुणवत्ता' आका-
शका तथा जीवात्माओंका समान धर्म सिद्ध हुआ. रूपादि विशेष गुण पृथिवी
आदिकोंमेंभी हैं, उनसे प्रथम लक्षणकी अतिव्याप्तिके वारणार्थ 'अव्याप्यवृत्ति'
विशेष गुणका विशेषण दिया. अव्याप्यवृत्ति संयोगादिकभी पृथिवी आदिकोंमें
रहते हैं. उनसे प्रथम लक्षणकी अतिव्याप्ति वारणार्थ विशेषगुणरूप विशेष्यका
निवेश किया। रूपादि अव्याप्य वृत्ति नहीं हैं तथा संयोगादि विशेष गुण नहीं हैं-
एवं उभयथा पृथिवीमें अतिव्याप्ति नहीं हैं. शंका-किसी एक कालमें रूपादिकों
का भी तीसरे क्षणमें नाश हो सकता है. ऐसे 'क्षणिक विशेष गुणवत्त्व' इस
द्वितीय लक्षणकी पृथिवी आदिकोंम अतिव्याप्ति होगी.
चतुःक्षणवृत्तिजन्यावृत्तिजातिमद्विशेषगुणवत्त्वस्य विवक्षित-
त्वात्, अपेक्षाबुद्धिः क्षणत्रयं तिष्ठति, क्षणचतुष्टयं तु किमपि
जन्यज्ञानादिकं न तिष्ठति, रूपत्वादिकं तु क्षणचतुष्टयस्थायि-
न्यपि रूपादौ वर्तत इति व्युदासः ईश्वरज्ञानस्य चतुःक्षणवृत्ति-
त्वाज्जन्येत्युक्तम्। यद्याकाशजीवात्मनोः साधर्म्यं तदा जन्ये-
ति न देयम्, द्वेषत्वादिकमादाय लक्षणसमन्वयात्, परममहत्त्व-
स्य तादृशगुणत्वाच्चतुर्थक्षणे द्वित्वादीनामपि नाशाभ्युपगमात्
( १ ) चतुःक्षणशब्द अधिक कालका उपलक्षक है.
( २ ) यदि जन्य पदका न निवेश किया जाय तो 'परममहत्त्वत्व' रूपजातिको चार
क्षणमें रहनेवाले परम महत्त्व परिमाणमें वृत्तित्त्व होनेसे परममहत्त्वपरिमाणको लेकर तिस
वालेकालादिकोंमें तो अतिव्याप्ति नहीं है याते विशेष पदकी सफलतार्थ ग्रन्थान्तर कहताहै
चतुर्थक्षणेद्वित्वादीनामिति ।