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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 350 में से

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पृष्ठ 63

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ३९
द्वित्वादीनामपि तथात्वात् तद्वारणाय विशेषेति । त्रिक्षणवृत्तित्वं
वा वाच्यम् । द्वेषत्वादिकमादायात्मनि लक्षणसमन्वयः ॥२७॥
समाधान-चार क्षणमें वर्तनेवाले जो घट पटादि तथा रूप रसादिजन्य
उनमें न वर्तनेवाली जो 'शब्दत्व ज्ञानत्व' रूपा जाति तादृश जातिमद्विशेष
गुणवत्ता शब्दमें तथा ज्ञानमें विवक्षित है. याते पूर्वोक्त दोष नहीं । अपेक्षा
बुद्धिरूप ज्ञानभी तीन क्षणमात्र स्थिर रहता है । चतुर्थ क्षणमें अपेक्षा बुद्धिका
नाश होता है, चार क्षणतक स्थिर तो जन्यज्ञानादिक कोई भी नहीं रहते ।
और रूपत्वादिक जाति तो चार क्षण उपलक्षित बहुत कालतक रहनेवाले
रूपादिकोंमें रहती है इसलिये उस रूपत्वादि जातिका व्युदास हुआ अर्थात्
वारण हुआ. ईश्वर ज्ञानभी चार क्षण उपलक्षित नित्य विद्यमान है उसके
संग्रहार्थ 'जन्य' पदका निवेश किया. यदि आकाश तथा जीवात्माकाही समान
धर्म कहनेका तात्पर्य्य होय तो 'जन्य' पदके निवेशका कुछ प्रयोजन नहीं अर्थात्
न निवेश करना चाहिये. ज्ञानत्वजातिके स्थानपर केवल जीवात्माके गुणोंमें रहने
वाली (द्वेषत्वादि) जातिका निवेश करनेसे जातिघटित लक्षण संगत होगा ।
आकाश कालादिकोंका परम महत्त्व परिमाणभी चार क्षणमें वर्तनेवाले जन्य
पदार्थोंमें वर्तनेवाली जो 'परम महत्त्व' रूपा जातिः तादृश जातिमत् है । उससे
अति प्रसक्तिवारणार्थ तैसे चतुर्थक्षणमें द्वित्वादिकोंका नाश आचार्योंने माना है.
द्वित्वादिकोंकोभी तादृश जातिमद्गुण होनेसे उनसे अति प्रसक्तिवारणार्थ 'विशेष'
पदार्थ गुणका विशेषण कहा । परममहत्त्व परिमाण तथा द्वित्वादि विशेष गुण नहीं
हैं । किन्तु सामान्य गुण हैं इस लिये तादृश गुणवाले काल घटादिकोंमें आत्माकाश
लक्षणकी अतिव्याप्ति नहीं है. अथवा चतुःक्षणके स्थानपर 'त्रिक्षणवृत्ति' कहनेसे
पूर्वोक्त दोष नहीं. ज्ञानत्वजातिके स्थानपर द्वेषत्वादिक जातिका निवेश करनेसे
आत्मामें लक्षण समन्वय होगा ॥ २७ ॥
रूपद्रवत्वप्रत्यक्षयोगिनः प्रथमाश्रयः ॥
भाषा-रूपवत्ता द्रवत्ववत्ता प्रत्यक्षविषयता प्रथम तीनका समान धर्म है.
रूपेति । पृथिव्यप्तेजसां रूपवत्त्वं, द्रवत्ववत्त्वं, प्रत्यक्षविषयत्वं
चेत्यर्थः । नच चक्षुरादीनां भर्जनकपालस्थवह्नेरूष्मणश्च रूप-
वत्त्वे किं मानमिति वाच्यम्। तत्रापि तेजस्त्वेन रूपानुमानात् ।
एवं वाय्वानीतपृथिवीजलतेजोभागानामपि पृथिवीत्वादिना