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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 350 में से

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पृष्ठ 69

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ४५
भाषा-मधुर कटु काषायादि भेदसे षट् प्रकारका रस पृथिवीहीमें रहता है;
जलमें तो केवल एक मधुररस है. यहांभी जिस पृथिवीमें नानाविध रस उत्पन्न
नहीं हुआ, उसमें अव्याप्ति वारणार्थ रसद्वयवालेमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य
‘पृथिवीत्व’ रूपा जाति तादृश जातिमत्त्वरूप लक्षणार्थ जानना उचित है.
-- गन्धस्तु द्विविधो मतः ॥ ३५ ॥
भाषा-दोप्रकारका उस पृथिवीमें गन्ध है ॥ ३५ ॥
गन्धस्त्विति। द्विविध इति वस्तुस्थितिमात्रं न तु द्विविधगन्धवत्त्वं
लक्षणं द्विविधत्वस्य व्यर्थत्वात् । द्वैविध्यं च सौरभासौरभभेदेन
बोध्यम् ॥ ३६ ॥
भाषा-पृथिवीमें गन्धका द्विविध कहना केवल वस्तुकी स्थितिमात्रका बोधक है.
द्विविध गन्धवत्त्व मात्र लक्षण नहीं है. किन्तु केवल 'गन्धवत्त्व' मात्रही लक्षण सम्यक्
है. 'द्विविध' पद निष्फल है. सुरभि असुरभि भेदसे वह गन्ध दोप्रकारका जानना
चाहिये ॥ ३५ ॥
स्पर्शस्तस्यास्तु विज्ञेयो ह्यनुष्णाशीतपाकजः ।
स्पर्श इति । तस्याः पृथिव्याः ।
भाषा--अनुष्णाशीतपाकज स्पर्शभी पृथिवीकाही जानना योग्य है.
अनुष्णाशीतस्पर्शवत्त्वं वायावपि वर्तत इत्युक्तं पाकज इति ।
इत्थञ्च पृथिव्याः स्पर्शोऽनुष्णाशीत इति ज्ञापनार्थं तदुक्तम् ।
लक्षणं तु पाकजस्पर्शवत्त्वमात्रम् । अधिकस्य वैयर्थ्यात् ।
यद्यपि पाकजस्पर्शः पटादौ नास्ति, तथापि पाकजस्पर्शवद्वृ-
त्तिद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वमर्थो बोध्यः ।
भाषा--अनुष्णाशीत स्पर्शवत्ता वायुमेंभी है उसके वारणार्थ 'पाकज' पदका निवेश
किया. वहस्पर्श वायुमें पाकज नहींहै. एवं यह पूर्व ग्रन्थ पृथिवीके लक्षणके अभिप्रायसे
नहीं कहा किन्तु पृथिवीका स्पर्श अनुष्णाशीत है यह बोधनार्थ कहा है. पृथिवीका
लक्षण तो 'पाकज स्पर्शवत्त्व' मात्रही साधु है; अधिक कथन निष्फल है. यद्यपि पाकज
स्पर्शवत्ता पटादिरूप पृथिवीमें नहीं है याते उक्त लक्षणकी अव्याप्ति होगी तथापि
पाकज स्पर्शवालेमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य 'पृथिवीत्व' रूपा जाति तादृश
'जातिमत्त्व' पदादि रूप पृथिवीमेंभी प्रसिद्ध है. एवं जातिघटित लक्षण करनेसे
कहीं दोष नहीं.