न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
२६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
भाषा-तथा ज्ञायमानसामान्यको प्रत्यासत्ति नहीं मानते, तैसे ज्ञायमान लिङ्गको
अनुमितिकरण नहीं मानते हैं. “ज्ञानवानहम्, इच्छावानहम्” इत्याकारक आत्माके
मानसप्रत्यक्षमें आत्माके परम महत् परिमाणकोभी कारणता है. इससे कारणता
शून्य परममहत्परिमाण आकाशादिकोंका जानना चाहिये. कई एक नैयायिक
उदयनाचार्यके आशयको लेकर आत्माके महत्परिमाणकोभी कारणता नहीं
मानते. सो सम्यक् नहीं;क्योंकि ज्ञानसे अतिरिक्त कार्यके प्रति आत्ममहत्परिमाण-
की कारणताका निषेधही उदयनाचार्यका आशय है.
ननु कारणत्वं किमत आह, अन्यथेति-
शंका-कारणता क्या पदार्थ है ? समाधान-उसको मूलकार ‘ अन्यथा ’
इत्यादि ग्रन्थसे स्वयं कहता है ॥
अन्यथा सिद्धिशून्यस्य नियता पूर्ववर्तिता ॥
कारणत्वं भवेत्तस्य त्रैविध्यंपरिकीर्तितम् ॥ १६ ॥
समवायिकारणत्वं ज्ञेयमथाप्यसमवायिहेतुत्वम् ॥
एवं न्यायनयज्ञैस्तृतीयमुक्तं निमित्तहेतुत्वम् ॥१७॥
यत्समवेतं कार्यं भवति ज्ञेयं तु समवायिजनंक तत् ॥
तत्रासन्नं जनकं द्वितीयमाभ्यां परं तृतीयं स्यात् १८
भाषा-अन्यथा सिद्धिसे शून्यनियमसे कार्यके प्रथम रहनेवाला कारण होता है.
वह तीन प्रकारका है ॥ १६ ॥ प्रथमका नाम ‘समवायिकारण’ है. द्वितीयका
नाम ‘असमवायिकारण’ है. तृतीयका नाम न्यायवेत्ता पुरुषोंने ‘निमित्त कारण’ कहा
है ॥ १७ ॥ जिसमें समवायसम्बन्धसे कार्य उत्पन्न हो वह समवायिकारण है ॥
( तत्र ) समवायिकारणमें समवेत होकर जो कार्यका जनक हो वह ‘ असमवायि
कारण ’ है. इन दोनों कारणोंसे भिन्न जो कारण है वह ‘निमित्तकारण’ है ॥ १८ ॥
तस्य कारणत्वस्य।तत्र समवायिकारणे।आसन्नं प्रत्यासन्नं कारणं
द्वितीयमसमवायिकारणमित्यर्थः । अत्र यद्यपि तुरीतन्तुसंयो-
गांनां पटासमवायिकारणत्वं स्यात्, एवं वेगादीनामप्यभिघा-
१ भाव यह है कि-तुरीतन्तु संयोगभी अनुयोगित्वेन तन्तुसमवेत है और पटरूप
कार्य्यका जनकभी है. एवं उक्तलक्षणका लक्ष होनेसे तुरीतन्तुसंयोगभी पटका असमवायि
कारण होना चाहिये.
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. २७
ताद्यसमवायिकारणत्वं स्यात्, एवं ज्ञानादिकमिच्छाद्यसमवायि-
कारणं स्यात्, तथाऽपि पटासमवायिकारणलक्षणे तुरीतन्तुसंयो-
गभिन्नत्वं देयम्। तुरीतन्तुसंयोगस्तु तुरीपटसंयोगं प्रत्यसमवायि-
कारणं भवत्येव । एवं वेगादिकमपि वेगस्पन्दाद्यसमवायिकारणं
भवत्येवेति, तत्तत्कार्य्यासमवायिकारणलक्षणे तत्तद्भिन्नत्वं देयम् ।
भाषा-( अत्र ) यहां कारणलक्षणोंमेंसे असमवायि कारणके लक्षणानुसार यद्यपि
तुरीतन्तुओंके संयोगोंकोभी पटका असमवायि कारण होना चाहिये, ऐसेही वेग तथा
स्पर्शकोभी यथाक्रम अभिघाताख्य संयोगका तथा 'नोदनाख्य' संयोगका असम-
वायिकारण होना चाहिये, ( एवं ) ज्ञान इच्छाकोभी यथाक्रम इच्छा तथा प्रवृत्ति-
का असमवायिकारण होना चाहिये तथापि पटके असमवायिकारणके लक्षणमें
तुरीतन्तुसंयोगसे 'भिन्न' पदका निवेश करना उचित है अर्थात् तन्तुओंमें
समवेत हो और तुरीतन्तुसंयोगसे अन्य होकर पटका कारण हो, वही पटका
असमवायिकारण है और तुरीतन्तुसंयोगभी तुरीपटके संयोगके प्रति तो असम-
वायि कारण होसक्ता है, ऐसे वेगादिकभी वेगजन्य क्रियाके असमवायि कारण हो
सक्ते हैं, इसलिये तिस२विशेष कार्य्यके असमवायिकारणके लक्षणमें तिस२से भिन्न
पदका निवेश करना उचित है.
आत्मविशेषगुणानां तु कुत्राप्यसमवायिकारणत्वं नास्ति, तेन
१ शंका-तुरीतन्तुसंयोगकोभी पटके असमवायिकारणके लक्षणका लक्ष्यही माने
तो क्या दोष है? समाधान--नैयायिकोंने असमवायि कारणके नाशसे कार्य्यनाश
माना है, यदि तुरीतन्तुसंयोगभी पटका असमवायिकारण होगा तो उसके नाशसेभी पटका नाश
हुआ चाहिये और यह वार्त्ता देखनेमें तो नहीं आती याते उससे भिन्नत्वका निवेश
करना उचित है.
२ अर्थात् पटके असमवायिकारणके लक्षणमें 'तुरीतन्तुसंयोगभिन्नत्वे सति' का
निवेश करना चाहिये, ऐसे घटके असमवायिकारणके लक्षणमें 'चक्रकपालसंयोगभिन्नत्वे
सति' का निवेश करना चाहिये, तात्पर्य्य यह है कि-प्रत्येक कार्य्यके असमवायिकारणमें
निमित्तकारण तथा समवायिकारणका जो परस्पर संयोग उससे भिन्नत्वका निवेश.
करना उचित है.
३ यहां यह भाव है कि-आत्माके ज्ञानरूप विशेषगुणके प्रति आत्ममनःसंयोगको
असमवायिकारणता तो अवश्य माननीय है, एवं वही आत्ममनःसंयोग यदि अन्य
विशेष गुणोंकाभी असमवायि कारण बनसके तो आत्मविशेषगुणोंको परस्पर एक दूसरेके
प्रतिया किसी गुणान्तरके प्रति असमवायिकारणता माननी व्यर्थ है.
२८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
तद्भिन्नत्वं सामान्यलक्षणे देयमेव अत्र समवायिकारणे प्रत्यासन्नं
द्विविधम् । आद्यं यथा । घटादिकं प्रति कपालसंयोगादिकम् ।
तत्र कार्येण घटेन सह कारणस्य कपालसंयोगस्यैकस्मिन्
कपाले प्रत्यासत्तिरस्ति । द्वितीयं यथा।घटरूपं प्रति कपालरूप-
मसमवायिकारणम् । तत्र घटरूपं प्रति कारणं घटस्तेन सह
कपालरूपस्यैकस्मिन् कपाले प्रत्यासत्तिरस्ति । तथाच
क्वचित् समवायसम्बन्धेन, क्वचित्स्वसमवायिसमवायसम्बन्धेनेति
फलितोऽर्थः ।
भाषा—आत्माके ज्ञानादि विशेषगुणोंको तो किसी कार्यके प्रतिभी असमवायि
कारणता नहींहै; इसलिये 'आत्मविशेष गुणभिन्नत्वे सति' का निवेश तो यावत्
कार्य्यके असमवायि कारणके लक्षणमें करना उचित है. ( अत्र ) इस प्रकरणमें
समवायिकारणरूप अधिकरणमें कार्य्यके साथ असमवायि कारणका समानाधि-
करणरूप सम्बन्ध दो प्रकारका है. प्रथम कार्य्यके साथ एकाधिकरणमें सम्बन्ध
रूपहै; दूसरा कारणके साथ एकाधिकरणमें सम्बन्धरूप है. प्रथम जैसे घटा-
दि कार्य्यके प्रति कपालद्वय संयोगादि असमवायि कारण है, तहां घटरूप कार्य्य
के साथ कपालसंयोगरूप कारणका कपालस्वरूप एकाधिकरणमें एकार्थसम-
वेतत्वरूप सम्बन्ध है. दूसरा जैसे घटके रूपके प्रति कपालका रूप असमवायि-
कारण है. तहां घटके रूपके प्रति कारण घटही है उस घटके साथ कपालस्वरूप
एकाधिकरणमें कपालके रूपका 'एकार्थ समवेतत्व' रूप सम्बन्ध है. इसरीति
से कारणताके नियामक दो सम्बन्ध हैं; कहीं समवायसम्बन्ध है. जैसे घटके प्रति
कपालसंयोग समवायसम्बन्धसे असमवायिकारण है और कहीं स्वसमवायि
समवेतत्वसम्बन्ध है. जैसे घटके रूपके प्रति कपालका रूप स्वसमवायिसमवेतत्व
सम्बन्धसे कारण है. यहां ' स्व ' पदसे कपालके रूपका ग्रहण है, उसका सम-
वायि कपाल है; उस कपालमें समवेत घट है. एतादृश सम्बन्धसे कपालके रूपको
घट पर मान कर घटके रूपके प्रति असमवायिकारणता भी बन सकती है. यह
पूर्व कथनका फलितार्थ है.
इत्थंच कार्यैकार्थकारणैकार्थान्तरप्रत्यासत्त्या समवायिकार-
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. २९
णे प्रत्यासन्नं कारणं ज्ञानादिभिन्नमसमवायिकारणमिति सामान्य-
लक्षणं पर्य्यवसन्नम्।आभ्यां समवायिकारणासमवायिकारणाभ्यां
परं भिन्नं कारणं तृतीयं निमित्तकारणमित्यर्थः ॥१६॥१७॥१८॥
भाषा-इस रीतिसे 'कार्य्यके साथ अथवा कारणके साथ समवायिकारणरूप
एकाधिकरणमें सम्बद्ध होकर जो ज्ञानादिकोंसे भिन्न कारण वही असमवायि कारण
है, यह सामान्यरूपसे असमवायिकारणका लक्षण नियत हुआ. समवायिकारण
असमवायिकारण दोनोंसे भिन्न जो कारण वह तीसरा निमित्त कारण है।१६।१७।१८
इदानीमन्यथासिद्धत्वमेव कियतां पदार्थानां तदाह, येनेत्यादिना-
भाषा-'येन' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार कार्य्यके प्रति अन्यथासिद्ध पदार्थोंको
कहता है-
येन सह पूर्वभावः-
भाषा-जिस रूपसे कारणकी कार्य्यसे प्रथम विद्यमानता है.
यत्कार्य्यं प्रति कारणस्य पूर्ववर्त्तिता येन रूपेण गृह्यते तत्कार्य्यं
प्रति तद्रूपमन्यथासिद्धमितिभावः। यथा घटं प्रति दण्डत्वमिति ।
भाषा-अर्थात् जिस कार्य्य के प्रति कारणकी पूर्व विद्यमानता जिसरूपसे ग्रहण
होती है उस कार्य्यके प्रति कारणका वह रूप अन्यथा सिद्ध है.जैसे घट कार्य्यके प्रति
दण्डकी कारणता दण्डत्वेन रूपेण है याते दण्डत्व अन्यथा सिद्ध है.
द्वितीयमन्यथासिद्धमाह, कारणमिति-
भाषा--'कारणं' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार दूसरी अन्यथासिद्धि दिखलाता है-
कारणमादाय वा यस्य ।
भाषा--अथवा कारणके ग्रहणपूर्वक जिसका ग्रहण हो वह अन्यथा सिद्ध है.
यस्य स्वातन्त्र्येणान्वयव्यतिरेकौ नस्तः किन्तु कारणमादायै-
वान्न्वयव्यतिरेकौ गृह्येते तदन्यथासिद्धम् । यथा दण्डरूपम् ।
अर्थात् जिसकी स्वतंत्ररूपसे कार्य्य के साथ नियतपूर्व्ववृत्तित्वरूपा व्याप्ति
न हो किन्तु मुख्य कारणके ग्रहणपूर्वक जिसका कार्य्यके साथ अन्वय व्यतिरेक
ग्रहण हो वह उस कार्य्यके प्रति अन्यथा सिद्ध है. ऐसा घटकार्य्यके प्रति दण्डका
रूप है.
तृतीयमाह, अन्यं प्रतीति-
३० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
भाषा-'अन्यं प्रति' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार तीसरी अन्यथासिद्धि दिखलाताहै--
अन्यं प्रति पूर्वभावे ज्ञाते यत्पूर्वभावविज्ञानम् ॥ १९ ॥
भाषा-दूसरेके प्रति पूर्वविद्यमानता जानकर जिसकी प्रकृत कार्यके प्रति पूर्व-
विद्यमानता प्रतीत हो ॥ १९ ॥
अन्यं प्रति पूर्ववर्तित्वं गृहीत्वैव यस्य यत्कार्यं प्रति पूर्ववर्तित्वं
गृह्यते तस्य तत्कार्यं प्रत्यन्यथासिद्धत्वम् । यथा घटादिकं
प्रत्याकाशस्य ।
भाषा--अर्थात् कार्यान्तरके प्रति पूर्वविद्यमानता ग्रहणपूर्वक जिसकी जिस
कार्यके प्रति पूर्वविद्यमानता ग्रहण हो वह उस कार्यके प्रति अन्यथा सिद्ध है. ऐसा
घटादि कार्यके प्रति आकाश है.
आकाशस्य हि घटादिकं प्रत्याकाशत्वेनैव कारणत्वं स्यात्,
आकाशत्वंच शब्दसमवायिकारणत्वम्। अतः शब्दं प्रति जनकत्वं
गृहीत्वैव घटादिकं प्रति जनकत्वं ग्राह्यमतस्तदन्यथासिद्धम् ।
शब्दाश्रयत्वेन कारणत्वे काऽन्यथासिद्धिरितिचेत्, पञ्चमीति
गृहाण । अथाकाशस्य शब्दं प्रति जनकत्वे किमवच्छेदकमिति-
चेत्, कवत्वादिकं विशेषपदार्थो वेति ॥ १९ ॥
भाषा-घटादिकार्यके प्रति आकाशको आकाशत्वेन रूपेण कारणता है. वह
आकाशशब्दका समवायिकारणस्वरूप है. इस रीतिसे आकाशमें शब्दके प्रति
कारणता ग्रहणपूर्वक घटादिकार्यके प्रति कारणता ग्रहण होती है; इससे आकाश
अन्यथा सिद्ध है. शंका-आकाशको शब्दका समवायिकारण न कहें, किन्तु
शब्दका आश्रयमात्र मानके घटादिकार्यके प्रति कारण माने तो कौन अन्यथा सिद्धि
होगी? समाधान-इसरीतिसे पञ्चमी मानने योग्य है. शंका-आकाशमें शब्दकी
जनकताका अवच्छेदक कौन है? समाधान-ककार वकारादि वर्णहैं. शंका-कका-
रादिवर्ण तो नाना तथा अनित्य हैं. उनको अवच्छेदक माननेमें गौरव होगा-
समाधान-अथवा विशेष पदार्थको आकाशमें शब्दकी जनकताका अवच्छेदक
मानना चाहिये ॥ १९ ॥
चतुर्थमन्यथासिद्धमाह , जनकं प्रतीति-
भाषा-'जनकं प्रति' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार चौथी अन्यथा सिद्धि दिखलाताहै-
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ३१
जनकंप्रति पूर्ववर्तितामपरिज्ञाय न यस्य गृह्यते ॥
भाषा-जिसकी कार्यसे पूर्वविद्यमानता कार्यके जनकको न जानकर न ग्रहण हो
किंतु जान कर हो वह उस कार्यके प्रति अन्यथा सिद्धहै.
यत्कार्यजनकं प्रति पूर्ववर्तित्वं गृहीत्वैव यस्य यत्कार्ये प्रति पूर्व-
वर्तित्वं गृह्यते तस्य तत्कार्यं प्रत्यन्यथासिद्धत्वम्,यथाकुलालपि-
तुर्घटं प्रति।तस्य च कुलालपितृत्वेन घटं प्रति जनकत्व एवान्य-
थासिद्धिः । कुलालत्वेन जनकत्वे त्विष्टापत्तिः, कुलालमात्रस्य
घटं प्रति जनकत्वात् ।
भाषा-अर्थात् घटरूपकार्यका जनक जो कुलाल उसके प्रति पूर्वविद्यमानता
ग्रहणपूर्वक कुलालके पिताकी घटकार्यके प्रति पूर्वविद्यमानता ग्रहण होती है.इससे
घटकार्यके प्रति कुलालका पिता अन्यथासिद्ध है. कुलालका पिताभी यदि 'कुलाल
पितृत्वेन' कारण माने तो अन्यथासिद्ध है और यदि कुलालत्वेन रूपेण कुलाल-
का पिताभी घटका जनक है तो वह कारणही है; क्योंकि कुलालमात्र घटका
जनक होताहै.
पञ्चममन्यथासिद्धमाह, अतिरिक्तमिति-
भाषा-'अतिरिक्तं' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार पञ्चमी अन्यथासिद्धि दिखलाताहै-
अतिरिक्तमथापि यद्भवेन्नियतावश्यकपूर्वभाविनः २०
भाषा-नियमसे कार्यके अवश्य पूर्व विद्यमान पदार्थोंसे अतिरिक्त यावत् पदार्थ
अन्यथासिद्ध हैं ॥ २० ॥
नियतावश्यकपूर्वभाविनोऽवश्यकॢप्तनियतपूर्ववर्तिन एव कार्य्य-
सम्भवे तद्भिन्नमन्यथासिद्धमित्यर्थः।अत एव प्रत्यक्षे महत्त्वं का-
रणमनेकद्रव्यत्वमन्यथासिद्धम् । तत्र हि महत्त्वमवश्यं कॢप्तं
तेनानेकद्रव्यत्वमन्यथासिद्धम् । नच वैपरीत्ये किं विनिगमक-
मिति वाच्यम्, महत्त्वत्वजातेः कारणतावच्छेदकत्वे लाघवात् २०
भाषा-कार्यके नियमसे प्रथम रहनेवाले कारणसमुदायसे कार्यका सम्भव
हो तो उससे भिन्न यावत् पदार्थ अन्यथासिद्ध हैं. ( अत एव ) आवश्यकॢप्त नियम
३२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
से प्रथम विद्यमानमें कारणता माननेहीसे प्रत्यक्षमें महत्त्व परिमाणको कारण और
अनेक द्रव्यत्वको अन्यथासिद्ध माना है। यहां अणुपरिमाण वालेसे भिन्न द्रव्यका
नाम अनेक द्रव्यत्व है। प्रत्यक्षमें महत्त्व अवश्यक्लृप्त है उससे अनेक द्रव्यत्व अन्य-
था सिद्ध है. शंका-यदि कोई अनेक द्रव्यत्वको प्रत्यक्षमें कारण तथा महत्त्वको
अन्यथा सिद्ध माने तो तुम्हारे पास एक पक्षके कहनेवाली युक्ति कौन है ?
समाधान-महत्त्वत्वजातिको कारणतावच्छेदक माननेमें शरीरकृत लाघव है॥२०॥
एते पञ्चान्यथासिद्धाः-
भाषा-ये पञ्च अन्यथा सिद्ध हैं.
दण्डत्वादिकमादिमम् ।
घटादौदण्डरूपादिद्वितीयमपि दर्शितम् ॥ २१ ॥
तृतीयं तु भवेद्व्योम कुलालजनकोऽपरः ।
पञ्चमोरासभादिःस्यात्-
भाषा-घटादि कार्यके प्रति प्रथम अन्यथा सिद्ध दण्डत्वादिक धर्म हैं. द्वितीय
दण्डके रूपादि हैं ॥ २१ ॥ तृतीय आकाश है. चतुर्थ कुलालपिता है. पञ्चम
रासभादि हैं ॥
रासभादिरिति। यद्यपि यत्किञ्चिद्घटव्यक्तिं प्रति रासभस्य निय-
तपूर्ववर्तित्वमस्ति, तथापि घटजातीयं प्रति सिद्धकारणभावै-
र्दण्डादिभिरेव तद्व्यक्तेरपिसम्भवे रासभोऽन्यथासिद्ध इति भावः।
भाषा-यद्यपि किसी एक घटव्यक्तिके पूर्वविद्यमानता गर्दभकोभी होसक्ती है
तथापि यावत् घटव्यक्तिके प्रति प्रसिद्ध कारणरूप दण्डादिकोंसेही उस व्यक्तिकाभी
निर्वाह होसक्ता है इसलिये रासभ सर्वथा अन्यथासिद्ध है ॥
एतेष्वावश्यकस्त्वसौ ॥ २२ ॥
भाषा-इन सबमें यह पञ्चम अन्यथासिद्ध तो आवश्यक है ॥ २२ ॥
एतेष्विति। एतेषु पञ्चस्वन्यथासिद्धेषु पञ्चमोऽन्यथासिद्ध आव-
श्यकः तेनैव परेषां चरितार्थत्वात् । तथाहि। दण्डादिभिरवश्य-
कॢप्तनियतपूर्ववर्तिभिरेव कार्य्यसम्भवे दण्डत्वादिकमन्यथा-
सिद्धम् ।
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ३३
इन पूर्वोक्त अन्यथासिद्ध पदार्थोंमें पञ्चम अन्यथा सिद्ध अवश्य माननीय है ।
और पूर्वले चारोंकी पञ्चममें चरितार्थताभी होसक्तीहै. उसकी रीति यह है
कि-कारणरूपसे अवश्य सम्बद्ध और घटादि कार्यके नियमसे प्रथम रहनेवाले
दण्डादिकोंसे ही यदि कार्यका सम्भव हो तो दण्डत्वादि सभी सर्वथा अन्यथा-
सिद्ध हैं.
न च वैपरीत्ये किं विनिगमकमिति वाच्यम्।दण्डत्वस्य कारणत्वे
दण्डघटितपरंपरायाः सम्बन्धत्वकल्पने गौरवात् । एवमन्येषाम-
प्यनेनैव चरितार्थत्वं सम्भवतीति ॥ २२ ॥
शंका-घटकार्यके प्रति 'दण्डत्व' को कारण तथा 'दण्ड' को अन्यथा-
सिद्ध मानें तो दण्डमें कारणताका नियामक कौन है? समाधान-दण्डत्वको कारण
माननेसे 'स्वाश्रयजन्य भ्रमीवत्ता' सम्बन्धसे कारणता माननी होगी और दण्डको
केवल 'स्वजन्य भ्रमीवत्ता' सम्बन्धसे कारणता है; इससे प्रथम सम्बन्धमें दण्ड
घटित परम्परा रूप सम्बन्ध कल्पनामें गौरव है. ऐसेही दण्डरूप, आकाश, कुलाल
के पिताकाभी पञ्चम अन्यथासिद्धमेंही संग्रह हो सकता है ॥ २२ ॥
समवायिकारणत्वं द्रव्यस्यैवेति विज्ञेयम् ॥
गुणकर्ममात्रवृत्तिज्ञेयमथाप्यसमवायिहेतुत्वम्॥२३॥
भाषा-समवायिकारण होना केवल द्रव्यहीका समान धर्म है. एवं असमवायि
कारण होना केवल गुण कर्महीका समान धर्म है ॥ २३ ॥
गुणकर्मेति।असमवायिकारणत्वं गुणकर्मभिन्नानां वैधर्म्यं न तु
गुणकर्मणोः साधर्म्यमित्यत्र तात्पर्यम् । अथवाऽसमवायिकारण
वृत्तिसत्ताभिन्नजातिमत्त्वं तदर्थः। तेन ज्ञानादीनामसमवायिकार
णत्वाविरहेऽपि न क्षतिः ॥ २३ ॥
भाषा-यहां गुणकर्मके समान धर्मके कथनका तात्पर्य नहीं किन्तु असमवायि
कारणता गुण कर्मसे भिन्न पदार्थोंका विपरीत धर्म है. इस कथनमें तात्पर्य है! अन्यथा
आत्मविशेष गुणोंमें इस लक्षणकी अव्याप्ति होगी; अथवा असमवायिकारणतावालेमें
वर्तनेवाली जो सत्ताभिन्न 'गुणत्व कर्मत्व' रूपा जातिः तादृश जातिमत्त्वही गुणकर्म
का समान धर्म है, ऐसा जातिघटित लक्षण करनेसे आत्मविशेष गुण ज्ञानादिकोंमें
असमवायिकारणताके न होनेसे भी अव्याप्ति नहीं है ॥ २३ ॥
३
३४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
अन्यत्र नित्यद्रव्येभ्य आश्रितत्वमिहोच्यते ॥
भाषा-नित्य द्रव्योंसे अन्यपदार्थोंका आश्रितत्वरूप समान धर्म्म है.
अन्यत्रेति। नित्यद्रव्याणि परमाण्वाकाशादीनि विहायाश्रितत्वं
साधर्म्यमित्यर्थः । आश्रितत्वंतु समवायादिसम्बन्धेन वृत्तिमत्त्वम् ।
विशेषणतया नित्यानामपि कालादौ वृत्तेः । कालिकसम्बन्धान्य-
सम्बन्धेनाऽवृत्तित्वमिति परमार्थः, तेन समवायेनावृत्तावपि न क्षतिः।
भाषा-पृथिवी आदि चारके परमाणु तथा आकाशादि पञ्च नित्यद्रव्य हैं. उनसे
भिन्न यावत् पदार्थोंका आश्रितत्वरूप समान धर्म्म है. यहां 'आश्रितत्व' शब्दका
अर्थ कालिकसम्बन्धसे भिन्न वृत्तिनियामक संयोगसमवायादि सम्बन्धसे वर्तना है.
कालिक विशेषणतारूप सम्बन्धसे तो नित्य पदार्थभी कालादिकोंमें रहते हैं.
कालिक सम्बन्धसे अन्यसम्बन्धसे आसमन्तात् वर्तनेवालेका 'आश्रितत्व'
रूप समान धर्म कहना वास्तव अर्थ है. ऐसे कथनसे समवायसे भिन्न सम्बन्धसे
वर्तनेवाले पदार्थोंमें पूर्व लक्षणकी अव्याप्ति नहीं है.
इदानीं द्रव्यस्यैव विशिष्यसाधर्म्यं वक्तुमारभते,क्षित्यादीनामिति-
भाषा-'क्षित्यादीनां' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार विशेषरूपसे द्रव्यहीका समान
धर्म कहता है-
क्षित्यादीनां नवानां तु द्रव्यत्वं गुणयोगिता ॥२४॥
क्षितिर्जलं तथा तेजः पवनो मन एव च ॥
परापरत्वमूर्तत्वक्रियावेगाश्रया अमी ॥ २५ ॥
भाषा-पृथिवीसे आदि लेके नव द्रव्योंका द्रव्यत्वरूप किंवा गुणवत्वरूप
समान धर्म्म है ॥ २४ ॥ पृथिवी, जल, अग्नि, वायु तथा मन इन पांचों
का परापरत्वरूप मूर्तत्वरूप तथा क्रियावेगाश्रयत्वरूप समान धर्म है ॥ २५ ॥
क्षितिर्जंलमिति । पृथिव्यप्तेजो वायुमनसां परत्वापरत्ववत्त्वं मूर्त-
त्वं क्रियावत्त्वं वेगवत्त्वं च साधर्म्यम् । न च यत्र घटादौ परत्वम-
परत्वं वा नोत्पन्नं तत्राव्याप्तिरिति वाच्यम् । परत्वादिसमानाधि-
करणद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वस्य विवक्षितत्वात्।मूर्तत्वमपकृष्ट-
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ३५
परिमाणवत्त्वम्, तच्च तेषामेव, गगनादिपरिमाणस्य कुतोऽप्यपकृ-
ष्टत्वाभावात् । पूर्ववत्कर्मवत्त्वं कर्मसमानाधिकरणद्रव्यत्व-
व्याप्यजातिमत्त्वं वेगवत्त्वं, वेगवद्वृत्तिद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वं
च बोध्यम् ॥ २४ ॥ २५ ॥
भाषा-पृथिवी,जल,अग्नि,वायु,मन इन पाँचोंका परत्वापरत्त्ववाले होना,मूर्त्त होना,
क्रिया वाले होना,तथा वेगवाले होना समान धर्म है.शंका-जहां जिन उत्पन्न विनष्टा
दिकार्योंमें परत्वापरत्त्व बुद्धि नहीं उत्पन्न हुई; वहां घटादि कार्योंमें परत्वापरत्त्वके
भी न उत्पन्न होनेसे अव्याप्ति होगी. समाधान-वहांभी परत्वादि समानाधिकरणमें
वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य पृथिवीत्व जलत्व तेजस्त्व वायुत्व मनस्त्व रूपा
जाति तादृश जातिमत्त्वकी विवक्षासे दोष नहीं है. मूर्त्तत्व नाम परिच्छिन्न अर्थात्
छोटे परिमाण वालेका है. वह परिच्छिन्न परिमाण पूर्वोक्त पाँचोंहीका है । आका-
शादिके परिमाणमें किसीकी अपेक्षासेभी छोटापना नहीं है । शेष लक्षणभी
पूर्ववत् जातिघटित करनेसे दोष नहीं है. अर्थात् ( कर्मवत्त्वं ) कर्मके समानाधि
करणमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य 'पृथिवीत्व' आदि जाति, तादृश जाति-
मत्त्व पृथिवी आदि पांचोंमें सिद्धहै.ऐसेही वेगवालेमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य
'पृथिवित्व' आदि जाति, तादृश जातिमत्ता पृथिवी आदि पाँचोंमें सिद्ध है २४॥२५॥
कालखात्मदिशां सर्वगतत्वं परमं महत् ॥
भाषा-काल आकाश आत्मा दिशा इन चारोंका सर्व व्यापकता तथा परममहत्
परिमाणवत्ता समान धर्म है.
कालेति।कालाकाशात्मदिशां सर्वगतत्वं सर्वमूर्त्तसंयोगित्वं परम-
महत्त्वं च, परममहत्त्वत्वं जातिविशेषः अपकर्षानाश्रय-
परिमाणत्वं वा ।
भाषा-जिसका यावत् मूर्त्तपदार्थके साथ संयोग हो वह व्यापक होता है ऐसेही
' परममहत्त्वत्व ' जातिविशेष युक्त परममहत् परिमाण होताहै. अथवा मूर्त्तोंमें न
वर्तनेवाला जो परिमाण तादृश परिमाणवत्ता पूर्वोक्त चारोंका समान धर्म है.
क्षित्यादिपञ्चभूतानि चत्वारि स्पर्शवन्ति हि ॥ २६ ॥
भाषा-पृथिवी जल अग्नि वायु आकाश, इन पाँचोंका भूतत्वरूप समान धर्म है.
पृथिवी आदि चारोंका समवायेन स्पर्शवत्ता समान धर्म है ॥ २६ ॥
३६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
क्षित्यादीति । पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशानां भूतत्वम् । तच्च बहिरि-
न्द्रियग्राह्यविशेषगुणवत्त्वम्। अत्र ग्राह्यत्वं लौकिंकप्रत्यक्षस्वरूप-
योग्यत्वं बोध्यम्।तेन ज्ञातो घट इति प्रत्यक्षे ज्ञानस्याप्युपनीत-
भानविषयत्वात्,तद्वत्यात्मनि नातिप्रसङ्गः।न वा प्रत्यक्षाविषय-
रूपादिमति परमाण्वादावव्याप्तिः,तस्यापि स्वरूपयोग्यत्वात् ।
महत्त्वलक्षणकारणान्तराऽसन्निधानाच्च न प्रत्यक्षम् । अथैवा
ऽऽत्मावृत्तिविशेषगुणवत्त्वं तत्त्वम् । चत्वारीति । पृथिव्यप्तेजो
वायूनां स्पर्शवत्त्वम् ।
भाषा-भूत नाम नेत्रादि बाह्य इन्द्रियग्राह्य रूपादि विशेषगुण वालोंकाहै.इस प्रसङ्ग-
में ग्राह्य पदसे लौकिक प्रत्यक्ष स्वरूप योग्यताका ग्रहण है. अन्यथा 'ज्ञातो घटः'
इस ज्ञानमें प्रकारीभूत जो ज्ञान उस ज्ञानकाभी ' चक्षुःसंयुक्तमनःसंयुक्तात्मसम-
वेतज्ञानविषयत्व' सम्बन्धसे घटअंशमें प्रत्यक्ष हो सकता है. एवं उस ज्ञान
वाले आत्मामें अतिव्याप्ति होगी; परन्तु पूर्वोक्त सम्बन्धसे ज्ञानका लौकिक प्रत्यक्ष
नहीं है किन्तु अलौकिक है; याते आत्मामें अतिव्याप्तिरूप दोष नहीं. स्वरूप
योग्यताके निवेश करनेसे प्रत्यक्षके अविषय तथा रूपादि युक्त परमाणु आदिमेंभी
अव्याप्ति नहीं है. परमाणुमें तथा द्वयणुकमें प्रत्यक्षकी योग्यता तो है परन्तु महत्त्व-
रूप कारणान्तरके न होनेसे परमाणुका तथा द्वयणुकका प्रत्यक्ष नहीं होता. अथवा
आत्मामें न वर्तनेवाले जो विशेषगुण, तादृश विशेषगुणवाले की 'भूत' संज्ञा है. पृथ्वी,
जल, तेज, तथा वायु इन चारोंका स्पर्शवाले होना समान धर्म है॥ २६ ॥
द्रव्यारम्भश्चतुर्षु स्यात्-
भाषा-द्रव्यान्तरके आरम्भक होनाभी पृथिवी आदि चारोंका समान धर्म है.
द्रव्यारम्भेति । पृथिव्यप्तेजोवायुषु चतुर्षु द्रव्यारम्भकत्वम् ।
( १ ) वक्ष्यमाणसंयोगादि षड्विधसन्निकर्षसे लौकिक प्रत्यक्ष होता है उनसे भिन्न
यावत् सम्बन्धोंसे प्रत्यक्ष योग्य पदार्थोंका अलौकिक प्रत्यक्ष होता है । एवं ' ज्ञातो घटः '
यह ज्ञान अनुव्यवसाय रूप मानसिक है । विशेष्यरूपसे घट तथा विशेषणरूपसे घटका
व्यवसायात्मक ज्ञान इसके विषय है । परन्तु अलौकिक सम्बन्धसे है याते ज्ञानवाले
आत्मामें दोष नहीं ॥
( २ ) नेत्र इन्द्रियादिगत रूपादि विशेष गुणोंको अनुद्भूत होनेसे बाह्य इन्द्रियसे ग्रहणकी
अयोग्यता है । यान्ते भूतत्व लक्षणकी अव्याप्तिकी शंकासे कहा है-अथवेति ।
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ३७
नच द्रव्यानाारम्भके घटादावव्याप्तिः । द्रव्यसमवायिकारणवृ-
त्तिद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वस्य विवक्षितत्वात् ।
भाषा-पृथिवी जल अग्नि वायु ये चारों समवायि कारण होकर द्रव्यान्तरके आर-
म्भक हैं. शंका-घटरूप पृथिवीमें द्रव्यान्तरारम्भकता नहीं है; अव्याप्ति होगी. समा०-
द्रव्यके समवायिकारणमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य 'पृथिवीत्व' आदि जाति,
तादृश जातिमत्ता यावत् घटादिकार्योंमें सिद्ध है. एवं अव्याप्तिरूप दोष नहीं है.
- अथाकाशशरीरिणाम् ।
अव्याप्यवृत्तिः क्षणिको विशेषगुण इष्यते ॥ २७ ॥
भाषा-आकाश तथा जीवात्माका अव्याप्य वृत्ति क्षणिक विशेष गुणवत्ता समान
धर्म है ॥ २७ ॥
आकाशशरीरिणामिति । आकाशात्मनामव्याप्यवृत्तिक्षणिकवि-
शेषगुणवत्त्वम्।आकाशस्य विशेषगुणः शब्दः,स चाव्याप्यवृत्ति-
र्यदा किञ्चिदवच्छेदेन शब्द उत्पद्यते,तदाऽन्यावच्छेदेन तदभाव-
स्यापि सत्त्वात्।क्षणिकत्वं च तृतीयक्षणवृत्तिध्वंसप्रतियोगित्वम्।
योग्यविभुविशेषगुणानां स्वोत्तरवर्तिगुणनाश्यत्वात् प्रथमशब्द-
स्य द्वितीयशब्देन नाशः।एवं ज्ञानादीनामपि ज्ञानादिकं ह्यात्म-
नि विभौ शरीराद्यवच्छेदेनोत्पद्यते घटाद्यवच्छेदेन तदभावो
ऽस्त्येव । एवं ज्ञानादिकमपि क्षणद्वयावस्थाथि । इत्थंचाव्याप्य-
वृत्तिविशेषगुणवत्त्वं चार्थः । पृथिव्यादौ रूपादिर्विशेषगुणो
ऽस्तीत्यतोऽव्याप्यवृत्तिरित्युक्तम्।पृथिव्यादावव्याप्यवृत्तिः संयो-
गादिरस्तीत्यतो विशेषगुण इत्युक्तम्॥नच रूपादीनामपि कदा-
चित्तृतीयक्षणे नाशसम्भवात् । क्षणिकविशेषगुणवत्त्वं क्षित्यादा
वतिव्याप्तमिति वाच्यम् ।
भाषा-आकाशका तथा जीवात्माओंका अव्याप्यवृत्ति जो क्षणिक विशेषगुण,
तादृश विशेषगुणवत्ता समान धर्म है. आकाशका विशेषगुण शब्द है. वह अव्याप्य
( १ ) जिस वस्तुका ध्वंस होय वही वस्तु ध्वंसकी प्रतियोगी कही जाती है.
३८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
वृत्ति इस रीतिसे है कि-जिस कालमें भेर्याद्यवच्छेदेन शब्द उत्पन्न होता है, उसी
कालमें घटाद्यवच्छेदेन शब्दके अभावकीभी प्रतीति होती है. क्षणिक नाम
तीसरे क्षणमें नाश होनेवालेका है. प्रत्यक्षके योग्य जो आकाशादि विभुद्रव्योंके
शब्दादि विशेष गुण, उनका अपनेसे पीछे उत्पन्न होनेवाले विशेष गुणोंसे नाश
होता है. इस रीतिसे प्रथमशब्दका द्वितीयशब्द नाशक है. ऐसेही प्रथमज्ञान
इच्छादिकोंकेभी द्वितीयज्ञान इच्छादिक विनाशक हैं. व्यापक आत्मामें ज्ञान
इच्छादिक शरीरावच्छेदेन उत्पन्न होते हैं और घटाद्यवच्छेदेन ज्ञानादिकोंका
अभावभी सिद्ध है. इस रीतिसे ज्ञानादिकभी दो क्षण स्थित रहते हैं. इस पूर्व
कथनसे 'अव्याप्यवृत्ति विशेषगुणवत्ता' अथवा 'क्षणिक विशेषगुणवत्ता' आका-
शका तथा जीवात्माओंका समान धर्म सिद्ध हुआ. रूपादि विशेष गुण पृथिवी
आदिकोंमेंभी हैं, उनसे प्रथम लक्षणकी अतिव्याप्तिके वारणार्थ 'अव्याप्यवृत्ति'
विशेष गुणका विशेषण दिया. अव्याप्यवृत्ति संयोगादिकभी पृथिवी आदिकोंमें
रहते हैं. उनसे प्रथम लक्षणकी अतिव्याप्ति वारणार्थ विशेषगुणरूप विशेष्यका
निवेश किया। रूपादि अव्याप्य वृत्ति नहीं हैं तथा संयोगादि विशेष गुण नहीं हैं-
एवं उभयथा पृथिवीमें अतिव्याप्ति नहीं हैं. शंका-किसी एक कालमें रूपादिकों
का भी तीसरे क्षणमें नाश हो सकता है. ऐसे 'क्षणिक विशेष गुणवत्त्व' इस
द्वितीय लक्षणकी पृथिवी आदिकोंम अतिव्याप्ति होगी.
चतुःक्षणवृत्तिजन्यावृत्तिजातिमद्विशेषगुणवत्त्वस्य विवक्षित-
त्वात्, अपेक्षाबुद्धिः क्षणत्रयं तिष्ठति, क्षणचतुष्टयं तु किमपि
जन्यज्ञानादिकं न तिष्ठति, रूपत्वादिकं तु क्षणचतुष्टयस्थायि-
न्यपि रूपादौ वर्तत इति व्युदासः ईश्वरज्ञानस्य चतुःक्षणवृत्ति-
त्वाज्जन्येत्युक्तम्। यद्याकाशजीवात्मनोः साधर्म्यं तदा जन्ये-
ति न देयम्, द्वेषत्वादिकमादाय लक्षणसमन्वयात्, परममहत्त्व-
स्य तादृशगुणत्वाच्चतुर्थक्षणे द्वित्वादीनामपि नाशाभ्युपगमात्
( १ ) चतुःक्षणशब्द अधिक कालका उपलक्षक है.
( २ ) यदि जन्य पदका न निवेश किया जाय तो 'परममहत्त्वत्व' रूपजातिको चार
क्षणमें रहनेवाले परम महत्त्व परिमाणमें वृत्तित्त्व होनेसे परममहत्त्वपरिमाणको लेकर तिस
वालेकालादिकोंमें तो अतिव्याप्ति नहीं है याते विशेष पदकी सफलतार्थ ग्रन्थान्तर कहताहै
चतुर्थक्षणेद्वित्वादीनामिति ।
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ३९
द्वित्वादीनामपि तथात्वात् तद्वारणाय विशेषेति । त्रिक्षणवृत्तित्वं
वा वाच्यम् । द्वेषत्वादिकमादायात्मनि लक्षणसमन्वयः ॥२७॥
समाधान-चार क्षणमें वर्तनेवाले जो घट पटादि तथा रूप रसादिजन्य
उनमें न वर्तनेवाली जो 'शब्दत्व ज्ञानत्व' रूपा जाति तादृश जातिमद्विशेष
गुणवत्ता शब्दमें तथा ज्ञानमें विवक्षित है. याते पूर्वोक्त दोष नहीं । अपेक्षा
बुद्धिरूप ज्ञानभी तीन क्षणमात्र स्थिर रहता है । चतुर्थ क्षणमें अपेक्षा बुद्धिका
नाश होता है, चार क्षणतक स्थिर तो जन्यज्ञानादिक कोई भी नहीं रहते ।
और रूपत्वादिक जाति तो चार क्षण उपलक्षित बहुत कालतक रहनेवाले
रूपादिकोंमें रहती है इसलिये उस रूपत्वादि जातिका व्युदास हुआ अर्थात्
वारण हुआ. ईश्वर ज्ञानभी चार क्षण उपलक्षित नित्य विद्यमान है उसके
संग्रहार्थ 'जन्य' पदका निवेश किया. यदि आकाश तथा जीवात्माकाही समान
धर्म कहनेका तात्पर्य्य होय तो 'जन्य' पदके निवेशका कुछ प्रयोजन नहीं अर्थात्
न निवेश करना चाहिये. ज्ञानत्वजातिके स्थानपर केवल जीवात्माके गुणोंमें रहने
वाली (द्वेषत्वादि) जातिका निवेश करनेसे जातिघटित लक्षण संगत होगा ।
आकाश कालादिकोंका परम महत्त्व परिमाणभी चार क्षणमें वर्तनेवाले जन्य
पदार्थोंमें वर्तनेवाली जो 'परम महत्त्व' रूपा जातिः तादृश जातिमत् है । उससे
अति प्रसक्तिवारणार्थ तैसे चतुर्थक्षणमें द्वित्वादिकोंका नाश आचार्योंने माना है.
द्वित्वादिकोंकोभी तादृश जातिमद्गुण होनेसे उनसे अति प्रसक्तिवारणार्थ 'विशेष'
पदार्थ गुणका विशेषण कहा । परममहत्त्व परिमाण तथा द्वित्वादि विशेष गुण नहीं
हैं । किन्तु सामान्य गुण हैं इस लिये तादृश गुणवाले काल घटादिकोंमें आत्माकाश
लक्षणकी अतिव्याप्ति नहीं है. अथवा चतुःक्षणके स्थानपर 'त्रिक्षणवृत्ति' कहनेसे
पूर्वोक्त दोष नहीं. ज्ञानत्वजातिके स्थानपर द्वेषत्वादिक जातिका निवेश करनेसे
आत्मामें लक्षण समन्वय होगा ॥ २७ ॥
रूपद्रवत्वप्रत्यक्षयोगिनः प्रथमाश्रयः ॥
भाषा-रूपवत्ता द्रवत्ववत्ता प्रत्यक्षविषयता प्रथम तीनका समान धर्म है.
रूपेति । पृथिव्यप्तेजसां रूपवत्त्वं, द्रवत्ववत्त्वं, प्रत्यक्षविषयत्वं
चेत्यर्थः । नच चक्षुरादीनां भर्जनकपालस्थवह्नेरूष्मणश्च रूप-
वत्त्वे किं मानमिति वाच्यम्। तत्रापि तेजस्त्वेन रूपानुमानात् ।
एवं वाय्वानीतपृथिवीजलतेजोभागानामपि पृथिवीत्वादिना
४० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
रूपानुमानं बोध्यम्। न च घटादौ द्रुतसुवर्णादिभिन्ने तेजसि च द्रव-
त्ववत्त्वमव्याप्तमिति वाच्यम्। द्रवत्ववद्वृत्तिद्रव्यत्वव्याप्यजाति-
मत्वस्य विवक्षितत्वात् । घृतजतुप्रभृतिषु पृथिवीषु जलेषु
द्रुतसुवर्णादौ तेजसि च द्रवत्वसत्त्वात्, तत्र च पृथिवीत्वादिसत्त्वा-
त्तदादाय सर्वत्र लक्षणसमन्वयः। न च प्रत्यक्षविषयत्वं परमाण्वा-
दावव्याप्तम्, अतिव्याप्तं च रूपादाविति वाच्यम्। चाक्षुषप्रत्यक्ष-
विषयवृत्तिद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वस्य विवक्षितत्वात्। आत्मन्य-
तिव्याप्तिवारणाय चाक्षुषेति।
भाषा-पृथिवी जल अग्नि इन तीनोंका रूपवत्ता द्रवत्ववत्ता प्रत्यक्ष विषयता
समान धर्म्म है. शंका-नेत्र घ्राणादि इन्द्रियोंके तथा भर्जन कपालस्थ रेतेमें होने
वाले अग्निके तथा तैजस भाफके रूपवाले होनेमें क्या प्रमाण है ? समाधान-
इन सबको पक्ष बनाकर तेजस्त्वादिरूप हेतुओंसे रूपवत्त्वका अनुमान होसकता है; यथा
"नेत्रेन्द्रियं रूपवत् तेजस्त्वात्" इत्यादि. ऐसे वायुवेगसे देशान्तरसे आयेहुए पृथिवी
जल तथा अग्निके भागोंमेंभी "पृथिवीत्वात्" इत्यादि हेतुओंसे रूपका अनुमान
होसकता है. शंका-घटादिरूप पृथिवीमें तथा द्रुत सुवर्णादिसे भिन्न तेजमें द्रवत्वव-
त्त्वके न होनेसे अव्याप्ति होगी. समा०-वहांभी द्रवत्ववद्वृत्ति जो द्रव्यत्वकी
व्याप्य 'पृथिवीत्वादि' जाति तादृश जातिमत्त्व अपेक्षित होनेसे दोष नहीं है.
घृतलाक्षादि रूप पृथिवीमें जलमें तथा द्रुत सुवर्णादिरूप तेजमें द्रवत्वके विद्यमान
होनेसे तथा इनमें पृथिवीत्वादि रूपजातिके होनेसे सर्वत्र पूर्वोक्त जातिघटित लक्षण
समन्वय होसकता है. शंका-पूर्वोक्त प्रत्यक्ष विषयतारूप समानधर्म्म पृथिवी
आदिके परमाणुओंमें अव्याप्त है तथा रूपादिकोंमें अतिव्याप्त है. समाधान-
चाक्षुष प्रत्यक्षके विषयमें रहनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य 'पृथिवीत्वादि' जाति
तादृशजातिमत्त्वके वहांभी अपेक्षित होनेसे दोष नहीं है. आत्मामें अतिव्याप्तिके
वारणार्थ 'चाक्षुष' पदका निवेश है.
गुरुणी द्वे रसवती-
भाषा-बोझेवाले अर्थात् भारी तथा रसवाले दो पदार्थ हैं.
गुरुणी इति। गुरुत्ववत्त्वं च पृथिवीजलयोरित्यर्थः। न च घ्राणेन्द्रि-
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ४१
यादीनां वाय्वानीतपार्थिवादिभागानां च रसादिमत्त्वे किंमानमि-
तिवाच्यम् । तत्रापि पृथिवीत्वादिना तदनुमानात् ।
भाषा--गुरुत्ववत्ता तथा रसवत्ता पृथिवीजलका समान धर्म है. शंका-घ्राणादि
इन्द्रियोंके तथा वायुआनीत पार्थिवादि भागोंके रसवाले होनेमें क्या प्रमाण है?
समाधान-वहांभी "पृथिवीत्वात्" इत्यादि हेतुओंसे रसका अनुमान हो सक्ताहै.
- द्वयोर्नैमित्तिको द्रवः ॥ २८ ॥
द्वयोरिति पृथिवीतेजसोरित्यर्थः ।
भाषा-पृथिवी, तेज, इन दोनोंका नैमित्तिक द्रवणरूप समान धर्म है ॥ २८ ॥
न च नैमित्तिकद्रवत्ववत्त्वं घटादौ वह्न्यादौ चाव्याप्तमिति वाच्य-
म् । नैमित्तिकद्रवत्वसमानाधिकरणद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वस्य
विवक्षितत्वात् ॥ २८ ॥
शंका-नैमित्तिक द्रवत्ववत्ता घटादि पृथिवीमें तथा वह्निरूप तेजमें अव्याप्त है.
समा०-वहांभी नैमित्तिक द्रवत्वके समानाधिकरणमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी
व्याप्य ( पृथिवीत्वादि ) जातिः तादृश जातिमत्त्व अपेक्षित होनेसे दोष नहीं है॥२८॥
आत्मानो भूतवर्गाश्च विशेषगुणयोगिनः ॥
यदुक्तं यस्य साधर्म्यं वैधर्म्यमितरस्य तत् ॥ २९ ॥
भाषा-जीवात्मा तथा पञ्चभूत विशेष गुणोंवाले हैं. हमने जो जिसका समान
धर्म कहा वह इतरका विरुद्ध धर्म जानना चाहिये ॥ २९ ॥
आत्मान इति । पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशात्मनां विशेषगुणवत्त्व
मित्यर्थः ॥ यदुक्तमिति । ज्ञेयत्वादिकं विहायेति बोध्यम्। तत्तु न
कस्यापि वैधर्म्यं केवलान्वयित्वात् ॥ २९ ॥
भाषा-ज्ञेयत्व प्रमेयत्व वाच्यत्व अभिधेयत्व इन चारों धर्मोंको छोड़कर जो
जिसका समान धर्म कहा वह दूसरेका विपरीत धर्म है और ज्ञेयत्वादि धर्म तो
केवलान्वयी हैं. याते किसी पदार्थकेभी विरुद्ध धर्म नहीं हैं ॥ २९ ॥
स्पर्शादयोऽष्टौ वेगाख्यसंस्कारो मरुतो गुणाः ॥
अष्टौ स्पर्शादयो रूपं द्रवो वेगश्च तेजसि ॥ ३० ॥
४२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
भाषा-स्पर्शादि आठ तथा वेगाख्य संस्कार ये नव वायुके गुण हैं. स्पर्शादि
आठ रूप द्रव और वेग ये एकादश तेजके गुण हैं ॥ ३० ॥
स्पर्शादयोऽष्टौ वेगश्च गुरुत्वं च द्रवत्वकम् ॥
रूपं रसस्तथा स्नेहो वारिण्येते चतुर्दश ॥ ३१ ॥
भाषा-स्पर्शादि आठ वेग गुरुत्व द्रवत्व रूप रस तथा स्नेह ये चतुर्दश जलके
गुण हैं ॥ ३१ ॥
स्नेहहीना गन्धयुताः क्षितावेते चतुर्दश ॥
बुद्ध्यादिषट्कं संख्यादि पञ्चकं भावना तथा ॥३२॥
धर्म्मा धर्म्मौ गुणा एते आत्मनः स्युश्चतुर्दश ॥
संख्यादि पञ्चकं कालदिशोः शब्दश्च ते च खे ॥३३॥
तेच संख्यादयः पञ्च खे आकाशे ।
जलके गुणोंमेंसे 'स्नेह' को निकाल गन्धको डालकर गिने तो वेही १४ पृथिवीके
गुण हैं. बुद्ध्यादि छः, तथा संख्यादि पञ्च, भावनाख्य संस्कार, तथा धर्म्माधर्म्म ये
१४ गुण जीवात्माके हैं. संख्यादि पञ्च कालके तथा दिशाके गुण हैं। संख्यादि
पञ्च तथा शब्द ये छः आकाशके गुण हैं ॥ ३२ ॥ ३३ ॥
संख्यादयः पञ्च बुद्धिरिच्छायतोऽपि चेश्वरे ॥
परत्वापरत्वे संख्याद्याः पञ्च वेगश्च मानसे ॥३४॥
भाषा-संख्यादि पञ्च बुद्धि इच्छा यत्न ये आठ ईश्वरके गुण हैं. परत्व अपरत्व
संख्यादि पञ्च तथा वेग ये आठ मनके गुण हैं ॥ ३४ ॥
साधर्म्यवैधर्म्ये निरूप्य संप्रति प्रत्येकं पृथिव्यादिकं निरूपयति,
तत्र क्षितिरित्यादिना-
भाषा-समान धर्म विपरीत धर्मोंके निरूपणानन्तर ' तत्र क्षितिः ' इत्यादि
ग्रन्थसे मूलकार प्रत्येक पृथिवी आदिका निरूपण करता है--
तत्र क्षितिर्गन्धहेतुः-
गन्धहेतुरिति । गन्धसमवायिकारणमित्यर्थः ।
भाषा--उन नवद्रव्योंके मध्यमें गन्धसमवायिकारणका नाम पृथिवी है,
यद्यपि गन्धवत्त्वमात्रं लक्षणमुचितं तथापि पृथिवीत्वजातौ
प्रमाणोपन्यासाय कारणत्वमुपन्यस्तम् । तथाहि । पृथिवीत्वं हि
Here is the line-by-line transcription of the page into Markdown:
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ४३
गन्धसमवायिकारणतावच्छेदकतया सिद्धयति, अन्यथा गन्ध-
त्वावच्छिन्नस्याकास्मिकत्वापत्तेः । नच पाषाणादौ गन्धाभावा-
द्गन्धवत्त्वमव्याप्तमिति वाच्यम् । तत्रापि गन्धसत्त्वात् । अनुपल्-
ब्धिस्त्वनुत्कटत्वेनाप्युपपद्यते, कथमन्यथा तद्भस्मनि गन्ध
उपलभ्यते । भस्मनो हि पाषाणध्वंसजन्यत्वात् पाषाणोपादानो-
पादेयत्वं सिद्धयति । यद्द्रव्यं यद्द्रव्यध्वंसजन्यं तत्तदुपादानो-
पादेयमिति व्याप्तेः । दृष्टं चैतत्-खण्डपटे महापटनध्वंसजन्ये ।
भाषा-यद्यपि पृथिवीका लक्षण गन्धवत्त्वमात्र कहना उचित है तथापि
लक्षणमें समवायिकारणताका निवेश ' पृथिवीत्व ' जातिमें प्रमाण उपन्यासके
लिये जानना चाहिये ( तथाहि ) उसकी रीति यह है कि-गन्धकी जो समवायि
[४४] न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
भाषा--ऐसेही पाषाणके परमाणुओंको पृथिवी होनेसे उनसे उत्पन्न होनेवाला
पाषाणभी पृथिवीस्वरूपही है । एवं पाषाणको गन्धवाला होनेमेंभी कोई
बाधक नहीं है ॥
-नानारूपवती मता ।
भाषा--तथा वह पृथिवी नानाविध रूपवाली है.
नानारूपेति । शुक्लनीलादिभेदेन नानाजातीयं रूपं पृथिव्यामेव
वर्तते,नतु जलादौ तत्रशुक्लस्यैव सत्त्वात् पृथिव्यां त्वेकस्मिन्नपि
धर्मिणि पाकवशेन नानारूपसम्भवात् । नच यत्र नानारूपं नो-
त्पन्नं तत्राव्याप्तिः । रूपद्वयवद्वृत्तिद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वस्य
रूपनाशवद्वृत्तिद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वस्य वा वाच्यत्वात् ।
वैशेषिकनये पृथिवीपरमाणौ रूपनाशस्य रूपान्तरस्य च
सत्त्वात् । न्यायनये घटादावपि तत्सत्त्वाल्लक्षणसमन्वयः ।
भाषा-शुक्ल नीलादि भेदसे सात प्रकारका रूप पृथिवीहीमें रहता है; जलादिमें
नहीं रहता. जलादिमें तो केवल शुक्लरूपही रहता है और पृथिवीमें तो एक व्यक्ति
( घटादि ) मेंभी अग्निसंयोगसे नानारूपका सम्भव होता है. शंका-जिस पृथिवीमें
नानारूप उत्पन्न नहीं हुआ उसमें अव्याप्ति होगी. समाधान-वहांभी रूपद्वयवाले
में वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य ( पृथिवीत्व ) रूपजाति तादृश जातिमत्त्व
अपेक्षित है. अथवा रूप नाशवालेमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य ' पृथिवीत्व '
रूपजातिः तादृशजातिमत्त्व अपेक्षित होनेसे उक्त दोष नहीं है. वैशेषिकमतमें पृथिवी
परमाणुओंमें रूपका नाश तथा रूपान्तरकी उत्पत्ति मानी है और न्यायमतमें तो
घटादिकोंहींमें रूपको नाश तथा रूपान्तरकी उत्पत्ति मानी है याते उभयमतमें
पूर्वोक्त लक्षणमें दोष नहीं है.
षड्विधस्तु रसस्तत्र-
भाषा-षट् प्रकारका उस पृथिवीमें रस है.
षड्विधइति । मधुरकटुकाषायादिभेदेन यःषड्विधो रसः सपृथिव्यामेव,जले च मधुर एव रसः।अत्रापि पूर्ववद्रसद्वयवद्वृत्तिद्र-
व्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वं लक्षणार्थोऽवसेयः ।
१ प्रथम लक्षण अपेक्षा बुद्धिविशेष विषयत्वरूपद्वित्व घटित होनेसे गौरवयुक्त है या...
' रूपनाश ' इत्यादिसे द्वितीय कहा है.
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ४५
भाषा-मधुर कटु काषायादि भेदसे षट् प्रकारका रस पृथिवीहीमें रहता है;
जलमें तो केवल एक मधुररस है. यहांभी जिस पृथिवीमें नानाविध रस उत्पन्न
नहीं हुआ, उसमें अव्याप्ति वारणार्थ रसद्वयवालेमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य
‘पृथिवीत्व’ रूपा जाति तादृश जातिमत्त्वरूप लक्षणार्थ जानना उचित है.
-- गन्धस्तु द्विविधो मतः ॥ ३५ ॥
भाषा-दोप्रकारका उस पृथिवीमें गन्ध है ॥ ३५ ॥
गन्धस्त्विति। द्विविध इति वस्तुस्थितिमात्रं न तु द्विविधगन्धवत्त्वं
लक्षणं द्विविधत्वस्य व्यर्थत्वात् । द्वैविध्यं च सौरभासौरभभेदेन
बोध्यम् ॥ ३६ ॥
भाषा-पृथिवीमें गन्धका द्विविध कहना केवल वस्तुकी स्थितिमात्रका बोधक है.
द्विविध गन्धवत्त्व मात्र लक्षण नहीं है. किन्तु केवल 'गन्धवत्त्व' मात्रही लक्षण सम्यक्
है. 'द्विविध' पद निष्फल है. सुरभि असुरभि भेदसे वह गन्ध दोप्रकारका जानना
चाहिये ॥ ३५ ॥
स्पर्शस्तस्यास्तु विज्ञेयो ह्यनुष्णाशीतपाकजः ।
स्पर्श इति । तस्याः पृथिव्याः ।
भाषा--अनुष्णाशीतपाकज स्पर्शभी पृथिवीकाही जानना योग्य है.
अनुष्णाशीतस्पर्शवत्त्वं वायावपि वर्तत इत्युक्तं पाकज इति ।
इत्थञ्च पृथिव्याः स्पर्शोऽनुष्णाशीत इति ज्ञापनार्थं तदुक्तम् ।
लक्षणं तु पाकजस्पर्शवत्त्वमात्रम् । अधिकस्य वैयर्थ्यात् ।
यद्यपि पाकजस्पर्शः पटादौ नास्ति, तथापि पाकजस्पर्शवद्वृ-
त्तिद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वमर्थो बोध्यः ।
भाषा--अनुष्णाशीत स्पर्शवत्ता वायुमेंभी है उसके वारणार्थ 'पाकज' पदका निवेश
किया. वहस्पर्श वायुमें पाकज नहींहै. एवं यह पूर्व ग्रन्थ पृथिवीके लक्षणके अभिप्रायसे
नहीं कहा किन्तु पृथिवीका स्पर्श अनुष्णाशीत है यह बोधनार्थ कहा है. पृथिवीका
लक्षण तो 'पाकज स्पर्शवत्त्व' मात्रही साधु है; अधिक कथन निष्फल है. यद्यपि पाकज
स्पर्शवत्ता पटादिरूप पृथिवीमें नहीं है याते उक्त लक्षणकी अव्याप्ति होगी तथापि
पाकज स्पर्शवालेमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य 'पृथिवीत्व' रूपा जाति तादृश
'जातिमत्त्व' पदादि रूप पृथिवीमेंभी प्रसिद्ध है. एवं जातिघटित लक्षण करनेसे
कहीं दोष नहीं.