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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २३९
होता है ४। उससे पीछे पंचमक्षणमें रक्तपरमाणुका परमाणुअन्तरके साथ संयोग होता
है५। उससे पीछे छठे क्षणमें द्व्यणुकादिद्रव्यकी उत्पत्ति होतीहै ६। उससे पीछे सातवें
क्षणमें उस द्रव्यमें रक्तादि गुणोंकी उत्पत्ति होतीहै. ७ । इति सप्तक्षणाप्रक्रिया ॥
अथाष्टक्षणा—एवं रक्तोत्पत्तिसमकालं परमाण्वन्तरे कर्मचिन्त-
नादष्टक्षणा ।
अथ अष्टक्षणा—एवं यदि रक्तादिगुणोंकी उत्पत्तिकालमें पूर्वोक्त रीतिसे परमाणु
अन्तरमें कर्मका चिन्तन करें तो अष्टक्षणमें द्रव्य पुनः रूपादि गुणयुक्त होताहै.
तथाहि । परमाणौ कर्म, ततः परमाण्वन्तरविभागः, तत आर-
म्भकसंयोगनाशः, ततो द्व्यणुकनाशः १। ततः श्यामनाशः २।
ततो रक्तोत्पत्तिपरमाण्वन्तरकर्मणी ३ । ततः परमाण्वन्तरक-
र्मजविभागः ४ । ततः परमाण्वन्तरे पूर्वसंयोगनाशः ५ । ततः
परमाण्वन्तरसंयोगः ६ । ततो द्व्यणुकोत्पत्तिः ७ । अथ रक्तो-
त्पत्तिः ८ । इत्यष्टक्षणा ॥ १०५ ॥
भाषा—(तथाहि) अग्निसंयोगसे परमाणुमें क्रिया हुई. उस क्रियासे परमाणुके
परमाणुअन्तरसे विभाग हुआ. उस विभागसे द्रव्यारम्भक संयोगका विनाश हुआ.
उससे पीछे द्व्यणुकादि द्रव्यका नाश हुआ १ । उससे पीछे दूसरे क्षणमें नष्ट द्रव्यके
परमाणुओंमें श्यामादि गुणोंका नाश हुआ २ । उससे पीछे तीसरे क्षणमें नष्ट द्रव्यके
परमाणुओंमें रक्तादि गुणोंकी उत्पत्ति तथा परमाणु अन्तरमें क्रिया होतीहै ३ । उससे
पीछे चौथे क्षणमें परमाणुअन्तरमें उत्पन्न हुए कर्मसे विभाग होताहै ४ । उससे
पीछे पंचमक्षणमें परमाणुअन्तरमें पूर्वसंयोगका विनाश होताहै ५ । उससे पीछे
छठे लक्षणमें रक्तपरमाणुका परमाणुअन्तरके साथ संयोग होता है ६ । उससे पीछे
सातवें क्षणमें द्व्यणुकादि द्रव्यकी उत्पत्ति होतीहै ७ । उससे पीछे अष्टमक्षणमें उस
द्रव्यमें रक्तादि गुणोंकी उत्पत्ति होतीहै ॥ १०५ ॥ इति अष्टक्षणाप्रक्रिया ॥
नैयायिकानां तु नये द्व्यणुकादावपीष्यते ॥
भाषा—नैयायिकोंके मतमें तो द्व्यणुकादि कार्यद्रव्यमेंभी पाक होसकताहै.
नैयायिकानामिति । नैयायिकानां मते द्व्यणुकादाववयविन्यापि
पाको भवति । तेषामयमाशयः । अवयविनां सच्छिद्रत्वाद्वह्नेः
सूक्ष्मावयवैरन्तःप्रविष्टैरवयवेष्ववष्टब्धेष्वपि पाको न विरुध्यते,
वैशेषिकमतेऽनन्तावयवितन्नाशकल्पने गौरवात् ।

२४० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-गौतमादि नैयायिकोंके सिद्धान्तमें तो द्वयणुकादि अवयवोंमेंभी अग्निसं-
योगसे पाक होसकताहै परमाणुपर्यंत धावन करनेका कुछ प्रयोजनही नहीं, उनके
हृदयका भाव यह है कि-घटादि अवयवी सदा छिद्रयुक्तही रहतेहैं; उन छिद्रोंमें
अग्निके सूक्ष्म अवयव प्रवेश कर जातेहैं; इसलिये परस्पर मिले मिलाये अवयवीरूप
अवयवोंमेंभी पाक मान लेनेमें कुछ विरोध नहीं है. एवं वैशेषिकके मतमें अनन्त
अवयवी तथा उसका ध्वंस कल्पनेमें गौरवभी है.
इत्थं च 'सोऽयं घटः' इत्यादिप्रत्यभिज्ञापि संगच्छते । यत्र तु न
प्रत्यभिज्ञा तत्रावयविनाशोऽपि स्वीक्रियत इति ।
भाषा-इस रीतिसे जब अवयवीका विनाश अङ्गीकार न किया तो “सोऽयं घटः”
इत्याकारक प्रत्यभिज्ञाज्ञानभी बन सकता है अर्थात् यदि अवयवी अग्निसंयोगसे विनष्ट
होकर दूसरा उत्पन्न होय तो “ सोऽयं घटः” यह प्रत्यभिज्ञाज्ञान नहीं हुआ चाहिये
परन्तु होता तो है. इसलिये अग्निसंयोगसे अवयवीका विनाश मानना उचित नहीं परन्तु
जहां ' सोऽयं ' इत्यादि प्रत्यभिज्ञात्मक बुद्धि नहीं होती वहां अवयवीका अग्निआदि-
संयोगसे विनाशभी हमको स्वीकार है-इति ।
संख्यां निरूपयितुमाह, गणनेति -
भाषा-' गणना' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार संख्याका निरूपण करतेहैं-
गणनाव्यवहारे तु हेतुः संख्याऽभिधीयते ॥१०६॥
भाषा-गणनाव्यवहारमें हेतुभूत गुणका नाम संख्या है ॥ १०६ ॥
गणनव्यवहारासाधारणकारणं संख्येत्यर्थः ॥ १०६ ॥
भाषा-अर्थात् परिगणनरूप व्यवहारका असाधारण कारणरूप संख्यात्मक
गुण है ॥१०६॥
नित्येषु नित्यमेकत्वमनित्येऽनित्यमिष्यते ॥
भाषा-उसमें एकत्वरूप संख्या नित्यपदार्थोंमें नित्य है तथा अनित्यपदार्थोंमें
अनित्य है.
नित्येष्विति । नित्येषु परमाण्वादिष्वेकत्वं नित्यम् । अनित्ये
घटादावेकत्वमनित्यमित्यर्थः ।
भाषा-अर्थात् परमाणु आदि नित्यपदार्थोंमें एकत्व नित्य है तथा घटादि अनि-
त्योंमें एकत्व अनित्य है.

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २४१
द्वित्वादयः परार्द्धान्ता अपेक्षाबुद्धिजा मताः॥१०७॥
भाषा-और द्वित्वादि संख्यासे लेकर परार्ध पर्यन्त यावत् संख्या अपेक्षाबुद्धि
जन्य है ॥ १०७ ॥
द्वित्वादय इति । द्वित्वादयो व्यासज्यवृत्तिसंख्या अपेक्षा-
बुद्धिजन्याः ॥ १०७ ॥
भाषा-अर्थात् ( व्यासज्यवृत्ति ) धर्मद्वय समनियतवृत्ति द्वित्वादि परार्द्धपर्यन्त यावत्
संख्या अपेक्षाबुद्धिसे उत्पन्न होतीहै.“एकं दशशतं चैव सहस्त्रमयुतं तथा॥लक्षं च नियुतं
चैव कोटिरर्बुदमेव च ॥ वृन्दं खर्वो निखर्वश्च शंखः पद्मश्च सागरः ॥ अन्त्यं मध्यं
परार्द्धं च दश वृद्ध्या यथाक्रमम् ॥ १ ॥ ” इस गणितविद्याके नियमानुसार यदि
एक अंकके आगे “१०००००००००००००००००” ऐसे सत्रह शून्य लगादिये
जावें तो उस संख्याका नाम परार्द्ध है, एवं द्वित्वादि संख्यासे लेकर एतादृश परा-
र्द्धपर्यन्त यावत्संख्या अपेक्षाबुद्धिसे उत्पन्न होतीहै ॥ १०७ ॥
अनेकाश्रयपर्याप्ता एते तु परिकीर्तिताः ॥
भाषा-यह सब द्वित्वादि धर्म अनेक आश्रयोंमें पर्याप्तिसम्बन्धसे रहते हैं, यह
पूर्वविद्वान् लोगोंका अनुभवानुरोधेन कथन है.
अनेकेति । यद्यपि द्वित्वादिसमवायः प्रत्येकं घटादावपि वर्तते,
तथाऽप्येको द्वावितिप्रत्ययाभावादेको न द्वाविति प्रत्ययसद्भावाच्च
द्वित्वादीनां पर्याप्तिलक्षणः कश्चन सम्बन्धोऽनेकाश्रयोऽभ्युपगम्यते ।
भाषा-यद्यपि द्वित्वादिका समवायभी प्रत्येक घटादिमें रहता है, इसलिये ऐसे
स्थलमें पर्याप्तिसम्बन्धकी कल्पना करनी उचित नहीं तथापि “ एको द्वौ ” इत्या-
कारक प्रत्ययके न होनेसे तथा “एको न द्वौ” इत्याकारक प्रत्ययके होनेसे द्वित्वादि-
कोंका ‘पर्याप्ति’ नामक कोईएक सम्बन्ध अनेक द्रव्यरूप आश्रयोंमें रहनेवाला
प्रतीत होताहै. “अयमेको घटः, इमौ द्वौ” इत्याकारक प्रतीति सिद्ध स्वरूप सम्ब-
न्धविशेषका नाम ‘पर्याप्ति’ है ।
अपेक्षाबुद्धिनाशाच्च नाशस्तेषां निरूपितः ॥१०८॥
भाषा-उस अपेक्षाबुद्धिके नाश होनेसे उन द्वित्वादि धर्मोंकाभी विनाश होताहै १०८
अपेक्षाबुद्धिनाशादिति।प्रथममपेक्षाबुद्धिः,ततो द्वित्वोत्पत्तिः,ततो
विशेषणज्ञानं द्वित्वत्वनिर्विकल्परूपं, ततो द्वित्वत्वविशिष्टप्रत्य-
क्षमपेक्षाबुद्धिनाशश्च, ततो द्वित्वनाश इति ।

कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, अभाव खण्ड एवं मुक्ति-विचार उपसंहार

२४२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-प्रथम क्षणमें "अयमेकः अयमेकः" इत्याकारक अपेक्षाबुद्धि उत्पन्न
होतीहै. दूसरे क्षणमें उस अपेक्षाबुद्धिसे द्वित्वकी उत्पत्ति होतीहै. तीसरे क्षणमें द्वित्वके
द्वित्वत्वरूप विशेषण का निर्विकल्पात्मक "इमे द्वित्वद्वित्वत्वे" इत्याकारक ज्ञान होता-
है. चौथे क्षणमें द्वित्वत्वविशिष्ट द्वित्वका लौकिक प्रत्यक्ष तथा अपेक्षाबुद्धिका विनाश
होताहै, पीछे पञ्चमक्षणमें द्वित्वादिका विनाश होताहै.
यद्यपि ज्ञानान्तरं द्विक्षणमात्रस्थायि, योग्यविभुविशेषगुणानां
स्वोत्तरवर्त्तिगुणनाश्यत्वात् । तथाप्यपेक्षाबुद्धेस्त्रिक्षणस्थायित्वं
कल्प्यते, अन्यथा निर्विकल्पककालेऽपेक्षाबुद्धिनाशानन्तरं
द्वित्वस्यैव नाशः स्यान्न तु द्वित्वप्रत्यक्षम्,तदानीं विषयाभावात्,
विद्यमानस्यैव चक्षुरादिना ज्ञानजननोपगमात् । तस्माद्वित्वप्र-
त्यक्षादिकमपेक्षाबुद्धेर्नाशकं कल्प्यते ।
भाषा-यद्यपि और साधारण यावत् ज्ञान द्विक्षणमात्र स्थित रहतेहैं, क्योंकि
यह नियम है कि-प्रत्यक्षके योग्य विभुके विशेषगुण स्वउत्तरवर्ति विभु विशेषगुणसे
नाश हुआ करतेहैं तथापि अपेक्षाबुद्धिकी तीनक्षण स्थितिकी कल्पना करनी पड़तीहै
(अन्यथा) यदि तीन क्षण स्थितिकी कल्पना न करें अर्थात् और ज्ञानोंकी तरह
द्विक्षणस्थायिही अपेक्षाबुद्धिभी मानें तो द्वित्वत्वनिर्विकल्परूप ज्ञानकालहीमें
अपेक्षाबुद्धिके नाशके अनन्तर द्वित्वकाभी नाश होगा तो द्वित्वका साक्षात्कार नहीं
होसकेगा; क्योंकि उस कालमें द्वित्वआत्मकविषय नहीं रहाहै और चक्षुरादि
इन्द्रियद्वारा विद्यमान विषयकाही ज्ञान होताहै. यह वार्ता सभी विद्वानोंके सम्मत
है. इसलिये द्वित्वादिका साक्षात्कारही अपेक्षाबुद्धिका विनाशक है, यह कल्पना
करनी पड़तीहै,
न चापेक्षाबुद्धिनाशात्कथं द्वित्वनाश इति वाच्यम् । कालान्तरे
द्वित्वप्रत्यक्षाभावादपेक्षाबुद्धिस्तदुत्पादिका तन्नाशस्तन्नाशक
इति कल्पनात् ।
शंका-अपेक्षाबुद्धि विनाशके पीछे द्वित्वादिका विनाश कैसे होताहै? समा-
धान-अपेक्षाबुद्धिके असत्त्वकालमें द्वित्त्वादिधर्मोंका साक्षात्कार नहीं होता इसलिये
यह निश्चय होता है कि-अपेक्षाबुद्धिही द्वित्वादि धर्मोंके उत्पन्न करनेवाली है
और अपेक्षाबुद्धिका विनाशही उन द्वित्वादि धर्मोंका विनाशक है.

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २४३
अतएव तत्पुरुषीयापेक्षाबुद्धिजन्यद्वित्वादिकं तेनैव गृह्यत इति
कल्प्यते ।
भाषा-( अतएव ) पूर्वोक्त युक्तिसे अपेक्षाबुद्धिको अवश्य द्वित्वादिउत्पादकता
है; इसीलिये यहभी कल्पना होती है कि-उस उस पुरुषकी अपेक्षाबुद्धिसे उत्पन्नहुए
द्वित्वादिको वही वही पुरुष ग्रहण करसकता है; दूसरा नहीं.
न चापेक्षाबुद्धेर्द्वित्वप्रत्यक्षे कारणत्वमस्त्विति वाच्यम्, लाघवेन
द्वित्वं प्रति कारणत्वस्यैवोचितत्वात् । अतीन्द्रिये द्व्यणुकादाव-
पेक्षाबुद्धिर्योगिनाम्, सर्गादिकालीनपरमाण्वादावीश्वरीयापेक्षाबु-
द्धिर्ब्रह्माण्डान्तरवर्तियोगिनामपेक्षाबुद्धिर्वा द्वित्वादिकारणमिति ।
शंका-अपेक्षाबुद्धिको यदि द्वित्वादि उत्पत्तिके प्रति कारणता न मानें किन्तु
केवल द्वित्वादि प्रत्यक्षके प्रतिही कारणता मानें तो हानि क्या है ? समाधान-
लाघवानुरोधसे द्वित्वादिके प्रतिही अपेक्षाबुद्धिको कारणता माननी उचित है अर्थात्
' द्वित्वप्रत्यक्षत्व ' की अपेक्षासे ' द्वित्वत्व ' रूप धर्मको कार्यतावच्छेदक माननेमें
लाघव है. द्व्यणुकादि अतीन्द्रियपदार्थोंमें योगी लोगोंकी अपेक्षाबुद्धि होती है. सृष्टिके
आदिकालमें परमाणु आदिकोंमें ईश्वरकी अपेक्षाबुद्धि होती है अथवा दूसरे ब्रह्माण्डमें
होनेवाले योगीलोगोंकी अपेक्षाबुद्धि द्वित्वादिका कारण होती है-इति ॥१०८॥
अपेक्षाबुद्धिः केत्यत आह, अनेकेति-
शंका-वह अपेक्षाबुद्धि कैसी होती है ?
अनेकैकत्वबुद्धिर्या साऽपेक्षाबुद्धिरुच्यते ॥
समा०-अनेक पदार्थोंमें एकत्वअवगाहन करनेवाली बुद्धिका नाम 'अपेक्षाबुद्धि' है.
'अयमेकोऽयमेकः' इत्याकारिकेत्यर्थः । इदं तु बोध्यम् । यत्रानि-
यतैकत्वज्ञानं तत्र द्वित्वादिभिन्ना बहुत्वसंख्योत्पद्यते यथा सेना-
वनादाविति कन्दलीकारः ।
भाषा-अर्थात् अनेक पदार्थोंमें “ अयमेकोऽयमेकः ” इत्याकारक बुद्धिका नाम
'अपेक्षाबुद्धि' है. यहांपर यह भेदभी जानने योग्य है कि-' कन्दली ' नामक
ग्रंथका कर्ता श्रीधर पंडित तो यह कहता है कि-जिस स्थलमें एकत्वका ज्ञान
अनियत है अर्थात् नियमपूर्वक नहीं होता उस स्थलमें द्वित्वादि भिन्न बहुत्वसंख्या-

२४४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
की उत्पत्ति होती है. जैसे सेना सभादि पुरुषसमूहमें या वनवाटिकादि वृक्षसमूहमें
एकत्वज्ञान अनियत है; इसलिये इत्यादि स्थलोंमें द्वित्वादिविन्न बहुत्वसंख्याकी
उत्पत्ति होती है-इति
आचार्यास्तु त्रित्वादिकमेव बहुत्वं मन्यन्ते, तथाच त्रित्वत्वा-
दिव्यापिका बहुत्वत्वजातिर्नातिरिच्यते । सेनावनादौ चोत्पन्ने-
ऽपि त्रित्वादौ त्रित्वत्वायग्रहो दोषात् ।
भाषा-और उदयनाचार्य तो यह कहते हैं कि-त्रित्वादिहीका नामान्तर 'बहुत्व' है;
बहुत्व कोई त्रित्वादिसे पृथक् धर्म नहीं है. एवं त्रित्वादि धर्मोंकी व्यापकीभूता
बहुत्वत्वरूपा जातिभी कोई अतिरिक्त नहीं है. सेनावनादिकोंमेंभी त्रित्वादि उत्पन्न
तो होतेहैं परन्तु उनमें नियतानेक एकत्वज्ञानाभावरूप दोषके प्रभावसे त्रित्वत्वादि
धर्मोंका ग्रहण नहीं होता.
इत्थं च 'इतो बहुतरेयं सेना' इति प्रतीतिरूपपद्यते, बहुत्वस्य सं-
ख्यान्तरत्वे तु तत्ततारतम्याभावान्नोपपद्येतेत्यवधेयम् ।
भाषा-(इत्थञ्च) ऐसे मन्तव्यसे "इतो बहुतरेयं सेना" अर्थात् इस सेनासे
इस द्वितीय सेनाके बहुत्वमें स्वसजातीयनिरूपित उत्कर्ष प्रतीत होता है. इस
प्रतीतिकीभी उपपत्ति होसकती है; परन्तु यदि बहुत्वको त्रित्वादिसे संख्यान्तर
मानें तो उसकी अपने आपमें न्यून अधिकता कुछ नहीं बन सकती, इसलिये
"इतो बहुतरेयं सेना" इस प्रतीतिका उपपन्न होना दुर्घट है-इति ।
परिमाणं निरूपयति, परिमाणमिति-
भाषा-'परिमाणं' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार परिमाणका निरूपण करतेहैं-
परिमाणं भवेन्मानव्यवहारस्य कारणम् ॥१०९॥
अणु दीर्घं महद्ह्रस्वमिति तद्भेद ईरितः ॥
भाषा-मानव्यवहारके कारणीभूतका नाम 'परिमाण' है ॥ १०९ ॥ वह परिमाण
अणु दीर्घ महत् तथा ह्रस्व भेदसे चार प्रकारका है.
परिमितिव्यवहारासाधारणं कारणं परिमाणमित्यर्थः ॥ १०९ ॥
तच्चतुर्विधम्, अणु महद्दीर्घं ह्रस्वं च । इदं चातुर्विध्यं प्रत्यक्षसि-
द्धम् । तत्राणुत्वह्रस्वत्वे महत्त्वदीर्घत्वे च समनियते ।
भाषा-अर्थात् "इदं अणु, इदं महत्" इत्याकारक जो (परिमिति) परिमापण

परिच्छेदः ५] भाषाटीकासमेता. २४५
रूप व्यवहार उसका असाधारण कारणीभूत परिमाण है ॥ १०९ ॥ वह अणु महत्
दीर्घ तथा ह्रस्वभेदसे चार प्रकारका है. यह चारों प्रकारका प्रत्यक्ष अनुभवसे सिद्ध
है. उनमें अणुत्व ह्रस्वत्व तथा महत्त्व दीर्घत्व ये दो दो आपसमें समनियत रहते हैं.
भाव यह कि-इन चारों प्रकारके परिमाणको पहले परम मध्यम भेदसे दोप्रकारका
जानना चाहिये. उनमें परमअणुत्व तथा परमह्रस्वत्व परमाणुओंमें तथा मनमें है.
एवं मध्यम अणुत्व तथा मध्यमह्रस्वत्व द्वयणुकमें है. एवं परममहत्त्व तथा परम-
दीर्घत्व गगनादिकोंमें है और मध्यममहत्त्व तथा मध्यमदीर्घत्व घटादि पदार्थोंमें है.
इस रीतिसे ये दो दो परस्पर समनियत हैं.
अनित्ये तदनित्यं स्यान्नित्ये नित्यमुदाहृतम्॥११०॥
संख्यातः परिमाणाच्च प्रचयादपि जायते ॥
अनित्यं-
भाषा--वह परिमाण घटपटादि अनित्यपदार्थोंमें अनित्य है तथा गगनादि नित्य-
पदार्थोंमें नित्य है ॥ ११० ॥ इनमें अनित्यपरिमाणकी संख्यासे परिमाणसे तथा
( प्रचय ) शिथिलाख्य संयोगसे उत्पत्ति होतीहै.
तत्परिमाणम् । नित्यमित्यत्र परिमाणमित्यनुषज्यते । जायत इ-
त्यत्रापि परिमाणमित्यनुवर्तते । अनित्यमिति पूर्वेणान्वितम् ।
तथाचानित्यं परिमाणं संख्याजन्यं परिमाणजन्यं प्रचयजन्यं
चेत्यर्थः ।
भाषा--मूलपठित 'तत्' शब्दसे परिमाणका ग्रहण है. एवं 'नित्यं' इस पदके
साथ 'परिमाणं' इस पदका पूर्वकारिकासे अनुवर्तन करके सम्बन्ध करना. एवं
'जायते' इस क्रियापदके साथभी 'परिमाणं' इस पदका पीछेसे सम्बन्ध करना
कारिकाके उत्तरार्द्धके आदिमें पठित 'अनित्य' पदका पूर्व पदोंके साथ अन्वय है.एवं
यह अर्थ हुआ कि--अनित्यपरिमाण संख्याजन्य परिमाणजन्य तथा प्रचयजन्य
होनेसे तीन प्रकारसे उत्पन्न होताहै.
तत्र सङ्ख्याजन्यमुदाहरति, द्वयणुकादाविति-
भाषा-उनमें 'द्वयणुकादौ' इत्यादि ग्रन्थसे संख्याजन्यको दिखलाते हैं-
-द्वयणुकादौ तु संख्याजन्यमुदाहृतम् ॥१११॥
भाषा-द्वयणुकादिकोंका परिमाण संख्यासे उत्पन्न होताहै ॥ १११ ॥

२४६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
द्व्यणुकस्य त्रसरेणोश्च परिमाणं प्रति परमाणुपरिमाणं द्व्यणुकप-
रिमाणं वा न कारणम् । परिमाणस्य स्वसमानजातीयोत्कृष्टप-
रिमाणजनकत्वात् । द्व्यणुकादिपरिमाणं तु परमाणुणुत्वापेक्ष-
या नोत्कृष्टम्, त्रसरेणुपरिमाणं तु न सजातीयम्, अतः परमाणौ
द्वित्वसङ्ख्या द्व्यणुकपरिमाणस्य,द्व्यणुके त्रित्वसङ्ख्या च त्रसरे-
णुपरिमाणस्य समवायिकारणमित्यर्थः ॥ १११ ॥
भाषा-द्व्यणुकके या त्रसरेणुके परिमाणके प्रति परमाणु परिमाणको या द्व्यणुक
परिमाणको कारणता नहीं है; क्योंकि परिमाणको नियमसे स्वसमानजातीय उत्कृष्ट
परिमाणजनकता है. भाव यह कि-परिमाणका यह स्वभाव है कि, यह अपनेसे उत्कृष्ट
परिमाणहीका जनक होताहै और द्व्यणुकादिका परिमाण तो परमाणुके अणुत्वकी
अपेक्षासे कुछ उत्कृष्ट नहीं है और त्रसरेणुका परिमाण परमाणुपरिमाणका सजाति
नहीं है क्योंकि त्रसरेणुका परिमाण इन्द्रियग्राह्य होनेसे मध्यममहत् है तथा परमा-
णुका परिमाण परम अणु है इसलिये परमाणुद्वयगत द्वित्वसंख्या द्व्यणुकपरिमाणके
प्रति तथा द्व्यणुक तीनगत त्रित्वसंख्या त्रसरेणुपरिमाणके प्रति असमवायिकारण है;
यही मानना उचित है ॥ १११ ॥
परिमाणजन्यमुदाहरति, परिमाणं घटादाविति-
भाषा-एवं ' परिमाणं ' इत्यादि ग्रन्थसे परिमाणजन्य परिमाणको दिखलाते हैं.
परिमाणं घटादौ तु परिमाणजमुच्यते ॥
परिमाणजं कपालादिपरिमाणजन्यम् ।
भाषा-घटादिगत परिमाणके प्रति कपालादिगत परिमाणको असमवायि
कारणता है.
प्रचयजन्यमुदाहर्तुं प्रचयं निर्वक्ति, प्रचय इति -
भाषा-एवं प्रचयजन्य परिमाण प्रदर्शनार्थ पहले 'प्रचयः' इत्यादि ग्रन्थसे
प्रचयको दिखलाते हैं.
प्रचयः शिथिलाख्यो यः संयोगस्तेन जन्यते ॥ ११२
परिमाणं तूलकादौ-
भाषा-' प्रचय ' नाम शिथिलाख्य संयोगका है ॥ ११२ ॥ उस संयोगसे
( तूल ) रूई आदिकोंमें परिमाणान्तरकी उत्पत्ति होती है.

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २४७
परिमाणं चाश्रयनाशादेव नश्यतीत्याह, नाश इति-
भाषा-उस परिमाणका स्वाश्रय नाश होनेसे नाश होताहै; इसीको ' नाशस्तु '
इत्यादि ग्रन्थसे कहतेहैं.
-नाशस्त्वाश्रयनाशतः॥
अर्थात् परिमाणस्यैव।
भाषा-उस परिमाणका अपने आश्रयद्रव्यके नाश होनेसे नाश होताहै अर्थात्
आश्रयद्रव्यके नाश मात्रसे केवल परिमाणहीका नाश होताहै, गुणान्तरका नहीं.
न चावयविनाशः कथं परिमाणनाशकः, सत्यप्यवयविनि त्रिच-
तुरादिपरमाणुविश्लेषे तदुपचये चावयविनः प्रत्यभिज्ञानेऽपि प-
रिमाणान्तरस्य प्रत्यक्षसिद्धत्वादिति वाच्यम् ।
शंका-अवयवीका नाश उसके परिमाणका नाशक तो नहीं बनसकता; क्योंकि
पटादि अवयवी बनाभी रहे परन्तु उसमेंसे यदि तीन चार ( परमाणु ) हिस्से अर्थात्
तन्तु आदि निकाल लिये जाँय अथवा और डालदिये जाँय तो 'यह वही पट है'
इत्यादि प्रत्यभिज्ञाज्ञान उसमें होनेसेभी उसका परिमाणान्तर होजाताहै; यह वार्ता तो
प्रत्यक्ष अनुभवसिद्ध है अर्थात् ऐसे स्थलमें अवयविनाशरूप कारणके न होनेपरभी
परिमाणनाशरूप कार्य देखनेमें आया; इसलिये व्यतिरेकव्यभिचार हुआ.
परमाणुविश्लेषे द्वयणुकस्य नाशोऽवश्यमभ्युपेयस्तन्नाशे च
त्र्यणुकनाश इत्येवं क्रमेण महावयविनो नाशस्यावश्यकत्वात् ।
सति च नाशके ऽनभ्युपगममात्रेण नाशस्यापवदितुमशक्य-
त्वात् । शरीरादाववयवोपचये ऽसमवायिकारणनाशस्यावश्य-
कत्वादवयविनाश आवश्यकः ।
समाधान-परमाणुद्वयके विश्लेषसे द्वयणुकका विनाश तो आपको स्वीकृतही
होगा. एवं द्वयणुकके नाश होनेसे त्रसरेणुका नाशभी माननेही योग्य है; इसी क्रमसे
महाअवयवीपर्यन्त विनाशका विचार अवश्य करना उचित है. इस क्रमसे यदि परि-
माणका विनाशक अवयवीनाशही बुद्धिमें आजाय तो केवल उसके ना स्वीकार
करणमात्रसे आप अवयवीनाशका अपलाप नहीं करसकते, असमवायिकारणके विना-
शसे कार्यका विनाश नियमसे होताहै. एवं शरीरादिकोंमेंभी ( अवयव ) अङ्गोंके
बढ़नेसे शरीरके असमवायिकारण अवयवसंयोगका विनाश अवश्य होताहै, इसलिये
अवयवी शरीरका विनाशभी अवश्य मानना चाहिये.

.२४८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
न च पटविनाशेऽपि तन्त्वन्तरसंयोगात् परिमाणाधिक्यं न
स्यादिति वाच्यम् । तत्रापि वेमाद्यभिघातेनासमवायिकारणत-
न्तुसंयोगनाशात् पटनाशस्यावश्यकत्वात् ।
शंका-दोचार तन्तुओंके निकलनेसे पटके विनाश होनेपरभी उस पटमें यदि तन्तु
अन्तरका संयोग होय तो वही पट अधिक परिमाणवाला होजाताहै, वह नहीं हुआ
चाहिये. समाधान-ऐसे स्थलमेंभी वेमादिके अभिघाताख्य संयोगसे पटका अस-
मवायिकारण जो परस्पर तन्तुद्वयसंयोग उसका नाशः होताहै; इसलिये पटका
विनाशभी अवश्यही मानना चाहिये.
किंच तन्त्वन्तरस्य तत्पटावयवत्वे पूर्वं तत्पट एव न स्यात्,
तन्त्वन्तररूपकारणाभावात् । तन्त्वन्तरस्यावयवत्वाभावे च
न तेन परिमाणाधिक्यं संयुक्तद्रव्यान्तरवत् ।
भाषा-( किञ्च ) तन्तुअन्तरभी यदि उसी पूर्वपटके अवयवही मान लिये जांय
तो उन तन्तुओंके सम्बन्धसे पहले वह पटही नहीं होना चाहिये; क्योंकि स्वस-
म्बन्धसे प्रथम तन्तुअन्तररूप कारण विद्यमानही नहीं है और यदि तन्तुअन्तरको
उस पटका ( अवयव ) समवायिकारणही नहीं मानें तो उनसे पटपरिमाणके अधिक
होनेकी संयुक्तद्रव्यकी तरह शंकाही नहीं होसकती अर्थात् जैसे घटपटादिके परस्पर
संयोगसे घटके या पटके परिमाणको अधिक कोई नहीं मानता किन्तु संयुक्तमात्र
व्यवहार करतेहैं वैसेही तन्तुअन्तरके सम्बन्धसे प्रथम पटमेंभी समझना चाहिये.
तस्मात्तत्र तंत्वन्तरसंयोगे सति पूर्वं पटनाशस्ततः पटान्तरोत्प-
त्तिरित्यवश्यं स्वीकार्यम् । अवयविनः प्रत्यभिज्ञानं तु साजात्येन
दीपकलिकादिवत् !
भाषा-इसलिये ऐसे स्थलमें यही सिद्धान्त अवश्य मानना उचित है कि, तन्तु
अन्तरके संयोग होनेसे उस पूर्वपटका विनाश हुआहै और नूतन पटान्तरकी उत्पत्ति
हुई है. एवं “ स एवायं पटः ” इत्यादि प्रत्यभिज्ञाज्ञानका निर्वाह दीपशिखाकी तरह
सजातीयके अवगाहन करनेवाला समझना चाहिये अर्थात् जैसे क्षण२ में बदलती हुई
दीपशिखामें “ यह वही दीपशिखाप्रज्वलित है” इत्याकारक साजात्यावलम्बी प्रत्यय
लोकमें सर्वानुभवसिद्ध है; वैसेही प्रकृतमेंभी जानना चाहिये.

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २४९ ]
न च पूर्वतन्तव एव तन्तवन्तरसहकारात् पूर्वपटे सत्येव पटान्तर-
मारभन्तामिति वाच्यम् । मूर्तयोः समानदेशताविरोधात् । ए-
कदा नानाद्रव्यस्य तत्रोपलम्भस्य बाधितत्वाच्च। पूर्वद्रव्यस्य प्र-
तिबन्धकस्य विनाशे द्रव्यान्तरोत्पत्तिरित्यस्यावश्यमभ्युपेयत्वात्।
शंका-प्रथम तन्तुही यदि औरतन्तुओंकी सहकारतासे पहले पटके रहनेपरभी
दूसरे पटको उत्पन्न करें तो क्या दोष है?समाधान-दो मूर्तद्रव्य समान एक देशमें
नहीं रहसकते अर्थात् मूर्तद्रव्य देशका प्रतिरोधक होता है, इसलिये दो मूर्त एक
देशमें नहीं रह सकते और ऐसे स्थलमें एकही वार नानाद्रव्यकी उपलब्धिभी नहीं
होती अर्थात् एकही पटादि पदार्थ एकही कालमें दोतरहका कभी किसी पुरुषको
दिखाई नहीं दिया इसलिये उत्तरद्रव्यकी उत्पत्तिमें प्रतिबन्धकरूप पूर्वद्रव्यके विनाश
होनेसे द्रव्यान्तरकी उत्पत्ति होतीहै; इस वार्ताको अवश्य मानना चाहिये.
पृथक्तं निरूपयति, संख्यावदिति-
भाषा-एवं 'संख्यावत्' इत्यादि ग्रन्थसे पृथक्तका निरूपण करतेहैं-
संख्यावत्तु पृथक्तं स्यात्पृथक्प्रत्ययकारणम् ॥११३॥
भाषा-पृथक्प्रत्ययका कारणीभूत पृथक्तगुणभी संख्याकी तरहही जानना
चाहिये ॥ ११३ ॥
पृथक्प्रत्ययासाधारणं कारणं पृथक्तम् । तन्नित्यतादिकं संख्या-
वत् । तथाहि।नित्येष्वेकत्वं नित्यमनित्येष्वनित्यम् । अनित्य-
मेकत्वं त्वाश्रयद्वितीयक्षणे चोत्पद्यते आश्रयनाशान्नश्यति।तथै-
कपृथक्तमपि । द्वित्वादिवच्च द्विपृथक्तादिकमपीत्यर्थः ॥११३॥
भाषा-अर्थात् "अयं अस्मात् पृथक्" इत्याकारक प्रत्ययका असाधारण कारण
'पृथक्त'है उसके नित्य अनित्य होनेका विचार संख्याकी तरह जानना चाहिये.(तथाहि)
अर्थात् जैसे नित्यपदार्थोंमें एकत्व नित्य है और अनित्योंमें अनित्य है और वह
अनित्य एकत्व अपने आश्रयमें स्वाश्रयकी उत्पत्तिसे दूसरे क्षणमें उत्पन्न होता है,
एवं स्वाश्रयनाशहीसे नाश होताहै, वैसेही पृथक्तकोभी जानना चाहिये. एवं पूर्वोक्त
द्वित्वादिकोंकी तरह द्विपृथक्तादिकोंका उत्पत्तिविनाशभी जानलेना चाहिये अर्थात्
अपेक्षाबुद्धिरूप निमित्तकारणसे इनकी उत्पत्ति है तथा अपेक्षाबुद्धि आदिके विनाशसे
इनका विनाश है ॥ ११३ ॥
२०

२५० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
ननु 'अयमस्मात् पृथग्' इत्यादावन्योन्याभावो भासते तत्कथं
पृथक्त्वं गुणान्तरं स्वीक्रियते, नचास्तु पृथक्त्वं, न त्वन्योन्याभाव
इति वाच्यम्,रूपं न घट इति प्रतीत्यनापत्तेः । न हि रूपे घटा-
वधिकं पृथक्त्वं गुणान्तरमस्ति, न वा घटे घटावधिकं पृथक्त्वम-
स्ति येन परम्परासम्बन्धः कल्प्य इत्यत आह, अन्योन्याभावत
इति-
शंका-“ अयमस्मात् पृथक् ” इत्यादि प्रतीतिमें अन्योन्याभावका भान होताहै;
इसलिये इस प्रतीतिसे पृथक्त्वको गुणान्तर मानना योग्य नहीं और यदि कहो कि-
पृथक्त्वके गुणान्तर माननेसे सर्वत्र निर्वाह हो सकताहै इसलिये अन्योन्याभाव मान-
नेकी आवश्यकताही नहीं तो यहभी ठीक नहीं; क्योंकि यदि अन्योन्याभावप्रतीति
सिद्ध न होंय तो “ रूपं न घटः ” यह प्रतीति नहीं हुई चाहिये. भाव यह कि-इस
प्रतीतिकी निर्वाह पृथक्त्वसे नहीं होसकता; क्योंकि रूपमें घटात्मक अवधिको लेकर
कोई पृथक्त्वनामक गुणान्तर नहीं है और घटमें स्वात्मक अवधिको लेकरभी पृथक्त्व
नहीं रहता जिससे ‘ सामानाधिकरण्य ’ रूप परंपरासम्बन्धकी कल्पनासे उक्त प्रती-
तिका निर्वाह किया जाय इसी भावको लेकर मूलकार ‘ अन्योन्य ’ इत्यादि अग्रिम
ग्रन्थको कहतेहैं-
अन्योन्याभावतो नास्य चरितार्थत्वमिष्यते ॥
अस्मात्पृथगिदं नेति प्रतीतिर्हि विलक्षणा॥११४॥
समाधान-इस पृथक्त्वात्मकगुणकी अन्योन्याभावसे चरितार्थता नहीं होती;
क्योंकि “अयमस्मात् पृथक्” इससे “इदमिदं न” यह प्रतीति विलक्षण है ॥ ११४॥
विलक्षणेति । ननु शब्दवैलक्षण्यमेव न त्वर्थवैलक्षण्यमिति चेत् ।
न । विनाऽर्थभेदं घटात् पृथगितिवत् 'घटो न पटः' इत्यत्रापि
पञ्चमी स्यात् । तस्मात् यदर्थकयोगे पञ्चमी सोऽर्थो नञर्थाऽन्यो
न्याभावतो भिन्नो गुणान्तरं कल्प्यत इति ॥ ११४॥
शंका-इन दोनों प्रतीतियोंमें परस्पर केवल शब्दमात्रकी विलक्षणता है किन्तु
अर्थभेद नहीं है. समाधान-यदि अर्थभेद न होय तो जैसे “ घटात् पृथक् ” इस
प्रयोगमें पञ्चमीविभक्ति हुईहै,वैसे ‘घटो न पटः’ इस प्रयोगमेंभी पञ्चमी होनी चाहिये.
भाव यह कि-यदि ‘ नञ् ’ तथा ‘पृथक्’ अव्यय इन दोनोंका एकही अर्थ होय तौ

: तृतीयः स्यात्–
Line 19: भाषा–अप्राप्त द्रव्योंके परस्पर ( प्राप्ति ) मिलापका नाम ‘ संयोग ’है; वह
Line 20: संयोग तीन प्रकारका है. उनमें प्रथम अन्यतर क्रियासे उत्पन्न होताहै ॥ ११५ ॥
Line 21: दूसरा उभयक्रियासे उत्पन्न होताहै और तीसरा संयोगसे संयोग उत्पन्न होताहै.
Line 22: इनमें प्रथम पर्वत पक्षी आदिकोंका संयोग है अर्थात् पर्वत अचल है, केवल पक्षीआ-
Line 23: दिकी क्रियासे पर्वतमें संयोग होताहै ॥ ११६ ॥ एवं परस्पर ( मेष ) मेढेआदिका
Line 24: ( सन्निपात ) टक्कर लगनारूप दूसरा संयोग है अर्थात् ऐसा संयोग उभयत्र क्रिया
Line 25: हो तो होताहै. एवं कपालवृक्षके संयोगसे होनेवाला घटवृक्षका संयोग ॥ ११७ ॥
Line 26: तीसरा संयोग है.
Line 27: सन्निपातः संयोगः । द्वितीय उभयकर्मजः ॥ ११६ ॥ ११७॥
Line 28: तृतीय इति, संयोगज इत्यर्थः । तृतीयः स्यादिति च पूर्वेणान्वितम् ।

Let's check line 27:
सन्निपातः संयोगः । द्वितीय उभयकर्मजः ॥ ११६ ॥ ११७॥
Wait, does

२५२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-मूलमें 'सन्निपात' यह शब्द संयोगका वाचक है. एवं द्वितीयशब्द
उभयक्रियाजन्य संयोगपर है ॥ ११५ ॥ ११६ ॥ ११७ ॥ (तृतीय इति) अर्थात्
संयोगसे उत्पन्न होनेवाला संयोग मूलघटित 'तृतीयः स्यात्' इस भागका पूर्वके
पदोंके साथ अन्वय है.
-कर्मजोऽपि द्विधैव परिकीर्तितः ॥
अभिघातो नोदनं च शब्दहेतुरिहादिमः॥ ११८ ॥
शब्दाहेतुर्द्वितीयः स्यात्-
भाषा-वह क्रियाजन्य संयोग फिर दो प्रकारका है. एक अभिघाताख्य संयोग
है; और दूसरा नोदनाख्य है. जिस संयोगके होनेसे शब्द होय वह अभिघाताख्य
संयोग है ॥ ११८ ॥ एवं जिसके होनेसे शब्द न होय वह नोदनाख्य संयोग है.
आदिमोऽभिघातः ॥ ११८ ॥ द्वितीयो नोदनाख्यः संयोग इति ।
भाषा-मूलमें 'आदिम' शब्दसे अभिघाताख्य संयोगका ग्रहण है ॥ ११८ ॥
तथा 'द्वितीय' शब्दसे नोदनाख्यसंयोगका ग्रहण है.
विभक्तप्रत्ययासाधारणं कारणं विभागं निरूपयति, विभाग इति-
भाषा-एवं 'विभाग' इत्यादि ग्रन्थसे विभक्तप्रत्ययके असाधारण कारणीभूत
विभागका निरूपण करतेहैं-
-विभागोपि त्रिधा भवेत् ॥
एककर्मोद्भवस्त्वाद्यो द्वयकर्मोद्भवोऽपरः॥ ११९ ॥
विभागजस्तृतीयः स्यात्तृतीयोऽपि द्विधा भवेत् ॥
हेतुमात्रविभागोत्थो हेत्वहेतुविभागजः ॥ १२० ॥
भाषा-एवं संयोगकी तरह विभागभी तीन प्रकारका है. उनमें प्रथम एककी
क्रियासे उत्पन्न होताहै; दूसरा दोनोंकी क्रियासे उत्पन्न होताहै ॥११९॥ और तीसरा
विभागसे विभाग उत्पन्न होताहै. वह तीसरा फिर दोप्रकारका है. पहला केवल
कारणमात्रके विभागसे उत्पन्न होताहै और दूसरा कारणाकारण उभयके विभागसे
उत्पन्न होताहै ॥ १२० ॥
एककर्मेति । उदाहरणं तु श्येनशैलविभागादिकं पूर्ववद्बोध्यम् ॥
॥ ११९ ॥ तृतीयो विभागजः कारणमात्रविभागजन्यः कारणा-
कारणविभागजन्यश्चेति । आद्यस्तावत्-यत्र कपाले कर्म ततः

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २५३
कपालद्वयविभागस्ततो घटारम्भकसंयोगनाशस्ततो घटना-
शस्ततस्तेनैव कपालविभागेन स्वकर्मणः कपालस्याकाशवि-
भागो जन्यते, तत आकाशसंयोगनाशः, तत उत्तरदेशसंयोग-
स्ततः कर्मनाश इति ।
भाषा-तीनों प्रकारके विभागके उदाहरणभी पीछे लिखे तीनों प्रकारके संयोगकी
तरहही जानने चाहिये अर्थात् श्येन शैलादिका विभाग अन्यतरक्रियाजन्य है
तथा मेषद्वयका विभाग उभयक्रियाजन्य है और तीसरा विभागजविभाग दोप्रकारका
है. एक कारणमात्र विभागजन्य है, दूसरा कारणाकारणविभागजन्य है; उनमें प्रथमका
उदाहरण जैसे पहले कपालमें क्रिया हुई उस क्रियासे कपालद्वयका विभाग हुआ,
उस विभागसे पीछे घटके आरम्भक कपालद्वयके संयोगका विनाश हुआ पीछे
घटका नाश हुआ, उससे पीछे उसी कपालद्वयविभागसे पूर्वोक्त क्रियायुक्त कपाल-
का आकाशके साथ विभाग उत्पन्न होता है; उससे पीछे आकाशसंयोगका विनाश
होता है, उससे पीछे कपालका उत्तर देशके साथ संयोग होता है. उससे पीछे
कपालगत क्रियाका विनाश होता है-इति ।
न च तेन कर्मणैव कथं देशान्तरविभागो न जन्यत इति वा-
च्यम् । एकस्य कर्मण आरम्भकसंयोगप्रतिद्वन्द्विविभागजनक-
त्वस्यानारम्भकसंयोगप्रतिद्वन्द्विविभागजनकत्वस्य च विरोधात् ।
शंका-उस कपालद्वयविभागजनक प्रथमक्रियाहीसे यदि ( देशान्तर ) कपाला-
काशादि विभागभी मान लियाजाय तो हानि क्या है? अर्थात् वह प्रथमक्रियाही
कपालाकाशादि देशान्तर विभागकोभी उत्पन्न क्यों नहीं करती? उसके लिये जुदा
कपालद्वयविभागमें कारणता कल्पनेकी कौन आवश्यकता है. समाधान-एक
क्रियामें ( आरम्भकसंयोग ) कपालद्वय संयोगादिविरोधि विभागजनकता तथा
( अनारम्भकसंयोग ) कपालाकाशसंयोगादि विरोधिविभागजनकता नहीं रहती
क्योंकि इन दोनों धर्मोंका परस्पर विरोध है.
अन्यथा विकसत् कमलकुड्मलभङ्गप्रसङ्गात् ।
भाषा-( अन्यथा ) यदि आरम्भकसंयोगविरोधि विभागजनक क्रियाको तथा
अनारम्भकसंयोगविरोधि विभागजनक क्रियाको एकही मानें तो विकसत्कमलके
कुड्मलका भङ्ग होजाना चाहिये अर्थात् खिलते हुए कमलकी डोड़ी टूट जानी
चाहिये. यहां भाव यह है कि-खिलतेहुए कमलमें अग्रावच्छेदेन अनारम्भक संयोगके
विरोधिविभागकी जनका क्रिया है, उसी क्रियासे यदि मूलावच्छेदेन आरम्भकसंयो-

२५४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
गविरोधिविभागभी मान लिया जाय तो उस विभागसे कमलके आरम्भकसंयोगके
नाश होनेके पश्चात् कमलका विनाशभी हुआ चाहिये परन्तु ऐसा होता देखनेमें
नहीं आता.
तस्माद्यदीदमनारम्भकसंयोगप्रतिद्वन्द्विविभागं जनयेत्, तदा
आरम्भकसंयोगप्रतिद्वन्द्विविभागं न जनयेत् ।
भाषा-इसलिये आरम्भकसंयोगविरोधि विभागजनक क्रियाको तथा अनारम्भ-
कसंयोगविरोधि विभागजनक क्रियाको एक मानना उचित नहीं है;किन्तु यही मानना
उचित है कि-क्रिया जिस कालमें अनारम्भकसंयोगविरोधि विभागको उत्पन्न करती है
उस कालमें आरम्भक संयोगके विरोधिविभागको नहीं उत्पन्न करती.
न च कारणविभागेनैव द्रव्यनाशात्पूर्वं कुतो देशान्तरविभागो
न जन्यत इति वाच्यम्। आरम्भकसंयोगप्रतिद्वन्द्विविभागवतो
ऽवयवस्य सति द्रव्ये देशान्तरविभागसम्भवात् ॥ १ ॥
शंका-कारणविभागहीसे अर्थात् कपालद्वयविभागादिहीसे घटादि द्रव्यनाशसे
पहले देशान्तरविभागभी क्यों नहीं उत्पन्न होता ? यदि होता है तो "ततो घटनाशः,
ततस्तैनैक कपालविभागेन सकर्मणः कपालस्याकाशविभागो जन्यते" यह पूर्वकथन
आपका असङ्गत होगा. समाधान-कपालद्वय विभागादिसे घटादिद्रव्यनाशके पहलें
देशान्तर विभाग उत्पन्न नहीं होसकता; क्योंकि आरम्भकसंयोगके ( प्रतिद्वंद्वि )
विरोधिविभागवाले कपालादि अवयवका ( सति द्रव्ये ) द्रव्यनाशके बिना देशान्तरकें
साथ विभाग होना असम्भव है १ ।
द्वितीयस्तावत् । यत्र हस्तक्रियया हस्ततरुविभागस्ततः शरी-
रेडपि विभक्तप्रत्ययो भवति तत्र च शरीरतरुविभागे हस्तक्रिया
न कारणं व्यधिकरणत्वात्,शरीरे तु क्रिया नास्त्येव,अवयविका
र्मणो यावदवयवकर्मनियतत्वात् । अतस्तत्र कारणाकारणवि-
भागेन कार्याकार्यविभागो जन्यत इति । २ ।
भाषा-एवं द्वितीयका उदाहरण जैसे जहां(हस्त)हाथमें क्रिया होनेसे हाथ वृक्षका
विभाग हुआहै. पश्चात् उसीसे शरीरमेंभी विभक्त (प्रत्यय) प्रतीति होतीहै, वहां शरीर
वृक्षके विभागमें हस्तक्रियाको कारणता नहीं है क्योंकि इन दोनोंका परस्पर एक
अधिकरण नहीं है और कार्यकारणभाव नियमसे समानाधिकरण पदार्थोंहीका होताहै-

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २५५
शरीरवृक्षके विभागके प्रति शरीरक्रियाको कारणता कहें तो वहभी ठीक नहीं क्योंकि
शरीरमें क्रिया हुईही नहीं. भाव यह कि-अवयवीके यावत् अवयवोंमें क्रिया होनेसे
अवयवीमें क्रिया मानी जातीहै, अन्यथा नहीं; इसलिये ऐसे स्थलमें कारणाकारणके
विभागसे कार्याकार्यविभागका उत्पन्न होनाही मानने योग्य है अर्थात् हस्तवृक्षके
विभागहीसे शरीरवृक्षका विभाग उत्पन्न हुआ मानना चाहिये. हस्तवृक्षके विभाग
होनेहीसे शरीरमेंभी विभक्तप्रत्यय होताहै ॥ ३ ॥
अत एव विभागो गुणन्तरम् । अन्यथा शरीरे विभक्तप्रत्ययो न
स्यात्। अतः संयोगनाशेन विभागो नान्यथासिद्धो भवति ॥ १२० ॥
भाषा-इसीलिये विभागभी गुणान्तर है, किन्तु संयोगनाशरूप नहीं है. (अन्यथा)
यदि गुणान्तर न मानें किन्तु संयोग नाशरूपही मानें तो शरीरमें विभक्तप्रत्यय नहीं
होना चाहिये इसलिये संयोगनाशसे विभाग अन्यथा सिद्ध नहीं है ॥ १२० ॥
परापरव्यवहारनिमित्ते परत्वापरत्वे निरूपयति, परत्वं चेति--
भाषा-एवं ' परत्वं ' इत्यादि ग्रन्थसे परापर व्यवहारके निमित्त कारणीभूत
परत्व तथा अपरत्वका निरूपण करतेहैं-
परत्वं चापरत्वं च द्विविधं परिकीर्तितम् ॥
दैशिकं कालिकं चेति मूर्त्त एव तु दैशिकम्॥१२१॥
परत्वं मूर्त्तसंयोगभूयस्त्वज्ञानतो भवेत् ॥
अपरत्वं तदल्पत्वबुद्धितः स्यादितीरितम् ॥१२२॥
भाषा-दैशिक कालिक भेदसे परत्व तथा अपरत्व दोप्रकारका कहा है. उनमेंसे
दैशिक परत्वापरत्व तो मूर्त्तपदार्थहीमें रहते हैं ॥ १२१ ॥ अधिकमूर्त्तसंयोगज्ञा-
नसे परत्व उत्पन्न होताहै. एवं उससे ( अल्प ) न्यून मूर्त्तसंयोगज्ञानसे अपरत्व
उत्पन्न होताहै ॥ १२२ ॥
दैशिकमिति । दैशिकपरत्वं बहुतरमूर्त्तसंयोगान्तरितत्वज्ञानादु-
त्पद्यते । एवं तदल्पीयस्त्वज्ञानादपरत्वमुत्पद्यते । अत्रावधि-
त्वार्थं पञ्चम्यपेक्षा । यथा पाटलिपुत्रात् काशीमपेक्ष्य प्रयागः
परः, पाटलिपुत्रात् कुरुक्षेत्रमपेक्ष्य प्रयागोऽपर इति ॥ १२१॥ १२२॥
भाषा--अनेक मूर्त्तपदार्थोंके परस्पर संयोगसंयोगान्तरज्ञानसे दैशिकपरत्व उत्पन्न
होताहै . एवं परत्वउत्पादक संयोगसंयोगान्तरकी अपेक्षा न्यूनसंयोगसंयोगान्तेक

३५६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
ज्ञानसे अपरत्व उत्पन्न होताहै. यहां अवधिज्ञानार्थ पञ्चमीविभक्तिकी अपेक्षा है; जैसे
( पाटलिपुत्रात् ) “पटनाकी अवधि मानकर काशीकी अपेक्षा प्रयाग परे है अर्थात्
पटनेमें स्थित पुरुषको काशीकी अपेक्षा प्रयाग दूर है. एवं पटनेहीमें स्थित पुरुषको
कुरुक्षेत्रकी अपेक्षा प्रयाग अपर है अर्थात् समीप है.” इत्याकारक व्यवहारके असा-
धारण निमित्तभूत मूर्तपदार्थोंमें परत्वापरत्व ये दो धर्म रहते हैं ॥ १२१ ॥ १२२ ॥
तयोरसमवायी तु दिक्संयोगस्तदाश्रये ॥
भाषा-उन दैशिक परत्वापरत्वोंका असमवायिकारण दैशिक परत्वापरत्व
आश्रयके साथ दिशाका संयोगरूपही है.
तयोर्दैशिकपरत्वापरत्वयोः । असमवायी असमवायिकारणम् ।
तदाश्रये दैशिकपरत्वापरत्वाश्रये ।
भाषा-मूलनिष्ठ ‘तयोः’ इस पदसे दैशिक परत्वापरत्त्वका ग्रहण है. एवं
‘असमवायी’ पदसे असमवायिकारणका ग्रहण है. ‘तदाश्रये’ इस पदसे दैशिक
परत्वापरत्वके आश्रय अर्थात् पूर्वोक्तरीतिसे जिन प्रयागादि स्थलोंमें दैशिक परत्वाप-
रत्व उत्पन्न होताहै उसका ग्रहण है.
दिवाकरपरिस्पन्दभूयस्त्वज्ञानतो भवेत् ॥ १२३॥
परत्वमपरत्वं तु तदीयाल्पत्वबुद्धितः ॥
भाषा-एवं सूर्यक्रियाके भूयस्त्वज्ञानसे कालिकपरत्व उत्पन्न होताहै ॥ १२३ ॥
तथा सूर्यक्रियाके अल्पीयस्त्वज्ञानसे कालिकअपरत्व उत्पन्न होताहै.
दिवाकरेति । अत्र परत्वमपरत्वं च कालिकं ग्राह्यम् । यस्य
सूर्यपरिस्पन्दापेक्षया यस्य सूर्यपरिस्पन्दोऽधिकः स ज्येष्ठः, यस्य
न्यूनः स कनिष्ठः । कालिकपरत्वापरत्वे जन्यद्रव्य एव ।
भाषा-( अत्र ) इस प्रकरणमें ‘परत्व’ तथा ‘अपरत्व’ कालिक जानना
चाहिये. ( यस्य ) जिस पीछे उत्पन्न हुए पदार्थके साथ सूर्यक्रियाकी अपेक्षासे
( यस्य ) जिस प्रथम उत्पन्न हुए पदार्थसे सूर्य्यकी क्रिया अधिक सम्बन्ध रखतीहै
वह पदार्थ ज्येष्ठ है अर्थात् अधिक आयुवाला है. एवं जिससे जिसमें न्यून सम्बन्ध
रखतीहै वह उससे कनिष्ठ है अर्थात् कम आयुःवाला है यह कालिक परत्वापरत्व
व्यवहार केवल जन्यद्रव्यहीमें होताहै, औरपदार्थोंमें नहीं होता.
अत्र त्वसमवायी स्यात्संयोगः कालपिण्डयोः १२४॥

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता, २५७
अत्र कालिकपरत्वापरत्वयोः ॥ १२४ ॥
भाषा-( अत्र ) इस कालिक परत्वापरत्वमें काल ( पिण्ड ) जन्यद्रव्यके संयो-
गको असमवायिकारणता है ॥ १२४ ॥
अपेक्षाबुद्धिनाशेन नाशस्तेषां निरूपितः ॥
तेषां कालिकदैशिकपरत्वापरत्वानाम् ।
भाषा-उन कालिक तथा दैशिक परत्वापरत्वोंका अपेक्षाबुद्धिके नाश होनेसे
नाश होताहै.
क्रमप्राप्तां बुद्धिं निरूपयितुमाह, । बुद्धेरिति-
भाषा-यहां ' बुद्धेः ' इत्यादि ग्रन्थसे क्रमप्राप्त बुद्धिका निरूपण करतेहैं-
बुद्धेः प्रकारः प्रागेव प्रायशो विनिरूपितः ॥ १२५ ॥
अथावशिष्टोऽप्यपरः प्रकारः परिदर्श्यते ॥
अप्रमा च प्रमा चेति ज्ञानं द्विविधमिष्यते ॥१२६॥
भाषा-बुद्धिका प्रकार तो हम बहुलरूपसे पीछे आत्मनिरूपणहीमें कह चुकेहैं
॥ १२५ ॥ परन्तु उसमें जितना कुछ थोड़ासा ( अविशिष्ट ) बाकी है वह यहांभी
दिखलातेहैं. अप्रमा तथा प्रमाभेदसे ज्ञान दोप्रकारका होताहै ॥ १२६ ॥
अप्रमां निरूपयति, तच्छून्य इति-
भाषा-यहां ' तच्छून्ये ' इत्यादि मूलग्रन्थसे अप्रमाज्ञानका निरूपण करतेहैं-
तच्छून्ये तन्मतिर्या स्यादप्रमा सा निरूपिता ॥
तत्प्रपञ्चो विपर्यासः संशयोऽपि प्रकीर्तितः ॥१२७॥
भाषा-( तत् ) रजतत्वादिधर्माभाववाली शुक्तिमें जो ( तन्मतिः ) "रजतत्ववद्
रजतं " इत्याकारक बुद्धि, ऐसी बुद्धिका नाम 'अप्रमा' है. विपर्यय तथा संशय
आत्मकज्ञान उसी अप्रमाआत्मक बुद्धिहीका प्रपञ्च समझना चाहिये ॥ १२७ ॥
तदभाववति तत्प्रकारकं ज्ञानं भ्रम इत्यर्थः । तत्प्रपञ्चो
ऽप्रमाप्रपञ्चः ॥ १२५ ॥ १२६ ॥ १२७ ॥
भाषा-अर्थात् तद्धर्माभाववालेमें जो तद्धर्मप्रकारक ज्ञान उस ज्ञानका नाम 'भ्रम'
है. मूलगत 'तत्प्रपञ्चः' इस पदसे अप्रमाज्ञानका प्रपञ्च समझना चाहिये ॥ १२७ ॥
आद्यो देहेष्वात्मबुद्धिः शङ्खादौ पीततामतिः ॥

२५८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भवेन्निश्चयरूपा या-
आद्य इति, विपर्यास इत्यर्थः ।
भाषा-देहमें आत्मबुद्धि, तथा शंखमें पीतबुद्धि, शुक्तिमें रजतबुद्धि, इत्यादि
यदि निश्चयरूपा होय तो उस बुद्धिका नाम 'विपर्ययज्ञान' है.
शरीरादौ यदात्मत्वप्रकारकं ज्ञानं गौरोऽहमित्याकारकमेवं श-
ङ्खादौ 'पीतः शङ्खः' इत्याकारकं यज्ज्ञानं निश्चयरूपं तद्भ्रम इति ।
भाषा-शरीरादिमें जो "गौरोऽहं, श्यामोऽहं" इत्याकारक आत्मत्वप्रकारक
ज्ञान तथा शंखादिमें जो "पीतः शंखः" इत्याकारक पीतत्वप्रकारक ज्ञान यह
यदि निश्चयरूप होय तो उसका नाम 'भ्रम' है-इति ।
-संशयोऽथ प्रदर्श्यते ॥ १२८॥
किंस्विन्नरो वा स्थाणुर्वेत्यादिबुद्धिस्तु संशयः ॥
भाषा-अब संशयात्मक ज्ञानका आकार दिखलातेहैं कि-॥ १२८ ॥ क्या यह
पुरुष है कि स्थाणु है? इत्यादि ज्ञानका नाम 'संशय' है.
किंस्विदिति वितर्के।
भाषा-मूलगत 'किंस्वित्' यह पद वितर्कका बोधक है तथा 'स्थाणुः' यह पद
शाखाच्छिन्नवृक्षका बोधक है. भाव यह कि-'एकस्मिन् धर्मिणि विरुद्धनानाधर्मावगाहि
ज्ञान' का नाम 'संशय' है. उदाहरण इसका 'किंस्वित्' इत्यादि ग्रन्थसे
मूलहीमें है.
निश्चयस्य लक्षणमाह, तद्भावेति-
भाषा-एवं 'तदभाव' इत्यादि ग्रन्थसे प्रमात्मक निश्चयज्ञानका लक्षण कहतेहैं-
तदभावाप्रकाराधीस्तत्प्रकारा तु निश्चयः ॥ १२९ ॥
भाषा-जो धर्म जिसमें नहीं रहता वह उसमें न भासे किन्तु जो धर्म जिस
वस्तुमें विद्यमान है तद्धर्मप्रकारक ज्ञानही होय तो उसका नाम 'निश्चय' अर्थात्
'प्रमाज्ञान' है ॥१२९॥
तदभावाप्रकारकत्वे सति तत्प्रकारकं ज्ञानं निश्चयः॥१२८॥१२९॥
भाषा-अर्थात् शुक्तित्वादि धर्माभावाप्रकारकत्वे सति जो शुक्तित्वप्रकारक
शुक्तिविशेष्यक 'शुक्तिरियं' इत्यादि ज्ञान, उसका नाम 'निश्चय' है; इस लक्षणमें प्रथम
सप्तम्यन्त विशेषण संशयमें अतिव्याप्तिवारणार्थ जानना चाहिये ॥१२८॥१२९॥