न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-मूलमें 'सन्निपात' यह शब्द संयोगका वाचक है. एवं द्वितीयशब्द
उभयक्रियाजन्य संयोगपर है ॥ ११५ ॥ ११६ ॥ ११७ ॥ (तृतीय इति) अर्थात्
संयोगसे उत्पन्न होनेवाला संयोग मूलघटित 'तृतीयः स्यात्' इस भागका पूर्वके
पदोंके साथ अन्वय है.
-कर्मजोऽपि द्विधैव परिकीर्तितः ॥
अभिघातो नोदनं च शब्दहेतुरिहादिमः॥ ११८ ॥
शब्दाहेतुर्द्वितीयः स्यात्-
भाषा-वह क्रियाजन्य संयोग फिर दो प्रकारका है. एक अभिघाताख्य संयोग
है; और दूसरा नोदनाख्य है. जिस संयोगके होनेसे शब्द होय वह अभिघाताख्य
संयोग है ॥ ११८ ॥ एवं जिसके होनेसे शब्द न होय वह नोदनाख्य संयोग है.
आदिमोऽभिघातः ॥ ११८ ॥ द्वितीयो नोदनाख्यः संयोग इति ।
भाषा-मूलमें 'आदिम' शब्दसे अभिघाताख्य संयोगका ग्रहण है ॥ ११८ ॥
तथा 'द्वितीय' शब्दसे नोदनाख्यसंयोगका ग्रहण है.
विभक्तप्रत्ययासाधारणं कारणं विभागं निरूपयति, विभाग इति-
भाषा-एवं 'विभाग' इत्यादि ग्रन्थसे विभक्तप्रत्ययके असाधारण कारणीभूत
विभागका निरूपण करतेहैं-
-विभागोपि त्रिधा भवेत् ॥
एककर्मोद्भवस्त्वाद्यो द्वयकर्मोद्भवोऽपरः॥ ११९ ॥
विभागजस्तृतीयः स्यात्तृतीयोऽपि द्विधा भवेत् ॥
हेतुमात्रविभागोत्थो हेत्वहेतुविभागजः ॥ १२० ॥
भाषा-एवं संयोगकी तरह विभागभी तीन प्रकारका है. उनमें प्रथम एककी
क्रियासे उत्पन्न होताहै; दूसरा दोनोंकी क्रियासे उत्पन्न होताहै ॥११९॥ और तीसरा
विभागसे विभाग उत्पन्न होताहै. वह तीसरा फिर दोप्रकारका है. पहला केवल
कारणमात्रके विभागसे उत्पन्न होताहै और दूसरा कारणाकारण उभयके विभागसे
उत्पन्न होताहै ॥ १२० ॥
एककर्मेति । उदाहरणं तु श्येनशैलविभागादिकं पूर्ववद्बोध्यम् ॥
॥ ११९ ॥ तृतीयो विभागजः कारणमात्रविभागजन्यः कारणा-
कारणविभागजन्यश्चेति । आद्यस्तावत्-यत्र कपाले कर्म ततः