न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
गविरोधिविभागभी मान लिया जाय तो उस विभागसे कमलके आरम्भकसंयोगके
नाश होनेके पश्चात् कमलका विनाशभी हुआ चाहिये परन्तु ऐसा होता देखनेमें
नहीं आता.
तस्माद्यदीदमनारम्भकसंयोगप्रतिद्वन्द्विविभागं जनयेत्, तदा
आरम्भकसंयोगप्रतिद्वन्द्विविभागं न जनयेत् ।
भाषा-इसलिये आरम्भकसंयोगविरोधि विभागजनक क्रियाको तथा अनारम्भ-
कसंयोगविरोधि विभागजनक क्रियाको एक मानना उचित नहीं है;किन्तु यही मानना
उचित है कि-क्रिया जिस कालमें अनारम्भकसंयोगविरोधि विभागको उत्पन्न करती है
उस कालमें आरम्भक संयोगके विरोधिविभागको नहीं उत्पन्न करती.
न च कारणविभागेनैव द्रव्यनाशात्पूर्वं कुतो देशान्तरविभागो
न जन्यत इति वाच्यम्। आरम्भकसंयोगप्रतिद्वन्द्विविभागवतो
ऽवयवस्य सति द्रव्ये देशान्तरविभागसम्भवात् ॥ १ ॥
शंका-कारणविभागहीसे अर्थात् कपालद्वयविभागादिहीसे घटादि द्रव्यनाशसे
पहले देशान्तरविभागभी क्यों नहीं उत्पन्न होता ? यदि होता है तो "ततो घटनाशः,
ततस्तैनैक कपालविभागेन सकर्मणः कपालस्याकाशविभागो जन्यते" यह पूर्वकथन
आपका असङ्गत होगा. समाधान-कपालद्वय विभागादिसे घटादिद्रव्यनाशके पहलें
देशान्तर विभाग उत्पन्न नहीं होसकता; क्योंकि आरम्भकसंयोगके ( प्रतिद्वंद्वि )
विरोधिविभागवाले कपालादि अवयवका ( सति द्रव्ये ) द्रव्यनाशके बिना देशान्तरकें
साथ विभाग होना असम्भव है १ ।
द्वितीयस्तावत् । यत्र हस्तक्रियया हस्ततरुविभागस्ततः शरी-
रेडपि विभक्तप्रत्ययो भवति तत्र च शरीरतरुविभागे हस्तक्रिया
न कारणं व्यधिकरणत्वात्,शरीरे तु क्रिया नास्त्येव,अवयविका
र्मणो यावदवयवकर्मनियतत्वात् । अतस्तत्र कारणाकारणवि-
भागेन कार्याकार्यविभागो जन्यत इति । २ ।
भाषा-एवं द्वितीयका उदाहरण जैसे जहां(हस्त)हाथमें क्रिया होनेसे हाथ वृक्षका
विभाग हुआहै. पश्चात् उसीसे शरीरमेंभी विभक्त (प्रत्यय) प्रतीति होतीहै, वहां शरीर
वृक्षके विभागमें हस्तक्रियाको कारणता नहीं है क्योंकि इन दोनोंका परस्पर एक
अधिकरण नहीं है और कार्यकारणभाव नियमसे समानाधिकरण पदार्थोंहीका होताहै-