न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-गौतमादि नैयायिकोंके सिद्धान्तमें तो द्वयणुकादि अवयवोंमेंभी अग्निसं-
योगसे पाक होसकताहै परमाणुपर्यंत धावन करनेका कुछ प्रयोजनही नहीं, उनके
हृदयका भाव यह है कि-घटादि अवयवी सदा छिद्रयुक्तही रहतेहैं; उन छिद्रोंमें
अग्निके सूक्ष्म अवयव प्रवेश कर जातेहैं; इसलिये परस्पर मिले मिलाये अवयवीरूप
अवयवोंमेंभी पाक मान लेनेमें कुछ विरोध नहीं है. एवं वैशेषिकके मतमें अनन्त
अवयवी तथा उसका ध्वंस कल्पनेमें गौरवभी है.
इत्थं च 'सोऽयं घटः' इत्यादिप्रत्यभिज्ञापि संगच्छते । यत्र तु न
प्रत्यभिज्ञा तत्रावयविनाशोऽपि स्वीक्रियत इति ।
भाषा-इस रीतिसे जब अवयवीका विनाश अङ्गीकार न किया तो “सोऽयं घटः”
इत्याकारक प्रत्यभिज्ञाज्ञानभी बन सकता है अर्थात् यदि अवयवी अग्निसंयोगसे विनष्ट
होकर दूसरा उत्पन्न होय तो “ सोऽयं घटः” यह प्रत्यभिज्ञाज्ञान नहीं हुआ चाहिये
परन्तु होता तो है. इसलिये अग्निसंयोगसे अवयवीका विनाश मानना उचित नहीं परन्तु
जहां ' सोऽयं ' इत्यादि प्रत्यभिज्ञात्मक बुद्धि नहीं होती वहां अवयवीका अग्निआदि-
संयोगसे विनाशभी हमको स्वीकार है-इति ।
संख्यां निरूपयितुमाह, गणनेति -
भाषा-' गणना' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार संख्याका निरूपण करतेहैं-
गणनाव्यवहारे तु हेतुः संख्याऽभिधीयते ॥१०६॥
भाषा-गणनाव्यवहारमें हेतुभूत गुणका नाम संख्या है ॥ १०६ ॥
गणनव्यवहारासाधारणकारणं संख्येत्यर्थः ॥ १०६ ॥
भाषा-अर्थात् परिगणनरूप व्यवहारका असाधारण कारणरूप संख्यात्मक
गुण है ॥१०६॥
नित्येषु नित्यमेकत्वमनित्येऽनित्यमिष्यते ॥
भाषा-उसमें एकत्वरूप संख्या नित्यपदार्थोंमें नित्य है तथा अनित्यपदार्थोंमें
अनित्य है.
नित्येष्विति । नित्येषु परमाण्वादिष्वेकत्वं नित्यम् । अनित्ये
घटादावेकत्वमनित्यमित्यर्थः ।
भाषा-अर्थात् परमाणु आदि नित्यपदार्थोंमें एकत्व नित्य है तथा घटादि अनि-
त्योंमें एकत्व अनित्य है.