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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 267, कुल 350 में से

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पृष्ठ 267

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २४३
अतएव तत्पुरुषीयापेक्षाबुद्धिजन्यद्वित्वादिकं तेनैव गृह्यत इति
कल्प्यते ।
भाषा-( अतएव ) पूर्वोक्त युक्तिसे अपेक्षाबुद्धिको अवश्य द्वित्वादिउत्पादकता
है; इसीलिये यहभी कल्पना होती है कि-उस उस पुरुषकी अपेक्षाबुद्धिसे उत्पन्नहुए
द्वित्वादिको वही वही पुरुष ग्रहण करसकता है; दूसरा नहीं.
न चापेक्षाबुद्धेर्द्वित्वप्रत्यक्षे कारणत्वमस्त्विति वाच्यम्, लाघवेन
द्वित्वं प्रति कारणत्वस्यैवोचितत्वात् । अतीन्द्रिये द्व्यणुकादाव-
पेक्षाबुद्धिर्योगिनाम्, सर्गादिकालीनपरमाण्वादावीश्वरीयापेक्षाबु-
द्धिर्ब्रह्माण्डान्तरवर्तियोगिनामपेक्षाबुद्धिर्वा द्वित्वादिकारणमिति ।
शंका-अपेक्षाबुद्धिको यदि द्वित्वादि उत्पत्तिके प्रति कारणता न मानें किन्तु
केवल द्वित्वादि प्रत्यक्षके प्रतिही कारणता मानें तो हानि क्या है ? समाधान-
लाघवानुरोधसे द्वित्वादिके प्रतिही अपेक्षाबुद्धिको कारणता माननी उचित है अर्थात्
' द्वित्वप्रत्यक्षत्व ' की अपेक्षासे ' द्वित्वत्व ' रूप धर्मको कार्यतावच्छेदक माननेमें
लाघव है. द्व्यणुकादि अतीन्द्रियपदार्थोंमें योगी लोगोंकी अपेक्षाबुद्धि होती है. सृष्टिके
आदिकालमें परमाणु आदिकोंमें ईश्वरकी अपेक्षाबुद्धि होती है अथवा दूसरे ब्रह्माण्डमें
होनेवाले योगीलोगोंकी अपेक्षाबुद्धि द्वित्वादिका कारण होती है-इति ॥१०८॥
अपेक्षाबुद्धिः केत्यत आह, अनेकेति-
शंका-वह अपेक्षाबुद्धि कैसी होती है ?
अनेकैकत्वबुद्धिर्या साऽपेक्षाबुद्धिरुच्यते ॥
समा०-अनेक पदार्थोंमें एकत्वअवगाहन करनेवाली बुद्धिका नाम 'अपेक्षाबुद्धि' है.
'अयमेकोऽयमेकः' इत्याकारिकेत्यर्थः । इदं तु बोध्यम् । यत्रानि-
यतैकत्वज्ञानं तत्र द्वित्वादिभिन्ना बहुत्वसंख्योत्पद्यते यथा सेना-
वनादाविति कन्दलीकारः ।
भाषा-अर्थात् अनेक पदार्थोंमें “ अयमेकोऽयमेकः ” इत्याकारक बुद्धिका नाम
'अपेक्षाबुद्धि' है. यहांपर यह भेदभी जानने योग्य है कि-' कन्दली ' नामक
ग्रंथका कर्ता श्रीधर पंडित तो यह कहता है कि-जिस स्थलमें एकत्वका ज्ञान
अनियत है अर्थात् नियमपूर्वक नहीं होता उस स्थलमें द्वित्वादि भिन्न बहुत्वसंख्या-