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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 277, कुल 350 में से

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पृष्ठ 277

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २५३
कपालद्वयविभागस्ततो घटारम्भकसंयोगनाशस्ततो घटना-
शस्ततस्तेनैव कपालविभागेन स्वकर्मणः कपालस्याकाशवि-
भागो जन्यते, तत आकाशसंयोगनाशः, तत उत्तरदेशसंयोग-
स्ततः कर्मनाश इति ।
भाषा-तीनों प्रकारके विभागके उदाहरणभी पीछे लिखे तीनों प्रकारके संयोगकी
तरहही जानने चाहिये अर्थात् श्येन शैलादिका विभाग अन्यतरक्रियाजन्य है
तथा मेषद्वयका विभाग उभयक्रियाजन्य है और तीसरा विभागजविभाग दोप्रकारका
है. एक कारणमात्र विभागजन्य है, दूसरा कारणाकारणविभागजन्य है; उनमें प्रथमका
उदाहरण जैसे पहले कपालमें क्रिया हुई उस क्रियासे कपालद्वयका विभाग हुआ,
उस विभागसे पीछे घटके आरम्भक कपालद्वयके संयोगका विनाश हुआ पीछे
घटका नाश हुआ, उससे पीछे उसी कपालद्वयविभागसे पूर्वोक्त क्रियायुक्त कपाल-
का आकाशके साथ विभाग उत्पन्न होता है; उससे पीछे आकाशसंयोगका विनाश
होता है, उससे पीछे कपालका उत्तर देशके साथ संयोग होता है. उससे पीछे
कपालगत क्रियाका विनाश होता है-इति ।
न च तेन कर्मणैव कथं देशान्तरविभागो न जन्यत इति वा-
च्यम् । एकस्य कर्मण आरम्भकसंयोगप्रतिद्वन्द्विविभागजनक-
त्वस्यानारम्भकसंयोगप्रतिद्वन्द्विविभागजनकत्वस्य च विरोधात् ।
शंका-उस कपालद्वयविभागजनक प्रथमक्रियाहीसे यदि ( देशान्तर ) कपाला-
काशादि विभागभी मान लियाजाय तो हानि क्या है? अर्थात् वह प्रथमक्रियाही
कपालाकाशादि देशान्तर विभागकोभी उत्पन्न क्यों नहीं करती? उसके लिये जुदा
कपालद्वयविभागमें कारणता कल्पनेकी कौन आवश्यकता है. समाधान-एक
क्रियामें ( आरम्भकसंयोग ) कपालद्वय संयोगादिविरोधि विभागजनकता तथा
( अनारम्भकसंयोग ) कपालाकाशसंयोगादि विरोधिविभागजनकता नहीं रहती
क्योंकि इन दोनों धर्मोंका परस्पर विरोध है.
अन्यथा विकसत् कमलकुड्मलभङ्गप्रसङ्गात् ।
भाषा-( अन्यथा ) यदि आरम्भकसंयोगविरोधि विभागजनक क्रियाको तथा
अनारम्भकसंयोगविरोधि विभागजनक क्रियाको एकही मानें तो विकसत्कमलके
कुड्मलका भङ्ग होजाना चाहिये अर्थात् खिलते हुए कमलकी डोड़ी टूट जानी
चाहिये. यहां भाव यह है कि-खिलतेहुए कमलमें अग्रावच्छेदेन अनारम्भक संयोगके
विरोधिविभागकी जनका क्रिया है, उसी क्रियासे यदि मूलावच्छेदेन आरम्भकसंयो-