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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 268, कुल 350 में से

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पृष्ठ 268

२४४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
की उत्पत्ति होती है. जैसे सेना सभादि पुरुषसमूहमें या वनवाटिकादि वृक्षसमूहमें
एकत्वज्ञान अनियत है; इसलिये इत्यादि स्थलोंमें द्वित्वादिविन्न बहुत्वसंख्याकी
उत्पत्ति होती है-इति
आचार्यास्तु त्रित्वादिकमेव बहुत्वं मन्यन्ते, तथाच त्रित्वत्वा-
दिव्यापिका बहुत्वत्वजातिर्नातिरिच्यते । सेनावनादौ चोत्पन्ने-
ऽपि त्रित्वादौ त्रित्वत्वायग्रहो दोषात् ।
भाषा-और उदयनाचार्य तो यह कहते हैं कि-त्रित्वादिहीका नामान्तर 'बहुत्व' है;
बहुत्व कोई त्रित्वादिसे पृथक् धर्म नहीं है. एवं त्रित्वादि धर्मोंकी व्यापकीभूता
बहुत्वत्वरूपा जातिभी कोई अतिरिक्त नहीं है. सेनावनादिकोंमेंभी त्रित्वादि उत्पन्न
तो होतेहैं परन्तु उनमें नियतानेक एकत्वज्ञानाभावरूप दोषके प्रभावसे त्रित्वत्वादि
धर्मोंका ग्रहण नहीं होता.
इत्थं च 'इतो बहुतरेयं सेना' इति प्रतीतिरूपपद्यते, बहुत्वस्य सं-
ख्यान्तरत्वे तु तत्ततारतम्याभावान्नोपपद्येतेत्यवधेयम् ।
भाषा-(इत्थञ्च) ऐसे मन्तव्यसे "इतो बहुतरेयं सेना" अर्थात् इस सेनासे
इस द्वितीय सेनाके बहुत्वमें स्वसजातीयनिरूपित उत्कर्ष प्रतीत होता है. इस
प्रतीतिकीभी उपपत्ति होसकती है; परन्तु यदि बहुत्वको त्रित्वादिसे संख्यान्तर
मानें तो उसकी अपने आपमें न्यून अधिकता कुछ नहीं बन सकती, इसलिये
"इतो बहुतरेयं सेना" इस प्रतीतिका उपपन्न होना दुर्घट है-इति ।
परिमाणं निरूपयति, परिमाणमिति-
भाषा-'परिमाणं' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार परिमाणका निरूपण करतेहैं-
परिमाणं भवेन्मानव्यवहारस्य कारणम् ॥१०९॥
अणु दीर्घं महद्ह्रस्वमिति तद्भेद ईरितः ॥
भाषा-मानव्यवहारके कारणीभूतका नाम 'परिमाण' है ॥ १०९ ॥ वह परिमाण
अणु दीर्घ महत् तथा ह्रस्व भेदसे चार प्रकारका है.
परिमितिव्यवहारासाधारणं कारणं परिमाणमित्यर्थः ॥ १०९ ॥
तच्चतुर्विधम्, अणु महद्दीर्घं ह्रस्वं च । इदं चातुर्विध्यं प्रत्यक्षसि-
द्धम् । तत्राणुत्वह्रस्वत्वे महत्त्वदीर्घत्वे च समनियते ।
भाषा-अर्थात् "इदं अणु, इदं महत्" इत्याकारक जो (परिमिति) परिमापण