न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें.२४८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
न च पटविनाशेऽपि तन्त्वन्तरसंयोगात् परिमाणाधिक्यं न
स्यादिति वाच्यम् । तत्रापि वेमाद्यभिघातेनासमवायिकारणत-
न्तुसंयोगनाशात् पटनाशस्यावश्यकत्वात् ।
शंका-दोचार तन्तुओंके निकलनेसे पटके विनाश होनेपरभी उस पटमें यदि तन्तु
अन्तरका संयोग होय तो वही पट अधिक परिमाणवाला होजाताहै, वह नहीं हुआ
चाहिये. समाधान-ऐसे स्थलमेंभी वेमादिके अभिघाताख्य संयोगसे पटका अस-
मवायिकारण जो परस्पर तन्तुद्वयसंयोग उसका नाशः होताहै; इसलिये पटका
विनाशभी अवश्यही मानना चाहिये.
किंच तन्त्वन्तरस्य तत्पटावयवत्वे पूर्वं तत्पट एव न स्यात्,
तन्त्वन्तररूपकारणाभावात् । तन्त्वन्तरस्यावयवत्वाभावे च
न तेन परिमाणाधिक्यं संयुक्तद्रव्यान्तरवत् ।
भाषा-( किञ्च ) तन्तुअन्तरभी यदि उसी पूर्वपटके अवयवही मान लिये जांय
तो उन तन्तुओंके सम्बन्धसे पहले वह पटही नहीं होना चाहिये; क्योंकि स्वस-
म्बन्धसे प्रथम तन्तुअन्तररूप कारण विद्यमानही नहीं है और यदि तन्तुअन्तरको
उस पटका ( अवयव ) समवायिकारणही नहीं मानें तो उनसे पटपरिमाणके अधिक
होनेकी संयुक्तद्रव्यकी तरह शंकाही नहीं होसकती अर्थात् जैसे घटपटादिके परस्पर
संयोगसे घटके या पटके परिमाणको अधिक कोई नहीं मानता किन्तु संयुक्तमात्र
व्यवहार करतेहैं वैसेही तन्तुअन्तरके सम्बन्धसे प्रथम पटमेंभी समझना चाहिये.
तस्मात्तत्र तंत्वन्तरसंयोगे सति पूर्वं पटनाशस्ततः पटान्तरोत्प-
त्तिरित्यवश्यं स्वीकार्यम् । अवयविनः प्रत्यभिज्ञानं तु साजात्येन
दीपकलिकादिवत् !
भाषा-इसलिये ऐसे स्थलमें यही सिद्धान्त अवश्य मानना उचित है कि, तन्तु
अन्तरके संयोग होनेसे उस पूर्वपटका विनाश हुआहै और नूतन पटान्तरकी उत्पत्ति
हुई है. एवं “ स एवायं पटः ” इत्यादि प्रत्यभिज्ञाज्ञानका निर्वाह दीपशिखाकी तरह
सजातीयके अवगाहन करनेवाला समझना चाहिये अर्थात् जैसे क्षण२ में बदलती हुई
दीपशिखामें “ यह वही दीपशिखाप्रज्वलित है” इत्याकारक साजात्यावलम्बी प्रत्यय
लोकमें सर्वानुभवसिद्ध है; वैसेही प्रकृतमेंभी जानना चाहिये.