न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-प्रथम क्षणमें "अयमेकः अयमेकः" इत्याकारक अपेक्षाबुद्धि उत्पन्न
होतीहै. दूसरे क्षणमें उस अपेक्षाबुद्धिसे द्वित्वकी उत्पत्ति होतीहै. तीसरे क्षणमें द्वित्वके
द्वित्वत्वरूप विशेषण का निर्विकल्पात्मक "इमे द्वित्वद्वित्वत्वे" इत्याकारक ज्ञान होता-
है. चौथे क्षणमें द्वित्वत्वविशिष्ट द्वित्वका लौकिक प्रत्यक्ष तथा अपेक्षाबुद्धिका विनाश
होताहै, पीछे पञ्चमक्षणमें द्वित्वादिका विनाश होताहै.
यद्यपि ज्ञानान्तरं द्विक्षणमात्रस्थायि, योग्यविभुविशेषगुणानां
स्वोत्तरवर्त्तिगुणनाश्यत्वात् । तथाप्यपेक्षाबुद्धेस्त्रिक्षणस्थायित्वं
कल्प्यते, अन्यथा निर्विकल्पककालेऽपेक्षाबुद्धिनाशानन्तरं
द्वित्वस्यैव नाशः स्यान्न तु द्वित्वप्रत्यक्षम्,तदानीं विषयाभावात्,
विद्यमानस्यैव चक्षुरादिना ज्ञानजननोपगमात् । तस्माद्वित्वप्र-
त्यक्षादिकमपेक्षाबुद्धेर्नाशकं कल्प्यते ।
भाषा-यद्यपि और साधारण यावत् ज्ञान द्विक्षणमात्र स्थित रहतेहैं, क्योंकि
यह नियम है कि-प्रत्यक्षके योग्य विभुके विशेषगुण स्वउत्तरवर्ति विभु विशेषगुणसे
नाश हुआ करतेहैं तथापि अपेक्षाबुद्धिकी तीनक्षण स्थितिकी कल्पना करनी पड़तीहै
(अन्यथा) यदि तीन क्षण स्थितिकी कल्पना न करें अर्थात् और ज्ञानोंकी तरह
द्विक्षणस्थायिही अपेक्षाबुद्धिभी मानें तो द्वित्वत्वनिर्विकल्परूप ज्ञानकालहीमें
अपेक्षाबुद्धिके नाशके अनन्तर द्वित्वकाभी नाश होगा तो द्वित्वका साक्षात्कार नहीं
होसकेगा; क्योंकि उस कालमें द्वित्वआत्मकविषय नहीं रहाहै और चक्षुरादि
इन्द्रियद्वारा विद्यमान विषयकाही ज्ञान होताहै. यह वार्ता सभी विद्वानोंके सम्मत
है. इसलिये द्वित्वादिका साक्षात्कारही अपेक्षाबुद्धिका विनाशक है, यह कल्पना
करनी पड़तीहै,
न चापेक्षाबुद्धिनाशात्कथं द्वित्वनाश इति वाच्यम् । कालान्तरे
द्वित्वप्रत्यक्षाभावादपेक्षाबुद्धिस्तदुत्पादिका तन्नाशस्तन्नाशक
इति कल्पनात् ।
शंका-अपेक्षाबुद्धि विनाशके पीछे द्वित्वादिका विनाश कैसे होताहै? समा-
धान-अपेक्षाबुद्धिके असत्त्वकालमें द्वित्त्वादिधर्मोंका साक्षात्कार नहीं होता इसलिये
यह निश्चय होता है कि-अपेक्षाबुद्धिही द्वित्वादि धर्मोंके उत्पन्न करनेवाली है
और अपेक्षाबुद्धिका विनाशही उन द्वित्वादि धर्मोंका विनाशक है.