न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
पृष्ठ 273, कुल 350 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २४९ ]
न च पूर्वतन्तव एव तन्तवन्तरसहकारात् पूर्वपटे सत्येव पटान्तर-
मारभन्तामिति वाच्यम् । मूर्तयोः समानदेशताविरोधात् । ए-
कदा नानाद्रव्यस्य तत्रोपलम्भस्य बाधितत्वाच्च। पूर्वद्रव्यस्य प्र-
तिबन्धकस्य विनाशे द्रव्यान्तरोत्पत्तिरित्यस्यावश्यमभ्युपेयत्वात्।
शंका-प्रथम तन्तुही यदि औरतन्तुओंकी सहकारतासे पहले पटके रहनेपरभी
दूसरे पटको उत्पन्न करें तो क्या दोष है?समाधान-दो मूर्तद्रव्य समान एक देशमें
नहीं रहसकते अर्थात् मूर्तद्रव्य देशका प्रतिरोधक होता है, इसलिये दो मूर्त एक
देशमें नहीं रह सकते और ऐसे स्थलमें एकही वार नानाद्रव्यकी उपलब्धिभी नहीं
होती अर्थात् एकही पटादि पदार्थ एकही कालमें दोतरहका कभी किसी पुरुषको
दिखाई नहीं दिया इसलिये उत्तरद्रव्यकी उत्पत्तिमें प्रतिबन्धकरूप पूर्वद्रव्यके विनाश
होनेसे द्रव्यान्तरकी उत्पत्ति होतीहै; इस वार्ताको अवश्य मानना चाहिये.
पृथक्तं निरूपयति, संख्यावदिति-
भाषा-एवं 'संख्यावत्' इत्यादि ग्रन्थसे पृथक्तका निरूपण करतेहैं-
संख्यावत्तु पृथक्तं स्यात्पृथक्प्रत्ययकारणम् ॥११३॥
भाषा-पृथक्प्रत्ययका कारणीभूत पृथक्तगुणभी संख्याकी तरहही जानना
चाहिये ॥ ११३ ॥
पृथक्प्रत्ययासाधारणं कारणं पृथक्तम् । तन्नित्यतादिकं संख्या-
वत् । तथाहि।नित्येष्वेकत्वं नित्यमनित्येष्वनित्यम् । अनित्य-
मेकत्वं त्वाश्रयद्वितीयक्षणे चोत्पद्यते आश्रयनाशान्नश्यति।तथै-
कपृथक्तमपि । द्वित्वादिवच्च द्विपृथक्तादिकमपीत्यर्थः ॥११३॥
भाषा-अर्थात् "अयं अस्मात् पृथक्" इत्याकारक प्रत्ययका असाधारण कारण
'पृथक्त'है उसके नित्य अनित्य होनेका विचार संख्याकी तरह जानना चाहिये.(तथाहि)
अर्थात् जैसे नित्यपदार्थोंमें एकत्व नित्य है और अनित्योंमें अनित्य है और वह
अनित्य एकत्व अपने आश्रयमें स्वाश्रयकी उत्पत्तिसे दूसरे क्षणमें उत्पन्न होता है,
एवं स्वाश्रयनाशहीसे नाश होताहै, वैसेही पृथक्तकोभी जानना चाहिये. एवं पूर्वोक्त
द्वित्वादिकोंकी तरह द्विपृथक्तादिकोंका उत्पत्तिविनाशभी जानलेना चाहिये अर्थात्
अपेक्षाबुद्धिरूप निमित्तकारणसे इनकी उत्पत्ति है तथा अपेक्षाबुद्धि आदिके विनाशसे
इनका विनाश है ॥ ११३ ॥
२०