न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २५५
शरीरवृक्षके विभागके प्रति शरीरक्रियाको कारणता कहें तो वहभी ठीक नहीं क्योंकि
शरीरमें क्रिया हुईही नहीं. भाव यह कि-अवयवीके यावत् अवयवोंमें क्रिया होनेसे
अवयवीमें क्रिया मानी जातीहै, अन्यथा नहीं; इसलिये ऐसे स्थलमें कारणाकारणके
विभागसे कार्याकार्यविभागका उत्पन्न होनाही मानने योग्य है अर्थात् हस्तवृक्षके
विभागहीसे शरीरवृक्षका विभाग उत्पन्न हुआ मानना चाहिये. हस्तवृक्षके विभाग
होनेहीसे शरीरमेंभी विभक्तप्रत्यय होताहै ॥ ३ ॥
अत एव विभागो गुणन्तरम् । अन्यथा शरीरे विभक्तप्रत्ययो न
स्यात्। अतः संयोगनाशेन विभागो नान्यथासिद्धो भवति ॥ १२० ॥
भाषा-इसीलिये विभागभी गुणान्तर है, किन्तु संयोगनाशरूप नहीं है. (अन्यथा)
यदि गुणान्तर न मानें किन्तु संयोग नाशरूपही मानें तो शरीरमें विभक्तप्रत्यय नहीं
होना चाहिये इसलिये संयोगनाशसे विभाग अन्यथा सिद्ध नहीं है ॥ १२० ॥
परापरव्यवहारनिमित्ते परत्वापरत्वे निरूपयति, परत्वं चेति--
भाषा-एवं ' परत्वं ' इत्यादि ग्रन्थसे परापर व्यवहारके निमित्त कारणीभूत
परत्व तथा अपरत्वका निरूपण करतेहैं-
परत्वं चापरत्वं च द्विविधं परिकीर्तितम् ॥
दैशिकं कालिकं चेति मूर्त्त एव तु दैशिकम्॥१२१॥
परत्वं मूर्त्तसंयोगभूयस्त्वज्ञानतो भवेत् ॥
अपरत्वं तदल्पत्वबुद्धितः स्यादितीरितम् ॥१२२॥
भाषा-दैशिक कालिक भेदसे परत्व तथा अपरत्व दोप्रकारका कहा है. उनमेंसे
दैशिक परत्वापरत्व तो मूर्त्तपदार्थहीमें रहते हैं ॥ १२१ ॥ अधिकमूर्त्तसंयोगज्ञा-
नसे परत्व उत्पन्न होताहै. एवं उससे ( अल्प ) न्यून मूर्त्तसंयोगज्ञानसे अपरत्व
उत्पन्न होताहै ॥ १२२ ॥
दैशिकमिति । दैशिकपरत्वं बहुतरमूर्त्तसंयोगान्तरितत्वज्ञानादु-
त्पद्यते । एवं तदल्पीयस्त्वज्ञानादपरत्वमुत्पद्यते । अत्रावधि-
त्वार्थं पञ्चम्यपेक्षा । यथा पाटलिपुत्रात् काशीमपेक्ष्य प्रयागः
परः, पाटलिपुत्रात् कुरुक्षेत्रमपेक्ष्य प्रयागोऽपर इति ॥ १२१॥ १२२॥
भाषा--अनेक मूर्त्तपदार्थोंके परस्पर संयोगसंयोगान्तरज्ञानसे दैशिकपरत्व उत्पन्न
होताहै . एवं परत्वउत्पादक संयोगसंयोगान्तरकी अपेक्षा न्यूनसंयोगसंयोगान्तेक