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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 263, कुल 350 में से

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पृष्ठ 263

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २३९
होता है ४। उससे पीछे पंचमक्षणमें रक्तपरमाणुका परमाणुअन्तरके साथ संयोग होता
है५। उससे पीछे छठे क्षणमें द्व्यणुकादिद्रव्यकी उत्पत्ति होतीहै ६। उससे पीछे सातवें
क्षणमें उस द्रव्यमें रक्तादि गुणोंकी उत्पत्ति होतीहै. ७ । इति सप्तक्षणाप्रक्रिया ॥
अथाष्टक्षणा—एवं रक्तोत्पत्तिसमकालं परमाण्वन्तरे कर्मचिन्त-
नादष्टक्षणा ।
अथ अष्टक्षणा—एवं यदि रक्तादिगुणोंकी उत्पत्तिकालमें पूर्वोक्त रीतिसे परमाणु
अन्तरमें कर्मका चिन्तन करें तो अष्टक्षणमें द्रव्य पुनः रूपादि गुणयुक्त होताहै.
तथाहि । परमाणौ कर्म, ततः परमाण्वन्तरविभागः, तत आर-
म्भकसंयोगनाशः, ततो द्व्यणुकनाशः १। ततः श्यामनाशः २।
ततो रक्तोत्पत्तिपरमाण्वन्तरकर्मणी ३ । ततः परमाण्वन्तरक-
र्मजविभागः ४ । ततः परमाण्वन्तरे पूर्वसंयोगनाशः ५ । ततः
परमाण्वन्तरसंयोगः ६ । ततो द्व्यणुकोत्पत्तिः ७ । अथ रक्तो-
त्पत्तिः ८ । इत्यष्टक्षणा ॥ १०५ ॥
भाषा—(तथाहि) अग्निसंयोगसे परमाणुमें क्रिया हुई. उस क्रियासे परमाणुके
परमाणुअन्तरसे विभाग हुआ. उस विभागसे द्रव्यारम्भक संयोगका विनाश हुआ.
उससे पीछे द्व्यणुकादि द्रव्यका नाश हुआ १ । उससे पीछे दूसरे क्षणमें नष्ट द्रव्यके
परमाणुओंमें श्यामादि गुणोंका नाश हुआ २ । उससे पीछे तीसरे क्षणमें नष्ट द्रव्यके
परमाणुओंमें रक्तादि गुणोंकी उत्पत्ति तथा परमाणु अन्तरमें क्रिया होतीहै ३ । उससे
पीछे चौथे क्षणमें परमाणुअन्तरमें उत्पन्न हुए कर्मसे विभाग होताहै ४ । उससे
पीछे पंचमक्षणमें परमाणुअन्तरमें पूर्वसंयोगका विनाश होताहै ५ । उससे पीछे
छठे लक्षणमें रक्तपरमाणुका परमाणुअन्तरके साथ संयोग होता है ६ । उससे पीछे
सातवें क्षणमें द्व्यणुकादि द्रव्यकी उत्पत्ति होतीहै ७ । उससे पीछे अष्टमक्षणमें उस
द्रव्यमें रक्तादि गुणोंकी उत्पत्ति होतीहै ॥ १०५ ॥ इति अष्टक्षणाप्रक्रिया ॥
नैयायिकानां तु नये द्व्यणुकादावपीष्यते ॥
भाषा—नैयायिकोंके मतमें तो द्व्यणुकादि कार्यद्रव्यमेंभी पाक होसकताहै.
नैयायिकानामिति । नैयायिकानां मते द्व्यणुकादाववयविन्यापि
पाको भवति । तेषामयमाशयः । अवयविनां सच्छिद्रत्वाद्वह्नेः
सूक्ष्मावयवैरन्तःप्रविष्टैरवयवेष्ववष्टब्धेष्वपि पाको न विरुध्यते,
वैशेषिकमतेऽनन्तावयवितन्नाशकल्पने गौरवात् ।