न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः ५] भाषाटीकासमेता. २४५
रूप व्यवहार उसका असाधारण कारणीभूत परिमाण है ॥ १०९ ॥ वह अणु महत्
दीर्घ तथा ह्रस्वभेदसे चार प्रकारका है. यह चारों प्रकारका प्रत्यक्ष अनुभवसे सिद्ध
है. उनमें अणुत्व ह्रस्वत्व तथा महत्त्व दीर्घत्व ये दो दो आपसमें समनियत रहते हैं.
भाव यह कि-इन चारों प्रकारके परिमाणको पहले परम मध्यम भेदसे दोप्रकारका
जानना चाहिये. उनमें परमअणुत्व तथा परमह्रस्वत्व परमाणुओंमें तथा मनमें है.
एवं मध्यम अणुत्व तथा मध्यमह्रस्वत्व द्वयणुकमें है. एवं परममहत्त्व तथा परम-
दीर्घत्व गगनादिकोंमें है और मध्यममहत्त्व तथा मध्यमदीर्घत्व घटादि पदार्थोंमें है.
इस रीतिसे ये दो दो परस्पर समनियत हैं.
अनित्ये तदनित्यं स्यान्नित्ये नित्यमुदाहृतम्॥११०॥
संख्यातः परिमाणाच्च प्रचयादपि जायते ॥
अनित्यं-
भाषा--वह परिमाण घटपटादि अनित्यपदार्थोंमें अनित्य है तथा गगनादि नित्य-
पदार्थोंमें नित्य है ॥ ११० ॥ इनमें अनित्यपरिमाणकी संख्यासे परिमाणसे तथा
( प्रचय ) शिथिलाख्य संयोगसे उत्पत्ति होतीहै.
तत्परिमाणम् । नित्यमित्यत्र परिमाणमित्यनुषज्यते । जायत इ-
त्यत्रापि परिमाणमित्यनुवर्तते । अनित्यमिति पूर्वेणान्वितम् ।
तथाचानित्यं परिमाणं संख्याजन्यं परिमाणजन्यं प्रचयजन्यं
चेत्यर्थः ।
भाषा--मूलपठित 'तत्' शब्दसे परिमाणका ग्रहण है. एवं 'नित्यं' इस पदके
साथ 'परिमाणं' इस पदका पूर्वकारिकासे अनुवर्तन करके सम्बन्ध करना. एवं
'जायते' इस क्रियापदके साथभी 'परिमाणं' इस पदका पीछेसे सम्बन्ध करना
कारिकाके उत्तरार्द्धके आदिमें पठित 'अनित्य' पदका पूर्व पदोंके साथ अन्वय है.एवं
यह अर्थ हुआ कि--अनित्यपरिमाण संख्याजन्य परिमाणजन्य तथा प्रचयजन्य
होनेसे तीन प्रकारसे उत्पन्न होताहै.
तत्र सङ्ख्याजन्यमुदाहरति, द्वयणुकादाविति-
भाषा-उनमें 'द्वयणुकादौ' इत्यादि ग्रन्थसे संख्याजन्यको दिखलाते हैं-
-द्वयणुकादौ तु संख्याजन्यमुदाहृतम् ॥१११॥
भाषा-द्वयणुकादिकोंका परिमाण संख्यासे उत्पन्न होताहै ॥ १११ ॥