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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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पृष्ठ 270

२४६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
द्व्यणुकस्य त्रसरेणोश्च परिमाणं प्रति परमाणुपरिमाणं द्व्यणुकप-
रिमाणं वा न कारणम् । परिमाणस्य स्वसमानजातीयोत्कृष्टप-
रिमाणजनकत्वात् । द्व्यणुकादिपरिमाणं तु परमाणुणुत्वापेक्ष-
या नोत्कृष्टम्, त्रसरेणुपरिमाणं तु न सजातीयम्, अतः परमाणौ
द्वित्वसङ्ख्या द्व्यणुकपरिमाणस्य,द्व्यणुके त्रित्वसङ्ख्या च त्रसरे-
णुपरिमाणस्य समवायिकारणमित्यर्थः ॥ १११ ॥
भाषा-द्व्यणुकके या त्रसरेणुके परिमाणके प्रति परमाणु परिमाणको या द्व्यणुक
परिमाणको कारणता नहीं है; क्योंकि परिमाणको नियमसे स्वसमानजातीय उत्कृष्ट
परिमाणजनकता है. भाव यह कि-परिमाणका यह स्वभाव है कि, यह अपनेसे उत्कृष्ट
परिमाणहीका जनक होताहै और द्व्यणुकादिका परिमाण तो परमाणुके अणुत्वकी
अपेक्षासे कुछ उत्कृष्ट नहीं है और त्रसरेणुका परिमाण परमाणुपरिमाणका सजाति
नहीं है क्योंकि त्रसरेणुका परिमाण इन्द्रियग्राह्य होनेसे मध्यममहत् है तथा परमा-
णुका परिमाण परम अणु है इसलिये परमाणुद्वयगत द्वित्वसंख्या द्व्यणुकपरिमाणके
प्रति तथा द्व्यणुक तीनगत त्रित्वसंख्या त्रसरेणुपरिमाणके प्रति असमवायिकारण है;
यही मानना उचित है ॥ १११ ॥
परिमाणजन्यमुदाहरति, परिमाणं घटादाविति-
भाषा-एवं ' परिमाणं ' इत्यादि ग्रन्थसे परिमाणजन्य परिमाणको दिखलाते हैं.
परिमाणं घटादौ तु परिमाणजमुच्यते ॥
परिमाणजं कपालादिपरिमाणजन्यम् ।
भाषा-घटादिगत परिमाणके प्रति कपालादिगत परिमाणको असमवायि
कारणता है.
प्रचयजन्यमुदाहर्तुं प्रचयं निर्वक्ति, प्रचय इति -
भाषा-एवं प्रचयजन्य परिमाण प्रदर्शनार्थ पहले 'प्रचयः' इत्यादि ग्रन्थसे
प्रचयको दिखलाते हैं.
प्रचयः शिथिलाख्यो यः संयोगस्तेन जन्यते ॥ ११२
परिमाणं तूलकादौ-
भाषा-' प्रचय ' नाम शिथिलाख्य संयोगका है ॥ ११२ ॥ उस संयोगसे
( तूल ) रूई आदिकोंमें परिमाणान्तरकी उत्पत्ति होती है.