न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भवेन्निश्चयरूपा या-
आद्य इति, विपर्यास इत्यर्थः ।
भाषा-देहमें आत्मबुद्धि, तथा शंखमें पीतबुद्धि, शुक्तिमें रजतबुद्धि, इत्यादि
यदि निश्चयरूपा होय तो उस बुद्धिका नाम 'विपर्ययज्ञान' है.
शरीरादौ यदात्मत्वप्रकारकं ज्ञानं गौरोऽहमित्याकारकमेवं श-
ङ्खादौ 'पीतः शङ्खः' इत्याकारकं यज्ज्ञानं निश्चयरूपं तद्भ्रम इति ।
भाषा-शरीरादिमें जो "गौरोऽहं, श्यामोऽहं" इत्याकारक आत्मत्वप्रकारक
ज्ञान तथा शंखादिमें जो "पीतः शंखः" इत्याकारक पीतत्वप्रकारक ज्ञान यह
यदि निश्चयरूप होय तो उसका नाम 'भ्रम' है-इति ।
-संशयोऽथ प्रदर्श्यते ॥ १२८॥
किंस्विन्नरो वा स्थाणुर्वेत्यादिबुद्धिस्तु संशयः ॥
भाषा-अब संशयात्मक ज्ञानका आकार दिखलातेहैं कि-॥ १२८ ॥ क्या यह
पुरुष है कि स्थाणु है? इत्यादि ज्ञानका नाम 'संशय' है.
किंस्विदिति वितर्के।
भाषा-मूलगत 'किंस्वित्' यह पद वितर्कका बोधक है तथा 'स्थाणुः' यह पद
शाखाच्छिन्नवृक्षका बोधक है. भाव यह कि-'एकस्मिन् धर्मिणि विरुद्धनानाधर्मावगाहि
ज्ञान' का नाम 'संशय' है. उदाहरण इसका 'किंस्वित्' इत्यादि ग्रन्थसे
मूलहीमें है.
निश्चयस्य लक्षणमाह, तद्भावेति-
भाषा-एवं 'तदभाव' इत्यादि ग्रन्थसे प्रमात्मक निश्चयज्ञानका लक्षण कहतेहैं-
तदभावाप्रकाराधीस्तत्प्रकारा तु निश्चयः ॥ १२९ ॥
भाषा-जो धर्म जिसमें नहीं रहता वह उसमें न भासे किन्तु जो धर्म जिस
वस्तुमें विद्यमान है तद्धर्मप्रकारक ज्ञानही होय तो उसका नाम 'निश्चय' अर्थात्
'प्रमाज्ञान' है ॥१२९॥
तदभावाप्रकारकत्वे सति तत्प्रकारकं ज्ञानं निश्चयः॥१२८॥१२९॥
भाषा-अर्थात् शुक्तित्वादि धर्माभावाप्रकारकत्वे सति जो शुक्तित्वप्रकारक
शुक्तिविशेष्यक 'शुक्तिरियं' इत्यादि ज्ञान, उसका नाम 'निश्चय' है; इस लक्षणमें प्रथम
सप्तम्यन्त विशेषण संशयमें अतिव्याप्तिवारणार्थ जानना चाहिये ॥१२८॥१२९॥