न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
ननु 'अयमस्मात् पृथग्' इत्यादावन्योन्याभावो भासते तत्कथं
पृथक्त्वं गुणान्तरं स्वीक्रियते, नचास्तु पृथक्त्वं, न त्वन्योन्याभाव
इति वाच्यम्,रूपं न घट इति प्रतीत्यनापत्तेः । न हि रूपे घटा-
वधिकं पृथक्त्वं गुणान्तरमस्ति, न वा घटे घटावधिकं पृथक्त्वम-
स्ति येन परम्परासम्बन्धः कल्प्य इत्यत आह, अन्योन्याभावत
इति-
शंका-“ अयमस्मात् पृथक् ” इत्यादि प्रतीतिमें अन्योन्याभावका भान होताहै;
इसलिये इस प्रतीतिसे पृथक्त्वको गुणान्तर मानना योग्य नहीं और यदि कहो कि-
पृथक्त्वके गुणान्तर माननेसे सर्वत्र निर्वाह हो सकताहै इसलिये अन्योन्याभाव मान-
नेकी आवश्यकताही नहीं तो यहभी ठीक नहीं; क्योंकि यदि अन्योन्याभावप्रतीति
सिद्ध न होंय तो “ रूपं न घटः ” यह प्रतीति नहीं हुई चाहिये. भाव यह कि-इस
प्रतीतिकी निर्वाह पृथक्त्वसे नहीं होसकता; क्योंकि रूपमें घटात्मक अवधिको लेकर
कोई पृथक्त्वनामक गुणान्तर नहीं है और घटमें स्वात्मक अवधिको लेकरभी पृथक्त्व
नहीं रहता जिससे ‘ सामानाधिकरण्य ’ रूप परंपरासम्बन्धकी कल्पनासे उक्त प्रती-
तिका निर्वाह किया जाय इसी भावको लेकर मूलकार ‘ अन्योन्य ’ इत्यादि अग्रिम
ग्रन्थको कहतेहैं-
अन्योन्याभावतो नास्य चरितार्थत्वमिष्यते ॥
अस्मात्पृथगिदं नेति प्रतीतिर्हि विलक्षणा॥११४॥
समाधान-इस पृथक्त्वात्मकगुणकी अन्योन्याभावसे चरितार्थता नहीं होती;
क्योंकि “अयमस्मात् पृथक्” इससे “इदमिदं न” यह प्रतीति विलक्षण है ॥ ११४॥
विलक्षणेति । ननु शब्दवैलक्षण्यमेव न त्वर्थवैलक्षण्यमिति चेत् ।
न । विनाऽर्थभेदं घटात् पृथगितिवत् 'घटो न पटः' इत्यत्रापि
पञ्चमी स्यात् । तस्मात् यदर्थकयोगे पञ्चमी सोऽर्थो नञर्थाऽन्यो
न्याभावतो भिन्नो गुणान्तरं कल्प्यत इति ॥ ११४॥
शंका-इन दोनों प्रतीतियोंमें परस्पर केवल शब्दमात्रकी विलक्षणता है किन्तु
अर्थभेद नहीं है. समाधान-यदि अर्थभेद न होय तो जैसे “ घटात् पृथक् ” इस
प्रयोगमें पञ्चमीविभक्ति हुईहै,वैसे ‘घटो न पटः’ इस प्रयोगमेंभी पञ्चमी होनी चाहिये.
भाव यह कि-यदि ‘ नञ् ’ तथा ‘पृथक्’ अव्यय इन दोनोंका एकही अर्थ होय तौ