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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

२२६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-(चक्षुर्ग्राह्यमिति) नेत्रइन्द्रियसे ग्रहण होनेयोग्य विशेषगुणरूप है.
ऐसा विवरण करनेसे संख्यादिमें अतिव्याप्तिभी नहीं है. ऐसेही आगे रसादिके
विवरणमेंभी जानलेना. (द्रव्यादेरिति) 'उपम्भक' नाम उपलब्धिके कारणीभूतका
है. इसीका 'चक्षुषः' इत्यादि ग्रन्थसे विवरण करतेहैं. द्रव्य गुण कर्म तथा सामान्य
चाक्षुषप्रत्यक्षके प्रति उद्भूतरूपको कारणता है.
-शुक्लादिकमनेकधा ॥ १०० ॥
भाषा-वह रूप शुक्ल नीलपीतादिभेदसे अनेक प्रकारका है ॥ १०० ॥
शुक्लादीति । तच्च रूपं शुक्लनीलपीतरक्तकृष्णकर्बुरादिभेदाद्-
नेकप्रकारकं भवति । ननु कर्बुरं कथमतिरिक्तं रूपं भवति ।
इत्थम् । नीलपीताद्यवयवारब्धोऽवयवी न तावन्नीरूपोऽप्रत्यक्ष-
त्वप्रसङ्गात्, नापि व्याप्यवृत्तिनीलादिकमुत्पद्यते पीतावच्छेदे-
नापि नीलोपलब्धिप्रसङ्गात्, नाप्यव्याप्यवृत्तिनीलादिकमुत्पद्यते
व्याप्यवृत्तिजातीयगुणानामव्याप्यवृत्तित्वे विरोधात् । तस्मा-
न्नानाजातीयरूपैरवयविनि विजातीयं चित्रं रूपमारभ्यते । अत
एवैकं चित्रमित्यनुभवोऽपि, नानारूपकल्पने तु गौरवात् ।
भाषा-वहरूप शुक्ल नील पीत रक्त हरित कपिश कृष्ण कर्बुर आदि भेदसे अने-
कप्रकारका है. शंका-(कर्बुर) चित्ररूप अतिरिक्त माननेका कुछ काम नहीं
किन्तु नीलपीतादि गुणोंके समुदाचारका नामही चित्ररूप है. समाधान-इस
विचारसे अतिरिक्त मानना पड़ता है कि-नीलपीतादि अवयवोंसे उत्पन्न हुआ अव-
यवी नीरूपभी नहीं है; क्योंकि यदि नीरूप होय तो प्रत्यक्ष नहीं हुआ चाहिये
और चित्रावयवीगत नीलपीतादि (व्याप्यवृत्ति) सर्वावयवावच्छेदेन उत्पन्न हुए हैं,
यहभी नहीं कहसकते क्योंकि यदि ऐसा होय तो चित्रावयवीमें नीलावच्छेदेन
पीतकी या पीतावच्छेदेनभी नीलकी उपलब्धि हुई चाहिये और (अव्याप्यवृत्ति)
किंचिदवयवावच्छेदेन नीलादि उत्पन्न होते हैं, ऐसाभी नहीं कहसकते; क्योंकि
(व्याप्यवृत्ति) सर्वावयवावच्छेदेन स्वाभाविक उत्पन्न होनेवाले नीलपीतादि गुणोंको
(अव्याप्यवृत्ति) किञ्चिदवयवावच्छेदेन उत्पन्न हुए माननाभी उनके स्वभावसे
विरुद्ध है. (तस्मात्) इसलिये अवयवगत नीलपीतादि अनेक प्रकारके रूपोंसे चित्रा-
वयवीमें विलक्षण एक चित्ररूप उत्पन्न होताहै, यही मानना उचित है; इसीसे "एकं
चित्ररूपं" यह अनुभवभी प्रामाणिक है. 'चित्रं' इत्याकारक प्रतीतिके विषयमें अनेक-
रूपोंकी कल्पना करनेमें उपस्थितिकृत गौरवभी है.

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २२७
इत्थंच नीलादीनां पीताद्यारम्भे प्रतिबन्धकत्वकल्पनादवयवि-
नि न पीताद्युत्पत्तिः । एतेन स्पर्शोऽपि व्याख्यातः ।
भाषा-(इत्थञ्च) इस पूर्वोक्त लाघवसे चित्ररूपकी अतिरिक्त सिद्धि हुई तो
नीलादि व्यक्तियोंमें पीतादिव्यक्तियोंके उत्पन्न होनेमें प्रतिबन्धकता कल्पना करनेसे
नीलरूपवाले अवयवीमें पीतरूपकी उत्पत्तिभी नहीं होसकती अर्थात् समवायसम्बन्धेन
पीतरूपं प्रति स्वसमवायिसमवेतत्वसम्बन्धेन पीतातिरिक्त रूपत्वेन पीतातिरिक्त नीला-
दिरूपोंको प्रतिबन्धकता है. इस पूर्वोक्त चित्ररूपके व्याख्यानसे चित्रस्पर्शका
व्याख्यानभी समझलेना अर्थात् चित्रस्पर्शभी अवश्यही अङ्गीकार करना उचित है.
रसादिकमपि नाव्याप्यवृत्तिः किंतु नानाजातीयरसवदवयवैरार-
ब्धेऽवयविनि रसाभावेऽपि न क्षतिः। तत्र रसनयाऽवयवरस
एव गृह्यते, रसनेन्द्रियादीनां द्रव्यग्रहे सामर्थ्याभावात् । अवय-
विनीरस्त्वेऽपि क्षतेरभावात् ।
भाषा-एवं रसादिकभी किंचिदवयवावच्छेदेन उत्पन्न नहीं होते, किन्तु रूपसे
इतनी विलक्षणता है कि-अनेकप्रकारके रसोंवाले अवयवोंसे उत्पन्न हुए अवयवीमें
चित्ररस नाभी मानें तो हानि कुछ नहीं; क्योंकि चित्ररसकी प्रतीति तो अवयवगत
अनेक रसोंसेभी होसकती है. एवं अवयवीमें चित्ररसकी कल्पना करनी व्यर्थ है.
(तत्र) चित्ररसग्रहणस्थलमें रसनेन्द्रियसे अवयवगत रसकाही ग्रहण होताहै.
रसना घ्राण तथा श्रोत्रइन्द्रियमें द्रव्य ग्रहण करनेकी तो सामर्थ्यही नहीं. इसलिये
अवयवीको रसशून्यभी मानलिया जाय तो हानि कुछ नहीं है.
नव्यास्तु तत्राव्याप्यवृत्त्येव नानारूपं नीलादेः पीतादिप्रतिब-
न्धकत्वकल्पने गौरवात् । अतएव "लोहितो यस्तु वर्णेन मुखे
पुच्छे च पाण्डुरः" इत्यादिशास्त्रमप्युपपद्यते ।
भाषा-(नव्यास्तु) और चिन्तामणिकारादि नवीनलोग तौ यह कहते हैं कि-
चित्रावयवीस्थलमें अनेकप्रकारका रूप अव्याप्यवृत्तित्वेन रूपेणही उत्पन्न होताहै; ऐसे
स्थलमें नीलरूपादिकोंमें पीतरूपादिके प्रति प्रतिबन्धकता कल्पना करनीभी महागौरव
है. चित्ररूप कोई पृथक् वर्ण नहीं है, इसीसे "लोहितो यस्तु वर्णेन मुखे पुच्छे च पाण्डु-
रः॥श्वेतः खुरविषाणाभ्यां स नीलो वृष उच्यते" इत्यादि स्कन्धपुराणका वचनभी उप-
पन्न होसकता है अर्थात् इस वचनमें नील(वृष)बलद विसर्जनके उद्देश्यसे अनेक वर्णयुक्त

२२८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
वृषको नीलवृष कहा है. यदि चित्रवर्ण आचार्यको पृथक् स्वीकृत होता तो "चित्रं
वृषं विसर्जयेत्" इतना मात्रही कहता.
न च व्याप्याव्याप्यवृत्तिजातीययोर्द्वयोर्विरोधः, मानाभावात् ।
शंका-व्याप्यवृत्ति स्वभाववाले पदार्थोंको अव्याप्यवृत्ति माननाभी उचित नहीं;
क्योंकि व्याप्यवृत्तित्त्वरूप धर्मका तथा अव्याप्यवृत्तित्त्वरूप धर्मका परस्पर तेजस्ति-
मिरवत् विरोध है. समाधान-रूपादि जो व्याप्यवृत्तित्वेन उत्पन्न होतेहैं वे अव्याप्य-
वृत्तित्वेन उत्पन्न नहीं होसकते; इस विरोधमें कोई प्रमाण नहीं है.
न च लाघवादेकं रूपम् । अनुभवविरोधात् । अन्यथा घटादे-
रपि लाघवादैक्यं स्यादिति । एतेन स्पर्शादिकं व्याख्यातमिति
वदन्ति ॥ १०० ॥
शंका-लाघवसे चित्ररूप एकही मान लिया जाय तो हानि क्याहै? समा०-
एक माननेमें "अयं नीलादिनानावर्णयुक्तोऽवयवी" इत्यादि अनुभवसे विरोध होता
है. (अन्यथा) यदि अनुभवसे विरुद्धभी लाघव स्वीकृत होय तो घटपटादि व्यक्तिभी
संसारमात्रमें लाघवसे एक मानलेनी चाहिये. (एतेन) इसी कथनसे चित्रस्पर्शादि-
का निरासभी समझलेना; (इति वदन्ति) यह सब नवीन लोगोंका कथन है॥१००॥
जलादिपरमाणौ तन्नित्यमन्यत्सहेतुकम् ॥
भाषा-वह रूप जलादि परमाणुओंमें नित्य है और पार्थिवपदार्थमात्रमें जन्य है.
जलादीति । जलपरमाणौ तेजःपरमाणौ च रूपं नित्यम् । पृथि-
वीपरमाणुरूपं तु न नित्यं पाकेन रूपान्तरोत्पत्तेः। न हि घटस्य
पाकानन्तरं तदवयवोऽपक्व उपपद्यते,न हि रक्तकपालस्य कपा-
लिका नीलाद्यवयवा भवति । एवंक्रमेण परमाणावपि पाकसिद्धेः ।
अन्यज्जलतेजःपरमाणुरूपभिन्नं रूपम् । सहेतुकं जन्यम् ।
भाषा-अर्थात् जलीय परमाणुओंमें तथा तैजस परमाणुओंमें रूप नित्य है
और पार्थिव परमाणुओंमें रूप अनित्य है क्योंकि वहां(पाकेन) अग्निसंयोगसे रूपान्त-
रकी उत्पत्ति होतीहै. अग्निसंयोगद्वारा घटके परिपाक होनेसे उसके अवयव परिपक्व
नहीं होते, यह कहना उचित नहीं; क्योंकि अग्निसंयोगसे रक्तहुए (कपाल) घटार्ध-
भागका (कपालिका) छोटा हिस्सा नीलपीतादि अवयवोंवाला देखनेमें नहीं आता,
इसक्रमसे विचारनेसे पार्थिव परमाणुओंमेंभी पाककी सिद्धि होसकतीहै.

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २२९
( अन्यत् ) जल तथा तेजके परमाणुओंके रूपसे भिन्न जो रूप है वह सभी सहेतुक
अग्निसंयोगादि कारणसे उत्पन्न होताहै.
रसं निरूपयति, रसस्त्विति-
भाषा- ' रसस्तु' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार रसका निरूपण करतेहैं-
रसस्तु रसनाग्राह्यो मधुरादिरनेकधा ॥ १०१ ॥
सहकारी रसज्ञाया नित्यत्वादि च पूर्ववत् ॥
भाषा-रसनाइन्द्रियसे ग्रहण होनेवालेका नाम'रस' है.वह रस मधुर, लवण, कटु
कषाय आम्लिक तथा तिक्त भेदसे षट् प्रकारका है ॥ १०१ ॥ और रसनाइन्द्रियका
सहायक है, नित्यता तथा अनित्यता इसकी रूपकी तरहही जान लेनी चाहिये.
सहकारीति । रासनज्ञाने रसः कारणमित्यर्थः । पूर्ववदिति ज-
लपरमाणौ रसो नित्योऽन्यः सर्वोऽपि रसोऽनित्य इत्यर्थः ।
भाषा-अर्थात् रासन साक्षात्कारके प्रति विषयतासम्बन्धसे रसको कारणता है.
पूर्ववत् अर्थात् रूपकी तरह रसभी जलीय परमाणुओंमें नित्य है तथा पार्थिव पदार्थ
मात्रमें अनित्य है.
गन्धं निरूपयति, घ्राणग्राह्य इति-
भाषा-' घ्राणग्राह्यो ' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार गन्धका निरूपण करते हैं.
घ्राणग्राह्यो भवेद्गन्धो घ्राणस्यैवोपकारकः॥१०२॥
भाषा-केवल घ्राणइन्द्रिय ग्रहणके योग्यका नाम 'गन्ध' है.वह गन्ध घ्राणइन्द्रिय
हीका उपकारक है ॥ १०२ ॥
उपकारको घ्राणजन्यज्ञाने कारणमित्यर्थः। गन्धः सर्वोऽनित्य
एव ॥ १०२ ॥
भाषा-( उपकारक ) अर्थात् घ्राणज साक्षात्कारके प्रति विषयतासम्बन्धेन उभ-
यविध गन्धको कारणता है. एवं सभी गन्ध अनित्यही हैं. रूपादिकी तरह नित्य
कोईभी नहीं ॥१०३॥
सौरभश्चासौरभश्च स द्वेधा परिकीर्तितः ।
भाषा-एवं सौरभ तथा असौरभभेदसे वह गन्ध दोप्रकारका है.
स्पर्शं निरूपयति, स्पर्श इति-
भाषा- 'स्पर्शः' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार स्पर्शका निरूपण करतेहैं-

२३० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली-- [ गुण -
स्पर्शस्त्वगिन्द्रियग्राह्यस्त्वचः स्यादुपकारकः ॥१०३॥
भाषा-केवल त्वगिन्द्रियसे ग्रहणके योग्यका नाम 'स्पर्श' है. वह स्पर्श त्वगइ-
न्द्रियका उपकारक है.
उपकारक इति । स्पर्शनप्रत्यक्षे स्पर्शः कारणमित्यर्थः ॥१०३॥
भाषा-स्पर्शनप्रत्यक्षमें विषयतासम्बन्धेन स्पर्शको कारणता है ॥१०३॥
अनुष्णाशीतशीतोष्णभेदात्स त्रिविधो मतः ॥
काठिन्यादि क्षितावेव नित्यत्वादि च पूर्ववत् ॥ १०४ ॥
भाषा-वह स्पर्श शीत उष्ण तथा अनुष्णाशीतभेदसे तीन प्रकारका है. वह स्पर्श
काठिन्यादि धर्मवाला केवल पृथिवीहीमें रहताहै और इस स्पर्शकी नित्यता तथा
अनित्यता ( पूर्ववत् ) रूपादिककी तरहही जानने योग्य है ॥ १०४ ॥
अनुष्णाशीत इति । पृथिव्या वायोश्च स्पर्शोऽनुष्णाशीतः,
जलस्य शीतः, तेजस उष्णः । काठिन्येति । कठिनसुकुमारस्प-
र्शौ पृथिव्या एवेत्यर्थः । कठिनत्वादिकं तु न संयोगनिष्ठो जाति-
विशेषः, चाक्षुषग्राह्यतापत्तेः । पूर्ववदिति । जलतेजोवायुपरमाणु-
स्पर्शा नित्यास्तद्भिन्नस्पर्शास्त्वनित्या इत्यर्थः ॥ १०४ ॥
भाषा-( अनुष्णाशीत इति ) पृथिवीका तथा वायुका स्पर्श अनुष्णाशीत है
अर्थात् न उष्ण है, न शीत है; और जलका स्पर्श शीत है. अग्निआदि तेजःपदार्थका स्पर्श
उष्ण है. एवं कठिनकोमलादि स्पर्शभी पृथिवीमें रहता है. कठिनत्त्वादि धर्मसंयोगनिष्ठ
जातिविशेष नहींहैं; क्योंकि यदि संयोगनिष्ठ जातिविशेष होय तो उसका संयोगकी तरह
चाक्षुषप्रत्यक्षभी हुआ चाहिये; इसलिये 'कठिनत्व' आदि पृथिवीगत स्पर्शकेही
व्याप्यवृत्ति धर्म हैं. ( पूर्ववदिति ) जल तेज तथा वायुके परमाणुओंका स्पर्श
नित्य है. इनसे भिन्न पार्थिवपरमाणुओंका स्पर्श अनित्य है ॥१०१॥
एतेषां पाकजत्वं तु क्षितौ नान्यत्र कुत्रचित् ॥
भाषा-ये रूपरसादि चारों केवल पृथिवीहीमें तेजःसंयोगसे उत्पन्न तथा
परिवर्तन होतेहैं, अन्यत्र जलादिकोंमें नहीं होते.
एतेषां रूपरसगन्धस्पर्शानाम् । नान्यत्रेति । पृथिव्या हि रूपरस-
गन्धस्पर्शपरावृत्तिः पावकसंयोगादुपलभ्यते, न हि शतधापि

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २३१
ध्मायमाने जलादौ रूपादिकं परावर्तते । नीरे सौरभमौष्ण्यं चा-
न्वयव्यतिरेकाभ्यामौपाधिकमेवेति निर्णीयते पवनपृथिव्योः शी-
तस्पर्शादिवत् ।
भाषा-इन रूप रस गन्ध स्पर्शोंकी अग्निसंयोगसे उत्पत्ति केवल पृथिवीहीमें है
और कहीं नहीं. ( नान्यत्रेति ) पृथिवीके रूप रस गन्ध तथा स्पर्शका परिवर्तन
अग्निसंयोगसे हुआ प्रतीत होता है और जलको सैकड़ोंबार तपानेसेभी उसके
रूपका परिवर्तन प्रतीत नहीं होता. एवं जैसे जलके सम्बन्धसे वायुमें तथा पृथिवी-
में शीत स्पर्शका भान होता है वस्तुतः इनमें शीतस्पर्श नहीं है. वैसेही जलमें
सौरभका तथा उष्णताका भानभी पृथिवीतेजःसंसर्गरूप उपाधिके वशसेही विज्ञ
पुरुषोंने अन्वयव्यतिरेकद्वारा निर्णय किया है; वस्तुतः जलमें सौरभ तथा उष्णता
नहीं है.
तत्रापि परमाणौ स्यात्पाको वैशेषिके नये ॥१०५॥
भाषा-उस पृथिवीमेंभी वैशेषिकके सिद्धान्तसे पाक परमाणुओंमें होता है अर्थात्
तेजःसंयोगसे प्रत्येक परमाणुमें रूपादिचतुष्टयका परिवर्तन होता है ॥ १०५ ॥
तत्रापि पृथिवीष्वपि परमाणवेव पाक इति वैशेषिका वदन्ति ।
तेषामयमाशयः । अवयविनाऽवष्टब्धेष्ववयवेषु पाको न सम्भव-
ति, परंतु वह्निसंयोगेनावयविषु विनष्टेषु स्वतन्त्रेषु परमाणुषु
पाकः, पुनश्च पक्वपरमाणुसंयोगाद्द्व्यणुकादिक्रमेण पुनर्महा-
वयविपर्यन्तमुत्पत्तिः, तेजसामतिशयितवेगवशात् पूर्वव्यूहनाशो
झटिति व्यूहान्तरोत्पत्तिश्चेति ।
भाषा-( तत्रापि ) उस अनेक विध पृथिवीमेंभी परमाणुओंहीमें ( पाक )
अग्निसंयोगसे रूपांदिका परिवर्तन होता है, यह ( वैशेषिक ) कणादमुनिके अनु-
यायीलोग कहतेहैं. उनके हृदयका भाव यह है कि-घटादि अवयविसे ( अवष्टब्ध )
निरोधित हुए छोटे कपालकादि अवयवोंमें पाक नहीं होसकता; परन्तु प्रबल
अग्निसंयोगसे अवयवीके विनाशके अनन्तर प्रत्येक अवयवके स्वतंत्र परमाणुओंमें
पाक होता है. फिर परिपक परमाणुओंके परस्परसंयोगसे द्वयणुक त्र्यणुकादि क्रमेण
फिर घटादि महाअवयवी पर्यन्त उत्पत्ति होती है. तेजःपदार्थके अत्यन्त वेगवशसे
शीघ्रही पूर्व ( व्यूह ) संघातका नाश तथा संघातान्तरकी उत्पत्ति होती है-इति

२३२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
अत्र द्व्यणुकादिविनाशमारभ्य कतिभिः क्षणैः पुनरुत्पत्त्या रू-
पादिमद्भवतीति शिष्यबुद्धिवैशद्याय क्षणप्रक्रिया । तत्र विभाग-
जविभागानङ्गीकारे नवक्षणा ।
भाषा-यहां 'द्व्यणुकादि विनाशसे लेकर फिर उत्पन्न हुआ अवयवी कितने
क्षणोंके पश्चात् रूपरसादिवाला होता है?' इस वार्त्ताका शिष्यलोगोंकी बुद्धिके
विशदकरणार्थ निरूपण करते हुए ग्रन्थकार क्षणिक प्रक्रियाको दिखलाते हैं, इस
प्रकरणमें यदि विभागज विभागको ना अङ्गीकार करें अर्थात् (कारण) कपा-
लादि तथा (अकारण) आकाशादिके विभागसे जैसे (कार्य) घटादि तथा
(अकार्य) आकाशादिका विभाग स्वीकृत है, वैसे (कारण) कपालद्वयादि मात्र-
के विभागसे (कारण) कपालादि तथा (अकारण) आकाशादिके विभागको न
मानें तो नवक्षणमें अवयवी विनष्ट होकर फिर रूपादिवाला होजाता है.
विभागजविभागाङ्गीकारे तु विभागः किञ्चित्सापेक्षो विभागं ज-
नयेत्, निरपेक्षस्य तत्त्वे कर्मत्वं स्यात् । संयोगविभागयोरनपेक्षं
कारणं कर्मेति हि वैशेषिकसूत्रम् । स्वोत्तरोत्पन्नभावान्तरानपे-
क्षत्वं च तस्यार्थः । अन्यथा कर्मणोऽप्युत्तरसंयोगजनने पूर्वसं-
योगनाशापेक्षणादव्याप्तिः स्यादिति ।
भाषा-एवं विभागज विभागका अङ्गीकार करें तो विभागभी (किञ्चित्)
स्वसमवायिनिष्ठ क्रियाकी (सापेक्षा) सहकारतासे विभागान्तरको उत्पन्न करेगा;
क्योंकि पदार्थान्तरकी सहकारतासे विना विभागका जनक तो केवल कर्मही है.
यदि विभागभी निरपेक्ष होकर विभागान्तरका जनक होगा तो कर्मके लक्षणकी
उसमें अतिव्याप्ति होगी; क्योंकि संयोगका तथा विभागका जो निरपेक्ष कारण
होय वह कर्म होता है. यह वार्त्ता वैशेषिक शास्त्रके १७ वें सूत्रमें लिखी है अर्थात्
(स्व) कर्म, संयोग तथा विभागको उत्पन्न करता हुआ अपनेसे उत्तरकालमें
उत्पन्न होनेवाले भावान्तरकी अपेक्षा नहीं करता. यह उक्त सूत्रका भावार्थ है.
(अन्यथा) यदि ऐसा अर्थ नहीं करें तो कर्मकोभी उत्तरसंयोगके उत्पन्न
करनेमें पूर्वसंयोग नाशकी अपेक्षाही है. निरपेक्ष कारण नहीं है. एवं उक्त सूत्रलक्षण-
की पूर्वसंयोगनाशकी अपेक्षा करनेवाली कर्मव्यक्तिमें अव्याप्ति होगी.
तत्र यदि द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशविशिष्टं कालमपेक्ष्य विभा-
गजविभागः स्यात्तदा दशक्षणा । अथ द्रव्यनाशाविशिष्टं काल-
मपेक्ष्य विभागजविभागः स्यात् तदैकादशक्षणा ।

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २३३
भाषा-( तत्र ) इस प्रकरणमें ( द्व्यणुकादि ) द्रव्यारम्भक संयोगका जो विनाश
तादृश विनाशविशिष्ट कालकी अपेक्षासे यदि विभागज विभागका विचार
किया जाय तो दशक्षणमें अवयवी फिर रूपादिमान् होसकता है और यदि द्रव्य-
नाशविशिष्ट कालकी अपेक्षाको लेकर विभागज विभागका विचार किया
जाय तो एकादश क्षणमें अवयवी फिर रूपादिवाला होसकताहै.
तथाहि अथ नवक्षणा-वह्निसंयोगात्परमाणौ कर्म, ततः परमाण्व-
न्तरेण विभागः, तत आरम्भकसंयोगनाशः । ततो द्व्यणुकना-
शः १ । ततः परमाणौ श्यामादिनाशः २ । ततो रक्ताद्युत्प-
त्तिः३ । ततो द्रव्यारम्भानुगुणक्रिया ४ । ततो विभागः ५। ततः
पूर्वसंयोगनाशः ६ । तत आरम्भकसंयोगः ७ । ततो द्व्यणुको-
त्पत्तिः ८ । ततो रक्ताद्युत्पत्तिः ९ ।
भाषा-( तथाहि ) इसी वार्ताको नवक्षणादि प्रक्रियाके क्रमसे लिखतेहैं-
पहले अग्निसंयोगसे द्व्यणुकारम्भक परमाणुद्वयमेंसे एक परमाणुमें क्रिया होतीहै. उस
क्रियासे पीछे द्व्यणुकारम्भक परमाणुअन्तरके साथ उस क्रियायुक्त परमाणुका विभाग
होताहै. उसके पीछे द्व्यणुकारम्भक संयोगका नाश होताहै. उसके पीछे द्व्यणुककां
नाश होताहै १ । प्रथमक्षणकी गणनाभी यहांहीसे करनी उचित है; क्योंकि पीछे
ग्रन्थकारने “ द्व्यणुकादिनाशमारभ्य ” इत्यादि कथनसे यही प्रतिज्ञा करीहै. उसके
पीछे परमाणुगत श्यामादि गुणोंका नाश होताहै २ । उसके पीछे तीसरे क्षणमें
परमाणुओंमें रक्तादि गुणोंकी उत्पत्ति होतीहै ३ । उसके पीछे चौथे क्षणमें द्व्यणुक-
रूप द्रव्यकी उत्पादिका क्रिया होतीहै ४ । उसके पीछे पञ्चमक्षणमें उस क्रियासे वि-
भाग होताहै ५ । उसके पीछे छठे क्षणमें विश्लिष्टपरमाणुओंके पूर्वसंयोगका नाश
होताहै ६ । उसके पीछे सातवें क्षणमें द्व्यणुकारम्भकसंयोग होताहै ७ । उसके
पीछे आठवें क्षणमें फिर द्व्यणुककी उत्पत्ति होतीहै ८ । उसके पीछे नवम क्षणमें
रक्तादिगुणोंकी उत्पत्ति होतीहै ९ । इति ।
ननु श्यामादिनाशक्षणे रक्तोत्पत्तिक्षणे वा परमाणौ द्रव्यारम्भानु-
गुणक्रियास्त्विति चेत् । न। अग्निसंयुक्ते परमाणौ यत्कर्म तद्विना-
शमन्तरेण गुणोत्पत्तिमन्तरेण च तत्र परमाणौ क्रियान्तराभा-
वात्, कर्मवति कर्मान्तरानुत्पत्तेः । निर्गुणे द्रव्ये द्रव्यारम्भानुगु-
णक्रियानुपपत्तेश्च ।
१९

२३४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
शंका-श्यामादि गुणोंके नाशक्षणमें या रक्तादि गुणोंकी उत्पत्तिक्षणमें परमाणुओंमें
द्व्यणुकादि द्रव्यकी उत्पादिका क्रिया मान लीजाय तो हानि क्या है? समाधान-
अग्निसंयुक्त परमाणुओंमें जो द्व्यणुकादिका विनाशक प्रथम कर्म है उसके विनाशसे
विना और परमाणुओंमें रक्तादि गुणोंकी उत्पत्तिसे विना उनही परमाणुओंमें द्व्यणु-
कादि द्रव्यारम्भकी. दूसरी क्रिया नहीं होसकती प्रथमक्रिया स्वसत्त्वावस्था में दूसरी
क्रियाकी उत्पत्तिमें प्रतिबन्धक होतीहै; इसलिये क्रियावालेमें क्रियान्तर नहीं होसकती
और निर्गुण द्रव्यमें द्रव्यारम्भणानुकूल क्रियाका होनाही असम्भव है.
तथापि परमाणौ श्यामादिनिवृत्तिसमकालं रक्ताद्युत्पत्तिः स्या-
दिति चेत् । न । पूर्वरूपादिध्वंसस्यापि रूपान्तरे हेतुत्वात् ॥
॥ इति नवक्षणा ॥
शंका-तथापि परमाणुओंमें श्यामादि गुणोंकी निवृत्तिक्षणहीमें रक्तादि गुणोंकी
उत्पत्तिभी मानलीजाय तो एक क्षणका लाघव है. समाधान-यह कथनभी सुयु-
क्तिक नहीं है; क्योंकि पूर्वरूपादि ध्वंसको रूपान्तरादिकी उत्पत्तिमें कारणता है और
कार्यकारणका समकालमें होना असम्भव है । इति नवक्षणा ॥
अथ दशक्षणा-सा चारम्भकसंयोगविनाशविशिष्टं कालमपेक्ष्य
विभागेन विभागजनने सति स्यात् ।
अथ दशक्षणा-वह दशक्षणप्रक्रिया द्रव्यारम्भसंयोगविनाशविशिष्ट कालकी
अपेक्षासे विभागजविभागका अङ्गीकार करनेसे प्रतीत होतीहै अर्थात् द्व्यणुकादि
द्रव्यारम्भक संयोगके विनाशकालहीमें यदि परमाणुद्वयके विभागसे परमाणु तथा
आकाशादिका विभागभी मानलिया जाय तो दशक्षणमें पुनः द्रव्य रूपादिमान् होताहै.
तथाहि । वह्निसंयोगाद्द्व्यणुकारम्भके परमाणौ क्रिया । ततो
विभागः, तत आरम्भकसंयोगनाशः, ततो द्व्यणुकनाशविभाग-
जविभागौ १ । ततः श्यामनाशपूर्वसंयोगनाशौ २ । ततो रक्तो-
त्पत्त्युत्तरसंयोगौ ३ । ततो वह्निनोदनजन्यपरमाणुकर्मणो
नाशः ४ । ततोऽदृष्टवदात्मसंयोगाद्द्रव्यारम्भानुगुणक्रिया ५ ।
ततो विभागः ६ । ततः पूर्वसंयोगनाशः ७ । तत आरम्भकसं-
योगः ८ । ततो द्व्यणुकोत्पत्तिः ९ । ततो रक्ताद्युत्पत्तिः १० ।
॥ इति दशक्षणा ॥

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २३५
भाषा-( तथा हि ) प्रथम अग्निसंयोगसे द्वयणुककारम्भक परमाणुमें क्रिया होतीहै;
उस क्रियासे पीछे परमाणुद्वयका विभाग होताहै. उस विभागसे पीछे द्वयणुकादि
द्रव्यके आरम्भक संयोगका नाश होताहै उसके पीछे द्वयणूकरूप द्रव्यका नाश तथा
परमाणु आकाशका विभाग ये दोनों एकही क्षणमें होतेहैं १ । उससे पीछे द्वितीय
क्षणमें परमाणुगत श्यामादिरूपका नाश तथा परमाणु आकाशके प्रथम संयोगका नाश
ये दोनों एकही क्षणमें होतेहैं २। उससे पीछे तृतीयक्षणमें परमाणुगत रक्तादिकी उत्प-
त्ति तथा परमाणुआकाशका उत्तरसंयोग ये दोनों एकही क्षणमें होतेहैं ३ । उससे
पीछे चतुर्थक्षणमें अग्निनोदनसे उत्पन्न हुई परमाणुगत क्रियाका नाश होता है ४ ।
उससे पीछे पंचमक्षणमें अदृष्टवाले आत्माके संयोगसे अर्थात् वह परिपक्क द्रव्य जिस
जीवात्माके भोगार्थ बनाहै उसके सम्बन्धसे द्रव्यारम्भणानुकूल क्रिया होतीहै ५ ।
उससे पीछे छठे क्षणमें उस क्रियासे परमाण्वाकाशादिका विभाग होताहै ६ । उस
विभागसे पीछे सातवें क्षणमें विभक्त अवयवोंके पूर्वसंयोगका नाश होताहै ७। उससे
पीछे अष्टमक्षणमें द्रव्यारम्भक संयोग होताहै ९। उससे पीछे नवम क्षणमें द्वयणुका-
दि द्रव्यकी उत्पत्ति होतीहै ९ । उससे पीछे दशमक्षणमें रक्तादि गुणोंकी उत्पत्ति
होतीहै १० । इति ।
अथैकादशक्षणा-वह्निसंयोगात्परमाणौ कर्म । ततो विभागः,
ततो द्रव्यारम्भकसंयोगनाशः, ततो द्वयणुकनाशः १। ततो
द्वयणुकनाशविशिष्टं कालमपेक्ष्य विभागजविभागश्यामानाशौ२।
ततः पूर्वसंयोगनाशरक्तोत्पत्ती ३ । तत उत्तरसंयोगः ४।
ततो वह्निनोदनजन्यपरमाणुकर्मनाशः ५ । ततोऽदृष्टवदात्मसं-
योगाद्द्रव्यारम्भानुगुणक्रिया ६ । ततो विभागः ७ । ततः
पूर्वसंयोगनाशः ८। ततो द्रव्यारम्भकसंयोगः ९ । ततो द्वयणु-
कोत्पत्तिः १० । ततो रक्ताद्युत्पत्तिः ११ । इति ॥
अथ एकादशक्षणाप्रक्रिया-अग्निसंयोगसे परमाणुओंमें क्रिया होतीहै, उस
क्रियासे एक परमाणुका दूसरेसे विभाग होताहै. उस विभागसे द्रव्यके आरम्भकसंयो-
गका नाश होताहै उससे पीछे द्वयणूकरूप कार्यद्रव्यका विनाश होताहै १ । उससे
पीछे द्वयणूकरूप द्रव्यनाशाधिकरणकालकी अपेक्षासे दूसरे क्षणमें परमाणुद्वयविभा-
गसे परमाण्वाकाशका विभाग तथा परमाणुगत श्यामादिरूपका नाश होताहै२। उससे
पीछे तीसरे क्षणमें प्रथम जहां परमाणुओंका संयोग था उसका नाश तथा रक्तादि

[Page Header: २३६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण- ]

गुणोंकी उत्पत्ति होतीहै ३ । उससे पीछे चौथे क्षणमें क्रियाकी विश्रान्तिका कारक
परमाणुओंका उत्तरसंयोग होताहै ४ । उससे पीछे पञ्चमक्षणमें अग्निके नोदनसे
उत्पन्न हुए परमाणुगत कर्मका नाश होताहै ५ । उससे पीछे छठे क्षणमें अदृष्टवाले
जीवात्माके संयोगसे द्वयणुकादि द्रव्यके आरम्भणानुकूला क्रिया होतीहै ६ । उस
क्रियासे पीछे सातवें क्षणमें फिर विभाग होताहै ७ । उससे पीछे अष्टमक्षणमें प्रथम
हुए संयोगका नाश होताहै ८। उससे पीछे नवमक्षणमें द्वयणुकादि द्रव्यारम्भक संयोग
होताहै ९ । उससे पीछे दशमक्षणमें द्वयणुकादि द्रव्यकी उत्पत्ति होतीहै १० । उससे
पीछे एकादश क्षणमें फिर द्रव्यमें रक्तादिगुणोंकी उत्पत्ति होतीहै ११ । इति ।
मध्यमशब्दवदेकस्मादग्निसंयोगान्न रूपनाशरक्तोत्पादौ, ताव-
त्कालमेकस्याग्नेरस्थिरत्वात् । किंच यद्युत्पादको नाशकस्तदा
नष्टे रूपादावग्निनाशे नीरूपश्चिरं परमाणुः स्यात् । नाशकश्चेदु-
त्पादकस्तदा रक्तोत्पत्तौ तदग्निनाशे रक्ततरता न स्यात् ॥
भाषा-मध्यमशब्दकी तरह एकही अग्निसंयोग श्यामादि गुणोंका नाशक तथा
रक्तादि गुणोंका उत्पादक नहीं होसकता अर्थात् आदि अन्तके शब्दद्वयको छोड़कर
मध्यवर्त्ति यावत् शब्दोंको जैसे स्वपूर्वशब्दनाशके प्रति तथा स्वउत्तर शब्द उत्पत्तिके
प्रति कारणता है वैसे द्वयणुकादि द्रव्यके विनाशक एकही अग्निसंयोगसे श्यामादि
गुणोंका विनाश तथा रक्तादिकी उत्पत्ति नहीं होसकती; क्योंकि (तावत्कालं)
श्यामानाशोत्पत्तिके अव्यवहित पूर्वक्षणपर्यन्त वह द्वयणुकादि द्रव्यका विनाशक एक
अग्निसंयोगस्थायी नहीं रहता, (किञ्च) इसमें औरभी युक्ति है कि-यदि रक्तादि
उत्पादक अग्निसंयोगहीको श्यामादिविनाशकभी मानें तो श्यामादिरूपके नष्ट होनेसे
दैवात् यदि अग्निसंयोगकाभी नाश होय तो पीछे चिरकालपर्यन्त परमाण्वादि द्रव्य
रूपरहितही पड़ा रहना चाहिये; परन्तु यह वार्त्ता किसी विद्वान्के अनुभवसम्मत
नहीं है. ऐसेही यदि श्यामादि गुणोंके विनाशक अग्निसंयोगकोही रक्तादिका उत्पाद-
कभी मानें तो साधारण रक्तकी उत्पत्तिके अनन्तर यदि दैवात् अग्निसंयोगका नाश
होय तो रक्ततरता नहीं हुई चाहिये; परन्तु साधारण रक्त हुए पीछे अग्निसंयोगनाश
होनेसेभी रक्ततर स्वयं होजाताहै. यह वार्त्ता अनुभवसिद्धहै. इसलिये श्यामादिके विना-
शक तथा रक्तादिके उत्पादक अग्निसंयोग भिन्न २ हैं; यही मानना उचित है.
अथ पञ्चक्षणा-एवं परमाण्वन्तरे कर्मचिन्तनात् पञ्चमादि
क्षणेऽपि गुणोत्पत्तिः ।

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २३७
अथ पञ्चक्षणा-एवं यदि परमाण्वन्तरमें कर्मका चिन्तन करें अर्थात् द्व्यणुककी
विनाशक क्रियावाले परमाणुसे भिन्न जो द्व्यणुकान्तरका आरम्भक परमाणु उस
परमाणुमें यदि कर्मका चिन्तन करें अर्थात् द्व्यणुकारम्भक संयोगके विनाशादि उत्प-
त्तिक्षणमें यदि द्व्यणुकान्तरारम्भक कर्मका चिन्तन करें तो पञ्चमादि क्षणोंमेंभी
रक्तादि गुणोंकी उत्पत्ति होसकतीहै-
तथाहि । एकत्र परमाणौ कर्म, ततो विभागः, तत आरम्भकसं-
योगनाशपरमाण्वन्तरकर्मणी । ततस्तु द्व्यणुकनाशः परमाण्व-
न्तरकर्मजश्च विभाग इत्येकः कालः १ । ततः श्यामादिनाशः,
विभागाच्च पूर्वसंयोगनाश इत्येकः कालः २ । ततो रक्तोत्पत्तिः
द्रव्यारम्भकसंयोगश्चेत्येकः कालः ३ । अथ द्व्यणुकोत्पत्तिः ४ ।
अथ रक्तोत्पत्तिः ५ ॥ इति पञ्चक्षणा ॥
भाषा-(तथाहि ) अग्निसंयोगसे एक परमाणुमें क्रिया हुई उस क्रियासे एक
परमाणुका दूसरेसे विभाग हुआ, उस विभागसे द्व्यणुकारम्भक संयोगका विनाश
तथा परमाणुअन्तरमें कर्म हुआ उससे पीछे द्व्यणुकरूप द्रव्यका नाश तथा परमाणु-
अन्तरमें कर्मजन्य विभाग हुआ, इतना एक काल जानना चाहिये १ । उससे पीछे
नष्ट द्रव्यके परमाणुओंमें श्यामादि गुणोंका विनाश तथा परमाणुअन्तर विभागसे
पूर्वसंयोगका विनाश हुआ, इतना द्वितीयक्षणरूप एक काल जानना चाहिये २ ।
उससे पीछे नष्टद्रव्यके परमाणुओंमें रक्तादि गुणोंकी उत्पत्ति तथा द्व्यणुकादि द्रव्य-
का आरम्भक संयोग हुआ, इतना तृतीय क्षणरूप एक काल जानना चाहिये ३ ।
उसके पीछे द्व्यणुकादि द्रव्यकी उत्पत्ति हुई ४ । उससे पीछे रक्तादि गुणोंकी उत्पत्ति
हुई ५ ॥ इति पञ्चक्षणाप्रक्रिया ॥
अथ षट्क्षणा-द्रव्यनाशसमकालं परमाण्वन्तरे कर्मचिन्तना-
त्षष्ठे गुणोत्पत्तिः ।
अथ षट्क्षणा-एवं पूर्वोक्त रीतिसे यदि द्व्यणुकादि द्रव्य नाश समकालमें पर-
माणुअन्तरमें कर्मका चिन्तन करें तो छठे क्षणमें रक्तादिगुणोंकी उत्पत्ति होतीहै.
तथाहि । परमाणुकर्मणा परमाण्वन्तरविभागः, तत आरम्भक-
संयोगनाशः । अथ द्व्यणुकनाशपरमाण्वन्तरकर्मणी १ । अथ
श्यामनाशः परमाण्वन्तरकर्मजो विभागश्च २ । ततो रक्तोत्पत्तिः

२३८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
परमाण्वन्तरे पूर्वसंयोगनाशश्च ३। ततः परमाण्वन्तरसंयोगः ४।
ततो द्व्यणुकोत्पत्तिः ५। अथ रक्तोत्पत्तिः ६॥ इति षट्क्षणा ॥
भाषा-( तथाहि ) अग्निसंयोगज परमाणुकी क्रियासे परमाण्वन्तरका विभाग
होता है. उस विभागसे द्व्यणुकादि द्रव्यके आरम्भक संयोगका विनाश होता है.
उससे पीछे द्व्यणुकका विनाश तथा परमाण्वन्तरमें क्रिया होती है १ । उससे पीछे
दूसरे क्षणमें नष्ट द्रव्यके परमाणुओंमें श्यामादि गुणोंका विनाश तथा परमाणु
अन्तरमें होनेवाली क्रियासे उत्पन्न होनेवाला विभाग होता है २। उससे पीछे तीसरे
क्षणमें नष्ट द्रव्यके परमाणुओंमें रक्तादिरूपकी उत्पत्ति होती है तथा परमाणु
अन्तरमें पूर्वसंयोगका विनाश होता है ३ । उससे पीछे चौथे क्षणमें रक्तहुए
परमाणुका परमाणु अन्तरके साथ संयोग होता है ४। उससे पीछे पञ्चम क्षणमें
द्व्यणुकादि द्रव्यकी उत्पत्ति होती है ५। छठे क्षणमें सम्पन्न द्व्यणुकादि द्रव्यमें
रक्तादिरूपकी उत्पत्ति होती है ६ ॥ इति षट् क्षणप्रक्रिया ॥
अथ सप्तक्षणा-एवं श्यामनाशक्षणे परमाण्वन्तरे कर्मचिन्त-
नात्सप्तक्षणा ।
अथ सप्तक्षणा-एवं यदि श्यामादि गुणनाशक्षणमें पूर्वोक्त रीतिसे परमाण्वन्तर-
में कर्मका चिन्तन करें तो सप्तक्षणमें पुनः द्रव्य रूपादिगुणोंवाला होता है.
तथाहि । परमाणौ कर्म, ततः परमाण्वन्तरेण विभागः,तत आर-
म्भकसंयोगनाशः, ततो द्व्यणुकनाशः १। ततः श्यामादिनाशप-
रमाण्वन्तरकर्मणी २ । ततो रक्तोत्पत्तिः परमाण्वन्तरे कर्मजवि-
भागश्च ३। ततः परमाण्वन्तरेण पूर्वसंयोगनाशः ४ । ततः पर-
माण्वन्तरेण संयोगः ५ । ततो द्व्यणुकोत्पत्तिः ६ । ततो रक्तो-
त्पत्तिः ७ ॥ इति सप्तक्षणा ॥
भाषा-( तथाहि ) अग्निसंयोगसे परमाणुमें क्रिया होती है; उस क्रियासे एक
परमाणुका दूसरेसे विभाग होता है; उस विभागसे द्रव्यारम्भक संयोगका विनाश
होता है. १। उससे पीछे द्व्यणुकादि द्रव्यका विनाश होताहै १ । उससे पीछे
दूसरे क्षणमें नष्टद्रव्यके परमाणुओंमें श्यामादिगुणोंका विनाश तथा परमा-
ण्वन्तरमें क्रिया होती है २ । उससे पीछे तीसरे क्षणमें नष्ट द्रव्यके
परमाणुओंमें रक्तादि गुणोंकी उत्पत्ति तथा परमाणुअन्तरमें क्रियाजन्य विभाग
होताहै ३ । उससे पीछे चौथे क्षणमें परमाणुअन्तरके साथ पूर्व संयोगका नाश

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २३९
होता है ४। उससे पीछे पंचमक्षणमें रक्तपरमाणुका परमाणुअन्तरके साथ संयोग होता
है५। उससे पीछे छठे क्षणमें द्व्यणुकादिद्रव्यकी उत्पत्ति होतीहै ६। उससे पीछे सातवें
क्षणमें उस द्रव्यमें रक्तादि गुणोंकी उत्पत्ति होतीहै. ७ । इति सप्तक्षणाप्रक्रिया ॥
अथाष्टक्षणा—एवं रक्तोत्पत्तिसमकालं परमाण्वन्तरे कर्मचिन्त-
नादष्टक्षणा ।
अथ अष्टक्षणा—एवं यदि रक्तादिगुणोंकी उत्पत्तिकालमें पूर्वोक्त रीतिसे परमाणु
अन्तरमें कर्मका चिन्तन करें तो अष्टक्षणमें द्रव्य पुनः रूपादि गुणयुक्त होताहै.
तथाहि । परमाणौ कर्म, ततः परमाण्वन्तरविभागः, तत आर-
म्भकसंयोगनाशः, ततो द्व्यणुकनाशः १। ततः श्यामनाशः २।
ततो रक्तोत्पत्तिपरमाण्वन्तरकर्मणी ३ । ततः परमाण्वन्तरक-
र्मजविभागः ४ । ततः परमाण्वन्तरे पूर्वसंयोगनाशः ५ । ततः
परमाण्वन्तरसंयोगः ६ । ततो द्व्यणुकोत्पत्तिः ७ । अथ रक्तो-
त्पत्तिः ८ । इत्यष्टक्षणा ॥ १०५ ॥
भाषा—(तथाहि) अग्निसंयोगसे परमाणुमें क्रिया हुई. उस क्रियासे परमाणुके
परमाणुअन्तरसे विभाग हुआ. उस विभागसे द्रव्यारम्भक संयोगका विनाश हुआ.
उससे पीछे द्व्यणुकादि द्रव्यका नाश हुआ १ । उससे पीछे दूसरे क्षणमें नष्ट द्रव्यके
परमाणुओंमें श्यामादि गुणोंका नाश हुआ २ । उससे पीछे तीसरे क्षणमें नष्ट द्रव्यके
परमाणुओंमें रक्तादि गुणोंकी उत्पत्ति तथा परमाणु अन्तरमें क्रिया होतीहै ३ । उससे
पीछे चौथे क्षणमें परमाणुअन्तरमें उत्पन्न हुए कर्मसे विभाग होताहै ४ । उससे
पीछे पंचमक्षणमें परमाणुअन्तरमें पूर्वसंयोगका विनाश होताहै ५ । उससे पीछे
छठे लक्षणमें रक्तपरमाणुका परमाणुअन्तरके साथ संयोग होता है ६ । उससे पीछे
सातवें क्षणमें द्व्यणुकादि द्रव्यकी उत्पत्ति होतीहै ७ । उससे पीछे अष्टमक्षणमें उस
द्रव्यमें रक्तादि गुणोंकी उत्पत्ति होतीहै ॥ १०५ ॥ इति अष्टक्षणाप्रक्रिया ॥
नैयायिकानां तु नये द्व्यणुकादावपीष्यते ॥
भाषा—नैयायिकोंके मतमें तो द्व्यणुकादि कार्यद्रव्यमेंभी पाक होसकताहै.
नैयायिकानामिति । नैयायिकानां मते द्व्यणुकादाववयविन्यापि
पाको भवति । तेषामयमाशयः । अवयविनां सच्छिद्रत्वाद्वह्नेः
सूक्ष्मावयवैरन्तःप्रविष्टैरवयवेष्ववष्टब्धेष्वपि पाको न विरुध्यते,
वैशेषिकमतेऽनन्तावयवितन्नाशकल्पने गौरवात् ।

२४० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-गौतमादि नैयायिकोंके सिद्धान्तमें तो द्वयणुकादि अवयवोंमेंभी अग्निसं-
योगसे पाक होसकताहै परमाणुपर्यंत धावन करनेका कुछ प्रयोजनही नहीं, उनके
हृदयका भाव यह है कि-घटादि अवयवी सदा छिद्रयुक्तही रहतेहैं; उन छिद्रोंमें
अग्निके सूक्ष्म अवयव प्रवेश कर जातेहैं; इसलिये परस्पर मिले मिलाये अवयवीरूप
अवयवोंमेंभी पाक मान लेनेमें कुछ विरोध नहीं है. एवं वैशेषिकके मतमें अनन्त
अवयवी तथा उसका ध्वंस कल्पनेमें गौरवभी है.
इत्थं च 'सोऽयं घटः' इत्यादिप्रत्यभिज्ञापि संगच्छते । यत्र तु न
प्रत्यभिज्ञा तत्रावयविनाशोऽपि स्वीक्रियत इति ।
भाषा-इस रीतिसे जब अवयवीका विनाश अङ्गीकार न किया तो “सोऽयं घटः”
इत्याकारक प्रत्यभिज्ञाज्ञानभी बन सकता है अर्थात् यदि अवयवी अग्निसंयोगसे विनष्ट
होकर दूसरा उत्पन्न होय तो “ सोऽयं घटः” यह प्रत्यभिज्ञाज्ञान नहीं हुआ चाहिये
परन्तु होता तो है. इसलिये अग्निसंयोगसे अवयवीका विनाश मानना उचित नहीं परन्तु
जहां ' सोऽयं ' इत्यादि प्रत्यभिज्ञात्मक बुद्धि नहीं होती वहां अवयवीका अग्निआदि-
संयोगसे विनाशभी हमको स्वीकार है-इति ।
संख्यां निरूपयितुमाह, गणनेति -
भाषा-' गणना' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार संख्याका निरूपण करतेहैं-
गणनाव्यवहारे तु हेतुः संख्याऽभिधीयते ॥१०६॥
भाषा-गणनाव्यवहारमें हेतुभूत गुणका नाम संख्या है ॥ १०६ ॥
गणनव्यवहारासाधारणकारणं संख्येत्यर्थः ॥ १०६ ॥
भाषा-अर्थात् परिगणनरूप व्यवहारका असाधारण कारणरूप संख्यात्मक
गुण है ॥१०६॥
नित्येषु नित्यमेकत्वमनित्येऽनित्यमिष्यते ॥
भाषा-उसमें एकत्वरूप संख्या नित्यपदार्थोंमें नित्य है तथा अनित्यपदार्थोंमें
अनित्य है.
नित्येष्विति । नित्येषु परमाण्वादिष्वेकत्वं नित्यम् । अनित्ये
घटादावेकत्वमनित्यमित्यर्थः ।
भाषा-अर्थात् परमाणु आदि नित्यपदार्थोंमें एकत्व नित्य है तथा घटादि अनि-
त्योंमें एकत्व अनित्य है.

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २४१
द्वित्वादयः परार्द्धान्ता अपेक्षाबुद्धिजा मताः॥१०७॥
भाषा-और द्वित्वादि संख्यासे लेकर परार्ध पर्यन्त यावत् संख्या अपेक्षाबुद्धि
जन्य है ॥ १०७ ॥
द्वित्वादय इति । द्वित्वादयो व्यासज्यवृत्तिसंख्या अपेक्षा-
बुद्धिजन्याः ॥ १०७ ॥
भाषा-अर्थात् ( व्यासज्यवृत्ति ) धर्मद्वय समनियतवृत्ति द्वित्वादि परार्द्धपर्यन्त यावत्
संख्या अपेक्षाबुद्धिसे उत्पन्न होतीहै.“एकं दशशतं चैव सहस्त्रमयुतं तथा॥लक्षं च नियुतं
चैव कोटिरर्बुदमेव च ॥ वृन्दं खर्वो निखर्वश्च शंखः पद्मश्च सागरः ॥ अन्त्यं मध्यं
परार्द्धं च दश वृद्ध्या यथाक्रमम् ॥ १ ॥ ” इस गणितविद्याके नियमानुसार यदि
एक अंकके आगे “१०००००००००००००००००” ऐसे सत्रह शून्य लगादिये
जावें तो उस संख्याका नाम परार्द्ध है, एवं द्वित्वादि संख्यासे लेकर एतादृश परा-
र्द्धपर्यन्त यावत्संख्या अपेक्षाबुद्धिसे उत्पन्न होतीहै ॥ १०७ ॥
अनेकाश्रयपर्याप्ता एते तु परिकीर्तिताः ॥
भाषा-यह सब द्वित्वादि धर्म अनेक आश्रयोंमें पर्याप्तिसम्बन्धसे रहते हैं, यह
पूर्वविद्वान् लोगोंका अनुभवानुरोधेन कथन है.
अनेकेति । यद्यपि द्वित्वादिसमवायः प्रत्येकं घटादावपि वर्तते,
तथाऽप्येको द्वावितिप्रत्ययाभावादेको न द्वाविति प्रत्ययसद्भावाच्च
द्वित्वादीनां पर्याप्तिलक्षणः कश्चन सम्बन्धोऽनेकाश्रयोऽभ्युपगम्यते ।
भाषा-यद्यपि द्वित्वादिका समवायभी प्रत्येक घटादिमें रहता है, इसलिये ऐसे
स्थलमें पर्याप्तिसम्बन्धकी कल्पना करनी उचित नहीं तथापि “ एको द्वौ ” इत्या-
कारक प्रत्ययके न होनेसे तथा “एको न द्वौ” इत्याकारक प्रत्ययके होनेसे द्वित्वादि-
कोंका ‘पर्याप्ति’ नामक कोईएक सम्बन्ध अनेक द्रव्यरूप आश्रयोंमें रहनेवाला
प्रतीत होताहै. “अयमेको घटः, इमौ द्वौ” इत्याकारक प्रतीति सिद्ध स्वरूप सम्ब-
न्धविशेषका नाम ‘पर्याप्ति’ है ।
अपेक्षाबुद्धिनाशाच्च नाशस्तेषां निरूपितः ॥१०८॥
भाषा-उस अपेक्षाबुद्धिके नाश होनेसे उन द्वित्वादि धर्मोंकाभी विनाश होताहै १०८
अपेक्षाबुद्धिनाशादिति।प्रथममपेक्षाबुद्धिः,ततो द्वित्वोत्पत्तिः,ततो
विशेषणज्ञानं द्वित्वत्वनिर्विकल्परूपं, ततो द्वित्वत्वविशिष्टप्रत्य-
क्षमपेक्षाबुद्धिनाशश्च, ततो द्वित्वनाश इति ।

कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, अभाव खण्ड एवं मुक्ति-विचार उपसंहार

२४२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-प्रथम क्षणमें "अयमेकः अयमेकः" इत्याकारक अपेक्षाबुद्धि उत्पन्न
होतीहै. दूसरे क्षणमें उस अपेक्षाबुद्धिसे द्वित्वकी उत्पत्ति होतीहै. तीसरे क्षणमें द्वित्वके
द्वित्वत्वरूप विशेषण का निर्विकल्पात्मक "इमे द्वित्वद्वित्वत्वे" इत्याकारक ज्ञान होता-
है. चौथे क्षणमें द्वित्वत्वविशिष्ट द्वित्वका लौकिक प्रत्यक्ष तथा अपेक्षाबुद्धिका विनाश
होताहै, पीछे पञ्चमक्षणमें द्वित्वादिका विनाश होताहै.
यद्यपि ज्ञानान्तरं द्विक्षणमात्रस्थायि, योग्यविभुविशेषगुणानां
स्वोत्तरवर्त्तिगुणनाश्यत्वात् । तथाप्यपेक्षाबुद्धेस्त्रिक्षणस्थायित्वं
कल्प्यते, अन्यथा निर्विकल्पककालेऽपेक्षाबुद्धिनाशानन्तरं
द्वित्वस्यैव नाशः स्यान्न तु द्वित्वप्रत्यक्षम्,तदानीं विषयाभावात्,
विद्यमानस्यैव चक्षुरादिना ज्ञानजननोपगमात् । तस्माद्वित्वप्र-
त्यक्षादिकमपेक्षाबुद्धेर्नाशकं कल्प्यते ।
भाषा-यद्यपि और साधारण यावत् ज्ञान द्विक्षणमात्र स्थित रहतेहैं, क्योंकि
यह नियम है कि-प्रत्यक्षके योग्य विभुके विशेषगुण स्वउत्तरवर्ति विभु विशेषगुणसे
नाश हुआ करतेहैं तथापि अपेक्षाबुद्धिकी तीनक्षण स्थितिकी कल्पना करनी पड़तीहै
(अन्यथा) यदि तीन क्षण स्थितिकी कल्पना न करें अर्थात् और ज्ञानोंकी तरह
द्विक्षणस्थायिही अपेक्षाबुद्धिभी मानें तो द्वित्वत्वनिर्विकल्परूप ज्ञानकालहीमें
अपेक्षाबुद्धिके नाशके अनन्तर द्वित्वकाभी नाश होगा तो द्वित्वका साक्षात्कार नहीं
होसकेगा; क्योंकि उस कालमें द्वित्वआत्मकविषय नहीं रहाहै और चक्षुरादि
इन्द्रियद्वारा विद्यमान विषयकाही ज्ञान होताहै. यह वार्ता सभी विद्वानोंके सम्मत
है. इसलिये द्वित्वादिका साक्षात्कारही अपेक्षाबुद्धिका विनाशक है, यह कल्पना
करनी पड़तीहै,
न चापेक्षाबुद्धिनाशात्कथं द्वित्वनाश इति वाच्यम् । कालान्तरे
द्वित्वप्रत्यक्षाभावादपेक्षाबुद्धिस्तदुत्पादिका तन्नाशस्तन्नाशक
इति कल्पनात् ।
शंका-अपेक्षाबुद्धि विनाशके पीछे द्वित्वादिका विनाश कैसे होताहै? समा-
धान-अपेक्षाबुद्धिके असत्त्वकालमें द्वित्त्वादिधर्मोंका साक्षात्कार नहीं होता इसलिये
यह निश्चय होता है कि-अपेक्षाबुद्धिही द्वित्वादि धर्मोंके उत्पन्न करनेवाली है
और अपेक्षाबुद्धिका विनाशही उन द्वित्वादि धर्मोंका विनाशक है.

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २४३
अतएव तत्पुरुषीयापेक्षाबुद्धिजन्यद्वित्वादिकं तेनैव गृह्यत इति
कल्प्यते ।
भाषा-( अतएव ) पूर्वोक्त युक्तिसे अपेक्षाबुद्धिको अवश्य द्वित्वादिउत्पादकता
है; इसीलिये यहभी कल्पना होती है कि-उस उस पुरुषकी अपेक्षाबुद्धिसे उत्पन्नहुए
द्वित्वादिको वही वही पुरुष ग्रहण करसकता है; दूसरा नहीं.
न चापेक्षाबुद्धेर्द्वित्वप्रत्यक्षे कारणत्वमस्त्विति वाच्यम्, लाघवेन
द्वित्वं प्रति कारणत्वस्यैवोचितत्वात् । अतीन्द्रिये द्व्यणुकादाव-
पेक्षाबुद्धिर्योगिनाम्, सर्गादिकालीनपरमाण्वादावीश्वरीयापेक्षाबु-
द्धिर्ब्रह्माण्डान्तरवर्तियोगिनामपेक्षाबुद्धिर्वा द्वित्वादिकारणमिति ।
शंका-अपेक्षाबुद्धिको यदि द्वित्वादि उत्पत्तिके प्रति कारणता न मानें किन्तु
केवल द्वित्वादि प्रत्यक्षके प्रतिही कारणता मानें तो हानि क्या है ? समाधान-
लाघवानुरोधसे द्वित्वादिके प्रतिही अपेक्षाबुद्धिको कारणता माननी उचित है अर्थात्
' द्वित्वप्रत्यक्षत्व ' की अपेक्षासे ' द्वित्वत्व ' रूप धर्मको कार्यतावच्छेदक माननेमें
लाघव है. द्व्यणुकादि अतीन्द्रियपदार्थोंमें योगी लोगोंकी अपेक्षाबुद्धि होती है. सृष्टिके
आदिकालमें परमाणु आदिकोंमें ईश्वरकी अपेक्षाबुद्धि होती है अथवा दूसरे ब्रह्माण्डमें
होनेवाले योगीलोगोंकी अपेक्षाबुद्धि द्वित्वादिका कारण होती है-इति ॥१०८॥
अपेक्षाबुद्धिः केत्यत आह, अनेकेति-
शंका-वह अपेक्षाबुद्धि कैसी होती है ?
अनेकैकत्वबुद्धिर्या साऽपेक्षाबुद्धिरुच्यते ॥
समा०-अनेक पदार्थोंमें एकत्वअवगाहन करनेवाली बुद्धिका नाम 'अपेक्षाबुद्धि' है.
'अयमेकोऽयमेकः' इत्याकारिकेत्यर्थः । इदं तु बोध्यम् । यत्रानि-
यतैकत्वज्ञानं तत्र द्वित्वादिभिन्ना बहुत्वसंख्योत्पद्यते यथा सेना-
वनादाविति कन्दलीकारः ।
भाषा-अर्थात् अनेक पदार्थोंमें “ अयमेकोऽयमेकः ” इत्याकारक बुद्धिका नाम
'अपेक्षाबुद्धि' है. यहांपर यह भेदभी जानने योग्य है कि-' कन्दली ' नामक
ग्रंथका कर्ता श्रीधर पंडित तो यह कहता है कि-जिस स्थलमें एकत्वका ज्ञान
अनियत है अर्थात् नियमपूर्वक नहीं होता उस स्थलमें द्वित्वादि भिन्न बहुत्वसंख्या-

२४४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
की उत्पत्ति होती है. जैसे सेना सभादि पुरुषसमूहमें या वनवाटिकादि वृक्षसमूहमें
एकत्वज्ञान अनियत है; इसलिये इत्यादि स्थलोंमें द्वित्वादिविन्न बहुत्वसंख्याकी
उत्पत्ति होती है-इति
आचार्यास्तु त्रित्वादिकमेव बहुत्वं मन्यन्ते, तथाच त्रित्वत्वा-
दिव्यापिका बहुत्वत्वजातिर्नातिरिच्यते । सेनावनादौ चोत्पन्ने-
ऽपि त्रित्वादौ त्रित्वत्वायग्रहो दोषात् ।
भाषा-और उदयनाचार्य तो यह कहते हैं कि-त्रित्वादिहीका नामान्तर 'बहुत्व' है;
बहुत्व कोई त्रित्वादिसे पृथक् धर्म नहीं है. एवं त्रित्वादि धर्मोंकी व्यापकीभूता
बहुत्वत्वरूपा जातिभी कोई अतिरिक्त नहीं है. सेनावनादिकोंमेंभी त्रित्वादि उत्पन्न
तो होतेहैं परन्तु उनमें नियतानेक एकत्वज्ञानाभावरूप दोषके प्रभावसे त्रित्वत्वादि
धर्मोंका ग्रहण नहीं होता.
इत्थं च 'इतो बहुतरेयं सेना' इति प्रतीतिरूपपद्यते, बहुत्वस्य सं-
ख्यान्तरत्वे तु तत्ततारतम्याभावान्नोपपद्येतेत्यवधेयम् ।
भाषा-(इत्थञ्च) ऐसे मन्तव्यसे "इतो बहुतरेयं सेना" अर्थात् इस सेनासे
इस द्वितीय सेनाके बहुत्वमें स्वसजातीयनिरूपित उत्कर्ष प्रतीत होता है. इस
प्रतीतिकीभी उपपत्ति होसकती है; परन्तु यदि बहुत्वको त्रित्वादिसे संख्यान्तर
मानें तो उसकी अपने आपमें न्यून अधिकता कुछ नहीं बन सकती, इसलिये
"इतो बहुतरेयं सेना" इस प्रतीतिका उपपन्न होना दुर्घट है-इति ।
परिमाणं निरूपयति, परिमाणमिति-
भाषा-'परिमाणं' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार परिमाणका निरूपण करतेहैं-
परिमाणं भवेन्मानव्यवहारस्य कारणम् ॥१०९॥
अणु दीर्घं महद्ह्रस्वमिति तद्भेद ईरितः ॥
भाषा-मानव्यवहारके कारणीभूतका नाम 'परिमाण' है ॥ १०९ ॥ वह परिमाण
अणु दीर्घ महत् तथा ह्रस्व भेदसे चार प्रकारका है.
परिमितिव्यवहारासाधारणं कारणं परिमाणमित्यर्थः ॥ १०९ ॥
तच्चतुर्विधम्, अणु महद्दीर्घं ह्रस्वं च । इदं चातुर्विध्यं प्रत्यक्षसि-
द्धम् । तत्राणुत्वह्रस्वत्वे महत्त्वदीर्घत्वे च समनियते ।
भाषा-अर्थात् "इदं अणु, इदं महत्" इत्याकारक जो (परिमिति) परिमापण

परिच्छेदः ५] भाषाटीकासमेता. २४५
रूप व्यवहार उसका असाधारण कारणीभूत परिमाण है ॥ १०९ ॥ वह अणु महत्
दीर्घ तथा ह्रस्वभेदसे चार प्रकारका है. यह चारों प्रकारका प्रत्यक्ष अनुभवसे सिद्ध
है. उनमें अणुत्व ह्रस्वत्व तथा महत्त्व दीर्घत्व ये दो दो आपसमें समनियत रहते हैं.
भाव यह कि-इन चारों प्रकारके परिमाणको पहले परम मध्यम भेदसे दोप्रकारका
जानना चाहिये. उनमें परमअणुत्व तथा परमह्रस्वत्व परमाणुओंमें तथा मनमें है.
एवं मध्यम अणुत्व तथा मध्यमह्रस्वत्व द्वयणुकमें है. एवं परममहत्त्व तथा परम-
दीर्घत्व गगनादिकोंमें है और मध्यममहत्त्व तथा मध्यमदीर्घत्व घटादि पदार्थोंमें है.
इस रीतिसे ये दो दो परस्पर समनियत हैं.
अनित्ये तदनित्यं स्यान्नित्ये नित्यमुदाहृतम्॥११०॥
संख्यातः परिमाणाच्च प्रचयादपि जायते ॥
अनित्यं-
भाषा--वह परिमाण घटपटादि अनित्यपदार्थोंमें अनित्य है तथा गगनादि नित्य-
पदार्थोंमें नित्य है ॥ ११० ॥ इनमें अनित्यपरिमाणकी संख्यासे परिमाणसे तथा
( प्रचय ) शिथिलाख्य संयोगसे उत्पत्ति होतीहै.
तत्परिमाणम् । नित्यमित्यत्र परिमाणमित्यनुषज्यते । जायत इ-
त्यत्रापि परिमाणमित्यनुवर्तते । अनित्यमिति पूर्वेणान्वितम् ।
तथाचानित्यं परिमाणं संख्याजन्यं परिमाणजन्यं प्रचयजन्यं
चेत्यर्थः ।
भाषा--मूलपठित 'तत्' शब्दसे परिमाणका ग्रहण है. एवं 'नित्यं' इस पदके
साथ 'परिमाणं' इस पदका पूर्वकारिकासे अनुवर्तन करके सम्बन्ध करना. एवं
'जायते' इस क्रियापदके साथभी 'परिमाणं' इस पदका पीछेसे सम्बन्ध करना
कारिकाके उत्तरार्द्धके आदिमें पठित 'अनित्य' पदका पूर्व पदोंके साथ अन्वय है.एवं
यह अर्थ हुआ कि--अनित्यपरिमाण संख्याजन्य परिमाणजन्य तथा प्रचयजन्य
होनेसे तीन प्रकारसे उत्पन्न होताहै.
तत्र सङ्ख्याजन्यमुदाहरति, द्वयणुकादाविति-
भाषा-उनमें 'द्वयणुकादौ' इत्यादि ग्रन्थसे संख्याजन्यको दिखलाते हैं-
-द्वयणुकादौ तु संख्याजन्यमुदाहृतम् ॥१११॥
भाषा-द्वयणुकादिकोंका परिमाण संख्यासे उत्पन्न होताहै ॥ १११ ॥