न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
वृषको नीलवृष कहा है. यदि चित्रवर्ण आचार्यको पृथक् स्वीकृत होता तो "चित्रं
वृषं विसर्जयेत्" इतना मात्रही कहता.
न च व्याप्याव्याप्यवृत्तिजातीययोर्द्वयोर्विरोधः, मानाभावात् ।
शंका-व्याप्यवृत्ति स्वभाववाले पदार्थोंको अव्याप्यवृत्ति माननाभी उचित नहीं;
क्योंकि व्याप्यवृत्तित्त्वरूप धर्मका तथा अव्याप्यवृत्तित्त्वरूप धर्मका परस्पर तेजस्ति-
मिरवत् विरोध है. समाधान-रूपादि जो व्याप्यवृत्तित्वेन उत्पन्न होतेहैं वे अव्याप्य-
वृत्तित्वेन उत्पन्न नहीं होसकते; इस विरोधमें कोई प्रमाण नहीं है.
न च लाघवादेकं रूपम् । अनुभवविरोधात् । अन्यथा घटादे-
रपि लाघवादैक्यं स्यादिति । एतेन स्पर्शादिकं व्याख्यातमिति
वदन्ति ॥ १०० ॥
शंका-लाघवसे चित्ररूप एकही मान लिया जाय तो हानि क्याहै? समा०-
एक माननेमें "अयं नीलादिनानावर्णयुक्तोऽवयवी" इत्यादि अनुभवसे विरोध होता
है. (अन्यथा) यदि अनुभवसे विरुद्धभी लाघव स्वीकृत होय तो घटपटादि व्यक्तिभी
संसारमात्रमें लाघवसे एक मानलेनी चाहिये. (एतेन) इसी कथनसे चित्रस्पर्शादि-
का निरासभी समझलेना; (इति वदन्ति) यह सब नवीन लोगोंका कथन है॥१००॥
जलादिपरमाणौ तन्नित्यमन्यत्सहेतुकम् ॥
भाषा-वह रूप जलादि परमाणुओंमें नित्य है और पार्थिवपदार्थमात्रमें जन्य है.
जलादीति । जलपरमाणौ तेजःपरमाणौ च रूपं नित्यम् । पृथि-
वीपरमाणुरूपं तु न नित्यं पाकेन रूपान्तरोत्पत्तेः। न हि घटस्य
पाकानन्तरं तदवयवोऽपक्व उपपद्यते,न हि रक्तकपालस्य कपा-
लिका नीलाद्यवयवा भवति । एवंक्रमेण परमाणावपि पाकसिद्धेः ।
अन्यज्जलतेजःपरमाणुरूपभिन्नं रूपम् । सहेतुकं जन्यम् ।
भाषा-अर्थात् जलीय परमाणुओंमें तथा तैजस परमाणुओंमें रूप नित्य है
और पार्थिव परमाणुओंमें रूप अनित्य है क्योंकि वहां(पाकेन) अग्निसंयोगसे रूपान्त-
रकी उत्पत्ति होतीहै. अग्निसंयोगद्वारा घटके परिपाक होनेसे उसके अवयव परिपक्व
नहीं होते, यह कहना उचित नहीं; क्योंकि अग्निसंयोगसे रक्तहुए (कपाल) घटार्ध-
भागका (कपालिका) छोटा हिस्सा नीलपीतादि अवयवोंवाला देखनेमें नहीं आता,
इसक्रमसे विचारनेसे पार्थिव परमाणुओंमेंभी पाककी सिद्धि होसकतीहै.