न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २२७
इत्थंच नीलादीनां पीताद्यारम्भे प्रतिबन्धकत्वकल्पनादवयवि-
नि न पीताद्युत्पत्तिः । एतेन स्पर्शोऽपि व्याख्यातः ।
भाषा-(इत्थञ्च) इस पूर्वोक्त लाघवसे चित्ररूपकी अतिरिक्त सिद्धि हुई तो
नीलादि व्यक्तियोंमें पीतादिव्यक्तियोंके उत्पन्न होनेमें प्रतिबन्धकता कल्पना करनेसे
नीलरूपवाले अवयवीमें पीतरूपकी उत्पत्तिभी नहीं होसकती अर्थात् समवायसम्बन्धेन
पीतरूपं प्रति स्वसमवायिसमवेतत्वसम्बन्धेन पीतातिरिक्त रूपत्वेन पीतातिरिक्त नीला-
दिरूपोंको प्रतिबन्धकता है. इस पूर्वोक्त चित्ररूपके व्याख्यानसे चित्रस्पर्शका
व्याख्यानभी समझलेना अर्थात् चित्रस्पर्शभी अवश्यही अङ्गीकार करना उचित है.
रसादिकमपि नाव्याप्यवृत्तिः किंतु नानाजातीयरसवदवयवैरार-
ब्धेऽवयविनि रसाभावेऽपि न क्षतिः। तत्र रसनयाऽवयवरस
एव गृह्यते, रसनेन्द्रियादीनां द्रव्यग्रहे सामर्थ्याभावात् । अवय-
विनीरस्त्वेऽपि क्षतेरभावात् ।
भाषा-एवं रसादिकभी किंचिदवयवावच्छेदेन उत्पन्न नहीं होते, किन्तु रूपसे
इतनी विलक्षणता है कि-अनेकप्रकारके रसोंवाले अवयवोंसे उत्पन्न हुए अवयवीमें
चित्ररस नाभी मानें तो हानि कुछ नहीं; क्योंकि चित्ररसकी प्रतीति तो अवयवगत
अनेक रसोंसेभी होसकती है. एवं अवयवीमें चित्ररसकी कल्पना करनी व्यर्थ है.
(तत्र) चित्ररसग्रहणस्थलमें रसनेन्द्रियसे अवयवगत रसकाही ग्रहण होताहै.
रसना घ्राण तथा श्रोत्रइन्द्रियमें द्रव्य ग्रहण करनेकी तो सामर्थ्यही नहीं. इसलिये
अवयवीको रसशून्यभी मानलिया जाय तो हानि कुछ नहीं है.
नव्यास्तु तत्राव्याप्यवृत्त्येव नानारूपं नीलादेः पीतादिप्रतिब-
न्धकत्वकल्पने गौरवात् । अतएव "लोहितो यस्तु वर्णेन मुखे
पुच्छे च पाण्डुरः" इत्यादिशास्त्रमप्युपपद्यते ।
भाषा-(नव्यास्तु) और चिन्तामणिकारादि नवीनलोग तौ यह कहते हैं कि-
चित्रावयवीस्थलमें अनेकप्रकारका रूप अव्याप्यवृत्तित्वेन रूपेणही उत्पन्न होताहै; ऐसे
स्थलमें नीलरूपादिकोंमें पीतरूपादिके प्रति प्रतिबन्धकता कल्पना करनीभी महागौरव
है. चित्ररूप कोई पृथक् वर्ण नहीं है, इसीसे "लोहितो यस्तु वर्णेन मुखे पुच्छे च पाण्डु-
रः॥श्वेतः खुरविषाणाभ्यां स नीलो वृष उच्यते" इत्यादि स्कन्धपुराणका वचनभी उप-
पन्न होसकता है अर्थात् इस वचनमें नील(वृष)बलद विसर्जनके उद्देश्यसे अनेक वर्णयुक्त