न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २३७
अथ पञ्चक्षणा-एवं यदि परमाण्वन्तरमें कर्मका चिन्तन करें अर्थात् द्व्यणुककी
विनाशक क्रियावाले परमाणुसे भिन्न जो द्व्यणुकान्तरका आरम्भक परमाणु उस
परमाणुमें यदि कर्मका चिन्तन करें अर्थात् द्व्यणुकारम्भक संयोगके विनाशादि उत्प-
त्तिक्षणमें यदि द्व्यणुकान्तरारम्भक कर्मका चिन्तन करें तो पञ्चमादि क्षणोंमेंभी
रक्तादि गुणोंकी उत्पत्ति होसकतीहै-
तथाहि । एकत्र परमाणौ कर्म, ततो विभागः, तत आरम्भकसं-
योगनाशपरमाण्वन्तरकर्मणी । ततस्तु द्व्यणुकनाशः परमाण्व-
न्तरकर्मजश्च विभाग इत्येकः कालः १ । ततः श्यामादिनाशः,
विभागाच्च पूर्वसंयोगनाश इत्येकः कालः २ । ततो रक्तोत्पत्तिः
द्रव्यारम्भकसंयोगश्चेत्येकः कालः ३ । अथ द्व्यणुकोत्पत्तिः ४ ।
अथ रक्तोत्पत्तिः ५ ॥ इति पञ्चक्षणा ॥
भाषा-(तथाहि ) अग्निसंयोगसे एक परमाणुमें क्रिया हुई उस क्रियासे एक
परमाणुका दूसरेसे विभाग हुआ, उस विभागसे द्व्यणुकारम्भक संयोगका विनाश
तथा परमाणुअन्तरमें कर्म हुआ उससे पीछे द्व्यणुकरूप द्रव्यका नाश तथा परमाणु-
अन्तरमें कर्मजन्य विभाग हुआ, इतना एक काल जानना चाहिये १ । उससे पीछे
नष्ट द्रव्यके परमाणुओंमें श्यामादि गुणोंका विनाश तथा परमाणुअन्तर विभागसे
पूर्वसंयोगका विनाश हुआ, इतना द्वितीयक्षणरूप एक काल जानना चाहिये २ ।
उससे पीछे नष्टद्रव्यके परमाणुओंमें रक्तादि गुणोंकी उत्पत्ति तथा द्व्यणुकादि द्रव्य-
का आरम्भक संयोग हुआ, इतना तृतीय क्षणरूप एक काल जानना चाहिये ३ ।
उसके पीछे द्व्यणुकादि द्रव्यकी उत्पत्ति हुई ४ । उससे पीछे रक्तादि गुणोंकी उत्पत्ति
हुई ५ ॥ इति पञ्चक्षणाप्रक्रिया ॥
अथ षट्क्षणा-द्रव्यनाशसमकालं परमाण्वन्तरे कर्मचिन्तना-
त्षष्ठे गुणोत्पत्तिः ।
अथ षट्क्षणा-एवं पूर्वोक्त रीतिसे यदि द्व्यणुकादि द्रव्य नाश समकालमें पर-
माणुअन्तरमें कर्मका चिन्तन करें तो छठे क्षणमें रक्तादिगुणोंकी उत्पत्ति होतीहै.
तथाहि । परमाणुकर्मणा परमाण्वन्तरविभागः, तत आरम्भक-
संयोगनाशः । अथ द्व्यणुकनाशपरमाण्वन्तरकर्मणी १ । अथ
श्यामनाशः परमाण्वन्तरकर्मजो विभागश्च २ । ततो रक्तोत्पत्तिः