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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 258, कुल 350 में से

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पृष्ठ 258

२३४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
शंका-श्यामादि गुणोंके नाशक्षणमें या रक्तादि गुणोंकी उत्पत्तिक्षणमें परमाणुओंमें
द्व्यणुकादि द्रव्यकी उत्पादिका क्रिया मान लीजाय तो हानि क्या है? समाधान-
अग्निसंयुक्त परमाणुओंमें जो द्व्यणुकादिका विनाशक प्रथम कर्म है उसके विनाशसे
विना और परमाणुओंमें रक्तादि गुणोंकी उत्पत्तिसे विना उनही परमाणुओंमें द्व्यणु-
कादि द्रव्यारम्भकी. दूसरी क्रिया नहीं होसकती प्रथमक्रिया स्वसत्त्वावस्था में दूसरी
क्रियाकी उत्पत्तिमें प्रतिबन्धक होतीहै; इसलिये क्रियावालेमें क्रियान्तर नहीं होसकती
और निर्गुण द्रव्यमें द्रव्यारम्भणानुकूल क्रियाका होनाही असम्भव है.
तथापि परमाणौ श्यामादिनिवृत्तिसमकालं रक्ताद्युत्पत्तिः स्या-
दिति चेत् । न । पूर्वरूपादिध्वंसस्यापि रूपान्तरे हेतुत्वात् ॥
॥ इति नवक्षणा ॥
शंका-तथापि परमाणुओंमें श्यामादि गुणोंकी निवृत्तिक्षणहीमें रक्तादि गुणोंकी
उत्पत्तिभी मानलीजाय तो एक क्षणका लाघव है. समाधान-यह कथनभी सुयु-
क्तिक नहीं है; क्योंकि पूर्वरूपादि ध्वंसको रूपान्तरादिकी उत्पत्तिमें कारणता है और
कार्यकारणका समकालमें होना असम्भव है । इति नवक्षणा ॥
अथ दशक्षणा-सा चारम्भकसंयोगविनाशविशिष्टं कालमपेक्ष्य
विभागेन विभागजनने सति स्यात् ।
अथ दशक्षणा-वह दशक्षणप्रक्रिया द्रव्यारम्भसंयोगविनाशविशिष्ट कालकी
अपेक्षासे विभागजविभागका अङ्गीकार करनेसे प्रतीत होतीहै अर्थात् द्व्यणुकादि
द्रव्यारम्भक संयोगके विनाशकालहीमें यदि परमाणुद्वयके विभागसे परमाणु तथा
आकाशादिका विभागभी मानलिया जाय तो दशक्षणमें पुनः द्रव्य रूपादिमान् होताहै.
तथाहि । वह्निसंयोगाद्द्व्यणुकारम्भके परमाणौ क्रिया । ततो
विभागः, तत आरम्भकसंयोगनाशः, ततो द्व्यणुकनाशविभाग-
जविभागौ १ । ततः श्यामनाशपूर्वसंयोगनाशौ २ । ततो रक्तो-
त्पत्त्युत्तरसंयोगौ ३ । ततो वह्निनोदनजन्यपरमाणुकर्मणो
नाशः ४ । ततोऽदृष्टवदात्मसंयोगाद्द्रव्यारम्भानुगुणक्रिया ५ ।
ततो विभागः ६ । ततः पूर्वसंयोगनाशः ७ । तत आरम्भकसं-
योगः ८ । ततो द्व्यणुकोत्पत्तिः ९ । ततो रक्ताद्युत्पत्तिः १० ।
॥ इति दशक्षणा ॥