न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
अत्र द्व्यणुकादिविनाशमारभ्य कतिभिः क्षणैः पुनरुत्पत्त्या रू-
पादिमद्भवतीति शिष्यबुद्धिवैशद्याय क्षणप्रक्रिया । तत्र विभाग-
जविभागानङ्गीकारे नवक्षणा ।
भाषा-यहां 'द्व्यणुकादि विनाशसे लेकर फिर उत्पन्न हुआ अवयवी कितने
क्षणोंके पश्चात् रूपरसादिवाला होता है?' इस वार्त्ताका शिष्यलोगोंकी बुद्धिके
विशदकरणार्थ निरूपण करते हुए ग्रन्थकार क्षणिक प्रक्रियाको दिखलाते हैं, इस
प्रकरणमें यदि विभागज विभागको ना अङ्गीकार करें अर्थात् (कारण) कपा-
लादि तथा (अकारण) आकाशादिके विभागसे जैसे (कार्य) घटादि तथा
(अकार्य) आकाशादिका विभाग स्वीकृत है, वैसे (कारण) कपालद्वयादि मात्र-
के विभागसे (कारण) कपालादि तथा (अकारण) आकाशादिके विभागको न
मानें तो नवक्षणमें अवयवी विनष्ट होकर फिर रूपादिवाला होजाता है.
विभागजविभागाङ्गीकारे तु विभागः किञ्चित्सापेक्षो विभागं ज-
नयेत्, निरपेक्षस्य तत्त्वे कर्मत्वं स्यात् । संयोगविभागयोरनपेक्षं
कारणं कर्मेति हि वैशेषिकसूत्रम् । स्वोत्तरोत्पन्नभावान्तरानपे-
क्षत्वं च तस्यार्थः । अन्यथा कर्मणोऽप्युत्तरसंयोगजनने पूर्वसं-
योगनाशापेक्षणादव्याप्तिः स्यादिति ।
भाषा-एवं विभागज विभागका अङ्गीकार करें तो विभागभी (किञ्चित्)
स्वसमवायिनिष्ठ क्रियाकी (सापेक्षा) सहकारतासे विभागान्तरको उत्पन्न करेगा;
क्योंकि पदार्थान्तरकी सहकारतासे विना विभागका जनक तो केवल कर्मही है.
यदि विभागभी निरपेक्ष होकर विभागान्तरका जनक होगा तो कर्मके लक्षणकी
उसमें अतिव्याप्ति होगी; क्योंकि संयोगका तथा विभागका जो निरपेक्ष कारण
होय वह कर्म होता है. यह वार्त्ता वैशेषिक शास्त्रके १७ वें सूत्रमें लिखी है अर्थात्
(स्व) कर्म, संयोग तथा विभागको उत्पन्न करता हुआ अपनेसे उत्तरकालमें
उत्पन्न होनेवाले भावान्तरकी अपेक्षा नहीं करता. यह उक्त सूत्रका भावार्थ है.
(अन्यथा) यदि ऐसा अर्थ नहीं करें तो कर्मकोभी उत्तरसंयोगके उत्पन्न
करनेमें पूर्वसंयोग नाशकी अपेक्षाही है. निरपेक्ष कारण नहीं है. एवं उक्त सूत्रलक्षण-
की पूर्वसंयोगनाशकी अपेक्षा करनेवाली कर्मव्यक्तिमें अव्याप्ति होगी.
तत्र यदि द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशविशिष्टं कालमपेक्ष्य विभा-
गजविभागः स्यात्तदा दशक्षणा । अथ द्रव्यनाशाविशिष्टं काल-
मपेक्ष्य विभागजविभागः स्यात् तदैकादशक्षणा ।