न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Page Header: २३६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण- ]
गुणोंकी उत्पत्ति होतीहै ३ । उससे पीछे चौथे क्षणमें क्रियाकी विश्रान्तिका कारक
परमाणुओंका उत्तरसंयोग होताहै ४ । उससे पीछे पञ्चमक्षणमें अग्निके नोदनसे
उत्पन्न हुए परमाणुगत कर्मका नाश होताहै ५ । उससे पीछे छठे क्षणमें अदृष्टवाले
जीवात्माके संयोगसे द्वयणुकादि द्रव्यके आरम्भणानुकूला क्रिया होतीहै ६ । उस
क्रियासे पीछे सातवें क्षणमें फिर विभाग होताहै ७ । उससे पीछे अष्टमक्षणमें प्रथम
हुए संयोगका नाश होताहै ८। उससे पीछे नवमक्षणमें द्वयणुकादि द्रव्यारम्भक संयोग
होताहै ९ । उससे पीछे दशमक्षणमें द्वयणुकादि द्रव्यकी उत्पत्ति होतीहै १० । उससे
पीछे एकादश क्षणमें फिर द्रव्यमें रक्तादिगुणोंकी उत्पत्ति होतीहै ११ । इति ।
मध्यमशब्दवदेकस्मादग्निसंयोगान्न रूपनाशरक्तोत्पादौ, ताव-
त्कालमेकस्याग्नेरस्थिरत्वात् । किंच यद्युत्पादको नाशकस्तदा
नष्टे रूपादावग्निनाशे नीरूपश्चिरं परमाणुः स्यात् । नाशकश्चेदु-
त्पादकस्तदा रक्तोत्पत्तौ तदग्निनाशे रक्ततरता न स्यात् ॥
भाषा-मध्यमशब्दकी तरह एकही अग्निसंयोग श्यामादि गुणोंका नाशक तथा
रक्तादि गुणोंका उत्पादक नहीं होसकता अर्थात् आदि अन्तके शब्दद्वयको छोड़कर
मध्यवर्त्ति यावत् शब्दोंको जैसे स्वपूर्वशब्दनाशके प्रति तथा स्वउत्तर शब्द उत्पत्तिके
प्रति कारणता है वैसे द्वयणुकादि द्रव्यके विनाशक एकही अग्निसंयोगसे श्यामादि
गुणोंका विनाश तथा रक्तादिकी उत्पत्ति नहीं होसकती; क्योंकि (तावत्कालं)
श्यामानाशोत्पत्तिके अव्यवहित पूर्वक्षणपर्यन्त वह द्वयणुकादि द्रव्यका विनाशक एक
अग्निसंयोगस्थायी नहीं रहता, (किञ्च) इसमें औरभी युक्ति है कि-यदि रक्तादि
उत्पादक अग्निसंयोगहीको श्यामादिविनाशकभी मानें तो श्यामादिरूपके नष्ट होनेसे
दैवात् यदि अग्निसंयोगकाभी नाश होय तो पीछे चिरकालपर्यन्त परमाण्वादि द्रव्य
रूपरहितही पड़ा रहना चाहिये; परन्तु यह वार्त्ता किसी विद्वान्के अनुभवसम्मत
नहीं है. ऐसेही यदि श्यामादि गुणोंके विनाशक अग्निसंयोगकोही रक्तादिका उत्पाद-
कभी मानें तो साधारण रक्तकी उत्पत्तिके अनन्तर यदि दैवात् अग्निसंयोगका नाश
होय तो रक्ततरता नहीं हुई चाहिये; परन्तु साधारण रक्त हुए पीछे अग्निसंयोगनाश
होनेसेभी रक्ततर स्वयं होजाताहै. यह वार्त्ता अनुभवसिद्धहै. इसलिये श्यामादिके विना-
शक तथा रक्तादिके उत्पादक अग्निसंयोग भिन्न २ हैं; यही मानना उचित है.
अथ पञ्चक्षणा-एवं परमाण्वन्तरे कर्मचिन्तनात् पञ्चमादि
क्षणेऽपि गुणोत्पत्तिः ।