न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २२९
( अन्यत् ) जल तथा तेजके परमाणुओंके रूपसे भिन्न जो रूप है वह सभी सहेतुक
अग्निसंयोगादि कारणसे उत्पन्न होताहै.
रसं निरूपयति, रसस्त्विति-
भाषा- ' रसस्तु' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार रसका निरूपण करतेहैं-
रसस्तु रसनाग्राह्यो मधुरादिरनेकधा ॥ १०१ ॥
सहकारी रसज्ञाया नित्यत्वादि च पूर्ववत् ॥
भाषा-रसनाइन्द्रियसे ग्रहण होनेवालेका नाम'रस' है.वह रस मधुर, लवण, कटु
कषाय आम्लिक तथा तिक्त भेदसे षट् प्रकारका है ॥ १०१ ॥ और रसनाइन्द्रियका
सहायक है, नित्यता तथा अनित्यता इसकी रूपकी तरहही जान लेनी चाहिये.
सहकारीति । रासनज्ञाने रसः कारणमित्यर्थः । पूर्ववदिति ज-
लपरमाणौ रसो नित्योऽन्यः सर्वोऽपि रसोऽनित्य इत्यर्थः ।
भाषा-अर्थात् रासन साक्षात्कारके प्रति विषयतासम्बन्धसे रसको कारणता है.
पूर्ववत् अर्थात् रूपकी तरह रसभी जलीय परमाणुओंमें नित्य है तथा पार्थिव पदार्थ
मात्रमें अनित्य है.
गन्धं निरूपयति, घ्राणग्राह्य इति-
भाषा-' घ्राणग्राह्यो ' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार गन्धका निरूपण करते हैं.
घ्राणग्राह्यो भवेद्गन्धो घ्राणस्यैवोपकारकः॥१०२॥
भाषा-केवल घ्राणइन्द्रिय ग्रहणके योग्यका नाम 'गन्ध' है.वह गन्ध घ्राणइन्द्रिय
हीका उपकारक है ॥ १०२ ॥
उपकारको घ्राणजन्यज्ञाने कारणमित्यर्थः। गन्धः सर्वोऽनित्य
एव ॥ १०२ ॥
भाषा-( उपकारक ) अर्थात् घ्राणज साक्षात्कारके प्रति विषयतासम्बन्धेन उभ-
यविध गन्धको कारणता है. एवं सभी गन्ध अनित्यही हैं. रूपादिकी तरह नित्य
कोईभी नहीं ॥१०३॥
सौरभश्चासौरभश्च स द्वेधा परिकीर्तितः ।
भाषा-एवं सौरभ तथा असौरभभेदसे वह गन्ध दोप्रकारका है.
स्पर्शं निरूपयति, स्पर्श इति-
भाषा- 'स्पर्शः' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार स्पर्शका निरूपण करतेहैं-