न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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स्पर्शस्त्वगिन्द्रियग्राह्यस्त्वचः स्यादुपकारकः ॥१०३॥
भाषा-केवल त्वगिन्द्रियसे ग्रहणके योग्यका नाम 'स्पर्श' है. वह स्पर्श त्वगइ-
न्द्रियका उपकारक है.
उपकारक इति । स्पर्शनप्रत्यक्षे स्पर्शः कारणमित्यर्थः ॥१०३॥
भाषा-स्पर्शनप्रत्यक्षमें विषयतासम्बन्धेन स्पर्शको कारणता है ॥१०३॥
अनुष्णाशीतशीतोष्णभेदात्स त्रिविधो मतः ॥
काठिन्यादि क्षितावेव नित्यत्वादि च पूर्ववत् ॥ १०४ ॥
भाषा-वह स्पर्श शीत उष्ण तथा अनुष्णाशीतभेदसे तीन प्रकारका है. वह स्पर्श
काठिन्यादि धर्मवाला केवल पृथिवीहीमें रहताहै और इस स्पर्शकी नित्यता तथा
अनित्यता ( पूर्ववत् ) रूपादिककी तरहही जानने योग्य है ॥ १०४ ॥
अनुष्णाशीत इति । पृथिव्या वायोश्च स्पर्शोऽनुष्णाशीतः,
जलस्य शीतः, तेजस उष्णः । काठिन्येति । कठिनसुकुमारस्प-
र्शौ पृथिव्या एवेत्यर्थः । कठिनत्वादिकं तु न संयोगनिष्ठो जाति-
विशेषः, चाक्षुषग्राह्यतापत्तेः । पूर्ववदिति । जलतेजोवायुपरमाणु-
स्पर्शा नित्यास्तद्भिन्नस्पर्शास्त्वनित्या इत्यर्थः ॥ १०४ ॥
भाषा-( अनुष्णाशीत इति ) पृथिवीका तथा वायुका स्पर्श अनुष्णाशीत है
अर्थात् न उष्ण है, न शीत है; और जलका स्पर्श शीत है. अग्निआदि तेजःपदार्थका स्पर्श
उष्ण है. एवं कठिनकोमलादि स्पर्शभी पृथिवीमें रहता है. कठिनत्त्वादि धर्मसंयोगनिष्ठ
जातिविशेष नहींहैं; क्योंकि यदि संयोगनिष्ठ जातिविशेष होय तो उसका संयोगकी तरह
चाक्षुषप्रत्यक्षभी हुआ चाहिये; इसलिये 'कठिनत्व' आदि पृथिवीगत स्पर्शकेही
व्याप्यवृत्ति धर्म हैं. ( पूर्ववदिति ) जल तेज तथा वायुके परमाणुओंका स्पर्श
नित्य है. इनसे भिन्न पार्थिवपरमाणुओंका स्पर्श अनित्य है ॥१०१॥
एतेषां पाकजत्वं तु क्षितौ नान्यत्र कुत्रचित् ॥
भाषा-ये रूपरसादि चारों केवल पृथिवीहीमें तेजःसंयोगसे उत्पन्न तथा
परिवर्तन होतेहैं, अन्यत्र जलादिकोंमें नहीं होते.
एतेषां रूपरसगन्धस्पर्शानाम् । नान्यत्रेति । पृथिव्या हि रूपरस-
गन्धस्पर्शपरावृत्तिः पावकसंयोगादुपलभ्यते, न हि शतधापि