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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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पृष्ठ 255

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २३१
ध्मायमाने जलादौ रूपादिकं परावर्तते । नीरे सौरभमौष्ण्यं चा-
न्वयव्यतिरेकाभ्यामौपाधिकमेवेति निर्णीयते पवनपृथिव्योः शी-
तस्पर्शादिवत् ।
भाषा-इन रूप रस गन्ध स्पर्शोंकी अग्निसंयोगसे उत्पत्ति केवल पृथिवीहीमें है
और कहीं नहीं. ( नान्यत्रेति ) पृथिवीके रूप रस गन्ध तथा स्पर्शका परिवर्तन
अग्निसंयोगसे हुआ प्रतीत होता है और जलको सैकड़ोंबार तपानेसेभी उसके
रूपका परिवर्तन प्रतीत नहीं होता. एवं जैसे जलके सम्बन्धसे वायुमें तथा पृथिवी-
में शीत स्पर्शका भान होता है वस्तुतः इनमें शीतस्पर्श नहीं है. वैसेही जलमें
सौरभका तथा उष्णताका भानभी पृथिवीतेजःसंसर्गरूप उपाधिके वशसेही विज्ञ
पुरुषोंने अन्वयव्यतिरेकद्वारा निर्णय किया है; वस्तुतः जलमें सौरभ तथा उष्णता
नहीं है.
तत्रापि परमाणौ स्यात्पाको वैशेषिके नये ॥१०५॥
भाषा-उस पृथिवीमेंभी वैशेषिकके सिद्धान्तसे पाक परमाणुओंमें होता है अर्थात्
तेजःसंयोगसे प्रत्येक परमाणुमें रूपादिचतुष्टयका परिवर्तन होता है ॥ १०५ ॥
तत्रापि पृथिवीष्वपि परमाणवेव पाक इति वैशेषिका वदन्ति ।
तेषामयमाशयः । अवयविनाऽवष्टब्धेष्ववयवेषु पाको न सम्भव-
ति, परंतु वह्निसंयोगेनावयविषु विनष्टेषु स्वतन्त्रेषु परमाणुषु
पाकः, पुनश्च पक्वपरमाणुसंयोगाद्द्व्यणुकादिक्रमेण पुनर्महा-
वयविपर्यन्तमुत्पत्तिः, तेजसामतिशयितवेगवशात् पूर्वव्यूहनाशो
झटिति व्यूहान्तरोत्पत्तिश्चेति ।
भाषा-( तत्रापि ) उस अनेक विध पृथिवीमेंभी परमाणुओंहीमें ( पाक )
अग्निसंयोगसे रूपांदिका परिवर्तन होता है, यह ( वैशेषिक ) कणादमुनिके अनु-
यायीलोग कहतेहैं. उनके हृदयका भाव यह है कि-घटादि अवयविसे ( अवष्टब्ध )
निरोधित हुए छोटे कपालकादि अवयवोंमें पाक नहीं होसकता; परन्तु प्रबल
अग्निसंयोगसे अवयवीके विनाशके अनन्तर प्रत्येक अवयवके स्वतंत्र परमाणुओंमें
पाक होता है. फिर परिपक परमाणुओंके परस्परसंयोगसे द्वयणुक त्र्यणुकादि क्रमेण
फिर घटादि महाअवयवी पर्यन्त उत्पत्ति होती है. तेजःपदार्थके अत्यन्त वेगवशसे
शीघ्रही पूर्व ( व्यूह ) संघातका नाश तथा संघातान्तरकी उत्पत्ति होती है-इति