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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 257, कुल 350 में से

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पृष्ठ 257

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २३३
भाषा-( तत्र ) इस प्रकरणमें ( द्व्यणुकादि ) द्रव्यारम्भक संयोगका जो विनाश
तादृश विनाशविशिष्ट कालकी अपेक्षासे यदि विभागज विभागका विचार
किया जाय तो दशक्षणमें अवयवी फिर रूपादिमान् होसकता है और यदि द्रव्य-
नाशविशिष्ट कालकी अपेक्षाको लेकर विभागज विभागका विचार किया
जाय तो एकादश क्षणमें अवयवी फिर रूपादिवाला होसकताहै.
तथाहि अथ नवक्षणा-वह्निसंयोगात्परमाणौ कर्म, ततः परमाण्व-
न्तरेण विभागः, तत आरम्भकसंयोगनाशः । ततो द्व्यणुकना-
शः १ । ततः परमाणौ श्यामादिनाशः २ । ततो रक्ताद्युत्प-
त्तिः३ । ततो द्रव्यारम्भानुगुणक्रिया ४ । ततो विभागः ५। ततः
पूर्वसंयोगनाशः ६ । तत आरम्भकसंयोगः ७ । ततो द्व्यणुको-
त्पत्तिः ८ । ततो रक्ताद्युत्पत्तिः ९ ।
भाषा-( तथाहि ) इसी वार्ताको नवक्षणादि प्रक्रियाके क्रमसे लिखतेहैं-
पहले अग्निसंयोगसे द्व्यणुकारम्भक परमाणुद्वयमेंसे एक परमाणुमें क्रिया होतीहै. उस
क्रियासे पीछे द्व्यणुकारम्भक परमाणुअन्तरके साथ उस क्रियायुक्त परमाणुका विभाग
होताहै. उसके पीछे द्व्यणुकारम्भक संयोगका नाश होताहै. उसके पीछे द्व्यणुककां
नाश होताहै १ । प्रथमक्षणकी गणनाभी यहांहीसे करनी उचित है; क्योंकि पीछे
ग्रन्थकारने “ द्व्यणुकादिनाशमारभ्य ” इत्यादि कथनसे यही प्रतिज्ञा करीहै. उसके
पीछे परमाणुगत श्यामादि गुणोंका नाश होताहै २ । उसके पीछे तीसरे क्षणमें
परमाणुओंमें रक्तादि गुणोंकी उत्पत्ति होतीहै ३ । उसके पीछे चौथे क्षणमें द्व्यणुक-
रूप द्रव्यकी उत्पादिका क्रिया होतीहै ४ । उसके पीछे पञ्चमक्षणमें उस क्रियासे वि-
भाग होताहै ५ । उसके पीछे छठे क्षणमें विश्लिष्टपरमाणुओंके पूर्वसंयोगका नाश
होताहै ६ । उसके पीछे सातवें क्षणमें द्व्यणुकारम्भकसंयोग होताहै ७ । उसके
पीछे आठवें क्षणमें फिर द्व्यणुककी उत्पत्ति होतीहै ८ । उसके पीछे नवम क्षणमें
रक्तादिगुणोंकी उत्पत्ति होतीहै ९ । इति ।
ननु श्यामादिनाशक्षणे रक्तोत्पत्तिक्षणे वा परमाणौ द्रव्यारम्भानु-
गुणक्रियास्त्विति चेत् । न। अग्निसंयुक्ते परमाणौ यत्कर्म तद्विना-
शमन्तरेण गुणोत्पत्तिमन्तरेण च तत्र परमाणौ क्रियान्तराभा-
वात्, कर्मवति कर्मान्तरानुत्पत्तेः । निर्गुणे द्रव्ये द्रव्यारम्भानुगु-
णक्रियानुपपत्तेश्च ।
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