न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २१७
हैं. इसलिये उनका वारण हुआ और कर्म कर्मसे भिन्न नहीं है, इसलिये उसकाभी
वारण हुआ और द्रव्य निर्गुण नहीं है इसलिये उसकाभी वारण हुआ.
निष्क्रियेति स्वरूपकथनं , न तु लक्षणं गगनादावतिव्याप्तेः ।
भाषा-मूलमें 'निष्क्रियाः' यह गुणोंका लक्षण नहीं है किन्तु स्वरूपमात्रका कथनहै.
आकाशादिकोंमें अतिव्याप्ति दोषसे दुष्ट होनेसे इसको लक्षण मानना उचितभी नहीं.
रूपं रसः स्पर्शगन्धौ परत्वमपरत्वकम् ॥ ८६ ॥
द्रवो गुरुत्वं स्नेहश्च वेगो मूर्त्तगुणा अमी ॥
भाषा-रूप, रस, स्पर्श, गन्ध, परत्व, अपरत्व, ॥८६ ॥ द्रवत्व, गुरुत्व, स्नेह, तथा
वेग, ये दश गुण मूर्त्तद्रव्यहीमें रहतेहै.
मूर्त्तगुणा इति । अत्र वेगेन स्थितिस्थापकोऽप्युपलक्षणीयः ।
अमूर्तेषु न वर्तन्त इत्यर्थः । लक्षणं तु तावदन्यान्यत्वमे-
वमग्रे ऽपि ।
भाषा-यहां वेगाख्य संस्कारसे स्थितिस्थापक संस्कारकाभी ग्रहण जानलेना
अर्थात् वहभी मूर्त्तद्रव्यहीमें रहताहै; यह सब अमूर्त्तद्रव्यमें कदापि नहीं रहते. इन
सबका अनुगत एकलक्षण ( तावत् ) एतद्भिन्न भिन्नत्वरूपही जानना चाहिये
अर्थात् इनसे भिन्न प्रपञ्चमात्रका भेद इन दशहींमें रहेगा ऐसेही आगेभी ऐसेही
लक्षण समझलेने.
धर्माधर्मौ भावना च शब्दो बुद्ध्यादयोऽपि च ॥८७॥
एतेऽमूर्तगुणाः सर्वे विद्वद्भिः परिकीर्तिताः ॥
अमूर्तगुणा इति । मूर्तेषु न वर्तन्त इत्यर्थः ।
भाषा-धर्म, अधर्म, भावनाख्य संस्कार, शब्द, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष,
और प्रयत्न ॥ ८७ ॥ ये दश गुण अमूर्त द्रव्यहीमें रहतेहैं. ऐसे विद्वान् लोगोंका
निश्चयपूर्वक कथन है अर्थात् ये मूर्त्तद्रव्योंमें कदापि नहीं रहते-इति ।
संख्यादयो विभागान्ता उभयेषां गुणा मताः ॥८८॥
उभयेषामिति । मूर्तामूर्तगुणा इत्यर्थः ॥ ८८ ॥
भाषा-संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, तथा विभाग, ये पांच गुण मूर्त तथा
अमूर्त दोनों तरहके द्रव्योंमें रहतेहैं ॥ ८८ ॥
१८
२१८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण--
संयोगश्च विभागश्च संख्या द्वित्वादिकास्तथा ॥
द्विपृथक्त्वादयस्तद्वदेतेऽनेकाश्रिता गुणाः ॥ ८९ ॥
भाषा-संयोग, विभाग, द्वित्वादिसंख्या, द्विपृथक्त्व, त्रिपृथक्त्व, आदि चार गुण
सर्वदा अनेकाश्रितही रहतेहैं ॥ ८९ ॥
अनेकाश्रिता इति । संयोगविभागद्वित्वादीनि द्विवृत्तीनि, त्रित्व-
चतुष्टादिकं त्रिचतुरादिवृत्तीति बोध्यम् ॥ ८९ ॥
भाषा-यहां अनेक पद एकसे भिन्नमात्रका बोधक है, एवं संयोग विभाग द्वित्वादि
दो द्रव्योंमें रहते हैं और त्रित्व चतुष्टादि तीनों चारोंमें रहते हैं, ऐसे जानना चाहिये ८९
अतः शेषा गुणाः सर्वे मता एकैकवृत्तयः ॥
भाषा-इन चारसे (शेष) बाकी सभी गुण एक २ द्रव्यमें नियमसे रहते हैं.
अतः शेषा इति । रूपरसगन्धस्पर्शैकत्वपरिमाणैकपृथक्त्वपर-
त्वापरत्वबुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नगुरुत्वद्रवत्वस्नेहसंस्कारा-
दृष्टशब्दा इत्यर्थः ।
भाषा-अर्थात् रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, एकत्व, परिमाण, एकपृथक्त्व, परत्व,
अपरत्व, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह, संस्कार,
धर्म, अधर्म, तथा शब्द ये २२ गुण एक एकही द्रव्यमें रहते हैं.
बुद्ध्यादिषट्कं स्पर्शान्ताः स्नेहः सांसिद्धिको द्रवः ९०
अदृष्टभावनाशब्दा अमी वैशेषिका गुणाः ॥
भाषा-बुद्धि आदि छः, तथा रूपादि स्पर्शान्त चार, एवं स्नेह तथा सांसि-
द्धिक द्रवत्व ॥९०॥ अदृष्ट भावनाख्य संस्कार तथा शब्द ये सब १६ विशेष गुण
कहलाते हैं.
बुद्ध्यादीति । बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्ना इत्यर्थः । स्पर्शा-
न्ता रूपरसगन्धस्पर्शा इत्यर्थः । द्रवो द्रवत्वम् ॥ ९० ॥
भाषा-बुद्धि, सुख, दुःख,इच्छा, द्वेष, प्रयत्न ये षट् बुद्ध्यादि हैं; रूप रस गन्ध
स्पर्श ये चार स्पर्शान्त हैं; 'द्रव' नाम द्रवणरूपा क्रियाकाभी है, उसके वारणार्थ
'द्रव्यत्व' यह विवरण किया है. यह निःसन्देह गुणविशेषका वाचक है ॥ ९० ॥
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २१९
वैशेषिका इति । विशेषा एव वैशेषिकाः, स्वार्थे ठक्, विशेषगु-
णा इत्यर्थः ।
भाषा-( वैशेषिका इति ) 'विशेष' तथा 'वैशेषिक' ये दोनों एकार्थबोधक शब्द
हैं. केवल “ विनयादिभ्यष्ठक् ५।४।३४ ” इस सूत्रसे किये ' ठक् '
प्रत्ययकृत शब्द स्वरूप मात्रका भेद है, अर्थका नहीं. “द्रव्यविभाजकोपाधिद्वय-
समानाधिकरणावृत्ति द्रव्यकर्मावृत्ति जातिमत्त्वं विशेषगुणत्वम् ” यह विशेषगुण-
मात्रका अनुगत एक लक्षण है; अर्थात् द्रव्यकी विभाजक उपाधिद्वय कोईएक
पृथिवीत्व जलत्वादि उन दोनोंके समानाधिकरण पृथिवी जलादि उभयमें न रहने-
वाली तथा द्रव्यकर्म उभयमेंभी न रहनेवाली जो बुद्ध्यादि कतिपय गुणोंमें रहने
वाली जाति, तादृश जातिमत्त्व पूर्वोक्त सभी विशेष गुणोंमें अनुगत है-इति ।
संख्यादिरपरत्वान्तो द्रवोऽसांसिद्धिकस्तथा॥९१॥
गुरुत्ववेगौ सामान्यगुणा एते प्रकीर्तिताः ॥
भाषा-संख्यासे आदिलेकर अपरत्व पर्यन्त सात और नैमित्तिक द्रवत्व ॥९१॥
गुरुत्व तथा वेगाख्यसंस्कार ये दश सामान्यगुण कहलाते हैं.
सङ्ख्यादिरिति । सङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागपरत्वापर-
त्वानीत्यर्थः । ॥ ९१ ॥
भाषा-संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, तथा अपरत्व ये सात
संख्यादि हैं ॥ ९१ ॥
संख्यादिरपरत्वान्तो द्रवत्वं स्नेह एव च ॥ ९२ ॥
एते तु द्वीन्द्रियग्राह्याः-
द्वीन्द्रियेति । चक्षुषा त्वचापि ग्रहणयोग्यत्वात् ।
भाषा-संख्यासे आदि लेकर अपरत्व पर्यन्त सात और द्रवत्व तथा स्नेह ॥९२॥
ये नव गुण नेत्र तथा त्वग् इन दोनों इन्द्रियोंसे ग्रहण होसकते हैं.
-अथ स्पर्शान्तशब्दकाः ॥
बाह्यैकैकेन्द्रियग्राह्याः-
बाह्येति । रूपादीनां चक्षुरादिग्राह्यत्वात् ।
३२० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-और रूपसे आदि लेकर चार तथा शब्द ये पांचों गुण नेत्रादि
बाह्यपांचों इन्द्रियोंसे ग्रहण होतेहैं अर्थात् चक्षुः, श्रोत्र, रसना, घ्राण, तथा त्वक् इन
पांचों बाह्य एक एक इन्द्रियसे यथाक्रम रूप शब्द रस गन्ध तथा स्पर्श ये पांच गुण
ग्रहण होतेहैं.
-गुरुत्वादृष्टभावनाः ॥ ९३ ॥
अतीन्द्रिया विभूनां तु ये स्युर्वैशेषिका गुणाः ॥
अकारणगुणोत्पन्ना एते तु परिकीर्तिताः ॥ ९४ ॥
भाषा-गुरुत्व अदृष्ट अर्थात् धर्माधर्म तथा भावनाख्य संस्कार ये चार गुण
किसी इन्द्रियसे ग्रहण नहीं होते अर्थात् इन चारोंका केवल अनुमानद्वारा लाभ
होता है. और आकाशादि विभु द्रव्योंके जो शब्दादि विशेष गुणहैं वे सब अकारण
गुण उत्पन्न हैं अर्थात् जैसे रूपादि कारणगुणोत्पन्न हैं वैसे ये नहीं हैं ॥ ९३ ॥ ९४ ॥
विभूनामिति। बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मभावना शब्दा
इत्यर्थः । अकारणेति। कारणगुणेन कार्ये ये गुणा उत्पद्यंते ते
कारणगुणपूर्वका रूपादयो वक्ष्यन्ते, बुद्ध्यादयस्तु न तादृशा
आत्मादेः कारणाभावात् ॥ ९३ ॥ ९४ ॥
भाषा-भाव यह कि-“कारणगुणपूर्वकः कार्यगुणो दृष्टः २० अ० २ आह्नि १”
यह कणादमुनिका सिद्धान्त है; परन्तु यह विभुंके विशेषगुणोंमें नहीं घटता अर्थात्
जैसे रूपादि 'स्वाश्रय समवायिसमवेतगुणजन्यत्व' सम्बन्धसे अपने कारणके गुणो-
से उत्पन्न होतेहैं; वैसे बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म,
भावना तथा शब्द ये .दश कारणगुणसे उत्पन्न नहीं हैं.
कपालादि कारणगुणसे जो घटादिकार्यमें रूपादि गुण उत्पन्न होतेहैं वही कारणगु-
णपूर्वक कहलातेहैं. उनको हम आगे कहेंगे. बुद्धि आदि तो वैसे नहींहैं; क्योंकि
आत्माका तथा आकाशका कोई कारण नहीं है ॥ ९३ ॥ ९४ ॥
अपाकजास्तु स्पर्शान्ता द्रवत्वं च तथाविधम् ॥
स्नेहवेगगुरुत्वैकपृथक्त्वपरिमाणकम् ॥ ९५ ॥
स्थितिस्थापक इत्येते स्युः कारणगुणोद्भवाः ॥
भाषा-अपाकज अर्थात् अग्निसंयोगसे न उत्पन्न होनेवाले रूप, रस, गन्ध,
तथा स्पर्श एवं अपाकज द्रवत्व, स्नेह, वेगाख्य संस्कार, गुरुत्व एकपृथक्त्व,
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २२१
परिमाण ॥ ९५ ॥ तथा स्थिति, स्थापकाख्य संस्कार ये सब ११ गुण कारण
गुणोंसे उत्पन्न होते हैं.
अपाकजास्त्विति । पाकजरूपादीनां कारणगुणपूर्वकत्वाभावाद-
पाकजा इत्युक्तम् । तथाविधमपाकजम् ॥ ९५॥ कारणगुणोद्भवा
इति । तथैकत्वमपि बोध्यम् ।
भाषा-पाकज रूपादिकोंकी उत्पत्ति कारणगुणपूर्वक नहीं है; इसलिये 'अपा-
कज' यह कहा है. मूलगत 'तथाविधम्' इसकाभी 'अपाकज' ही अर्थ है; वैसेही
एकत्वकोभी कारणगुणपूर्वकही जानना चाहिये.
संयोगश्च विभागश्च वेगश्चैते तु कर्मजाः ॥ ९६ ॥
भाषा-संयोग विभाग और वेगाख्य संस्कार ये तीन गुण कर्मसे उत्पन्न
होतेंहैं ॥ ९६ ॥
कर्मजा इति । यद्यपि कर्मजत्वं न साधर्म्यं घटादावतिव्याप्तेः,
संयोगजसंयोगेऽव्याप्तेश्च । तथापि कर्मजवृत्तिगुणत्वव्याप्यजाति-
मत्त्वं बोध्यम्, एवमन्यत्राप्यूह्यम् ॥ ९६ ॥
भाषा-यद्यपि चक्रभ्रमणादि कर्मजन्यत्व घटादिकोंमेंभी है. उनमें इन संयोगादि
तीनके लक्षणकी अतिव्याप्ति होगी. एवं हस्त पुस्तकादिसंयोगसे उत्पन्न होनेवाले
काय पुस्तकादि संयोगजसंयोगमें इस लक्षणकी अव्याप्ति होगी; क्योंकि 'संयोगज-
संयोग' यह कर्मजन्य नहीं है किन्तु संयोगजन्य है तथापि (कर्मसे उत्पन्न होनेवा-
लोंमें रहनेवाली जो गुणत्वकी व्याप्य संयोगत्वादिरूपा जाति तादृशजातिमत्ता) इन
तीनके सिवाय और कहीं नहीं है ऐसेही और स्थलोंमेंभी ऐसेही जातिघटित लक्षण
करके निर्वाह करना उचित है. ॥ ९६॥
स्पर्शान्तपरिमाणैकपृथक्त्वं स्नेहशब्दके ॥
भवेदसमवायित्वं,-
भाषा-रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, परिमाण, एकत्व, पृथक्त्व, स्नेह, और शब्द, इन
नवोंमें गुणान्तरोंके प्रति नियमसे असमवायि कारणताही रहती है.
स्पर्शान्तेति । स्पर्शोऽत्रानुष्णो ग्राह्यः । एकपृथक्त्वेत्यत्र त्वप्र-
त्ययस्य प्रत्येकमन्वयादेकत्वं पृथक्त्वं च ग्राह्यम् । पृथकपदेन
चैकपृथक्त्वं विवक्षितम् ।
२२२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-‘स्पर्श’ शब्दसे यहां अनुष्णस्पर्शका ग्रहण करना. एवं मूलमें पठित
( एकपृथक्त्व ) यहां ‘त्व’ प्रत्ययका दोनोंके साथ सम्बन्ध करके ( एकत्व ) तथा
'पृथक्त्व’ ऐसे जान लेना. यहां प्रकृतमें ‘पृथक्त्व’ पदसे केवल एकपृथक्त्व वांछित है.
भवेदसमवायित्वमिति । घटादिरूपरसगन्धस्पर्शाः कपालादि-
रूपरसगन्धस्पर्शोभ्यो भवन्ति । एवं कपालादिपरिमाणादीनां घ-
टादिपरिमाणाद्यसमवायिकारणत्वम् । एवं शब्दस्यापि द्विती-
यशब्दं प्रत्यसमवायिकारणत्वम् । एवं स्थितिस्थापकैकपृथक्त्व-
योरपि बोध्यम् ।
भाषा-( भवेदसमवायित्वमिति ) घटादिके रूप रस गन्ध तथा स्पर्श कपाला-
दिकोंके रूप रस गन्ध तथा स्पर्शसे यथाक्रम उत्पन्न होतेहैं. ऐसेही कपालादिगत
परिमाणादिकोभी घटादिगत परिमाणादिके प्रति असमवायिकारणता है. ऐसेही
शब्दकोभी स्वाव्यवहितोत्तर उत्पन्न द्वितीयशब्दके प्रति असमवायिकारणता है. ऐसेही
स्थितिस्थापकाख्य संस्कारोंको तथा एकपृथक्त्वकोभी जानलेना अर्थात् कारणगत
संस्कार तथा एकपृथक्त्व ( कटादि ) चटाईआदि कार्यगत संस्कारोंके तथा एकपृ-
थक्त्वके जनक हैं.
–अथ वैशेषिके गुणे ॥ ९७ ॥
आत्मनः स्यान्निमित्तत्वं–
भाषा-जीवात्माके ( बुद्धि ) ज्ञानादि विशेषगुणोंमें गुणान्तरोंके प्रति नियमसे
निमित्तकारणताही रहतीहै.
निमित्तत्वमिति । बुद्ध्यादीनामिच्छादिनिमित्तत्वादिति भावः ।
भाषा-जीवात्माके ज्ञानादि विशेषगुण पूर्वोक्त युक्तिके अनुरोधसे इच्छादि
विशेषगुणोंके प्रति निमित्तकारणही स्वीकार कियेहैं.
–उष्णस्पर्शगुरुत्वयोः ॥
वेगेऽपि च द्रवत्वे च संयोगादिद्वये तथा ॥९८॥
द्विधैव कारणत्वं स्यात्–
भाषा-उष्णस्पर्श, गुरुत्व, वेगाख्यसंस्कार, द्रवत्व, संयोग तथा विभाग इन
छःमें ॥ ९८ ॥ असमवायि तथा निमित्तभेदसे दोतरहकी कारणता रहती है.
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता, २२३
द्विधैवेति । असमवायिकारणत्वं निमित्तकारणत्वं च । तथाहि ।
उष्णस्पर्श उष्णस्पर्शस्यासमवायिकारणं पाकजे निमित्तम्, ।
गुरुत्वं गुरुत्वपतनयोरसमवायि प्रतिघाते निमित्तम्, वेगो
वेगस्पन्दयोरसमवाय्यभिघाते निमित्तम्, द्रवत्वं द्रवत्वस्पन्दन-
योरसमवायि संग्रहे निमित्तम्, भेरीदण्डसंयोगः शब्दे निमित्तम् ।
भेर्याकाशसंयोगेऽसमवायी, वंशदलद्वयविभागः शब्दे निमित्तं
वंशदलाकाशविभागेऽसमवायीति ।
भाषा-अर्थात् असमवायिकारणताभी रहतीहै और निमित्तकारणताभी रहती है.
(तथाहि) जैसे कपालादिगत उष्णस्पर्श घटादिगत उष्णस्पर्शका असमवायि-
कारण है, परन्तु घटादिगत पाकजरूपादिकोंके प्रति निमित्तकारणभी है. एवं
कारणगत गुरुत्व कार्यगत गुरुत्वके प्रति तथा आद्यपतनरूपा क्रियाके प्रति असमवायि-
कारण है; परन्तु (प्रतिघात) अभिघाताख्य संयोगके प्रति निमित्तकारणभी है. एवं वेगभी
स्वाव्यवहितोत्तर वेगान्तरके तथा स्पन्दरूपाक्रियाके प्रति असमवायिकारण है परंतु
बाणादिजन्य अभिघाताख्य संयोगके प्रति निमित्तकारणभीहै. एवं कारणगत द्रवत्वभी
कार्यगत द्रवत्वका तथा (स्पन्दन) ढलनरूपा क्रियाका असमवायिकारण है, परन्तु
(संग्रहे) चूर्णादिके पिण्डीभावमें निमित्तकारणभी है. ऐसेही भेरी दण्डका संयोग
शब्दमें निमित्तकारण है और भेरीआकाश संयोगके प्रति असमवायिकारण है. एवं
(वंश) बांसके दोनों दलोंका विभाग शब्दमें निमित्तकारण है और बांसदलके
आकाशसे विभागका असमवायिकारण है-इति ।
-अथ प्रादेशिको भवेत् ॥
वैशेषिको विभुगुणः संयोगादिद्वयं तथा ॥ ९९ ॥
प्रादेशिकोऽव्याप्यवृत्तिः ॥ ९७ ॥ ९८ ॥ ॥ ९९ ॥
भाषा-आकाशादि विभुद्रव्योंके शब्द ज्ञानादि विशेषगुण संयोग तथा विभाग ये
सब १२ गुण (प्रदेश) अव्याप्यवृत्ति हैं अर्थात् किञ्चिदवच्छेदेन रहते हैं ॥ ९९ ॥
यहांतक अनेकगुणोंके एक एक साधर्म्यका निरूपण किया अब इससे
आगे प्रत्येक गुणके साधर्म्यको कहतेहैं-
चक्षुर्ग्राह्यं भवेद्रूपं द्रव्यादेरुपलम्भकम् ॥
चक्षुषः सहकारि स्यात्-
२२४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-केवल (चक्षुः) नेत्रइन्द्रियसे जिसका ग्रहण हो उसका नाम 'रूप' है. वह
रूप द्रव्यादिकोंकी उपलब्धिमें नेत्रइन्द्रियका सहायकभी है.
चक्षुरिति । रूपत्वजातिस्तु प्रत्यक्षसिद्धा। रूपशब्दोल्लेखिनी प्र-
तीतिर्नास्तीति चेत् । मास्तु रूपशब्दप्रयोगस्तथापि नीलपीता-
दिष्वनुगतजातिविशेषोऽनुभवसिद्ध एव । रूपशब्दाप्रयोगेऽपि
'नीलो वर्णः पीतो वर्णः' इति वर्णशब्दोल्लेखिनीप्रतीतिरस्त्येव ।
एवं नीलत्वादिकमपि प्रत्यक्षसिद्धम् ।
भाषा-' रूपं रूपं' इस अनुगत प्रत्ययसे रूपत्वजाति तो प्रत्यक्ष प्रमाणहीसे
सिद्ध है. शंका-ऐसी वस्तु तो संसारमें कोई प्रतीत नहीं होती, जिसमें केवल 'रूप'
शब्दका प्रयोग किया जाय किन्तु नीलपीतादि व्यक्तियां प्रतीत होती हैं. समा०-
मत हो किसी पदार्थमें केवल 'रूप' शब्दका प्रयोग, तथापि नीलपीतादि अनेक व्यक्ति-
योंमें एक अनुगत जाति विशेष तो अनुभवसिद्ध है. एवं नीलपीतादिव्यक्तियोंमें मत
हो अनुगतरूपेण 'रूप' शब्दका प्रयोग; तथापि "नीलो वर्णः, पीतो वर्णः" इस अनुगत
प्रत्ययसे ' रूप ' शब्दपर्यायवाचि ' वर्ण ' शब्दका प्रयोग तो होताही है. एवं रूप-
त्वकी व्याप्य नीलत्वादि जातियांभी प्रत्यक्षही सिद्ध हैं.
न चैकैका एव नीलरूपादिव्यक्तय इत्येकव्यक्तिवृत्तित्वान्नील-
त्वादीर्न जातिरिति वाच्यम् । 'नीलो नष्टो रक्त उत्पन्न' इत्यादि-
प्रतीतेर्नीलादेरुत्पादविनाशशालितया नानात्वात् । अन्यथैकनी-
लनाशे जगदनीलमापद्येत ।
शंका-नीलपीतादि व्यक्ति तो संसारमात्रमें एक २ ही है; इसलिये उन एक२में
रहनेवाले नीलत्वपीतत्वादि धर्म जातिरूप नहीं होसकते. समाधान-आमनिक्षिप्त
घटादिमें " नीलो नष्टो रक्त उत्पन्नः " इत्यादि प्रतीति होती है. इस प्रतीतिसे नील
पीतादि व्यक्तियोंको उत्पादविनाशवाली होनेसे उनमें अनेकता सिद्ध होती है.
( अन्यथा ) यदि संसारमात्रमें एकही नीलव्यक्ति अङ्गीकार करें तो उसके नाश
होनेसे शेष संसार नीलवर्णरहित होजाना चाहिये.
नच नीलसमवायरक्तसमवाययोरेव विनाशोत्पादविषयकोऽसा-
वेष प्रत्यय इति वाच्यम् । प्रतीत्या समवायानुल्लेखात् ।
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २२५
शंका-“नीलो नष्टो रक्त उत्पन्नः” यह प्रत्यय तो नीलके समवायके नाशको
तथा रक्तके समवायकी उत्पत्तिको अवगाहन करता है इसलिये इससे नीलपीतादि
व्यक्तियोंमें नानात्व मानना उचित नहीं. समाधान-प्रतीतिमें जिस पदार्थका
( उल्लेख ) भान हो वही उसके विषय होता है. एवं “नीलो नष्टः ” इत्यादि प्रतीतिमें
समवायका भान नहीं है; इसलिये इसको समवायावगाहनी प्रतीति मानना उचित
नहीं है.
न च 'स एवायं नीलः' इति प्रत्ययाल्लाघवाच्चैक्यमिति वाच्यम् ।
प्रत्यक्षस्य तज्जातीयविषयकत्वात्, सैवेयं गुर्जरीतिवत् । लाघवं
तु प्रत्यक्षबाधितम् ।
शंका-“स एवायं नीलः-अर्थात् यह वही नील व्यक्तिहै” इत्याकारक प्रत्ययके
बलसे तथा लाघवसे नीलपीतादि व्यक्ति एकही एक माननी चाहिये. समाधान-“स
एवायं नीलः” इत्याकारक प्रत्यक्ष ज्ञान तो “सैवेयं गुर्जरी”-अर्थात् यह वही गुजरात
देशमें होनेवाली औषधी है” इस ज्ञानकी तरह केवल साजात्यको अवगाहन करता है
अर्थात् व्यक्तिभेदमेंभी पुरुष कहताहै कि-मैनेभी वही औषधी खाई है, जो चैत्रने
खाईथी. एवं आपका लाघवसे संसारमात्रमें एक २ नीलपीतादि व्यक्तियोंका मानना
“नीलो नष्टो रक्त उत्पन्नः ” इत्यादि प्रत्यक्षज्ञानसे बाधित है.
अन्यथा घटादीनामप्यैक्यप्रसङ्गात्। उत्पादविनाशबुद्धेः समवा-
यालम्बनत्वापत्तेरिति । एतेन रसादिकमपि व्याख्यातम् ।
भाषा-( अन्यथा ) यदि केवल लाघवमात्रसेही नीलपीतादि व्यक्तियोंमें ऐक्य-
स्वीकार करो तो घटपटादि पदार्थोंमेंभी ऐक्यही मानना चाहिये. अर्थात् संसारमा-
त्रमें एकही घट तथा एकही पटको मानकर उत्पादविनाशबुद्धिको घटपटादिके
समवायको अवगाहन करनेवाली समझना चाहिये. ( एतेन ) इस पूर्वोक्त कथनसे
रसादिकोंमेंभी यही विचार समझ लेना अर्थात् रसादि व्यक्तियांभी संसारमें
अनेक हैं.
चक्षुर्ग्राह्यमिति । चक्षुर्ग्राह्यविशेषगुणत्वमित्यर्थः । एवमग्रेऽपि। द्र-
व्यादेरिति, उपलम्भकमुपलब्धिकारणम् । इदमेव विवृणोति ।
चक्षुष इति । द्रव्यगुणकर्मसामान्यानां चाक्षुषप्रत्यक्षं प्रत्युद्भूत-
रूपं कारणम् ।
२२६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-(चक्षुर्ग्राह्यमिति) नेत्रइन्द्रियसे ग्रहण होनेयोग्य विशेषगुणरूप है.
ऐसा विवरण करनेसे संख्यादिमें अतिव्याप्तिभी नहीं है. ऐसेही आगे रसादिके
विवरणमेंभी जानलेना. (द्रव्यादेरिति) 'उपम्भक' नाम उपलब्धिके कारणीभूतका
है. इसीका 'चक्षुषः' इत्यादि ग्रन्थसे विवरण करतेहैं. द्रव्य गुण कर्म तथा सामान्य
चाक्षुषप्रत्यक्षके प्रति उद्भूतरूपको कारणता है.
-शुक्लादिकमनेकधा ॥ १०० ॥
भाषा-वह रूप शुक्ल नीलपीतादिभेदसे अनेक प्रकारका है ॥ १०० ॥
शुक्लादीति । तच्च रूपं शुक्लनीलपीतरक्तकृष्णकर्बुरादिभेदाद्-
नेकप्रकारकं भवति । ननु कर्बुरं कथमतिरिक्तं रूपं भवति ।
इत्थम् । नीलपीताद्यवयवारब्धोऽवयवी न तावन्नीरूपोऽप्रत्यक्ष-
त्वप्रसङ्गात्, नापि व्याप्यवृत्तिनीलादिकमुत्पद्यते पीतावच्छेदे-
नापि नीलोपलब्धिप्रसङ्गात्, नाप्यव्याप्यवृत्तिनीलादिकमुत्पद्यते
व्याप्यवृत्तिजातीयगुणानामव्याप्यवृत्तित्वे विरोधात् । तस्मा-
न्नानाजातीयरूपैरवयविनि विजातीयं चित्रं रूपमारभ्यते । अत
एवैकं चित्रमित्यनुभवोऽपि, नानारूपकल्पने तु गौरवात् ।
भाषा-वहरूप शुक्ल नील पीत रक्त हरित कपिश कृष्ण कर्बुर आदि भेदसे अने-
कप्रकारका है. शंका-(कर्बुर) चित्ररूप अतिरिक्त माननेका कुछ काम नहीं
किन्तु नीलपीतादि गुणोंके समुदाचारका नामही चित्ररूप है. समाधान-इस
विचारसे अतिरिक्त मानना पड़ता है कि-नीलपीतादि अवयवोंसे उत्पन्न हुआ अव-
यवी नीरूपभी नहीं है; क्योंकि यदि नीरूप होय तो प्रत्यक्ष नहीं हुआ चाहिये
और चित्रावयवीगत नीलपीतादि (व्याप्यवृत्ति) सर्वावयवावच्छेदेन उत्पन्न हुए हैं,
यहभी नहीं कहसकते क्योंकि यदि ऐसा होय तो चित्रावयवीमें नीलावच्छेदेन
पीतकी या पीतावच्छेदेनभी नीलकी उपलब्धि हुई चाहिये और (अव्याप्यवृत्ति)
किंचिदवयवावच्छेदेन नीलादि उत्पन्न होते हैं, ऐसाभी नहीं कहसकते; क्योंकि
(व्याप्यवृत्ति) सर्वावयवावच्छेदेन स्वाभाविक उत्पन्न होनेवाले नीलपीतादि गुणोंको
(अव्याप्यवृत्ति) किञ्चिदवयवावच्छेदेन उत्पन्न हुए माननाभी उनके स्वभावसे
विरुद्ध है. (तस्मात्) इसलिये अवयवगत नीलपीतादि अनेक प्रकारके रूपोंसे चित्रा-
वयवीमें विलक्षण एक चित्ररूप उत्पन्न होताहै, यही मानना उचित है; इसीसे "एकं
चित्ररूपं" यह अनुभवभी प्रामाणिक है. 'चित्रं' इत्याकारक प्रतीतिके विषयमें अनेक-
रूपोंकी कल्पना करनेमें उपस्थितिकृत गौरवभी है.
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २२७
इत्थंच नीलादीनां पीताद्यारम्भे प्रतिबन्धकत्वकल्पनादवयवि-
नि न पीताद्युत्पत्तिः । एतेन स्पर्शोऽपि व्याख्यातः ।
भाषा-(इत्थञ्च) इस पूर्वोक्त लाघवसे चित्ररूपकी अतिरिक्त सिद्धि हुई तो
नीलादि व्यक्तियोंमें पीतादिव्यक्तियोंके उत्पन्न होनेमें प्रतिबन्धकता कल्पना करनेसे
नीलरूपवाले अवयवीमें पीतरूपकी उत्पत्तिभी नहीं होसकती अर्थात् समवायसम्बन्धेन
पीतरूपं प्रति स्वसमवायिसमवेतत्वसम्बन्धेन पीतातिरिक्त रूपत्वेन पीतातिरिक्त नीला-
दिरूपोंको प्रतिबन्धकता है. इस पूर्वोक्त चित्ररूपके व्याख्यानसे चित्रस्पर्शका
व्याख्यानभी समझलेना अर्थात् चित्रस्पर्शभी अवश्यही अङ्गीकार करना उचित है.
रसादिकमपि नाव्याप्यवृत्तिः किंतु नानाजातीयरसवदवयवैरार-
ब्धेऽवयविनि रसाभावेऽपि न क्षतिः। तत्र रसनयाऽवयवरस
एव गृह्यते, रसनेन्द्रियादीनां द्रव्यग्रहे सामर्थ्याभावात् । अवय-
विनीरस्त्वेऽपि क्षतेरभावात् ।
भाषा-एवं रसादिकभी किंचिदवयवावच्छेदेन उत्पन्न नहीं होते, किन्तु रूपसे
इतनी विलक्षणता है कि-अनेकप्रकारके रसोंवाले अवयवोंसे उत्पन्न हुए अवयवीमें
चित्ररस नाभी मानें तो हानि कुछ नहीं; क्योंकि चित्ररसकी प्रतीति तो अवयवगत
अनेक रसोंसेभी होसकती है. एवं अवयवीमें चित्ररसकी कल्पना करनी व्यर्थ है.
(तत्र) चित्ररसग्रहणस्थलमें रसनेन्द्रियसे अवयवगत रसकाही ग्रहण होताहै.
रसना घ्राण तथा श्रोत्रइन्द्रियमें द्रव्य ग्रहण करनेकी तो सामर्थ्यही नहीं. इसलिये
अवयवीको रसशून्यभी मानलिया जाय तो हानि कुछ नहीं है.
नव्यास्तु तत्राव्याप्यवृत्त्येव नानारूपं नीलादेः पीतादिप्रतिब-
न्धकत्वकल्पने गौरवात् । अतएव "लोहितो यस्तु वर्णेन मुखे
पुच्छे च पाण्डुरः" इत्यादिशास्त्रमप्युपपद्यते ।
भाषा-(नव्यास्तु) और चिन्तामणिकारादि नवीनलोग तौ यह कहते हैं कि-
चित्रावयवीस्थलमें अनेकप्रकारका रूप अव्याप्यवृत्तित्वेन रूपेणही उत्पन्न होताहै; ऐसे
स्थलमें नीलरूपादिकोंमें पीतरूपादिके प्रति प्रतिबन्धकता कल्पना करनीभी महागौरव
है. चित्ररूप कोई पृथक् वर्ण नहीं है, इसीसे "लोहितो यस्तु वर्णेन मुखे पुच्छे च पाण्डु-
रः॥श्वेतः खुरविषाणाभ्यां स नीलो वृष उच्यते" इत्यादि स्कन्धपुराणका वचनभी उप-
पन्न होसकता है अर्थात् इस वचनमें नील(वृष)बलद विसर्जनके उद्देश्यसे अनेक वर्णयुक्त
२२८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
वृषको नीलवृष कहा है. यदि चित्रवर्ण आचार्यको पृथक् स्वीकृत होता तो "चित्रं
वृषं विसर्जयेत्" इतना मात्रही कहता.
न च व्याप्याव्याप्यवृत्तिजातीययोर्द्वयोर्विरोधः, मानाभावात् ।
शंका-व्याप्यवृत्ति स्वभाववाले पदार्थोंको अव्याप्यवृत्ति माननाभी उचित नहीं;
क्योंकि व्याप्यवृत्तित्त्वरूप धर्मका तथा अव्याप्यवृत्तित्त्वरूप धर्मका परस्पर तेजस्ति-
मिरवत् विरोध है. समाधान-रूपादि जो व्याप्यवृत्तित्वेन उत्पन्न होतेहैं वे अव्याप्य-
वृत्तित्वेन उत्पन्न नहीं होसकते; इस विरोधमें कोई प्रमाण नहीं है.
न च लाघवादेकं रूपम् । अनुभवविरोधात् । अन्यथा घटादे-
रपि लाघवादैक्यं स्यादिति । एतेन स्पर्शादिकं व्याख्यातमिति
वदन्ति ॥ १०० ॥
शंका-लाघवसे चित्ररूप एकही मान लिया जाय तो हानि क्याहै? समा०-
एक माननेमें "अयं नीलादिनानावर्णयुक्तोऽवयवी" इत्यादि अनुभवसे विरोध होता
है. (अन्यथा) यदि अनुभवसे विरुद्धभी लाघव स्वीकृत होय तो घटपटादि व्यक्तिभी
संसारमात्रमें लाघवसे एक मानलेनी चाहिये. (एतेन) इसी कथनसे चित्रस्पर्शादि-
का निरासभी समझलेना; (इति वदन्ति) यह सब नवीन लोगोंका कथन है॥१००॥
जलादिपरमाणौ तन्नित्यमन्यत्सहेतुकम् ॥
भाषा-वह रूप जलादि परमाणुओंमें नित्य है और पार्थिवपदार्थमात्रमें जन्य है.
जलादीति । जलपरमाणौ तेजःपरमाणौ च रूपं नित्यम् । पृथि-
वीपरमाणुरूपं तु न नित्यं पाकेन रूपान्तरोत्पत्तेः। न हि घटस्य
पाकानन्तरं तदवयवोऽपक्व उपपद्यते,न हि रक्तकपालस्य कपा-
लिका नीलाद्यवयवा भवति । एवंक्रमेण परमाणावपि पाकसिद्धेः ।
अन्यज्जलतेजःपरमाणुरूपभिन्नं रूपम् । सहेतुकं जन्यम् ।
भाषा-अर्थात् जलीय परमाणुओंमें तथा तैजस परमाणुओंमें रूप नित्य है
और पार्थिव परमाणुओंमें रूप अनित्य है क्योंकि वहां(पाकेन) अग्निसंयोगसे रूपान्त-
रकी उत्पत्ति होतीहै. अग्निसंयोगद्वारा घटके परिपाक होनेसे उसके अवयव परिपक्व
नहीं होते, यह कहना उचित नहीं; क्योंकि अग्निसंयोगसे रक्तहुए (कपाल) घटार्ध-
भागका (कपालिका) छोटा हिस्सा नीलपीतादि अवयवोंवाला देखनेमें नहीं आता,
इसक्रमसे विचारनेसे पार्थिव परमाणुओंमेंभी पाककी सिद्धि होसकतीहै.
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २२९
( अन्यत् ) जल तथा तेजके परमाणुओंके रूपसे भिन्न जो रूप है वह सभी सहेतुक
अग्निसंयोगादि कारणसे उत्पन्न होताहै.
रसं निरूपयति, रसस्त्विति-
भाषा- ' रसस्तु' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार रसका निरूपण करतेहैं-
रसस्तु रसनाग्राह्यो मधुरादिरनेकधा ॥ १०१ ॥
सहकारी रसज्ञाया नित्यत्वादि च पूर्ववत् ॥
भाषा-रसनाइन्द्रियसे ग्रहण होनेवालेका नाम'रस' है.वह रस मधुर, लवण, कटु
कषाय आम्लिक तथा तिक्त भेदसे षट् प्रकारका है ॥ १०१ ॥ और रसनाइन्द्रियका
सहायक है, नित्यता तथा अनित्यता इसकी रूपकी तरहही जान लेनी चाहिये.
सहकारीति । रासनज्ञाने रसः कारणमित्यर्थः । पूर्ववदिति ज-
लपरमाणौ रसो नित्योऽन्यः सर्वोऽपि रसोऽनित्य इत्यर्थः ।
भाषा-अर्थात् रासन साक्षात्कारके प्रति विषयतासम्बन्धसे रसको कारणता है.
पूर्ववत् अर्थात् रूपकी तरह रसभी जलीय परमाणुओंमें नित्य है तथा पार्थिव पदार्थ
मात्रमें अनित्य है.
गन्धं निरूपयति, घ्राणग्राह्य इति-
भाषा-' घ्राणग्राह्यो ' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार गन्धका निरूपण करते हैं.
घ्राणग्राह्यो भवेद्गन्धो घ्राणस्यैवोपकारकः॥१०२॥
भाषा-केवल घ्राणइन्द्रिय ग्रहणके योग्यका नाम 'गन्ध' है.वह गन्ध घ्राणइन्द्रिय
हीका उपकारक है ॥ १०२ ॥
उपकारको घ्राणजन्यज्ञाने कारणमित्यर्थः। गन्धः सर्वोऽनित्य
एव ॥ १०२ ॥
भाषा-( उपकारक ) अर्थात् घ्राणज साक्षात्कारके प्रति विषयतासम्बन्धेन उभ-
यविध गन्धको कारणता है. एवं सभी गन्ध अनित्यही हैं. रूपादिकी तरह नित्य
कोईभी नहीं ॥१०३॥
सौरभश्चासौरभश्च स द्वेधा परिकीर्तितः ।
भाषा-एवं सौरभ तथा असौरभभेदसे वह गन्ध दोप्रकारका है.
स्पर्शं निरूपयति, स्पर्श इति-
भाषा- 'स्पर्शः' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार स्पर्शका निरूपण करतेहैं-
२३० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली-- [ गुण -
स्पर्शस्त्वगिन्द्रियग्राह्यस्त्वचः स्यादुपकारकः ॥१०३॥
भाषा-केवल त्वगिन्द्रियसे ग्रहणके योग्यका नाम 'स्पर्श' है. वह स्पर्श त्वगइ-
न्द्रियका उपकारक है.
उपकारक इति । स्पर्शनप्रत्यक्षे स्पर्शः कारणमित्यर्थः ॥१०३॥
भाषा-स्पर्शनप्रत्यक्षमें विषयतासम्बन्धेन स्पर्शको कारणता है ॥१०३॥
अनुष्णाशीतशीतोष्णभेदात्स त्रिविधो मतः ॥
काठिन्यादि क्षितावेव नित्यत्वादि च पूर्ववत् ॥ १०४ ॥
भाषा-वह स्पर्श शीत उष्ण तथा अनुष्णाशीतभेदसे तीन प्रकारका है. वह स्पर्श
काठिन्यादि धर्मवाला केवल पृथिवीहीमें रहताहै और इस स्पर्शकी नित्यता तथा
अनित्यता ( पूर्ववत् ) रूपादिककी तरहही जानने योग्य है ॥ १०४ ॥
अनुष्णाशीत इति । पृथिव्या वायोश्च स्पर्शोऽनुष्णाशीतः,
जलस्य शीतः, तेजस उष्णः । काठिन्येति । कठिनसुकुमारस्प-
र्शौ पृथिव्या एवेत्यर्थः । कठिनत्वादिकं तु न संयोगनिष्ठो जाति-
विशेषः, चाक्षुषग्राह्यतापत्तेः । पूर्ववदिति । जलतेजोवायुपरमाणु-
स्पर्शा नित्यास्तद्भिन्नस्पर्शास्त्वनित्या इत्यर्थः ॥ १०४ ॥
भाषा-( अनुष्णाशीत इति ) पृथिवीका तथा वायुका स्पर्श अनुष्णाशीत है
अर्थात् न उष्ण है, न शीत है; और जलका स्पर्श शीत है. अग्निआदि तेजःपदार्थका स्पर्श
उष्ण है. एवं कठिनकोमलादि स्पर्शभी पृथिवीमें रहता है. कठिनत्त्वादि धर्मसंयोगनिष्ठ
जातिविशेष नहींहैं; क्योंकि यदि संयोगनिष्ठ जातिविशेष होय तो उसका संयोगकी तरह
चाक्षुषप्रत्यक्षभी हुआ चाहिये; इसलिये 'कठिनत्व' आदि पृथिवीगत स्पर्शकेही
व्याप्यवृत्ति धर्म हैं. ( पूर्ववदिति ) जल तेज तथा वायुके परमाणुओंका स्पर्श
नित्य है. इनसे भिन्न पार्थिवपरमाणुओंका स्पर्श अनित्य है ॥१०१॥
एतेषां पाकजत्वं तु क्षितौ नान्यत्र कुत्रचित् ॥
भाषा-ये रूपरसादि चारों केवल पृथिवीहीमें तेजःसंयोगसे उत्पन्न तथा
परिवर्तन होतेहैं, अन्यत्र जलादिकोंमें नहीं होते.
एतेषां रूपरसगन्धस्पर्शानाम् । नान्यत्रेति । पृथिव्या हि रूपरस-
गन्धस्पर्शपरावृत्तिः पावकसंयोगादुपलभ्यते, न हि शतधापि
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २३१
ध्मायमाने जलादौ रूपादिकं परावर्तते । नीरे सौरभमौष्ण्यं चा-
न्वयव्यतिरेकाभ्यामौपाधिकमेवेति निर्णीयते पवनपृथिव्योः शी-
तस्पर्शादिवत् ।
भाषा-इन रूप रस गन्ध स्पर्शोंकी अग्निसंयोगसे उत्पत्ति केवल पृथिवीहीमें है
और कहीं नहीं. ( नान्यत्रेति ) पृथिवीके रूप रस गन्ध तथा स्पर्शका परिवर्तन
अग्निसंयोगसे हुआ प्रतीत होता है और जलको सैकड़ोंबार तपानेसेभी उसके
रूपका परिवर्तन प्रतीत नहीं होता. एवं जैसे जलके सम्बन्धसे वायुमें तथा पृथिवी-
में शीत स्पर्शका भान होता है वस्तुतः इनमें शीतस्पर्श नहीं है. वैसेही जलमें
सौरभका तथा उष्णताका भानभी पृथिवीतेजःसंसर्गरूप उपाधिके वशसेही विज्ञ
पुरुषोंने अन्वयव्यतिरेकद्वारा निर्णय किया है; वस्तुतः जलमें सौरभ तथा उष्णता
नहीं है.
तत्रापि परमाणौ स्यात्पाको वैशेषिके नये ॥१०५॥
भाषा-उस पृथिवीमेंभी वैशेषिकके सिद्धान्तसे पाक परमाणुओंमें होता है अर्थात्
तेजःसंयोगसे प्रत्येक परमाणुमें रूपादिचतुष्टयका परिवर्तन होता है ॥ १०५ ॥
तत्रापि पृथिवीष्वपि परमाणवेव पाक इति वैशेषिका वदन्ति ।
तेषामयमाशयः । अवयविनाऽवष्टब्धेष्ववयवेषु पाको न सम्भव-
ति, परंतु वह्निसंयोगेनावयविषु विनष्टेषु स्वतन्त्रेषु परमाणुषु
पाकः, पुनश्च पक्वपरमाणुसंयोगाद्द्व्यणुकादिक्रमेण पुनर्महा-
वयविपर्यन्तमुत्पत्तिः, तेजसामतिशयितवेगवशात् पूर्वव्यूहनाशो
झटिति व्यूहान्तरोत्पत्तिश्चेति ।
भाषा-( तत्रापि ) उस अनेक विध पृथिवीमेंभी परमाणुओंहीमें ( पाक )
अग्निसंयोगसे रूपांदिका परिवर्तन होता है, यह ( वैशेषिक ) कणादमुनिके अनु-
यायीलोग कहतेहैं. उनके हृदयका भाव यह है कि-घटादि अवयविसे ( अवष्टब्ध )
निरोधित हुए छोटे कपालकादि अवयवोंमें पाक नहीं होसकता; परन्तु प्रबल
अग्निसंयोगसे अवयवीके विनाशके अनन्तर प्रत्येक अवयवके स्वतंत्र परमाणुओंमें
पाक होता है. फिर परिपक परमाणुओंके परस्परसंयोगसे द्वयणुक त्र्यणुकादि क्रमेण
फिर घटादि महाअवयवी पर्यन्त उत्पत्ति होती है. तेजःपदार्थके अत्यन्त वेगवशसे
शीघ्रही पूर्व ( व्यूह ) संघातका नाश तथा संघातान्तरकी उत्पत्ति होती है-इति
२३२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
अत्र द्व्यणुकादिविनाशमारभ्य कतिभिः क्षणैः पुनरुत्पत्त्या रू-
पादिमद्भवतीति शिष्यबुद्धिवैशद्याय क्षणप्रक्रिया । तत्र विभाग-
जविभागानङ्गीकारे नवक्षणा ।
भाषा-यहां 'द्व्यणुकादि विनाशसे लेकर फिर उत्पन्न हुआ अवयवी कितने
क्षणोंके पश्चात् रूपरसादिवाला होता है?' इस वार्त्ताका शिष्यलोगोंकी बुद्धिके
विशदकरणार्थ निरूपण करते हुए ग्रन्थकार क्षणिक प्रक्रियाको दिखलाते हैं, इस
प्रकरणमें यदि विभागज विभागको ना अङ्गीकार करें अर्थात् (कारण) कपा-
लादि तथा (अकारण) आकाशादिके विभागसे जैसे (कार्य) घटादि तथा
(अकार्य) आकाशादिका विभाग स्वीकृत है, वैसे (कारण) कपालद्वयादि मात्र-
के विभागसे (कारण) कपालादि तथा (अकारण) आकाशादिके विभागको न
मानें तो नवक्षणमें अवयवी विनष्ट होकर फिर रूपादिवाला होजाता है.
विभागजविभागाङ्गीकारे तु विभागः किञ्चित्सापेक्षो विभागं ज-
नयेत्, निरपेक्षस्य तत्त्वे कर्मत्वं स्यात् । संयोगविभागयोरनपेक्षं
कारणं कर्मेति हि वैशेषिकसूत्रम् । स्वोत्तरोत्पन्नभावान्तरानपे-
क्षत्वं च तस्यार्थः । अन्यथा कर्मणोऽप्युत्तरसंयोगजनने पूर्वसं-
योगनाशापेक्षणादव्याप्तिः स्यादिति ।
भाषा-एवं विभागज विभागका अङ्गीकार करें तो विभागभी (किञ्चित्)
स्वसमवायिनिष्ठ क्रियाकी (सापेक्षा) सहकारतासे विभागान्तरको उत्पन्न करेगा;
क्योंकि पदार्थान्तरकी सहकारतासे विना विभागका जनक तो केवल कर्मही है.
यदि विभागभी निरपेक्ष होकर विभागान्तरका जनक होगा तो कर्मके लक्षणकी
उसमें अतिव्याप्ति होगी; क्योंकि संयोगका तथा विभागका जो निरपेक्ष कारण
होय वह कर्म होता है. यह वार्त्ता वैशेषिक शास्त्रके १७ वें सूत्रमें लिखी है अर्थात्
(स्व) कर्म, संयोग तथा विभागको उत्पन्न करता हुआ अपनेसे उत्तरकालमें
उत्पन्न होनेवाले भावान्तरकी अपेक्षा नहीं करता. यह उक्त सूत्रका भावार्थ है.
(अन्यथा) यदि ऐसा अर्थ नहीं करें तो कर्मकोभी उत्तरसंयोगके उत्पन्न
करनेमें पूर्वसंयोग नाशकी अपेक्षाही है. निरपेक्ष कारण नहीं है. एवं उक्त सूत्रलक्षण-
की पूर्वसंयोगनाशकी अपेक्षा करनेवाली कर्मव्यक्तिमें अव्याप्ति होगी.
तत्र यदि द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशविशिष्टं कालमपेक्ष्य विभा-
गजविभागः स्यात्तदा दशक्षणा । अथ द्रव्यनाशाविशिष्टं काल-
मपेक्ष्य विभागजविभागः स्यात् तदैकादशक्षणा ।
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २३३
भाषा-( तत्र ) इस प्रकरणमें ( द्व्यणुकादि ) द्रव्यारम्भक संयोगका जो विनाश
तादृश विनाशविशिष्ट कालकी अपेक्षासे यदि विभागज विभागका विचार
किया जाय तो दशक्षणमें अवयवी फिर रूपादिमान् होसकता है और यदि द्रव्य-
नाशविशिष्ट कालकी अपेक्षाको लेकर विभागज विभागका विचार किया
जाय तो एकादश क्षणमें अवयवी फिर रूपादिवाला होसकताहै.
तथाहि अथ नवक्षणा-वह्निसंयोगात्परमाणौ कर्म, ततः परमाण्व-
न्तरेण विभागः, तत आरम्भकसंयोगनाशः । ततो द्व्यणुकना-
शः १ । ततः परमाणौ श्यामादिनाशः २ । ततो रक्ताद्युत्प-
त्तिः३ । ततो द्रव्यारम्भानुगुणक्रिया ४ । ततो विभागः ५। ततः
पूर्वसंयोगनाशः ६ । तत आरम्भकसंयोगः ७ । ततो द्व्यणुको-
त्पत्तिः ८ । ततो रक्ताद्युत्पत्तिः ९ ।
भाषा-( तथाहि ) इसी वार्ताको नवक्षणादि प्रक्रियाके क्रमसे लिखतेहैं-
पहले अग्निसंयोगसे द्व्यणुकारम्भक परमाणुद्वयमेंसे एक परमाणुमें क्रिया होतीहै. उस
क्रियासे पीछे द्व्यणुकारम्भक परमाणुअन्तरके साथ उस क्रियायुक्त परमाणुका विभाग
होताहै. उसके पीछे द्व्यणुकारम्भक संयोगका नाश होताहै. उसके पीछे द्व्यणुककां
नाश होताहै १ । प्रथमक्षणकी गणनाभी यहांहीसे करनी उचित है; क्योंकि पीछे
ग्रन्थकारने “ द्व्यणुकादिनाशमारभ्य ” इत्यादि कथनसे यही प्रतिज्ञा करीहै. उसके
पीछे परमाणुगत श्यामादि गुणोंका नाश होताहै २ । उसके पीछे तीसरे क्षणमें
परमाणुओंमें रक्तादि गुणोंकी उत्पत्ति होतीहै ३ । उसके पीछे चौथे क्षणमें द्व्यणुक-
रूप द्रव्यकी उत्पादिका क्रिया होतीहै ४ । उसके पीछे पञ्चमक्षणमें उस क्रियासे वि-
भाग होताहै ५ । उसके पीछे छठे क्षणमें विश्लिष्टपरमाणुओंके पूर्वसंयोगका नाश
होताहै ६ । उसके पीछे सातवें क्षणमें द्व्यणुकारम्भकसंयोग होताहै ७ । उसके
पीछे आठवें क्षणमें फिर द्व्यणुककी उत्पत्ति होतीहै ८ । उसके पीछे नवम क्षणमें
रक्तादिगुणोंकी उत्पत्ति होतीहै ९ । इति ।
ननु श्यामादिनाशक्षणे रक्तोत्पत्तिक्षणे वा परमाणौ द्रव्यारम्भानु-
गुणक्रियास्त्विति चेत् । न। अग्निसंयुक्ते परमाणौ यत्कर्म तद्विना-
शमन्तरेण गुणोत्पत्तिमन्तरेण च तत्र परमाणौ क्रियान्तराभा-
वात्, कर्मवति कर्मान्तरानुत्पत्तेः । निर्गुणे द्रव्ये द्रव्यारम्भानुगु-
णक्रियानुपपत्तेश्च ।
१९
२३४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
शंका-श्यामादि गुणोंके नाशक्षणमें या रक्तादि गुणोंकी उत्पत्तिक्षणमें परमाणुओंमें
द्व्यणुकादि द्रव्यकी उत्पादिका क्रिया मान लीजाय तो हानि क्या है? समाधान-
अग्निसंयुक्त परमाणुओंमें जो द्व्यणुकादिका विनाशक प्रथम कर्म है उसके विनाशसे
विना और परमाणुओंमें रक्तादि गुणोंकी उत्पत्तिसे विना उनही परमाणुओंमें द्व्यणु-
कादि द्रव्यारम्भकी. दूसरी क्रिया नहीं होसकती प्रथमक्रिया स्वसत्त्वावस्था में दूसरी
क्रियाकी उत्पत्तिमें प्रतिबन्धक होतीहै; इसलिये क्रियावालेमें क्रियान्तर नहीं होसकती
और निर्गुण द्रव्यमें द्रव्यारम्भणानुकूल क्रियाका होनाही असम्भव है.
तथापि परमाणौ श्यामादिनिवृत्तिसमकालं रक्ताद्युत्पत्तिः स्या-
दिति चेत् । न । पूर्वरूपादिध्वंसस्यापि रूपान्तरे हेतुत्वात् ॥
॥ इति नवक्षणा ॥
शंका-तथापि परमाणुओंमें श्यामादि गुणोंकी निवृत्तिक्षणहीमें रक्तादि गुणोंकी
उत्पत्तिभी मानलीजाय तो एक क्षणका लाघव है. समाधान-यह कथनभी सुयु-
क्तिक नहीं है; क्योंकि पूर्वरूपादि ध्वंसको रूपान्तरादिकी उत्पत्तिमें कारणता है और
कार्यकारणका समकालमें होना असम्भव है । इति नवक्षणा ॥
अथ दशक्षणा-सा चारम्भकसंयोगविनाशविशिष्टं कालमपेक्ष्य
विभागेन विभागजनने सति स्यात् ।
अथ दशक्षणा-वह दशक्षणप्रक्रिया द्रव्यारम्भसंयोगविनाशविशिष्ट कालकी
अपेक्षासे विभागजविभागका अङ्गीकार करनेसे प्रतीत होतीहै अर्थात् द्व्यणुकादि
द्रव्यारम्भक संयोगके विनाशकालहीमें यदि परमाणुद्वयके विभागसे परमाणु तथा
आकाशादिका विभागभी मानलिया जाय तो दशक्षणमें पुनः द्रव्य रूपादिमान् होताहै.
तथाहि । वह्निसंयोगाद्द्व्यणुकारम्भके परमाणौ क्रिया । ततो
विभागः, तत आरम्भकसंयोगनाशः, ततो द्व्यणुकनाशविभाग-
जविभागौ १ । ततः श्यामनाशपूर्वसंयोगनाशौ २ । ततो रक्तो-
त्पत्त्युत्तरसंयोगौ ३ । ततो वह्निनोदनजन्यपरमाणुकर्मणो
नाशः ४ । ततोऽदृष्टवदात्मसंयोगाद्द्रव्यारम्भानुगुणक्रिया ५ ।
ततो विभागः ६ । ततः पूर्वसंयोगनाशः ७ । तत आरम्भकसं-
योगः ८ । ततो द्व्यणुकोत्पत्तिः ९ । ततो रक्ताद्युत्पत्तिः १० ।
॥ इति दशक्षणा ॥
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २३५
भाषा-( तथा हि ) प्रथम अग्निसंयोगसे द्वयणुककारम्भक परमाणुमें क्रिया होतीहै;
उस क्रियासे पीछे परमाणुद्वयका विभाग होताहै. उस विभागसे पीछे द्वयणुकादि
द्रव्यके आरम्भक संयोगका नाश होताहै उसके पीछे द्वयणूकरूप द्रव्यका नाश तथा
परमाणु आकाशका विभाग ये दोनों एकही क्षणमें होतेहैं १ । उससे पीछे द्वितीय
क्षणमें परमाणुगत श्यामादिरूपका नाश तथा परमाणु आकाशके प्रथम संयोगका नाश
ये दोनों एकही क्षणमें होतेहैं २। उससे पीछे तृतीयक्षणमें परमाणुगत रक्तादिकी उत्प-
त्ति तथा परमाणुआकाशका उत्तरसंयोग ये दोनों एकही क्षणमें होतेहैं ३ । उससे
पीछे चतुर्थक्षणमें अग्निनोदनसे उत्पन्न हुई परमाणुगत क्रियाका नाश होता है ४ ।
उससे पीछे पंचमक्षणमें अदृष्टवाले आत्माके संयोगसे अर्थात् वह परिपक्क द्रव्य जिस
जीवात्माके भोगार्थ बनाहै उसके सम्बन्धसे द्रव्यारम्भणानुकूल क्रिया होतीहै ५ ।
उससे पीछे छठे क्षणमें उस क्रियासे परमाण्वाकाशादिका विभाग होताहै ६ । उस
विभागसे पीछे सातवें क्षणमें विभक्त अवयवोंके पूर्वसंयोगका नाश होताहै ७। उससे
पीछे अष्टमक्षणमें द्रव्यारम्भक संयोग होताहै ९। उससे पीछे नवम क्षणमें द्वयणुका-
दि द्रव्यकी उत्पत्ति होतीहै ९ । उससे पीछे दशमक्षणमें रक्तादि गुणोंकी उत्पत्ति
होतीहै १० । इति ।
अथैकादशक्षणा-वह्निसंयोगात्परमाणौ कर्म । ततो विभागः,
ततो द्रव्यारम्भकसंयोगनाशः, ततो द्वयणुकनाशः १। ततो
द्वयणुकनाशविशिष्टं कालमपेक्ष्य विभागजविभागश्यामानाशौ२।
ततः पूर्वसंयोगनाशरक्तोत्पत्ती ३ । तत उत्तरसंयोगः ४।
ततो वह्निनोदनजन्यपरमाणुकर्मनाशः ५ । ततोऽदृष्टवदात्मसं-
योगाद्द्रव्यारम्भानुगुणक्रिया ६ । ततो विभागः ७ । ततः
पूर्वसंयोगनाशः ८। ततो द्रव्यारम्भकसंयोगः ९ । ततो द्वयणु-
कोत्पत्तिः १० । ततो रक्ताद्युत्पत्तिः ११ । इति ॥
अथ एकादशक्षणाप्रक्रिया-अग्निसंयोगसे परमाणुओंमें क्रिया होतीहै, उस
क्रियासे एक परमाणुका दूसरेसे विभाग होताहै. उस विभागसे द्रव्यके आरम्भकसंयो-
गका नाश होताहै उससे पीछे द्वयणूकरूप कार्यद्रव्यका विनाश होताहै १ । उससे
पीछे द्वयणूकरूप द्रव्यनाशाधिकरणकालकी अपेक्षासे दूसरे क्षणमें परमाणुद्वयविभा-
गसे परमाण्वाकाशका विभाग तथा परमाणुगत श्यामादिरूपका नाश होताहै२। उससे
पीछे तीसरे क्षणमें प्रथम जहां परमाणुओंका संयोग था उसका नाश तथा रक्तादि
[Page Header: २३६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण- ]
गुणोंकी उत्पत्ति होतीहै ३ । उससे पीछे चौथे क्षणमें क्रियाकी विश्रान्तिका कारक
परमाणुओंका उत्तरसंयोग होताहै ४ । उससे पीछे पञ्चमक्षणमें अग्निके नोदनसे
उत्पन्न हुए परमाणुगत कर्मका नाश होताहै ५ । उससे पीछे छठे क्षणमें अदृष्टवाले
जीवात्माके संयोगसे द्वयणुकादि द्रव्यके आरम्भणानुकूला क्रिया होतीहै ६ । उस
क्रियासे पीछे सातवें क्षणमें फिर विभाग होताहै ७ । उससे पीछे अष्टमक्षणमें प्रथम
हुए संयोगका नाश होताहै ८। उससे पीछे नवमक्षणमें द्वयणुकादि द्रव्यारम्भक संयोग
होताहै ९ । उससे पीछे दशमक्षणमें द्वयणुकादि द्रव्यकी उत्पत्ति होतीहै १० । उससे
पीछे एकादश क्षणमें फिर द्रव्यमें रक्तादिगुणोंकी उत्पत्ति होतीहै ११ । इति ।
मध्यमशब्दवदेकस्मादग्निसंयोगान्न रूपनाशरक्तोत्पादौ, ताव-
त्कालमेकस्याग्नेरस्थिरत्वात् । किंच यद्युत्पादको नाशकस्तदा
नष्टे रूपादावग्निनाशे नीरूपश्चिरं परमाणुः स्यात् । नाशकश्चेदु-
त्पादकस्तदा रक्तोत्पत्तौ तदग्निनाशे रक्ततरता न स्यात् ॥
भाषा-मध्यमशब्दकी तरह एकही अग्निसंयोग श्यामादि गुणोंका नाशक तथा
रक्तादि गुणोंका उत्पादक नहीं होसकता अर्थात् आदि अन्तके शब्दद्वयको छोड़कर
मध्यवर्त्ति यावत् शब्दोंको जैसे स्वपूर्वशब्दनाशके प्रति तथा स्वउत्तर शब्द उत्पत्तिके
प्रति कारणता है वैसे द्वयणुकादि द्रव्यके विनाशक एकही अग्निसंयोगसे श्यामादि
गुणोंका विनाश तथा रक्तादिकी उत्पत्ति नहीं होसकती; क्योंकि (तावत्कालं)
श्यामानाशोत्पत्तिके अव्यवहित पूर्वक्षणपर्यन्त वह द्वयणुकादि द्रव्यका विनाशक एक
अग्निसंयोगस्थायी नहीं रहता, (किञ्च) इसमें औरभी युक्ति है कि-यदि रक्तादि
उत्पादक अग्निसंयोगहीको श्यामादिविनाशकभी मानें तो श्यामादिरूपके नष्ट होनेसे
दैवात् यदि अग्निसंयोगकाभी नाश होय तो पीछे चिरकालपर्यन्त परमाण्वादि द्रव्य
रूपरहितही पड़ा रहना चाहिये; परन्तु यह वार्त्ता किसी विद्वान्के अनुभवसम्मत
नहीं है. ऐसेही यदि श्यामादि गुणोंके विनाशक अग्निसंयोगकोही रक्तादिका उत्पाद-
कभी मानें तो साधारण रक्तकी उत्पत्तिके अनन्तर यदि दैवात् अग्निसंयोगका नाश
होय तो रक्ततरता नहीं हुई चाहिये; परन्तु साधारण रक्त हुए पीछे अग्निसंयोगनाश
होनेसेभी रक्ततर स्वयं होजाताहै. यह वार्त्ता अनुभवसिद्धहै. इसलिये श्यामादिके विना-
शक तथा रक्तादिके उत्पादक अग्निसंयोग भिन्न २ हैं; यही मानना उचित है.
अथ पञ्चक्षणा-एवं परमाण्वन्तरे कर्मचिन्तनात् पञ्चमादि
क्षणेऽपि गुणोत्पत्तिः ।