न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
पृष्ठ 249, कुल 350 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २२५
शंका-“नीलो नष्टो रक्त उत्पन्नः” यह प्रत्यय तो नीलके समवायके नाशको
तथा रक्तके समवायकी उत्पत्तिको अवगाहन करता है इसलिये इससे नीलपीतादि
व्यक्तियोंमें नानात्व मानना उचित नहीं. समाधान-प्रतीतिमें जिस पदार्थका
( उल्लेख ) भान हो वही उसके विषय होता है. एवं “नीलो नष्टः ” इत्यादि प्रतीतिमें
समवायका भान नहीं है; इसलिये इसको समवायावगाहनी प्रतीति मानना उचित
नहीं है.
न च 'स एवायं नीलः' इति प्रत्ययाल्लाघवाच्चैक्यमिति वाच्यम् ।
प्रत्यक्षस्य तज्जातीयविषयकत्वात्, सैवेयं गुर्जरीतिवत् । लाघवं
तु प्रत्यक्षबाधितम् ।
शंका-“स एवायं नीलः-अर्थात् यह वही नील व्यक्तिहै” इत्याकारक प्रत्ययके
बलसे तथा लाघवसे नीलपीतादि व्यक्ति एकही एक माननी चाहिये. समाधान-“स
एवायं नीलः” इत्याकारक प्रत्यक्ष ज्ञान तो “सैवेयं गुर्जरी”-अर्थात् यह वही गुजरात
देशमें होनेवाली औषधी है” इस ज्ञानकी तरह केवल साजात्यको अवगाहन करता है
अर्थात् व्यक्तिभेदमेंभी पुरुष कहताहै कि-मैनेभी वही औषधी खाई है, जो चैत्रने
खाईथी. एवं आपका लाघवसे संसारमात्रमें एक २ नीलपीतादि व्यक्तियोंका मानना
“नीलो नष्टो रक्त उत्पन्नः ” इत्यादि प्रत्यक्षज्ञानसे बाधित है.
अन्यथा घटादीनामप्यैक्यप्रसङ्गात्। उत्पादविनाशबुद्धेः समवा-
यालम्बनत्वापत्तेरिति । एतेन रसादिकमपि व्याख्यातम् ।
भाषा-( अन्यथा ) यदि केवल लाघवमात्रसेही नीलपीतादि व्यक्तियोंमें ऐक्य-
स्वीकार करो तो घटपटादि पदार्थोंमेंभी ऐक्यही मानना चाहिये. अर्थात् संसारमा-
त्रमें एकही घट तथा एकही पटको मानकर उत्पादविनाशबुद्धिको घटपटादिके
समवायको अवगाहन करनेवाली समझना चाहिये. ( एतेन ) इस पूर्वोक्त कथनसे
रसादिकोंमेंभी यही विचार समझ लेना अर्थात् रसादि व्यक्तियांभी संसारमें
अनेक हैं.
चक्षुर्ग्राह्यमिति । चक्षुर्ग्राह्यविशेषगुणत्वमित्यर्थः । एवमग्रेऽपि। द्र-
व्यादेरिति, उपलम्भकमुपलब्धिकारणम् । इदमेव विवृणोति ।
चक्षुष इति । द्रव्यगुणकर्मसामान्यानां चाक्षुषप्रत्यक्षं प्रत्युद्भूत-
रूपं कारणम् ।