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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 247, कुल 350 में से

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पृष्ठ 247

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता, २२३
द्विधैवेति । असमवायिकारणत्वं निमित्तकारणत्वं च । तथाहि ।
उष्णस्पर्श उष्णस्पर्शस्यासमवायिकारणं पाकजे निमित्तम्, ।
गुरुत्वं गुरुत्वपतनयोरसमवायि प्रतिघाते निमित्तम्, वेगो
वेगस्पन्दयोरसमवाय्यभिघाते निमित्तम्, द्रवत्वं द्रवत्वस्पन्दन-
योरसमवायि संग्रहे निमित्तम्, भेरीदण्डसंयोगः शब्दे निमित्तम् ।
भेर्याकाशसंयोगेऽसमवायी, वंशदलद्वयविभागः शब्दे निमित्तं
वंशदलाकाशविभागेऽसमवायीति ।
भाषा-अर्थात् असमवायिकारणताभी रहतीहै और निमित्तकारणताभी रहती है.
(तथाहि) जैसे कपालादिगत उष्णस्पर्श घटादिगत उष्णस्पर्शका असमवायि-
कारण है, परन्तु घटादिगत पाकजरूपादिकोंके प्रति निमित्तकारणभी है. एवं
कारणगत गुरुत्व कार्यगत गुरुत्वके प्रति तथा आद्यपतनरूपा क्रियाके प्रति असमवायि-
कारण है; परन्तु (प्रतिघात) अभिघाताख्य संयोगके प्रति निमित्तकारणभी है. एवं वेगभी
स्वाव्यवहितोत्तर वेगान्तरके तथा स्पन्दरूपाक्रियाके प्रति असमवायिकारण है परंतु
बाणादिजन्य अभिघाताख्य संयोगके प्रति निमित्तकारणभीहै. एवं कारणगत द्रवत्वभी
कार्यगत द्रवत्वका तथा (स्पन्दन) ढलनरूपा क्रियाका असमवायिकारण है, परन्तु
(संग्रहे) चूर्णादिके पिण्डीभावमें निमित्तकारणभी है. ऐसेही भेरी दण्डका संयोग
शब्दमें निमित्तकारण है और भेरीआकाश संयोगके प्रति असमवायिकारण है. एवं
(वंश) बांसके दोनों दलोंका विभाग शब्दमें निमित्तकारण है और बांसदलके
आकाशसे विभागका असमवायिकारण है-इति ।
-अथ प्रादेशिको भवेत् ॥
वैशेषिको विभुगुणः संयोगादिद्वयं तथा ॥ ९९ ॥
प्रादेशिकोऽव्याप्यवृत्तिः ॥ ९७ ॥ ९८ ॥ ॥ ९९ ॥
भाषा-आकाशादि विभुद्रव्योंके शब्द ज्ञानादि विशेषगुण संयोग तथा विभाग ये
सब १२ गुण (प्रदेश) अव्याप्यवृत्ति हैं अर्थात् किञ्चिदवच्छेदेन रहते हैं ॥ ९९ ॥
यहांतक अनेकगुणोंके एक एक साधर्म्यका निरूपण किया अब इससे
आगे प्रत्येक गुणके साधर्म्यको कहतेहैं-
चक्षुर्ग्राह्यं भवेद्रूपं द्रव्यादेरुपलम्भकम् ॥
चक्षुषः सहकारि स्यात्-