न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण--
संयोगश्च विभागश्च संख्या द्वित्वादिकास्तथा ॥
द्विपृथक्त्वादयस्तद्वदेतेऽनेकाश्रिता गुणाः ॥ ८९ ॥
भाषा-संयोग, विभाग, द्वित्वादिसंख्या, द्विपृथक्त्व, त्रिपृथक्त्व, आदि चार गुण
सर्वदा अनेकाश्रितही रहतेहैं ॥ ८९ ॥
अनेकाश्रिता इति । संयोगविभागद्वित्वादीनि द्विवृत्तीनि, त्रित्व-
चतुष्टादिकं त्रिचतुरादिवृत्तीति बोध्यम् ॥ ८९ ॥
भाषा-यहां अनेक पद एकसे भिन्नमात्रका बोधक है, एवं संयोग विभाग द्वित्वादि
दो द्रव्योंमें रहते हैं और त्रित्व चतुष्टादि तीनों चारोंमें रहते हैं, ऐसे जानना चाहिये ८९
अतः शेषा गुणाः सर्वे मता एकैकवृत्तयः ॥
भाषा-इन चारसे (शेष) बाकी सभी गुण एक २ द्रव्यमें नियमसे रहते हैं.
अतः शेषा इति । रूपरसगन्धस्पर्शैकत्वपरिमाणैकपृथक्त्वपर-
त्वापरत्वबुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नगुरुत्वद्रवत्वस्नेहसंस्कारा-
दृष्टशब्दा इत्यर्थः ।
भाषा-अर्थात् रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, एकत्व, परिमाण, एकपृथक्त्व, परत्व,
अपरत्व, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह, संस्कार,
धर्म, अधर्म, तथा शब्द ये २२ गुण एक एकही द्रव्यमें रहते हैं.
बुद्ध्यादिषट्कं स्पर्शान्ताः स्नेहः सांसिद्धिको द्रवः ९०
अदृष्टभावनाशब्दा अमी वैशेषिका गुणाः ॥
भाषा-बुद्धि आदि छः, तथा रूपादि स्पर्शान्त चार, एवं स्नेह तथा सांसि-
द्धिक द्रवत्व ॥९०॥ अदृष्ट भावनाख्य संस्कार तथा शब्द ये सब १६ विशेष गुण
कहलाते हैं.
बुद्ध्यादीति । बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्ना इत्यर्थः । स्पर्शा-
न्ता रूपरसगन्धस्पर्शा इत्यर्थः । द्रवो द्रवत्वम् ॥ ९० ॥
भाषा-बुद्धि, सुख, दुःख,इच्छा, द्वेष, प्रयत्न ये षट् बुद्ध्यादि हैं; रूप रस गन्ध
स्पर्श ये चार स्पर्शान्त हैं; 'द्रव' नाम द्रवणरूपा क्रियाकाभी है, उसके वारणार्थ
'द्रव्यत्व' यह विवरण किया है. यह निःसन्देह गुणविशेषका वाचक है ॥ ९० ॥