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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 243, कुल 350 में से

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पृष्ठ 243

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २१९
वैशेषिका इति । विशेषा एव वैशेषिकाः, स्वार्थे ठक्, विशेषगु-
णा इत्यर्थः ।
भाषा-( वैशेषिका इति ) 'विशेष' तथा 'वैशेषिक' ये दोनों एकार्थबोधक शब्द
हैं. केवल “ विनयादिभ्यष्ठक् ५।४।३४ ” इस सूत्रसे किये ' ठक् '
प्रत्ययकृत शब्द स्वरूप मात्रका भेद है, अर्थका नहीं. “द्रव्यविभाजकोपाधिद्वय-
समानाधिकरणावृत्ति द्रव्यकर्मावृत्ति जातिमत्त्वं विशेषगुणत्वम् ” यह विशेषगुण-
मात्रका अनुगत एक लक्षण है; अर्थात् द्रव्यकी विभाजक उपाधिद्वय कोईएक
पृथिवीत्व जलत्वादि उन दोनोंके समानाधिकरण पृथिवी जलादि उभयमें न रहने-
वाली तथा द्रव्यकर्म उभयमेंभी न रहनेवाली जो बुद्ध्यादि कतिपय गुणोंमें रहने
वाली जाति, तादृश जातिमत्त्व पूर्वोक्त सभी विशेष गुणोंमें अनुगत है-इति ।
संख्यादिरपरत्वान्तो द्रवोऽसांसिद्धिकस्तथा॥९१॥
गुरुत्ववेगौ सामान्यगुणा एते प्रकीर्तिताः ॥
भाषा-संख्यासे आदिलेकर अपरत्व पर्यन्त सात और नैमित्तिक द्रवत्व ॥९१॥
गुरुत्व तथा वेगाख्यसंस्कार ये दश सामान्यगुण कहलाते हैं.
सङ्ख्यादिरिति । सङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागपरत्वापर-
त्वानीत्यर्थः । ॥ ९१ ॥
भाषा-संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, तथा अपरत्व ये सात
संख्यादि हैं ॥ ९१ ॥
संख्यादिरपरत्वान्तो द्रवत्वं स्नेह एव च ॥ ९२ ॥
एते तु द्वीन्द्रियग्राह्याः-
द्वीन्द्रियेति । चक्षुषा त्वचापि ग्रहणयोग्यत्वात् ।
भाषा-संख्यासे आदि लेकर अपरत्व पर्यन्त सात और द्रवत्व तथा स्नेह ॥९२॥
ये नव गुण नेत्र तथा त्वग् इन दोनों इन्द्रियोंसे ग्रहण होसकते हैं.
-अथ स्पर्शान्तशब्दकाः ॥
बाह्यैकैकेन्द्रियग्राह्याः-
बाह्येति । रूपादीनां चक्षुरादिग्राह्यत्वात् ।